Summary of Ādi purāṇa Parv 39 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 39 (श्लोक 1 से 211)
महाराज भरत आदिपुराण पर्व 39 में द्विजों को मोक्ष प्रदान करने वाली 43 दीक्षान्वय और सात कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन करते हैं। दीक्षा व्रतों का धारण है, जो महाव्रत (सूक्ष्म-स्थूल हिंसा त्याग) और अणुव्रत (स्थूल हिंसा त्याग) के रूप में दो प्रकार के हैं। पहली ‘अवतार’ क्रिया में भव्य मिथ्यात्व छोड़कर समीचीन मार्ग ग्रहण करता है, योग्य मुनि या गृहस्थाचार्य से सत्य धर्म का उपदेश पाता है। आप्त (वीतराग, सर्वज्ञ, कल्याणकारी) के वचन ही सत्य हैं, और जैन मत ही प्रमाणभूत है, जो युक्ति, आगम, और गंभीर शासन से युक्त है। वेद, पुराण, और धर्मशास्त्र वही हैं, जो हिंसा का निषेध करते हैं। चारित्र, मंत्र, देवता, और आहार की शुद्धि अहिंसा और दया पर आधारित है। दीक्षान्वय की 43 क्रियाएं, जैसे वृत्तलाभ, स्थानलाभ, गणग्रह, पूजाराध्य, उपयोगिता, उपनीति, व्रतचर्या, विवाह, और वर्णलाभ, भव्य को मिथ्यामार्ग त्यागकर सम्यक् मार्ग पर ले जाती हैं। जैन गृहस्थों की आजीविका में थोड़ी हिंसा हो सकती है, पर पक्ष, चर्या, और साधन से शुद्धि होती है। कर्त्रन्वय की सात क्रियाएं—सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्रज्य, सुरेन्द्रता, साम्राज्य, आर्हन्त्य, और परिनिर्वृति—भव्य को विशुद्ध कुल-जाति, सम्यग्ज्ञान, दिगंबर दीक्षा, स्वर्ग, चक्रवर्ती पद, अरहंत अवस्था, और अंत में निर्वाण तक ले जाती हैं। इनका पालन करने वाला भव्य कर्मबंधन तोड़कर परम सुख प्राप्त करता है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 39
श्लोक 1 से 11 दीक्षान्वय क्रियाओं का प्रारंभ
महाराज भरत द्विजों को मोक्ष प्रदान करने वाली 43 दीक्षान्वय क्रियाओं का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि व्रतों का धारण करना दीक्षा है, जो महाव्रत (सूक्ष्म-स्थूल हिंसा आदि पापों का पूर्ण त्याग) और अणुव्रत (स्थूल हिंसा आदि का त्याग) के रूप में दो प्रकार के होते हैं। दीक्षा वह प्रवृत्ति है, जब सन्मुख पुरुष व्रत ग्रहण करता है। पहली क्रिया ‘अवतार’ है, जिसमें मिथ्यात्व से दूषित भव्य पुरुष योग्य मुनि या गृहस्थाचार्य से समीचीन धर्म का उपदेश मांगता है, क्योंकि अन्य मत और वेदों के वाक्य उसे दोषपूर्ण प्रतीत होते हैं।
श्लोक 12 से 21 आप्त और समीचीन धर्म का वर्णन
मुनि या आचार्य भव्य को आप्त के सत्य वचनों को ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। आप्त वह है, जो वीतराग, सर्वज्ञ, कल्याणकारी, और मोक्षमार्ग का उपदेशक है। आप्त के गुणों में रूप, तेज, ज्ञान, और सुखामृत आदि शामिल हैं। जैन मत आप्त का कथन है, जो युक्ति, आगम, और गंभीर शासन से युक्त है। इसमें शास्त्र, मंत्र, और क्रिया का यथार्थ निरूपण है। अन्य मतों के वचन दुष्ट हैं, जबकि जैन धर्म ही समीचीन मार्ग है।
श्लोक 22 से 31 धर्म और शुद्धि के लक्षण
वेद, पुराण, और धर्मशास्त्र वही हैं, जो हिंसा का निषेध करते हैं। हिंसा का उपदेश देने वाले ग्रंथ धूर्तों के रचित हैं। चारित्र पापकर्मों से विरक्ति है, जो देवपूजा आदि छह कर्मों में प्रकट होता है। गर्भाधान से निर्वाण तक की क्रियाएं ही शुद्ध हैं। मंत्र, देवता, लिंग, और आहार की शुद्धि अहिंसा और दया पर आधारित है। हिंसा करने वाले मंत्र, देवता, और मांसाहारी आहार दुष्ट हैं। कामशुद्धि जितेंद्रिय मुनियों या संतोषी गृहस्थों में होती है।
श्लोक 32 से 41 अवतार और स्थानलाभ क्रिया
आप्त के उपदेश से भव्य मिथ्यामार्ग त्यागकर समीचीन मार्ग अपनाता है। यह ‘गर्भाधान’ के समान अवतार क्रिया है। इसके बाद ‘वृत्तलाभ’ क्रिया में भव्य गुरु को नमस्कार कर व्रत ग्रहण करता है। तीसरी ‘स्थानलाभ’ क्रिया में वह उपवास के बाद जिनालय में अष्टदल कमल या समवसरण मंडल की रचना करता है। आचार्य उसे जिनप्रतिमा के समक्ष बैठाकर पंचमुष्टि से मस्तक स्पर्श कर श्रावक दीक्षा देते हैं और पंच नमस्कार मंत्र का उपदेश करते हैं।
श्लोक 42 से 51 गणग्रह और पूजाराध्य क्रिया
चौथी ‘गणग्रह’ क्रिया में भव्य मिथ्यादेवताओं का विसर्जन कर अपने मत के शांत देवताओं की पूजा करता है। पांचवीं ‘पूजाराध्य’ क्रिया में वह जिनपूजन, उपवास, और द्वादशांग के अर्थ सुनता है। छठी ‘पुण्ययज्ञा’ क्रिया में वह साधर्मी पुरुषों के साथ चौदह पूर्वविद्याओं के अर्थ सुनता है। सातवीं ‘दृढ़चर्या’ क्रिया में वह अपने मत के शास्त्रों को समझकर अन्य मतों के ग्रंथों का अध्ययन करता है।
श्लोक 52 से 61 उपयोगिता और उपनीति क्रिया
आठवीं ‘उपयोगिता’ क्रिया में दृढ़व्रती भव्य पर्व के दिन रात्रि में प्रतिमायोग धारण करता है। नौवीं ‘उपनीति’ क्रिया में वह शुद्धि और उत्कृष्ट चिह्न (सफेद वस्त्र, यज्ञोपवीत, देवपूजा आदि) धारण करता है। दसवीं ‘व्रतचर्या’ क्रिया में वह यज्ञोपवीत धारण कर उपासकाध्ययन का अभ्यास करता है। ग्यारहवीं ‘व्रतावतरण’ क्रिया में वह गुरु के समक्ष आभूषण ग्रहण करता है। बारहवीं ‘विवाह’ क्रिया में वह अपनी पत्नी को श्रावक दीक्षा देकर पुनर्विवाह संस्कार करता है।
श्लोक 62 से 71 वर्णलाभ क्रिया
तेरहवीं ‘वर्णलाभ’ क्रिया में भव्य अन्य साधर्मी श्रावकों से संबंध स्थापित करता है। वह चार श्रावकों को बुलाकर कहता है कि उसने समस्त गृहस्थ धर्म का पालन किया, दान दिए, गुरुपूजन किया, और मिथ्याधर्म त्यागकर सम्यक् चारित्र अपनाया। वह यज्ञोपवीत, श्रावकाचार, और पत्नी के संस्कार पूर्ण कर चुका है। श्रावक उसे प्रशंसा कर वर्णलाभ प्रदान करते हैं, जिससे वह उनके समान हो जाता है।
श्लोक 72 से 81 कुलचर्या से कर्त्रन्वय क्रियाओं का प्रारंभ
चौदहवीं ‘कुलचर्या’ क्रिया में भव्य पुरुष आर्योचित छह कर्मों (देवपूजा आदि) में पूर्ण प्रवृत्ति रखता है। पंद्रहवीं ‘गृहीशिता’ क्रिया में सम्यक् चारित्र और अध्ययन से युक्त श्रावक, प्रायश्चित्त, श्रुति, स्मृति, और पुराण जानकर गृहस्थाचार्य पद प्राप्त करता है। सोलहवीं ‘प्रशान्तता’ क्रिया में वह उपवास आदि भावनाओं से शांति प्राप्त करता है। सत्रहवीं ‘गृहत्याग’ क्रिया में वह पुत्र को शिक्षा देकर घर छोड़ता है। अठारहवीं ‘दीक्षाद्य’ क्रिया में वह तपोवन में एक वस्त्र धारण करता है। उन्नीसवीं ‘जिनरूपता’ क्रिया में वह मुनि से दिगंबर रूप ग्रहण करता है। शेष क्रियाएं गर्भान्वय जैसी हैं। इनका पालन करने वाला भव्य शीघ्र निर्वाण प्राप्त करता है। इसके बाद कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन शुरू होता है।
श्लोक 82 से 91 सज्जाति क्रिया
कर्त्रन्वय की पहली ‘सज्जाति’ क्रिया में भव्य को मनुष्य जन्म और विशुद्ध कुल-जाति में जन्म मिलता है। विशुद्ध कुल (पिता का वंश) और जाति (माता का वंश) सज्जाति कहलाती है, जो रत्नत्रय की प्राप्ति को सुलभ करती है। आर्यखंड में योग्य शरीर और सामग्री से सज्जाति अनेक कल्याण देती है। संस्काररूपी जन्म से भव्य द्विजन्म प्राप्त करता है, जैसे रत्न या सुवर्ण संस्कार से शुद्ध होकर उत्कर्ष पाता है।
श्लोक 92 से 101 सज्जाति और सद्गृहित्व क्रिया
सज्जाति में भव्य सर्वज्ञ के मुख से सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर व्रत-शील से द्विज कहलाता है। वह यज्ञोपवीत (द्रव्यसूत्र) और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र (भावसूत्र) धारण करता है। आचार्य उसे पुष्प-अक्षतों से जिनपूजा के आशीर्वाद देते हैं, जो धर्म में उत्साह बढ़ाता है। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में वह गृहस्थ अवस्था में अरहंत के उपदेशानुसार छह कर्मों का आलस्यरहित पालन करता है। जिनेंद्र और गणधरों की शिक्षा से वह ब्रह्मतेज धारण करता है।
श्लोक 102 से 111 सद्गृहित्व और देवब्राह्मण की महिमा
सद्गृहित्व में भव्य की प्रशंसा धर्मस्वरूप और ब्रह्मतेज युक्त के रूप में होती है। वह पूजा करता, करवाता, और वेद-वेदांग पढ़ता-पढ़ाता है। उसके गुणों में अणिमा-महिमा आदि देवगुण हैं, जिससे वह पृथ्वी पर पूजित होता है। यदि कोई उसकी जाति या कुल पर प्रश्न उठाए, तो वह कहता है कि वह जिनेंद्र के उपदेश से उत्पन्न हुआ है, न कि सांसारिक कुल-जाति से।
श्लोक 112 से 121 देवब्राह्मण की शुद्धता
कोई मिथ्यादृष्टि यदि भव्य को उलाहना दे कि वह मनुष्य ही है, तो वह उत्तर देता है कि जिनेंद्र उसका पिता और ज्ञान उसका गर्भ है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, और चारित्र उसकी शक्तियां हैं। वह बिना योनि के उत्पन्न होकर देवब्राह्मण है। उसका यज्ञोपवीत और व्रत शास्त्रोक्त चिह्न हैं। मिथ्यादृष्टि केवल मलिन सूत्र धारण करते हैं। जीव का जन्म और मरण दो प्रकार का होता है: शरीरजन्म-मरण और संस्कारजन्म-मरण। भव्य को संस्कारजन्म से द्विजपना प्राप्त होता है।
श्लोक 122 से 131 संस्कारजन्म और ब्राह्मण की परिभाषा
संस्कारमरण से भव्य मिथ्यादर्शन छोड़ता है और संस्कारजन्म से देवद्विज कहलाता है। वह युक्तिपूर्ण वचनों से अपने गुणों का उत्कर्ष प्रकट करता है। जिनेंद्र ही आदि ब्रह्मा हैं, जिनके उपदेश से शिष्य ब्राह्मण कहलाते हैं। मृगचर्म, जटा, या कामवश भ्रष्ट व्यक्ति ब्रह्मा नहीं हो सकता। जिनेंद्र के ज्ञान से उत्पन्न द्विज वर्णातीत और उत्कृष्ट हैं।
श्लोक 132 से 141 द्विज की शुद्धि और अशुद्धि
क्षमा, शौच, संतोष, और निर्दोष आचरण से युक्त द्विज सर्वोत्तम हैं। मलिन आचार, हिंसा, और पापकर्म करने वाले ब्राह्मण नहीं, बल्कि कर्मचांडाल हैं। हिंसक धर्म को मानने वाले निर्दय, लुटेरे, और दंडनीय हैं। जैन लोग निर्मल आचार से शुक्लवर्ग में, जबकि मिथ्यादृष्टि पापियों के कृष्णवर्ग में गिने जाते हैं। द्विज की शुद्धि श्रुति, स्मृति, पुराण, सदाचार, मंत्र, और कामनाश से होती है। दया न्याय और हिंसा अन्याय है, जिससे शुद्धि-अशुद्धि का निर्णय होता है।
श्लोक 142 से 151 जैन द्विजों की शुद्धता और हिंसा का निराकरण
जैन लोग विशुद्ध वृत्ति के कारण वर्णोत्तम और जगत्पूज्य द्विज हैं। जैन गृहस्थों की आजीविका के लिए छह कर्मों (असि, मषि आदि) में थोड़ी हिंसा हो सकती है, पर शास्त्रों में इसके शुद्धिकरण का उपाय है। शुद्धि के तीन अंग हैं: पक्ष (मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ्य भाव से हिंसा त्याग), चर्या (देवता, मंत्र, औषधि, या भोजन के लिए हिंसा न करने की प्रतिज्ञा), और साधन (आयु के अंत में शरीर, आहार, और चेष्टाओं का त्याग कर ध्यान से आत्मशुद्धि)। इनसे हिंसा का दोष नहीं लगता। जैन मत में चार आश्रम (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, भिक्षुक) ही विशुद्ध हैं, अन्य मतों के आश्रम विचार में दोषपूर्ण हैं।
श्लोक 152 से 161 सद्गृहित्व और पारिव्रज्य क्रिया
चार आश्रमों के भेदों से अनेक प्रकार की शुद्धि प्राप्त होती है, जिनका विस्तार ग्रंथ वृद्धि के भय से नहीं किया गया। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में गृहस्थ धर्म का पालन कर भव्य दीक्षा ग्रहण करता है, जिसे ‘पारिव्रज्य’ कहते हैं। यह तीसरी क्रिया है, जिसमें ममत्व त्यागकर दिगंबर रूप धारण किया जाता है। मोक्ष की इच्छा वाला भव्य शुभ तिथि, नक्षत्र, और योग में विशुद्ध कुल-चरित्र वाले आचार्य से दीक्षा लेता है। अशुभ समय (ग्रहण, मेघ, नष्ट मास आदि) में दीक्षा नहीं दी जाती। असमय दीक्षा देने वाला आचार्य संघ से बहिष्कृत होता है।
श्लोक 162 से 171 पारिव्रज्य के सूत्रपद और गुण
पारिव्रज्य में 27 सूत्रपद (जाति, मूर्ति, लक्षण, सौंदर्य, प्रभा, मंडल, चक्र, अभिषेक आदि) परमेष्ठियों के गुण हैं। दीक्षा लेने वाला भव्य अपने गुणों का आदर न कर अरहंत के गुणों का सम्मान करता है, जिससे अहंकार से बचकर उत्थान होता है। वह उत्तम जाति का होते हुए भी अरहंत की सेवा करता है, जिससे अगले जन्म में दिव्या, विजयाश्रिता, परमा, या स्वा जाति प्राप्त होती है। मुनि शरीर को कृश कर, अन्य जीवों की रक्षा करते हुए, और अरहंत के लक्षणों का चिंतन कर तप करता है।
श्लोक 172 से 181 तप से प्राप्तियां
मुनि अपने सौंदर्य, प्रभा, तेज, और परिग्रह (अस्त्र, वस्त्र, आसन, छत्र आदि) का त्याग कर अरहंत की आराधना करता है, जिससे वह देदीप्यमान प्रभा, धर्मचक्र, अभिषेक, और सिंहासन प्राप्त करता है। तकिया, छत्र, और चामर का त्याग करने से वह स्वर्गीय विभूतियां, तीन छत्र, और चौंसठ चामर प्राप्त करता है। तप से वह परम स्वामी और तीर्थकर बनता है।
श्लोक 182 से 191 तप की महिमा
मुनि नगाड़े, उद्यान, धन, घर, और क्षेत्र का त्याग कर तप करता है, जिससे स्वर्गीय दुंदुभि, अशोक वृक्ष, निधियां, मंडप शोभा, और अवगाहन शक्ति प्राप्त होती है। वह आज्ञा, सभा, और इच्छाओं का त्याग कर मौन धारण करता है, जिससे उसकी आज्ञा सुर-असुर मानते हैं और वह समवसरण में विराजमान होता है। तप से वह प्रशंसनीय और वंदनीय बनता है।
श्लोक 192 से 201 पारिव्रज्य की पूर्णता
मुनि सवारी, भाषा, और आहार का नियमन कर तप करता है, जिससे कमल पर चरण, दिव्य ध्वनि, और चार तृप्तियां (दिव्य, विजय, परम, अमृत) प्राप्त होती हैं। काम-सुख त्यागकर वह परमानंद पाता है। तप से त्यागी वस्तु ही उसे प्राप्त होती है। पारिव्रज्य में जिनेंद्र की आज्ञा मानकर तप करने से ही सच्ची दीक्षा होती है। अन्य मतों की पारिव्रज्य युक्तिहीन है। चौथी ‘सुरेन्द्रता’ क्रिया में सुरेंद्र पद प्राप्त होता है।
श्लोक 202 से 211 साम्राज्य, आर्हन्त्य, और परिनिर्वृति
पांचवीं ‘साम्राज्य’ क्रिया में चक्रवर्ती को चक्ररत्न, निधियां, और भोग प्राप्त होते हैं। छठवीं ‘आर्हन्त्य’ क्रिया में अरहंत को स्वर्गावतार और पंचकल्याण की प्राप्ति होती है, जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करती है। सातवीं ‘परिनिर्वृति’ क्रिया में कर्ममल नष्ट होकर सिद्धि प्राप्त होती है, जो आत्मतत्त्व की शुद्धि है। ये सात कर्त्रन्वय क्रियाएं मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं। भव्य इनका पालन कर संसार के बंधनों को तोड़ता है, सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्रज्य, सुरेंद्रता, चक्रवर्ती, अरहंत, और अंत में निर्वाण प्राप्त करता है।
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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