आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 355 to 371
श्लोक ( Shlok ) 355
स्नेहेनेष्टवियोगोत्थः प्रदीप्तः शोकपावकः । तदा प्रबुद्धमप्यस्य चेतोऽ धाक्षीदधीशितुः ॥३५५॥
इधर उस समय इष्टके वियोगसे उत्पन्न हुई और स्नेहसे प्रज्वलित हुई शोकरूपी अग्नि भरतके प्रबुद्ध चित्तको भी जला रही थी ॥ ३५५॥
Meanwhile, at that time, the fire of grief—arising from the separation from his beloved and kindled by deep affection—was also consuming Bharata’s awakened mind. ॥355॥
श्लोक ( Shlok ) 356
गणी वृषभसेनाख्यस्तच्छोकापनिनीषया । प्राक्रस्त वक्तुं सर्वेषां स्वेषां व्यक्तां भवावलीम् ॥३५६।
जब भरतका यह हाल देखा तब वृषभसेन गणधर भरतका शोक दूर करनेकी इच्छा से अपने सब लोगोंके पूर्वभव स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥३५६॥
When Vṛṣabhasena, the Ganadhara, saw Bharata in this state, he desired to dispel Bharata’s sorrow. Thus, he began to recount clearly the previous births of all those present. ॥356॥
श्लोक ( Shlok ) 357 – 359
जयवर्मा भवे पूर्वे द्वितीयेऽभून्महाबलः । तुतीये ललिताङ्गाख्यो वज्रजङ्घश्चतुर्थके ॥३५७॥पञ्चमे भोगभूजोऽभूत् षष्ठेऽयं श्रीधरोऽमरः । सप्तमे सुविधिः क्ष्माभृद ष्टमेऽच्युतनायकः ॥३५८॥नवमे वज्रनाभीशो दशयेऽनुत्तरान्त्यजः । ततोऽवतीर्य सर्वेन्द्रवन्दितो वृषभोऽभवत् ॥३५९॥
उन्होंने कहा कि वृषभदेवका जीव पहले भवमें जयवर्मा था दूसरे भवमें महाबल हुआ, तीसरे भवमें ललिताङ्गदेव और चौथे भवमें राजा वज्रजंघ हुआ । पांचवें भवमें भोग-भूमिका आर्य हुआ । छठवें भवमें श्रीधरदेव हुआ, सातवें भवमें सुविधि राजा हुआ । आठवें भवमें अच्युतेन्द्र हुआ, नौवें भवमें राजा वज्रनाभि हुआ, दशवें भवमें सर्वार्थसिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ और वहांसे आकर सब इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय वृषभदेव हुआ है ॥ ३५७-३५९॥
He said: “The soul of Lord Vṛṣabhadeva was, in his first birth, Jayavarma; in his second, Mahabala; in the third, Lalitangadeva; and in the fourth, King Vajrajangha. In his fifth birth, he was an Arya in the Bhogabhumi. In his sixth, he became Shridhara Deva; in the seventh, King Suvidhi. In the eighth birth, he was Achyutendra; in the ninth, King Vajranabhi; and in the tenth birth, he attained the status of Ahamindra in Sarvarthasiddhi. From there, he descended and was venerated by all the heavenly kings, becoming the revered Lord Vṛṣabhadeva.” ॥357–359॥
श्लोक ( Shlok ) 360 – 362
धनश्रीरादिमे जन्मन्यतो निर्णायिका ततः । स्वयंप्रभा ततस्तस्माच्छ्र मत्यार्या ततोऽभवत् ॥३६०॥स्वयंप्रभः सुरस्तस्मादस्मादपि च केशवः । ततः प्रतीन्द्रस्तस्माच्च धनदत्तोऽहमिन्द्रताम् ॥३६१॥गतस्ततस्ततः श्रेयान् दानतीर्थस्य नायकः । आश्चर्य पञ्चकस्यापि प्रथमोऽभूत् प्रवर्त्तकः ॥३६२॥
श्रेयान् का जीव पहले भवमें घनश्री था, दूसरे भवमें निर्णामिका, तीसरे भवमें स्वयंप्रभा देवी, चौथे भवमें श्रीमती, पांचवें भवमें भोगभूमिकी आर्या, छठवें भवमें स्वयंप्रभदेव, सातवें भवमें केशव, आठवें भवमें अच्युतस्वर्गका प्रतीन्द्र, नौवें भवमें धनदत्त, दशवें भवमें अहमिन्द्र हुआ और वहांसे आकर दानतीर्थका नायक तथा पंचाश्चर्यकी सबसे पहले प्रवृत्ति करानेवाला राजा श्रेयान् हुआ है ।।३६०-३६२।।
“The soul of Shreyāns was, in his first birth, Ghanashri; in the second, Nirnamika; in the third, the goddess Swayamprabha; in the fourth, Shrimati; in the fifth, an Arya in the Bhogabhumi; in the sixth, Swayamprabhadeva; in the seventh, Keshava; in the eighth, a sub-king in Achyuta heaven; in the ninth, Dhanadatta; in the tenth, Ahamindra. From there, he descended to become King Shreyāns, the foremost initiator of the five wondrous donations (panchashcharya) and the noble leader of the charity tradition.” ॥360–362॥
श्लोक ( Shlok ) 363 – 364
अतिगृद्धः पुरा पश्चान्नारकोऽन चमूरकः । दिवाकरप्रभो देवस्तथा मतिवराह्वयः ॥३६३॥ततोऽहमिन्द्रस्तस्माच्च सुबाहुरहमिन्द्रताम् । प्राप्य त्वं भरतो जातः षट्खण्डाखण्डपालकः ॥३६४।॥
तेरा जीव पहले भवमें अतिगृद्ध नामका राजा था, दूसरे भवमें नारकी हुआ, तीसरे भवमें शार्दूल हुआ, चौथे भवमें दिवाकर प्रभदेव हुआ, पांचवें भवमें मतिवर हुआ, छठवें भवमें अहमिन्द्र हुआ, सातवें भवमें सुबाहु हुआ, आठवें भवमें अर्हमिन्द्र हुआ और नौवें भवमें छह खण्ड पृथिवीका अखण्ड पालन करनेवाला भरत हुआ है ।।३६३-३६४।।
“Your soul was, in its first birth, King Atigṛiddha; in the second, a denizen of hell; in the third, a lion (Shārdūla); in the fourth, Divākaraprabha Deva; in the fifth, Mativara; in the sixth, Ahamindra; in the seventh, Subāhu; in the eighth, Arhamindra; and in the ninth birth, you became Bharata, the sovereign ruler of the entire six-part continent, maintaining its undivided dominion.” ॥363–364॥
श्लोक ( Shlok ) 365 – 366
आद्यः सेनापतिः पश्चादार्यस्तस्मात्प्रभङ्करः । ततोऽकम्पनभूपालः कल्पातीतस्ततस्ततः ॥३६५॥ महाबाहुस्ततश्चाभूद हमिन्द्रस्ततश्च्युतः । एष बाहुबली जातो जातापूर्वमहोदयः ॥३६६॥
बाहु-बलीका जीव पहले सेनापति था, फिर भोगभूमिमें आर्य हुआ । उसके बाद प्रभंकर देव हुआ, तदनन्तर अकंपन हुआ, उसके पश्चात् अहमिन्द्र हुआ, फिर महाबाहु हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ और अब उसके बाद अपूर्व महा उदयको धारण करनेवाला बाहुबली हुआ है ।।३६५-३६६।।
“The soul of Bāhubalī was first a commander-in-chief; then, in the Bhogabhumi, an Arya. After that, he was born as Prabhankara Deva; then as Akampana; thereafter as Ahamindra; then as Mahabāhu; again as Ahamindra; and now, he has incarnated as Bāhubalī, endowed with unprecedented and exalted fortune.” ॥365–366॥
श्लोक ( Shlok ) 367 – 369
मन्त्री प्राग् भोगभूजोऽनु सुरोऽनु कनकप्रभः । आनन्दोऽन्वहमिन्द्रोऽनु ततः पीठा ह्वयस्ततः ॥३६७॥ अहमिन्द्रोऽग्रिमोऽभूवमहमद्य गणाधिपः । पुरोहितस्ततश्चार्यो बभूवास्मत्प्रभञ्जनः ॥३६८॥ धनभित्रस्ततस्तस्मादहमिन्द्रस्ततश्च्युतः । महापीठोऽहमिन्द्रोऽस्मादनन्तविजयोऽभवत् ॥३६९॥
मैं पहले भवमें राजा प्रीतिवर्धनका मंत्री था, उसके बाद भोग-भूमिका आर्य हुआ, फिर कनकप्रभदेव हुआ, उसके पश्चात् आनन्द हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ, वहांसे आकर पीठ हुआ, फिर सर्वार्थ-सिद्धिका अहमिन्द्र हुआ और अब भगवान् वृषभदेवका गणधर हुआ हूं । अनन्तविजयका जीव सबसे पहले पुरोहित था, फिर भोगभूमिका आर्य हुआ, उसके बाद प्रभंजन नामका देव हुआ, फिर धनमित्र हुआ, उसके पश्चात् अहमिन्द्र हुआ, उसके अनन्तर महापीठ हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ और अब अनन्तविजय गणधर हुआ है ।। ३६७-३६९॥
“I myself was, in my first birth, a minister to King Prītivardhana; then an Arya in the Bhogabhumi; next, I was born as Kanakaprabha Deva; afterward as Ānanda; then as Ahamindra; from there, I incarnated as Pīṭha; then again as Ahamindra in Sarvārthasiddhi; and now, I am a Ganadhara of Lord Vṛṣabhadeva.As for the soul of Anantavijaya: first, he was a royal priest; then an Arya in the Bhogabhumi; after that, he was born as the deity Prabhanjana; then as Dhanamitra; thereafter as Ahamindra; next as Mahāpīṭha; then once more as Ahamindra; and now he has become Anantavijaya, the Ganadhara.” ॥367–369॥
श्लोक ( Shlok ) 370 – 371
उग्रसेनश्वभूरोऽतो भोगभूमिसमुद्भवः । ततश्चित्राङ्गदस्तस्माद् बरदत्तः सुरो जयः ॥३७०।। ततो गत्वाऽहमिन्द्रोऽभूत्तस्माच्चागत्य भूतलम् । महासेनोऽभवत् कर्ममहासेनाजयोर्जितः ॥३७१॥
महासेन पहले भवमें उग्रसेन था, दूसरे भवमें शार्दूल हुआ, तीसरे भवमें भोगभूमिका आर्य हुआ, चौथे भवमें चित्राङ्गद देव हुआ, पांचवें भवमें वरदत्त राजा हुआ, छठवें भवमें देव हुआ, सातवें भवमें जय हुआ, वहां-से चलकर आठवें भवमें अहमिन्द्र हुआ और नौवें भवमें वहांसे पृथिवीपर आकर कर्मरूपी महासेनाको जीतनेमें अत्यन्त बलवान् महासेन हुआ है ॥ ३७०-३७१॥
“Mahāsena’s soul was, in his first birth, Ugrasena; in the second, a lion (Shārdūla); in the third, an Arya in the Bhogabhumi; in the fourth, Citrāṅgada Deva; in the fifth, King Varadatta; in the sixth, a celestial being; in the seventh, Jaya; from there, he advanced to become Ahamindra in his eighth birth; and from that heavenly realm, in his ninth birth, he descended to earth as Mahāsena, supremely powerful in conquering the great army of karmas.” ॥370–371॥
श्लोक 372 से 381
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354