पर्व 48 – श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 143
संभवनाथ तीर्थकर का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 12 : पूर्वभव में विमलवाहन राजा का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म बन्ध
संभवनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए वर्णन आता है कि पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर के राजा विमलवाहन संसार की नश्वरता, आयु की क्षणभंगुरता और विषयभोगों की असारता का गहन चिंतन कर वैराग्य को प्राप्त हुए। उन्होंने राज्य पुत्र को सौंपकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्र से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। जीवनांत में वे प्रथम ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान में महान् अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 13 से 21 : अहमिन्द्र देव से संभवनाथ के गर्भ और जन्म कल्याणक तक
अहमिन्द्र रूप में दिव्य सुख भोगने के बाद वही जीव भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी में राजा दृढ़राज्य और रानी सुषेणा के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और कार्तिक पूर्णिमा को भगवान् संभवनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से लोक में सुख का संचार हुआ और देवों ने उनके दिव्य स्वरूप तथा जगत्-हितकारी महिमा की स्तुति की।
श्लोक 22 से 31 : जन्ममहिमा, राज्यवैभव और वैराग्य की पुनः जागृति
देवों ने संभवनाथ के तेज, ज्ञान और लोकहितकारी स्वरूप की प्रशंसा की। भगवान् दीर्घकाल तक राजवैभव भोगते रहे, परंतु मेघों की चंचलता देखकर उन्हें पुनः संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने समझा कि आयुकर्म ही वास्तविक मृत्युकारक है और जीव अज्ञानवश शरीर एवं विषयों में आसक्त होकर दुःख पाता है।
श्लोक 32 से 41 : दीक्षा, तप और केवलज्ञान
भगवान् ने राज्य त्यागकर पुत्र को सौंपा और सहस्र राजाओं सहित संयम ग्रहण किया। दीक्षा के साथ उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। चौदह वर्ष तक कठोर तप एवं मौन साधना के पश्चात् शाल्मली वृक्ष के नीचे उन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया और ज्ञानकल्याणक सम्पन्न हुआ।
श्लोक 42 से 54 : धर्मतीर्थ स्थापना, विशाल संघ और दिव्य प्रभाव
केवलज्ञान के बाद भगवान् संभवनाथ ने विशाल धर्मसंघ की स्थापना की जिसमें गणधर, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ और असंख्य देव सम्मिलित थे। वे चौंतीस अतिशयों और आठ प्रातिहार्यों से विभूषित थे। उनकी दिव्यध्वनि ने मिथ्यात्व का नाश किया और वे चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ सिद्ध हुए क्योंकि उन्होंने बाह्य और आंतरिक दोनों अंधकारों का नाश किया।
श्लोक 55 से 59 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और परम कल्याण
आयु पूर्ण होने पर भगवान् संभवनाथ सम्मेदाचल पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और चैत्र शुक्ल षष्ठी को निर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त किया। पूर्वभव के विमलवाहन राजा से अहमिन्द्र और फिर पंचकल्याणक सम्पन्न तीर्थंकर बनकर उन्होंने अनंत जीवों के कल्याण का मार्ग प्रकाशित किया।
English translation of Uttar Puran parv 49- shlok 1 to 12
श्लोक ( Shlok ) 1
श्रियं क्रियात्स मे निम्न्नन् सम्भवो दम्भजृम्भणम् । सम्मुखीनायते यस्य सद्बोधः सम्मुखेऽखिले ॥१॥
जिनका ज्ञान सामने रखे हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेके लिए दर्पणके समान है तथा जो सब प्रकारके पाखण्डोंके विस्तारको नष्ट करनेवाले हैं ऐसे सम्भवनाथ तीर्थकर मेरा कल्याण करें ।॥ १ ॥
May the Tīrthaṅkara Sambhavanatha—whose omniscience, like a mirror held before all things, illumines every substance, and who dispels the manifold expansion of false doctrines—bestow auspiciousness upon me.1.
श्लोक ( Shlok ) 2
द्वीपेऽस्मिन्नादिमे पूर्वविदेहे नद्युदक्तटे । कच्छाख्ये विषये क्षेमपुरे विमलवाहनः ॥ २ ॥
इसी पहले जम्बूद्वीपके पूर्व विदेहक्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर तटपर एक कच्छ नामका देश है। उसके क्षेमपुर नगरमें राजा विमलवाहन राज्य करता था ॥ २ ॥
In that very first Jambūdvīpa, within the eastern Videha region, there lies a land named Kaccha upon the northern bank of the Sita River. In its city of Kṣemapura, King Vimalavāhana held sovereign rule.2.
श्लोक ( Shlok ) 3
नान्ना नरपतिस्तस्य सद्यः केनापि हेतुना । सति अत्रिभेदे निर्वेदे स समासन्ननिवृतिः ॥ ३ ॥
जिसे निकट भविष्यमें मोक्ष प्राप्त होनेवाला है ऐसा वह राजा किसी कारणसे शीघ्र ही विरक्त हो गया। वह विचार करने लगा कि इस संसारमें वैराग्यके तीन कारण उपस्थित हैं ।॥ ३ ॥
That king, destined to attain liberation in the near future, for some cause swiftly became imbued with detachment. He began to reflect: “In this sansar, there arise three causes that give birth to dispassion.”3.
श्लोक ( Shlok ) 4
जन्तुरन्तकदन्तस्थो हन्त जीवितमीहते । मोहात्तन्निर्गमोपायं न चिन्तयति धिक् तमः ॥ ४ ॥
प्रथम तो यह कि यह जीव यम-राजके दाँतोंके बीचमें रहकर भी जीवित रहनेकी इच्छा करता है और मोहकर्मके उदयसे उससे निकलनेका उपाय नहीं सोचता इसलिए इस अज्ञानान्धकारको धिक्कार हो ।॥ ४ ॥
First, this living being, though lodged as it were between the very jaws of Yama, still clings to the desire to live; and, through the rise of deluding karm, does not even conceive of a means to escape. Fie, then, upon this darkness of ignorance!4.
श्लोक ( Shlok ) 5
आयुः परमसङ्ख्याताः क्षणास्ते शरणीकृताः । प्राणिभिर्हानये चेमानर्पयन्त्यन्तकप्रभोः ॥ ५ ॥
वैराग्यका दूसरा कारण यह है कि इस जीवकी आयु असंख्यात समयकी ही है उन्हें ही यह शरण माने हुए है परन्तु आश्चर्य है कि ये आयुके क्षण ही इन जीवोंको नष्ट होनेके लिए यमराजके समीप पहुँचा देते हैं ॥ ५ ॥
The second cause of dispassion is this: the span of life, though reckoned as of innumerable duration, is yet relied upon by the soul as its refuge; and yet, wondrous indeed, it is these very moments of life that lead beings onward to the presence of Yama for their destruction.5.
श्लोक ( Shlok ) 6
अभिलावातपातप्ताश्छायां भोग्यस्य संश्रिताः । जीर्णकूलस्य वासोऽमून हि क्षेमेण पालयेत् ॥ ६ ॥
तीसरा कारण यह है कि ये जीव अभिलाषारूपी धूपसे संतप्त होकर विषयभोगरूपी किसी नदीके जीर्णशीर्ण तटकी छायाका आश्रय ले रहे हैं सो उनका यह आश्रय कुशलतापूर्वक उनकी रक्षा नहीं कर सका ।। ६ ।।
The third cause is this: these beings, scorched by the blazing sun of desire, seek refuge in the frail shade of the crumbling banks of the river of sensual pleasures; yet such a shelter proves incapable of safeguarding them in any true or lasting manner.6.
श्लोक ( Shlok ) 7
इत्यादि चिन्तयन् राज्यं दत्त्वा विमलकीर्तये । स्वयम्प्रभजिनस्यान्तेवासित्वं प्रतिपन्नवान् ॥ ७ ॥
इत्यादि विचार करते हुए विमलवाहन राजाने अपना राज्य विमलकीर्ति नामके पुत्रके लिए देकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्रकी शिष्यता स्वीकार कर ली अर्थात् उनके पास दीक्षा धारण कर ली ॥ ७ ॥
Thus reflecting, King Vimalavāhana entrusted his kingdom to his son, Vimalakīrti, and accepted discipleship under the self-effulgent Jina—thereby receiving initiation at his feet. 7
श्लोक ( Shlok ) 8
एकादशाङ्गधारी सन् त्रैलोक्यक्षोभकारणम् । भावनाभिर्निवृत्यान्त्यनामतीर्थकराह्वयम् ॥ ८ ॥
ग्यारह अङ्गोंका जानकार होकर उसने सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला तीर्थंकर नामक नामकर्मका बन्ध किया ।॥ ८ ॥
Having become a knower of the eleven Aṅgas, he, through the contemplation of the sixteen causal reflections, bound the Tīrthaṅkara-nāma-karma—that karmic force which has the potency to stir the three worlds.8
श्लोक ( Shlok ) 9
संन्यासविधिना त्यक्तदेहो मैवेयकादिमे । “सुदर्शने विमानेऽभूदहमिन्द्रो महर्द्धिकः ॥ ९ ॥
अन्त में संन्यासकी विधिसे शरीर छोड़कर प्रथम ग्रैवेयकके सुदर्शन विमानमें बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंको धारण करनेवाला अहमिन्द्र हुआ ॥ ९ ॥
In the end, relinquishing the body according to the rite of renunciation, he was reborn in the Sudarśana vimāna of the first Graiveyaka heaven, becoming an Ahamindra endowed with great and manifold supernatural excellences.9
श्लोक ( Shlok ) 10 – 12
त्रयोविंशतिवार्ध्यायुः स षष्ठयङ्गुलमानभाक् । शरीरो लेश्यया शुक्छः श्वसन् पक्षोनवत्सरे ॥ १० ॥
खत्रयाग्नि द्विवर्षान्ते भोजनं मनसा स्मरन् । निःप्रवीचारभोगोऽन्त्यनरकान्तगतावधिः ॥ ११ ॥
स्वावधिक्षेत्रसञ्चारसमर्थस्तव्यमप्रभः । प्राग्देहोत्थतनुव्याप्तया स्वावधिक्षेत्रपूरकः ॥ १२ ॥
तेईस सागरकी उसकी आयु थी, साठ अङ्गुल ऊँचा उसका शरीर था, शुक्त लेश्या थी, साढ़े ग्यारह माहमें एकबार श्वास लेता था, तेईस हजार वर्ष बाद मनसे आहारका स्मरण करता था, उसके भोग प्रवीचारसे रहित थे, सातवें नरकके अन्त तक उसका अवधिज्ञान था, अवधिज्ञानके क्षेत्रमें गमन करनेकी शक्ति थी, उतनी ही उसके शरीरकी प्रभा थी और उतनी ही दूर तक उसका वैक्रियिक शरीर आ जा सकता था ।। १०-१२ ॥
His lifespan extended to twenty-three sāgaras; his body measured sixty aṅgulas in height; he possessed the Śukla-leśyā. He drew breath but once in eleven and a half months, and only after twenty-three thousand years did he recollect the taking of mental sustenance. His enjoyments were entirely free from sensual indulgence. His clairvoyant knowledge extended up to the limits of the seventh hell; within the domain of that avadhi-jñāna, he had the power of movement. So far-reaching was the radiance of his body, and to that very extent could his protean (vaikriyika) form travel and return. 10 – 12
श्लोक 13 से 21
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