आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 242 to 252
श्लोक ( Shlok ) 242
किल स्त्रीभ्यः सुखावाप्तिः पौरुषं किमतः परम् । दैन्यमात्मनि सम्भाव्य सौख्यं स्यां परमः पुमान् ॥
स्त्रियोंसे सुखकी प्राप्ति होना ही पुरुषत्व है ऐसा प्रसिद्ध है परन्तु इससे बढ़कर और दीनता क्या होगी ? इसलिये अपने आत्मामें ही सच्चे सुखका निश्चय कर पुरुष हो सकता हूं-पुरुषत्वका धनी बन सकता हूं ॥ २४२॥
It is commonly held that to attain pleasure through women is the mark of manliness; yet what greater wretchedness could there be than this? Therefore, by discerning true happiness within my own self, I may indeed become truly manly—rich in the essence of true manhood. ॥242॥
श्लोक ( Shlok ) 243
इति श्रीपालचक्रेशः सन्त्यजन् वक्रतां धियः । अक्रमेणाखिलं त्यक्तुं सचक्रं मतिमातनोत् ॥ २४३॥
इस प्रकार बुद्धिकी वक्रताको छोड़ते हुए श्रीपाल चक्रवर्तीने चक्ररत्न सहित समस्त परिग्रहको एक साथ छोड़नेका विचार किया ॥२४३॥
Thus, casting aside the crookedness of his intellect, the Chakravartin Shripal resolved to renounce, all at once, his divine discus and every possession he held. ॥243॥
श्लोक ( Shlok ) 244 – 245
ततः सुखावतीपुत्रं नरपालाभिधानकन् । कृताभिषेकमारोप्य समुत्तुङ्गं निजासनम् ।।२४४।।जयवत्यादिभिः स्वाभिर्देवोभिर्धरणीश्वरैः । वसुपालादिभिश्चामा संयमं प्रत्यपद्यत ॥२४५।।
तदनन्तर उसने नरपाल नामके सुखावतीके पुत्रका राज्याभिषेक कर उसे अपने बहुत ऊंचे सिंहासनपर बैठाया और स्वयं जयवती आदि रानियों तथा वसुपाल आदि राजाओंके साथ दीक्षा धारण कर ली ।। २४४-२४५।।
Thereafter, he anointed Narapala, the son of Sukhavati, as king and seated him upon his own lofty throne. Then, together with his queens—Jayavati and the others—and the kings such as Vasupal, he embraced the vows of renunciation. ॥244–245॥
श्लोक ( Shlok ) 246 – 249
स बाह्यमन्तरङ्गं च तपस्तप्त्वा यथाविधि । क्षपकश्रेणिमारुह्य “मासेन (?) हतमोहकः ॥२४६॥यथाख्यातमवाप्योरुचारित्रनिष्कषायकम् । ध्यायन् द्वितीयशुक्लेन वीचाररहितात्मना ॥२४७॥घातिकर्मत्रयं हत्वा सम्प्राप्तनवकेवलः’ । सयोगस्थानमाक्रम्य वियोगो वीतकल्मषः ।॥२४८।।शरीरत्रितयापायादा विष्कृतगुणोत्करः । अनन्तशान्तमप्रायमवाप सुखमुत्तमम् ॥२४९॥
उन्होंने विधिपूर्वक बाहय और अन्तरङ्ग तप तपा, क्षपक श्रेणीमें चढ़कर मोहरूपी शत्रुको नाश करनेसे प्राप्त होनेवाला कषायरहित यथाख्यात नामका उत्कृष्ट चारित्र प्राप्त किया, वीचाररहित द्वितीय शुक्ल ध्यानके द्वारा आत्मस्वरूपकाचिन्तवन करते हुए ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोंको नष्ट कर नौ केवललब्धियां प्राप्त कीं, सयोगकेवली गुणस्थानमें पहुंचकर क्रमसे योगरहित होकर सब कर्म नष्ट किये और अन्तमें औदारिक, तैजस, कार्माण तीनों शरीरोंके नाशसे गुणोंका समूह प्रकट कर अनन्त, शान्त, नवीन और उत्तम सुख प्राप्त किया ॥ २४६-२४९।।
They diligently practiced both external and internal austerities in accordance with the prescribed rites. Ascending the ladder of spiritual annihilation (kshapaka-shreni), they destroyed the enemy of delusion and attained the supreme conduct known as yathakhyata, free from all passions. Immersed in contemplation of the true nature of the Self through the second, thought-free shukla dhyana, they eradicated the three destructive karmas—knowledge-obscuring, perception-obscuring, and obstructive—and attained the nine kinds of supreme omniscient attributes. Reaching the stage of sayoga-kevali gunasthana, they gradually ceased all activities of mind, speech, and body, thus destroying all remaining karmas. Finally, through the dissolution of the physical, fiery, and karmic bodies, they manifested the infinite qualities of the soul, and attained boundless, serene, ever-new, and supreme bliss. ॥246–249॥
श्लोक ( Shlok ) 250
तस्य राज्यश्च ताः सर्वा विधाय विविधं तपः । स्वर्गलोके स्वयोग्योरुविमानेष्वभवन् सुराः ॥२५०॥
श्रीपाल चक्रवर्तीकी सब रानियां भी अनेक प्रकारका तप तपकर स्वर्गलोकमें अपने अपने योग्य बड़े बड़े विमानोंमें देव हुईं ॥ २५० ॥
All the queens of Chakravartin Shripal, too, through the performance of manifold austerities, ascended to the celestial realms and were reborn as divine beings, each in her own magnificent and befitting heavenly chariot. ॥250॥
श्लोक ( Shlok ) 251 – 252
आवां चाकर्ण्य तं नत्वा गत्वा नाकं निजोचितम् । अनुभूय सुखं प्रान्ते” शेषपुण्यविशेषतः ॥२५१॥इहागताविति व्यक्तं व्याजहार सुलोचना । जयोऽपि स्वप्रियाप्रज्ञाप्रभावादतुषत्तदा ॥२५२॥
सुलोचना जयकुमारसे कह रही है कि हम दोनों भी ये सब कथाएं सुनकर एवं गुणपाल तीर्थङ्कर को नमस्कार कर स्वर्ग चले गये थे और वहां यथायोग्य सुख भोगकर आयुके अन्तमें बाकी बचे हुए पुण्यविशेषसे यहां उत्पन्न हुए हैं। ये सब कथाएं सुलोचनाने स्पष्ट शब्दोंमें कही थीं और जयकुमार भी अपनी प्रियाकी बुद्धिके प्रभावसे उस समय अत्यन्त संतुष्ट हुआ था ।। २५१-२५२॥
Sulochana said to Jayakumar: “Both of us, upon hearing all these tales and offering our reverent salutations to Tirthankara Gunapala, ascended to heaven, where we enjoyed appropriate celestial pleasures. At the end of our lifespans there, by the remaining fruits of our past merits, we have now been born here once again.” These stories were narrated by Sulochana in clear and unambiguous words, and Jayakumar, through the influence of his beloved’s wisdom, felt exceedingly delighted at that time. ॥251–252॥
श्लोक 253 से 273
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241