आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 वर्णलाभ क्रिया
तेरहवीं ‘वर्णलाभ’ क्रिया में भव्य अन्य साधर्मी श्रावकों से संबंध स्थापित करता है। वह चार श्रावकों को बुलाकर कहता है कि उसने समस्त गृहस्थ धर्म का पालन किया, दान दिए, गुरुपूजन किया, और मिथ्याधर्म त्यागकर सम्यक् चारित्र अपनाया। वह यज्ञोपवीत, श्रावकाचार, और पत्नी के संस्कार पूर्ण कर चुका है। श्रावक उसे प्रशंसा कर वर्णलाभ प्रदान करते हैं, जिससे वह उनके समान हो जाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
चतुरः श्रावकज्येष्ठाना हूय कृतसत्क्रियान् । तान् ब्रूयादस्म्यनुग्राह्यो भवद्भिः स्वसमीकृतः ॥६२॥
इस क्रियाके करते समय वह भव्य चार बड़े बड़े श्रावकोंको आदर सत्कार कर बुलावे और उनसे कहे कि आप लोग मुझे अपने समान बनाकर मेरा अनुग्रह कीजिये ।। ६२।।
While performing this rite, the noble soul respectfully invites four eminent Śrāvakas, honoring them with reverence and hospitality, and humbly entreats them, saying:“Kindly bestow your grace upon me by accepting me as one among your own.”62
श्लोक ( Shlok ) 63
यूयं निस्तारका देवब्राह्मणा लोकपूजिताः । अहं च कृतदीक्षोऽस्मि गृहीतोपासकव्रतः ॥६३॥
आप लोग संसारसे पार करनेवाले देव ब्राह्मण हैं, संसारमें पूज्य हैं और मैंने भी दीक्षा लेकर श्रावकके व्रत ग्रहण किये हैं ।। ६३ ।।
“You are the divine Brāhmaṇas—guides who lead souls across the ocean of saṃsāra—venerable in this world. I too have embraced initiation and undertaken the vows of a Śrāvaka.”63
श्लोक ( Shlok ) 64
मया तु चरितो धर्मः पुष्कलो गृहमेधिनाम् । दत्तान्यपि च दानानि कृतं च गुरुपूजनम् ॥६४॥
मैंने गृहस्थों-के संपूर्ण धर्मका आचरण किया है, दान भी दिये हैं और गुरुओंका पूजन भी किया है ।।६४।।
“I have observed the full conduct befitting a householder’s dharma, have offered alms with devotion, and have rendered worship unto the venerable Gurus.”64
श्लोक ( Shlok ) 65
अयोनिसम्भवं जन्म लब्ध्वाहं गुर्वनुग्रहात् । चिरभावितमुत्सृज्य प्राप्तो वृत्तमभावितम् ॥६५॥
मैंने गुरुके अनुग्रहसे योनिके बिना ही उत्पन्न होनेवाला जन्म धारण किया है, और चिर कालसे पालन किये हुए मिथ्याधर्मको छोड़कर जिसका पहले कभी चिन्तवन भी नहीं किया था ऐसा सम्यक् चारित्र धारण किया है ।॥ ६५॥
“By the grace of the Guru, I have taken birth in a manner free from the bonds of sensual origin. Abandoning the false faith I had long upheld, I have now embraced right conduct—Samyak-cāritra—which I had never before even contemplated.”65
श्लोक ( Shlok ) 66
व्रतसिद्ध्यर्थमेवाहमुपनीतोऽस्मि साम्प्रतम् । कृतविद्यश्च जातोऽस्मि ‘स्वधीतोपासकश्रुतः ॥६६॥
व्रतोंकी सिद्धिके लिये ही मैंने इस समय यज्ञोपवीत धारण किया है और श्रावकाचारका अच्छी तरह अध्ययन कर विद्वान् भी हो गया हूं ।।६६।।
For the perfection of my vows, I have now adorned myself with the sacred thread, and through diligent study of the Śrāvaka-ācāra, I have become well-versed in the sacred disciplines, attaining both learning and insight.66
श्लोक ( Shlok ) 67
व्रतावतरणस्यान्ते स्वीकृताभरणोऽस्म्यहम् । पत्नी च संस्कृताऽऽत्मीया कृतपाणिग्रहा पुनः ॥ ६७।।
व्रतावतरण क्रिया के बाद ही मैंने आभूषण स्वीकार किये हुए हैं, मैंने अपनी पत्नीके भी संस्कार किये हैं और उसके साथ दुबारा विवाहसंस्कार भी किया है ।।६७।।
Only after performing the rite of Vratāvataraṇa did I accept ornaments once more. I have also sanctified my wife through the appropriate rites and have solemnized a second marriage with her in accordance with sacred law.67
श्लोक ( Shlok ) 68
एवं कृतव्रतस्याद्य वर्णलाभो ममोचितः । सुलभः सोऽपि युष्माकमनुज्ञानात् सधर्मणाम् ॥६८॥
इस प्रकार व्रत धारण करनेवाले मुझको वर्णलाभकी प्राप्ति होना उचित है और वह भी आप साधर्मी पुरुषोंकी आज्ञासे सहज ही प्राप्त हो सकती है ।। ६८ ।।
Thus, as one who has rightfully undertaken sacred vows, it is fitting that I be granted Varṇalābha. And this honor may readily be bestowed through the gracious assent of you, my noble fellow aspirants in the path of Dharma.68
श्लोक ( Shlok ) 69
इत्युक्तास्ते च तं सत्यमेवमस्तु समञ्जसम्। त्वयोक्तं श्लाध्यमेवैतत् कोऽन्यस्त्वत्सदृशो द्विजः ॥६९॥
इस प्रकार कह चुकनेपर वे श्रावक कहें कि ठीक है, ऐसा ही होगा, तुमने जो कुछ कहा है वह सब प्रशंसनीय है, तुम्हारे समान और दूसरा द्विज कौन है ? ॥६९॥
Having heard these words, the Śrāvakas shall reply: “So be it—it shall indeed be as you have spoken. All that you have declared is truly praiseworthy. Who among the twice-born could be deemed equal to you?”69
श्लोक ( Shlok ) 70
युष्मादृशामलाभे तु मिथ्यादृष्टिभिरप्यमा । समानाजीविभिः कर्तु सम्बन्धोऽभिमतो हि नः ॥७०।।
आप जैसे पुरुषोंके न मिलनेपर हम लोगोंको समान जीविका करनेवाले मिथ्यादृष्टियों के साथ भी सम्बन्ध करना पड़ता है ॥७०।।
In the absence of noble souls such as yourself, we are at times compelled to associate even with those of false vision, provided their livelihood resembles our own.70
श्लोक ( Shlok ) 71
इत्युक्त्वैनं समाश्वास्य वर्णलाभेन युञ्जते । विधिवत् सोऽपि तं लब्ध्वा याति तत्समकक्षताम् ॥७१॥इति वर्णलाभक्रिया ।
इस प्रकार कहकर वे श्रावक उसे आश्वासन दें और वर्णलाभसे युक्त करावें तथा वह भव्य भी विधिपूर्वक वर्णलाभको पाकर उन सब श्रावकों-की समानताको प्राप्त होता है ।॥ ७१ ॥ यह तेरहवीं वर्णलाभ नामकी क्रिया है।71
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
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