आर्यिका आस्थाश्री माताजी रचित चंदनषष्ठी व्रत विधान
स्थापना – चंदनषष्ठी व्रत विधान
अर्घ्य Arghya 1 to 8
अर्घ्य Arghya 9 to 16
मन तो मैला कर लिया, तन भी मैला होय ।
वचनों से शुद्धि कहें, तीनों शुद्ध न होय ॥ शुद्धि.. । 17 ।
ॐ ह्रीं अर्ह मन-वच काय कृत सर्व अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
कृतकारित अनुमोदना, अच्छा बुरा दिखाय।
मन-वच काया तीन ये, पुण्य अपुण्य दिलाय ॥ शुद्धि..। 18 ॥
ॐ ह्रीं अर्ह नवकोटी जनित दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
पाप छिपाकर जो किये, इक दिन बाहर आय।
घड़ा पाप का फूटता, सबको ही दिख जाय ॥ शुद्धि..। 19 ।
ॐ ह्रीं अहँ पापान्धकार निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।
पाप छिपाये ना छिपे, छिपे ना कोई रोग ।
शुद्धि से प्रभु भक्ति कर, मिट जायें सब रोग । शुद्धि..।।20 ।।
ॐ ह्रीं अर्ह जिनभक्ति संबंधि सर्व दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
झूठ बोलकर दे दिया, मुनिवर को आहार।
कोड़ होय जब देह में, करते कर्म प्रहार ॥ शुद्धि.. ।।21 ।
नमः
ॐ ह्रीं अर्ह असत्य वचन संबंधि अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
हिंसात्मक सामग्री से, सजा रहे जो काय ।
उसमें जिन-गुरु भक्ति कर, दुःखकर पाप कमाय ।।
शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश ।
पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश ॥ 2211
ॐ ह्रीं अर्ह अशुद्ध कायसंबंधि सर्वदोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
केवली गुरु श्रुत देव पर, करते जो अपवाद ।
दर्शन मोह कुकर्म भी, देता उन्हें विषाद । शुद्धि.. ॥23 ।
ॐ ह्रीं अर्ह देव शास्त्र – गुरु संबंधि सर्व अपवाद दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ
जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
गुरु की निंदा जो करे, या करते अपमान ।
उसकी दुर्गति हो अवश, होगा ना कल्याण । शुद्धि..। 24 ।।
ॐ ह्रीं अहँ गुरु निंदा संबंधि सर्व दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
English Meaning with Transliteration
आंतरिक और बाह्य शुद्धि की साधना – Shuddhi Verses for Mind, Speech, and Body Purification
हम जीवन में अक्सर बाहरी स्वच्छता पर ध्यान देते हैं, लेकिन मन, वचन और काया की वास्तविक शुद्धि के बिना सच्चा आध्यात्मिक उत्थान संभव नहीं। यहाँ प्रस्तुत हैं शुद्धि के कुछ गहन दोहे और मंत्र, जो आचार्य-प्रेरित हैं और जिनका उद्देश्य है — हमारे भीतर जमे दोष, पाप और अशुद्धियों को दूर करना।
दोहा 17
मन तो मैला कर लिया, तन भी मैला होय ।
वचनों से शुद्धि कहें, तीनों शुद्ध न होय ॥ शुद्धि.. । 17 ।
Transliteration:
Man to maila kar liya, tan bhi maila hoya.
Vachanon se shuddhi kahen, teenon shuddh na hoya.
Meaning:
If the mind is impure and the body too is tainted, mere words claiming purity cannot cleanse the self. True purification requires harmony of mind, speech, and body.
Mantra:
ॐ ह्रीं अर्ह मन-वच-काय कृत सर्व अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 18
कृतकारित अनुमोदना, अच्छा बुरा दिखाय।
मन-वच काया तीन ये, पुण्य अपुण्य दिलाय ॥ शुद्धि..। 18 ॥
Transliteration:
Krit-karit anumodana, achchha bura dikhaya.
Man-vach-kaya teen ye, punya-apunya dilaya.
Meaning:
By doing, causing to be done, or approving acts — whether good or bad — mind, speech, and body create both virtue and sin.
Mantra:
ॐ ह्रीं अर्ह नवकोटी जनित दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 19
पाप छिपाकर जो किये, इक दिन बाहर आय।
घड़ा पाप का फूटता, सबको ही दिख जाय ॥ शुद्धि..। 19 ।
Transliteration:
Paap chhipakar jo kiye, ek din baahar aaya.
Ghada paap ka phootata, sabko hi dikh jaya.
Meaning:
Sins hidden in secrecy eventually come to light, like a pot that bursts and spills for all to see.
Mantra:
ॐ ह्रीं अहं पापान्धकार निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 20
पाप छिपाये ना छिपे, छिपे ना कोई रोग ।
शुद्धि से प्रभु भक्ति कर, मिट जायें सब रोग ॥ शुद्धि..।।20 ।।
Transliteration:
Paap chhipaye na chhipe, chhipe na koi rog.
Shuddhi se Prabhu bhakti kar, mit jaye sab rog.
Meaning:
Just as a disease cannot be hidden forever, sins too reveal themselves. Through true purification and devotion to the Lord, all afflictions can be removed.
Mantra:
ॐ ह्रीं अर्ह जिनभक्ति संबंधि सर्व दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 21
झूठ बोलकर दे दिया, मुनिवर को आहार।
कोड़ होय जब देह में, करते कर्म प्रहार ॥ शुद्धि.. ।।21 ।
Transliteration:
Jhooth bolkar de diya, munivar ko aahar.
Kod hoy jab deh mein, karte karm prahaar.
Meaning:
Offering food to monks through lies brings karmic retribution, like the affliction of leprosy attacking the body.
Mantra:
ॐ ह्रीं अर्ह असत्य वचन संबंधि अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 22
हिंसात्मक सामग्री से, सजा रहे जो काय ।
उसमें जिन-गुरु भक्ति कर, दुःखकर पाप कमाय ।।
शुद्धि से सिद्धि मिले, कहते चन्द्र जिनेश ।
पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश ॥ 22 ॥
Transliteration:
Hinsatmak saamagri se, saja rahe jo kaaya.
Usmein Jin-Guru bhakti kar, dukhkar paap kamaya.
Shuddhi se siddhi mile, kahte Chandra Jinesh.
Poojen hum vasu dravya se, harlo sab dukh klesh.
Meaning:
Decorating the body with violent or harmful materials while engaging in worship leads to sin. Lord Chandraprabha teaches that true purity brings success, and offering pure materials in worship removes all suffering.
Mantra:
ॐ ह्रीं अर्ह अशुद्ध काय संबंधि सर्व दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 23
केवली गुरु श्रुत देव पर, करते जो अपवाद ।
दर्शन मोह कुकर्म भी, देता उन्हें विषाद ॥ शुद्धि.. ॥23 ।
Transliteration:
Kevli guru shrut dev par, karte jo apavaad.
Darshan moh kukarm bhi, deta unhein vishaad.
Meaning:
Slandering the Omniscient, the Guru, the scriptures, or the Deities causes grief and binds the soul with wrong faith and sinful acts.
Mantra:
ॐ ह्रीं अर्ह देव शास्त्र-गुरु संबंधि सर्व अपवाद दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
दोहा 24
गुरु की निंदा जो करे, या करते अपमान ।
उसकी दुर्गति हो अवश, होगा ना कल्याण ॥ शुद्धि..। 24 ।।
Transliteration:
Guru ki ninda jo kare, ya karte apmaan.
Uski durgati ho avash, hoga na kalyaan.
Meaning:
One who insults or slanders the Guru inevitably meets with downfall, and no true welfare comes to them.
Mantra:
ॐ ह्रीं अहं गुरु निंदा संबंधि सर्व दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
इन शुद्धि-दोहों और मंत्रों का नियमित जप एवं मनन, हमें भीतर और बाहर से निर्मल बनाता है।
सच्ची शुद्धि केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन, वचन और काया की पवित्रता है — यही आत्मकल्याण का मार्ग है।
अर्घ्य Arghya- 25 to 32
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