आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 343 to 354
श्लोक ( Shlok ) 343 – 346
तदागत्य सुराः सर्वे प्रान्तपूजाचिकीर्षया । पवित्रं परमं मोक्षसाधनं शुचिनिर्मलम् ॥३४३।।शरीरं भर्तुरस्येति परार्द्ध्यशिबिकार्पितम् । अग्रीन्द्ररत्नभाभासिप्रोत्तुङ्गमुकुटोद्भुवा ॥३४४॥चन्दनागुरुकर्पूरपारी ‘काश्मीरजादिभिः । घृतक्षीरादिभिश्चाप्तवृद्धिना हुतभोजिना ॥३४५॥जगद्गृहस्य सौगन्ध्यं सम्पाद्याभूतपूर्वकम् । तदाकारोपमर्देन’ पर्यायान्तरमानयन् ॥३४६॥
उसी समय मोक्ष-कल्याणकको पूजा करनेकी इच्छासे सब देव लोग आये उन्होंने “यह भगवान् का शरीर पवित्र, उत्कृष्ट, मोक्षका साधन, स्वच्छ और निर्मल है” यह विचारकर उसे बहुमूल्य पालकी में विराजमान किया । तदनन्तर जो अग्निकुमार देवोंके इन्द्रके रत्नोंकी कान्तिसे देदीप्यमान उन्नत मुकुटसे उत्पन्न हुई है तथा चन्दन, अगुरु, कपूर, केशर आदि सुगन्धित पदार्थों और घी दूध आदिसे बढ़ाई गई है ऐसी अग्निसे जगत् की अभूतपूर्व सुगन्धि प्रकट कर उसका वर्तमान आकार नष्ट कर दिया और इस प्रकार उसे दूसरी पर्याय प्राप्त करा दी ॥ ३४३-३४६।।
At that very moment, desiring to celebrate the auspicious event of liberation (moksha-kalyanaka), all the celestial beings assembled. Reflecting, “This body of the Blessed Lord is sacred, supreme, a means to liberation, immaculate, and pure,” they reverently placed it upon a priceless palanquin.Then, through a fire—born of the resplendent crown of the Agnikumar gods’ lord, which shone with the brilliance of celestial gems, and kindled with fragrant substances such as sandalwood, aloe, camphor, saffron, along with ghee, milk, and other offerings—they spread an unparalleled fragrance across the worlds, consumed the present corporeal form, and thus enabled him to transition into his next, liberated state. ॥343–346॥
श्लोक ( Shlok ) 347 – 350
अभ्यर्चिताग्निकुण्डस्य गन्धयुष्पादिभिस्तथा । तस्य दक्षिणभागेऽभूद् गणभृत्संस्क्रियानलः ॥३४७॥तस्यापरस्मिन् दिग्भागे शेषकेवलिकायगः । एवं वह्नित्रयं भूमा अवस्थाप्यामरेश्वराः ॥३४८॥ततो भस्म समादाय पञ्चकल्याणभागिनः । वयं चैवं भवामेति स्वललाटे भुजद्वये ॥३४९llकण्ठे हृदयदेश च तेन’ संस्पृश्य भक्तितः । तत्पवित्रतमं मत्वा धर्मरागरसाहिताः ॥३५०॥
गन्ध, पुष्प आदिसे जिसकी पूजा की गई है ऐसे उस अग्निकुण्डके दाहिनी ओर गणधरोंके शरीरका संस्कार करनेवाली अग्नि स्थापित की और बांई ओर तीर्थकर तथा गणधरोंसे अतिरिक्त अन्य सामान्य केवलियोंके शरीरका संस्कार करनेवाली अग्नि स्थापित की, इस प्रकार इन्द्रोंने पृथिवीपर तीन प्रकारकी अग्नि स्थापित की । तदनन्तर उन्हीं इन्द्रोंने पंच कल्याणकको प्राप्त होनेवाले श्री वृषभदेवके शरीरकी भस्म उठाई और ‘हम लोग भी ऐसे ही हों’ यही सोचकर बड़ी भक्तिसे अपने ललाटपर दोनों भुजाओंमें, गलेमें और वक्षःस्थलमें लगाई । वे सब उस भस्मको अत्यन्त पवित्र मानकर धर्मानुरागके रससे तन्मय हो रहे थे ॥ ३४७-३५०।।
eside that sacrificial fire—adorned with offerings of fragrance, flowers, and other auspicious items—the gods established three distinct fires upon the earth: on the right, a fire consecrated for the cremation of the bodies of the Ganadharas; on the left, a fire designated for the cremation of the bodies of ordinary Kevalins other than the Tirthankaras and Ganadharas; and the central fire, already enkindled for the blessed body of Lord Rishabhadeva, who had attained the five auspicious events (panch kalyanaka).Then, the Indras reverently gathered the sacred ashes of Lord Rishabhadeva’s body and, thinking, “May we too become like him,” they devotedly applied the ashes to their foreheads, both arms, necks, and chests. Considering those ashes supremely holy, they became completely immersed in the nectar of devotion to Dharma. ॥347–350॥
श्लोक ( Shlok ) 351 – 354
तोषाद् सम्पादयामासुः सम्भूयानन्दनाटकम् । सप्तमोपासकाद्यास्ते सर्वेऽपि ब्रह्मचारिणः ॥३५१॥गार्हपत्याभिधं पूर्व परमाहवनीयकम् । दक्षिणाग्नि ततो न्यस्य सन्ध्यासु तिसृषु स्वयम् ॥३५२॥तच्छिखित्रयसानिध्य चक्रमातपवारणम् । जिनेन्द्रप्रतिमाश्चैवा स्थाप्य मन्त्रपुरस्सरम्।। ३५३।।तास्त्रिकालं समभ्यर्च्य गृहस्थै विहितादराः । भवतातिथयों यूयमित्याचख्युरुपासकान् ॥३५४।।
सबने मिलकर बड़े संतोषसे आनन्द नामका नाटक किया और फिर श्रावकोंको उपदेश दिया कि ‘हे सप्तमादि प्रतिमाओंको धारण करनेवाले सभी ब्रह्मचारियो, तुम लोग तीनों संध्याओंमें स्वयं गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि इन तीन अग्नियोंकी स्थापना करो, और उनके समीप ही धर्मचक्र, छत्र तथा जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाओं की स्थापनाकर तीनों काल मन्त्रपूर्वक उनकी पूजा करो। इस प्रकार गृहस्थोंके द्वारा आदर सत्कार पाते हुए अतिथि बनो’ ॥ ३५१-३५४।।
All the gods together joyfully performed the grand Ananda play, and then instructed the lay followers, saying:
“O celibate householders who observe the seventh and higher pratimas, establish daily the three sacred fires—Garhapatya, Ahavaniya, and Dakshinagni—at the three sandhyas (dawn, noon, and dusk). Near these fires, install the Dharma-wheel (dharmachakra), the royal canopy (chatra), and the images of the Jina. Perform their worship at each of the three times with proper recitation of mantras. In this way, by honoring these rites, become worthy recipients of reverence as noble guests within the householder community.” ॥351–354॥
श्लोक 355 से 371
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342