Hindi Translation of Adi purana Parv 40
आदिपुराण सारांश पर्व 40
श्लोक 1 से 11 मंत्रकल्प और पूजा विधि
अथानन्तर-आगे इन क्रियाओंकी उत्तरचूलिकाका कथन करेंगे जिसमें कि इन तीनों क्रियाओंका विशेष निर्णय किया गया है ।।१।। इस उत्तरचूलिकामें भी सबसे पहले क्रियाकल्प अर्थात् क्रियाओं के समूहकी सिद्धिके लिये मन्त्रोंका उद्धार करूंगा अर्थात् मंत्रोंकी रचना आदि का निरूपण करूंगा सो ठीक ही है क्योंकि मुनियोंके कार्यकी सिद्धि भी मंत्रोंके ही आधीन होती है ।।२।। आधानादि क्रियाओंके प्रारम्भमें सबसे पहले तीन छत्र, तीन चक्र और तीन अग्नियां स्थापित करना चाहिये ।। ३ ।। और वेदी के मध्य भागमें विधिपूर्वक जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमा विराज-मान करनी चाहिये । उक्त क्रियाओंके प्रारम्भमें उन छत्र, चक्र, अग्नि तथा जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाकी जो पूजा की जाती है वह मन्त्रकल्प कहलाता है ।।४।। इन क्रियाओंके करते समय जलसे भूमि शुद्ध करने के लिये जिसके अन्तमें नमः शब्द लगा हुआ है ऐसे नीरजस् शब्दको चतुर्थी के एकवचनका रूप पढ़ना चाहिये अर्थात् ‘नीरजसे नमः’ (कर्मरूप धूलिसे रहित जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार हो) यह मंत्र बोलना चाहिये । इस मन्त्रका फल उत्कृष्ट विशुद्धि होना है ।।५।। तदनन्तर डाभका आसन ग्रहण करना चाहिये और उसके बाद विघ्नोंको शान्त करने के लिये ‘दर्पमथनाय नमः’ (अहंकारको नष्ट करनेवाले भगवान्को नमस्कार हो) इस मन्त्र-का उच्चारण करना चाहिये ।।६।। गन्ध समर्पण करनेका मन्त्र है ‘शीलगन्धाय नमः’ (शील रूप सुगन्ध धारण करनेवाले जिनेन्द्रदेवको नमस्कार हो) । तथा पुष्प देनेका मन्त्र है ‘विमलाय नमः (कर्ममलसे रहित जिनेन्द्रभगवान्के लिये नमस्कार हो) ।।७।। अक्षतसे पूजा करनेके लिये ‘अक्षताय नमः’ (क्षयरहित जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) यह मन्त्र बोले और धूपसे पूजा करते समय ‘श्रुतधूपाय नमः’ (प्रसिद्ध वासनावाले भगवान्को नमस्कार हो) इस मन्त्र-का उच्चारण करे ।।८।। दीप चढ़ाते समय ‘ज्ञानोद्योताय नमः’ (ज्ञानरूप उद्योत प्रकाश) को धारण करनेवाले जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) यह मन्त्र पढ़े और अमृत अर्थात् नैवेद्य चढ़ाते समय ‘परमसिद्धाय नमः’ (उकृष्ट सिद्धभगवान्को नमस्कार हो) ऐसा मन्त्र बोले ।॥९॥ इस प्रकार इन मन्त्रोंसे विधिपूर्वक भूमिका संस्कार कर उसके बाद उन उत्तम द्विजोंको पीठिका मन्त्र पढ़ना चाहिये ।।१०।। पीठिका मन्त्र इस प्रकार है- सबसे पहले, जिसके आगे ‘नमः’ शब्द लगा हुआ है और चतुर्थी विभक्ति अन्तमें है ऐसे सत्यजात शब्दका उच्चारण करना चाहिये अर्थात् ‘सत्यजाताय नमः’ (सत्यरूप जन्मको धारण करनेवाले जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) बोलना चाहिये, उसके बाद चतुर्थ्यन्त अर्हज्जात शब्दके आगे ‘नमः’ पद लगा कर ‘अर्हज्जाताय नमः’ (प्रशंसनीय जन्मको धारण करनेवाले जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) यह मन्त्र बोले ।।११।।
श्लोक 12 से 23 पीठिका मंत्रों का विस्तार
तदनन्तर ‘परमजाताय नमः’ (उत्कृष्ट जन्मग्रहण करनेवाले अर्हन्तदेवको नमस्कार हो) बोलना चाहिये और उसके बाद ‘अनुपमजाताय नमः’ (उपमा-रहित जन्म धारण करनेवाले जिनेन्द्रको नमस्कार हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये ।।१२।। इसके बाद ‘स्वप्रधानाय नमः’ (अपने आप ही प्रधान अवस्थाको प्राप्त होनेवाले जिनराजको नमस्कार हो) यह मन्त्र बोले और उसके पश्चात् ‘अचलाय नमः’ (स्वरूपमें निश्चल रहनेवाले वीतराग को नमस्कार हो) तथा ‘अक्षयाय नमः’ (कभी नष्ट न होनेवाले भगवान्को नमस्कार हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये ।।१३।। इसी प्रकार ‘अव्यावाधाय नमः’ (बाधाओंसे रहित परमेश्वर को नमस्कार हो), ‘अनन्तज्ञानाय नमः’ (अनन्त ज्ञानको धारण करनेवाले जिनराजको नमस्कार हो), ‘अनन्तदर्शनाय नमः’ (अनन्तदर्शन केवल दर्शनको धारण करनेवाले जिनेन्द्र-देवको नमस्कार हो), ‘अनन्तवीर्याय नमः’ (अनन्त बलके धारक अर्हन्तदेवको नमस्कार हो), ‘अनन्तसुखाय नमः’ (अनन्तसुखके भाण्डार जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो), ‘नीरजसे नमः’ (कर्मरूपी धूलिसे रहित जिनराजको नमस्कार हो), ‘निर्मलाय नमः’ (कर्मरूप मलसे रहित जिनेन्द्रभगवान्को नमस्कार हो) ‘अच्छेद्याय नमः’ (जिनका कोई छेदन नहीं कर सके ऐसे जिनेन्द्रदेवको नमस्कार हो), ‘अभेद्याय नमः’ (जो किसी तरह भिद नहीं सके ऐसे अरहन्त को नमस्कार हो), ‘अजराय नमः’ (जो बुढ़ापासे रहित है उसे नमस्कार हो,) ‘अमराय नमः’ (जो मरणसे रहित है उसे नमस्कार हो), ‘अप्रमेयाय नमः’ (जो प्रमाणसे रहित है-छद्मस्थ पुरुषके ज्ञानसे अगम्य है, उसे नमस्कार हो) ‘अगर्भवासाय नमः’ (जो जन्म-मरणसे रहित होने के कारण किसीके गर्भमें निवास नहीं करते ऐसे जिनराजको नमस्कार हो), ‘अक्षोभ्याय नमः’ (जिन्हें कोई क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता ऐसे भगवान्को नमस्कार हो), ‘अविलीनाय नमः’ (जो कभी विलीन-नष्ट नहीं होते उन परमात्माको नमस्कार हो) और ‘परमघनाय नमः’ (जो उत्कृष्ट घनरूप हैं-उन्हें नमस्कार हो) इन अव्यावाद्य आदि शब्दोंके आगे चतुर्थी-विभक्ति तथा नमः शब्द लगाकर ऊपर लिखे अनुसार अव्यावाधाय नमः आदि मन्त्र पदों-का उच्चारण करना चाहिये ।।१४-१७।। तदनन्तर मन्त्रको जाननेवाला द्विज जिसके आदिमें ‘परमकाष्ठ’ है और अन्तमें योगरूपाय है ऐसे शब्दका उच्चारण कर उसके आगे ‘नमः’ पद लगाता हुआ ‘परमकाष्ठयोगाय नमः’ (जिनका योग उत्कृष्ट सीमाको प्राप्त हो रहा है ऐसे जिनेन्द्रको नमस्कार हो) इस मन्त्रका उद्धार करे ।।१८।। फिर लोकाग्रवासिने शब्दके आगे ‘नमो नमः” लगाना चाहिये इसी प्रकार परम सिद्धेभ्यः और अर्हत्सिद्धेभ्यः शब्दोंके आगे भी नमो नमः शब्दका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् क्रमसे ‘लोकाग्रवासिने नमो नमः’ (लोकके अग्रभाग पर निवास करनेवाले सिद्ध परमेष्ठीको बार बार नमस्कार हो), ‘परमसिद्धेभ्यो नमो नमः’ (परम सिद्धभगवान्को बार बार नमस्कार हो) और ‘अर्हत्सिद्धेभ्यो नमो नमः’ (जिन्होंने अरहन्त अवस्थाके बाद सिद्ध अवस्था प्राप्त की है ऐसे सिद्ध महाराजको बार बार नमस्कार हो) इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये ।।१९।। इसी प्रकार ‘केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः’ (केवली सिद्धोंको नमस्कार हो) ‘अन्तः कृत्सिद्धेभ्यो नमो नमः’ (अन्तकृत् केवली होकर सिद्ध होनेवालोंको नमस्कार हो), ‘परम्परसिद्धेभ्यो नमः’ (परम्परासे हुए सिद्धोंको नमस्कार हो) ‘अनादिपरम्परसिद्धेभ्यो नमः’ (अनादि कालसे हुए परम सिद्धोंको नमस्कार हो) और ‘अना-द्यनुपमसिद्धेभ्यो नमो नमः’ (अनादिकालसे हुए उपमारहित सिद्धोंको नमस्कार हो,) इन मन्त्र पदों का उच्चारण कर नीचे लिखे पद पढ़ना चाहिये। इन नीचे लिखे शब्दोंको सम्बोधनरूपसे दो दो बार बोलना चाहिये । प्रथम ही हे सम्यग्दृष्टे हे सम्यग्दृष्टे, हे आसन्नभव्य हे आसन्नभव्य, हे निर्वाणपूजार्ह हे निर्वाणपूजाई, और फिर अग्नीन्द्र स्वाहा इस प्रकार उच्चारण करना चाहिये (इन सबका अर्थ यह है कि हे सम्यग्दृष्टि, हे निकटभव्य, हे निर्वाण कल्याणकी पूजा करने योग्य, अग्निकुमार देवोंके इन्द्र, तेरे लिये यह हवि सम-पित करता हूं) ।॥२०-२३॥
श्लोक 24 से 31 काम्य मंत्र और जाति मंत्र
(अब इसके आगे काम्य मन्त्र लिखते हैं) । तदनन्तर अपनी इष्टसिद्धिके लिये नीचे लिखे पदका उच्चारण करना चाहिये ‘सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु’ अर्थात् मुझे सेवाके फलस्वरूप छह परम स्थानोंकी प्राप्ति हो, अपमृत्युका नाश हो और समाधिमरण प्राप्त हो ।॥ २४-२५।। ऊपर कहे हुए सब मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, परमजाताय नमः, अनुपमजाताय नमः, स्व-प्रधानाय नमः, अचलाय नमः, अक्षयाय नमः, अव्याबाधाय नमः, अनन्तज्ञानाय नमः, अनन्त-दर्शनाय नमः, अनन्तवीर्याय नमः, अनन्तसुखाय नमः, नीरजसे नमः, निर्मलाय नमः, अच्छेद्याय नमः, अभेद्याय नमः, अजराय नमः, अमराय नमः, अप्रमेयाय नमः, अगर्भवासाय नमः, अक्षो-भ्याय नमः, अविलीनाय नमः, परमधनाय नमः, परमकाष्ठायोगरूपाय नमः, लोकाग्रवासिने नमो नमः, परमसिद्धेभ्यो नमो नमः, अर्हत्सिद्धेभ्यो नमो नमः, केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः, अन्त-कृत्सिद्धेभ्यो नमो नमः, परम्परसिद्धेभ्यो नमो नमः, अनादिपरम्परसिद्धेभ्यो नमो नमः, अनाद्यनु-प्रमसिद्धेभ्यो नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्य आसन्नभव्य निर्वाणपूजार्ह निर्वाणपूजार्ह अग्नीन्द्र स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्यु विनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
इस प्रकार इन समस्त पदोंके द्वारा यह पीठिका मन्त्र कहा, अब इसके आगे शास्त्रोंके अनुसार अनुक्रमसे जातिमन्त्र कहते हैं ।। २६ ।। तान्त अर्थात् षष्ठीविभक्त्यन्त सत्यजन्म पदके आगे शरण और उसके आगे प्रपद्यामि शब्द कहना अर्थात् ‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि’ (मैं सत्यरूप जन्मको धारण करनेवाले जिनेन्द्रदेवका शरण लेता हूं), इस प्रकार कहना चाहिये । इसके बाद ‘अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि’ (मैं अरहन्त पदके योग्य जन्म धारण करनेवाले का शरण लेता हूं) ‘अर्हन्मातुः शरणं प्रपद्यामि’ (अर्हन्तदेवकी माताका शरण लेता हूं,) ‘अर्हत्सुतस्य शरणं प्रपद्यामि’ (अरहन्तदेवके पुत्रका शरण लेता हूं), ‘अनादिगमनस्य शरणं प्रपद्याश्चि’ (अनादि ज्ञानको धारण करनेवालेका शरण लेता हूं), ‘अनुपमजन्मनः शरणं प्रभद्यामि’ (उपमारहित जन्मको धारण करनेवालेका शरण लेता हूं) और ‘रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि’ (रत्नत्रयका शरण ग्रहण करता हूं) ये मन्त्र बोलना चाहिये । तदनन्तर सम्बोधन विभक्त्यन्त सम्यग्दृष्टि, ज्ञानमूर्ति और सरस्वती पदका दो दो बार उच्चारणकर अन्तमें स्वाहा शब्द बोलना चाहिये अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, ज्ञानमूर्ते, ज्ञानमूर्ते, सरस्वति सरस्वति, स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टे हे सम्यग्दृष्टे, हे ज्ञानमूर्ते हे ज्ञानमूर्ते, हे सरस्वति, हे सरस्वति, मैं तेरे लिये हवि समर्पण करता हूं) यह मन्त्र कहना चाहिये और फिर काम्य मन्त्र पहले के समान ही पढ़ना चाहिये ।। २७-३०।। ऊपर कहे हुए पीठिका मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि, अर्हन्मातुः शरणं प्रपद्यामि, अर्हत्सुतस्य शरणं प्रपद्यामि, अनादिगमनस्य शरणं प्रपद्यामि, अनुपमजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे ज्ञानमूर्ते ज्ञानमूर्ते, सरस्वति सरस्वति स्वाहा, सेवाफलं षड्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।’
ये मन्त्र जातिसंस्कारका कारण होनेसे जाति मन्त्र कहलाते हैं अब इसके आगे निस्ता-रक मन्त्र कहते हैं ।।३१।।
श्लोक 32 से 42 निस्तारक और ऋषि मंत्र
सबसे पहले ‘सत्यजाताय स्वाहा’ (सत्यरूप जन्मको धारण करने वालेके लिये मैं हवि समर्पण करता हूं) इस मन्त्रका स्मरण किया गया है फिर ‘अर्हज्जाताय स्वाहा’ (अरहन्तरूप जन्मको धारण करनेवाले के लिये मैं हवि सर्पित करता हूं) यह मन्त्र बोलना चाहिये और इसके बाद षट्कर्मणे स्वाहा (देवपूजा आदि छह कर्म करनेवाले के लिये हवि सर्पित करता हूं), इस मन्त्रका द्विजको उच्चारण करना चाहिये। फिर ‘ग्रामयतये स्वाहा’ (ग्रामयतिके लिये समर्पण करता हूं), यह मन्त्र बोलना चाहिये ॥ ३२-३३।। फिर ‘अनादिश्रोत्रियाय स्वाहा’ (अनादिकालीन श्रुतके अध्येताको समर्पण करता हूं), यह मन्त्र पद बोलना चाहिये तदनन्तर इसी प्रकार ‘स्नातकाय स्वाहा’ और श्रावकाय स्वाहा’ ये दो मन्त्र पढ़ना चाहिये (केवली अरहन्त और श्रावकके लिये समर्पण करता हूं) ।॥३४।। इसके बाद ‘देवब्राह्मणाय स्वाहा’ (देवब्राह्मणके लिये समर्पण करता हूं), ‘सुब्राह्मणाय स्वाहा’ (सुब्राह्मणके लिये समर्पण करता हूं), और ‘अनुपमाय स्वाहा’ (उपमारहित भगवान्के लिये हवि सर्पित करता हूं), ये शब्द बोलना चाहिये ।। ३५॥ तदनन्तर सम्यग्दृष्टि, निधि-पति और वैश्रवण शब्दको दो दो बार कहकर अन्तमें स्वाहा शब्दका प्रयोग करना चाहिये अर्थात सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे निधिपते निधिपते, वैश्रवण वैश्रवण स्वाहा’ (हे सम्यग्दृष्टि हे निधियोंके अधिपति, हे कुबेर, मैं तुम्हें हवि सर्पित करता हूं) यह मन्त्र बोलना चाहिये ।। ३६।। इसके बाद मन्त्रोंको जाननेवाला द्विज पहले के समान काम्यमन्त्र बोले । अब इसके आगे उपासकाध्ययन-शास्त्र के अनुसार ऋषि मन्त्र कहता हूं ।॥३७॥ जातिमन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
‘सत्यजाताय स्वाहा, अर्हज्जाताय स्वाहा, षट्कर्मणे स्वाहा, ग्रामयतये स्वाहा, अनादि-श्रोत्रिधाय स्वाहा, स्नातकाय स्वाहा, श्रावकाय स्वाहा, देवब्राह्मणाय स्वाहा, सुब्राह्मणाय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे निधिपते निधिपते वैश्रवण वैश्रवण स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधियरणं भवतु ।
तदनन्तर ऋषिमन्त्र-प्रथम ही ‘सत्यजाताय नमः’ (सत्यजन्मको धारण करनेवाले को नमस्कार हो) यह पद बोलना चाहिये और उसके बाद ‘अर्हज्जाताय नमः (अरहन्त रूप जन्मको धारण करनेवाले के लिये नमस्कार हो) इस पदका उच्चारण करना चाहिये ॥३८॥ ‘निर्ग्रन्थाय नमः’ (परिग्रहरहितके लिये नमस्कार हो), ‘वीतरागाय नमः’ (रागद्वेषरहित जिनेन्द्र देवको नमस्कार हो), ‘महाव्रताय नमः’ (महाव्रत धारण करनेवालोंके लिये नमस्कार हो), ‘त्रिगुप्ताय नमः’ (तीनों गुप्तियोंको धारण करनेवाले के लिये नमस्कार हो) ‘महायोगाय नमः’ (महायोगको धारण करनेवाले ध्यानियोंको नमस्कार हो) और ‘विविधयोगाय नमः’ (अनेक प्रकारके योगोंको धारण करनेवालोंके लिये नमस्कार हो) ये मन्त्र पढ़ना चाहिये ।।३९-४०।। फिर नमः शब्दके साथ चतुर्थी विभक्त्यन्त विविर्धाद्ध शब्दका पाठ करना चाहिये अर्थात् ‘विवि- धर्द्धये नमः” (अनेक ऋद्धियोंको धारण करनेवाले के लिये नमस्कार हो) ऐसा उच्चारण करना चाहिये । इसी प्रकार जिनके आगे नमः शब्द लगा हुआ है ऐसे चतुर्थ्यन्त अङ्गधर और पूर्वधर शब्दोंका पाठ करना चाहिये अर्थात् ‘अङ्गधराय नमः’ (अङ्गोंके जाननेवालेको नमस्कार हो) और ‘पूर्ववराय नमः’ (पूर्वी के जाननेवालोंको नमस्कार हो) ये मन्त्र बोलना चाहिये । तदनन्तर ‘गणधराय नमः (गगत्ररको नमस्कार हो) इस पदका उच्चारण करना चाहिये ॥४१-४२।।
श्लोक 43 से 51 ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्र
फिर परविभ्यः शब्दके आगे नमो नमः का उच्चारण करना चाहिये अर्थात् ‘परविभ्यो नमो नमः’ (परम ऋषियोंको बार बार नमस्कार हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये और इसके बाद ‘अनुपमजाताय नमो नमः’ (उपभारहित जन्मधारण करनेवालेको बार बार नमस्कार हो) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ॥४३।। फिर अन्तमें सम्बोधन विभक्त्यन्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार उच्चारण करना चाहिये और इसी प्रकार मन्त्रोंको जाननेवाले द्विजों को सम्बोधनान्त भूपति और नगरपति शब्दका भी दो दो बार उच्चारण करना चाहिये । तदनन्तर आगे कहा जानेवाला मन्त्रका अवशिष्ट अंश भी बोलना चाहिये । कालश्रमण शब्दको सम्बोधन विभक्तिमें दो बार कहकर उसके आगे स्वाहा शब्दका उच्चारण करना चाहिये और फिर यह सब कह चुकने के बाद पहले के समान काम्यमन्त्र पढ़ना चाहिये ।।४४-४६॥ इन सब ऋषिमन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
‘सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, निर्ग्रन्थाय नमः, वीतरागाय नमः, महाव्रताय नमः, त्रिगुप्ताय नमः, महायोगाय नमः, विविधयोगाय नमः, विविधर्द्धये नमः’ अङ्गधराय नमः, पूर्वधराय नमः, गणवराय नमः, परविभ्यो नमो नमः, अनुपमजाताय नमो नमः, सम्य-ग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे भूपते भूपते नगरपते नगरपते कालश्रमण कालश्रमण स्वाहा, सेवाफलं षट्रम-स्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
तत्त्वों के जाननेवाले मुनियों के द्वारा ये ऊपर लिखे हुए मन्त्र मुनिमन्त्र अथवा ऋषिमन्त्र माने गये हैं। अब इनके आगे भगवान् ऋषभदेवकी श्रुतिने जिस प्रकार कहा है उसी प्रकार में सुरेन्द्र मन्त्रोंको कहता हूं ॥४७॥
प्रथम ही में ‘सत्यजाताय स्वाहा’ (सत्यजन्म लेनेवालेको हवि समर्पण करता हूं) यह पद पढ़ना चाहिये, फिर ‘अर्हज्जाताय स्वाहा’ (अरहन्तके योग्य जन्म लेनेवालेको हवि समर्पण करता हूँ) यह उत्कृष्ट पद पढ़ना चाहिये ॥४८।। फिर ‘दिव्यजाताय स्वाहा’ (जिसका जन्म दिव्यरूप है उसे हवि समर्पण करता हूँ) ऐसा उच्चारण करना चाहिये और फिर ‘दिव्या-चिर्जाताय स्वाहा’ (दिव्य तेजःस्वरूप जन्म धारण करनेवालेके लिये हवि समर्पण करता हूँ) यह पद पढ़ना चाहिये ॥४९॥ तदनन्तर ‘नेमिनाथाय स्वाहा’ (धर्मचक्रकी धुरीके स्वामी जिनेन्द्रदेवको समर्पण करता हूँ) यह पद बोलना चाहिये और इसके बाद ‘सौधर्माय स्वाहा’ (सौधर्मेन्द्रके लिये समर्पण करता हूँ) इस मन्त्रका स्मरण करना चाहिये ।। ५० ।। फिर ‘कल्पाधि-पतये स्वाहा (स्वर्गके अधिपतिके लिये समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र कहना चाहिये और उसके बाद ‘अनुचराय स्वाहा’ (इन्द्रके अनुचरोंके लिये समर्पण करता हूँ) यह शब्द बोलना चाहिये ॥५१॥ फिर ‘परम्परेन्द्राय स्वाहा’ (परम्परासे होनेवाले इन्द्रोंके लिये समर्पण करता हूँ) इस पदका उच्चारण करे और उसके अनन्तर ‘अहमिन्द्राय स्वाहा’ (अहमिन्द्रके लिये समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र अच्छी तरह पढ़े ।।५२।।
श्लोक 52 से 62 सुरेंद्र और परमराजादि मंत्र
फिर ‘परार्हताय स्वाहा’ (अरहन्तदेवके परम-उत्कृष्ट उपासकको समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये और उसके पश्चात् ‘अनुपमाय स्वाहा’ (उपमारहितके लिये समर्पण करता हूँ) यह पद बोलना चाहिये ।। ५३ ।। तदनन्तर सम्बोधनान्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार उच्चारण करना चाहिये तथा सम्बोधनान्त कल्पपति और दिव्यमूर्ति शब्दको भी दो दो बार पढ़ना चाहिये इसी प्रकार सम्बोधनान्त वज्रनामन् शब्द को भी दो बार बोलकर स्वाहा शब्दका उच्चारण करना चाहिये और अन्तमें तीन तीन पदोंके द्वारा पहले के समान काम्य मन्त्र पढ़ना चाहिये अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे कल्पपते कल्पपते दिव्यमूर्ते दिव्यमूर्ते वज्रनामन् वज्रनामन् स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टि, हे स्वर्गके अधिपति, हे दिव्य-मूर्तिको धारण करनेवाले, हे वज्रनाम, में तेरे लिये हवि समर्पण करता हूँ) यह बोलकर काम्य मन्त्र पढ़ना चाहिये ।।५४-५५।।
ऊपर कहे हुए सुरेन्द्र मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
‘सत्यजाताय स्वाहा, अर्हज्जाताय स्वाहा, दिव्यजाताय स्वाहा, दिव्याचिर्जाताय स्वाहा, नेमिनाथाय स्वाहा, सौधर्माय स्वाहा, कल्पाधिपतये स्वाहा, अनुचराय स्वाहा, परम्परेन्द्राय स्वाहा, अहमिन्द्राय स्वाहा, परमार्हताय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे कल्प-पते कल्पपते दिव्यमूर्ते दिव्यमूर्ते वज्रनामन् वज्रनामन् स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
यह सुरेन्द्रको संतुष्ट करनेवाला सुरेन्द्र मन्त्र कहा। अब आगे शास्त्रोंके अनुसार परम-राजादि मन्त्र कहते हैं ।। ५६ ।। इन मन्त्रोंमें सर्वप्रथम ‘सत्यजाताय स्वाहा’ (सत्य जन्म धारण करनेवालेको हवि समर्पण करता हूँ) यह पद पढ़ना चाहिये, फिर ‘अर्हज्जाताय स्वाहा’ (अरहन्त पदके योग्य जन्म लेनेवालेको समर्पण करता हूँ) यह उत्कृष्ट पद पढ़ना चाहिये ।।५७।। इसके बाद ‘अनुपमेन्द्राय स्वाहा’ (उपमारहित इन्द्र अर्थात् चक्रवर्तीके लिये समर्पण करता हूँ) यह पद कहना चाहिये। तदनन्तर ‘विजयार्चजाताय स्वाहा’ (विजयरूप तथा तेजःपूर्ण जन्मको धारण करनेवालेके लिये समर्पण करता हूँ) इस पदका उच्चारण करना चाहिये ॥५८॥ इसके पश्चात् ‘नेमिनाथाय स्वाहा’ (धर्मरूप रथके प्रवर्तकको समर्पण करता हूँ) यह पद पढ़ना चाहिये और उसके बाद ‘परमजाताय स्वाहा’ (उत्कृष्ट जन्म लेनेवालेको समर्पण करता हूँ) यह पद बोलना चाहिये ।। ५९।। फिर ‘परमार्हताय स्वाहा’ (उत्कृष्ट उपासकको समर्पण करता हूँ) यह पद पढ़ना चाहिये और इसके बाद द्विजोंको ‘अनुपमाय स्वाहा’ (उपमारहित के लिये समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र बोलना चाहिये ।। ६०।। तदनन्तर सम्बोधनान्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार उच्चारण करना चाहिये तथा इसी प्रकार सम्बोधनान्त उग्रतेजः पद, दिशाजय पद और नेमिविजय पदको दो दो बार बोलकर अन्तमें स्वाहा शब्दका उच्चारण करना चाहिये और अन्तमें पहलेके समान तीन तीन पदोंसे काम्य मन्त्र बोलना चाहिये अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे उग्रतेजः उग्रतेजः दिशांजय दिशांजय नेमिविजय नेमिविजय स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टि, हे प्रचण्ड प्रतापके धारक, हे दिशाओंको जीतनेवाले, हे नेमिविजय, मैं तुम्हें हवि समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र बोलकर काम्यमन्त्र पढ़ना चाहिये ।।६१-६२॥
श्लोक 63 से 71 परमेष्ठी मंत्रों का प्रारंभ
परमराजादि मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
‘सत्यजाताय स्वाहा, अर्हज्जाताय स्वाहा, अनुपमेन्द्राय स्वाहा, विजयार्चजाय स्वाहा, नेमिनाथाय स्वाहा, परमजाताय स्वाहा, परमार्हताय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, उग्रतेजः, उग्रतेजः, दिशांजय दिशांजय, नेमिविजय नेमिविजय स्वाहा, सेवाफलं षट् परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
ये मन्त्र परमराजादि मन्त्र माने गये हैं। अब यहांसे आगे जिस प्रकार परम शास्त्रमें कहा है उसी प्रकार परमेष्ठियों के उत्कृष्ट मन्त्र कहता हूँ ।। ६३ ।। उन परमेष्ठी मन्त्रोंमें सबसे पहले ‘सत्यजाताय नमः’ (सत्यरूप जन्म लेनेवालेके लिये नमस्कार हो) यह पद बोलना चाहिये
(सत्यरूप जन्म लेनेवालेके लिये नमस्कार हो) यह पद बोलना चाहिये और उसके बाद ‘अर्हज्जाताय नमः’ (अरहन्तके योग्य जन्म लेनेवालेके लिये नमस्कार हो) यह पद पढ़ना चाहिये ।। ६४।। तदनन्तर ‘परमजाताय नमः’ (उत्कृष्ट जन्म लेनेवाले के लिये नमस्कार हो) यह पद कहना चाहिये और इसके बाद चतुर्थी विभक्त्यन्त परमार्हत शब्दके आगे नमः पद लगाकर ‘परमार्हताय नमः’ (उत्कृष्ट जिनधर्मके धारकके लिये नमस्कार हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये ।। ६५।। तत्पश्चात् अध्यात्म शास्त्रको जाननेवाले द्विजोंको ‘परमरूपाय नमः’ (उत्कृष्ट निर्ग्रन्थरूपको धारण करनेवालेके लिये नमस्कार हो) और परम-तेजसे नमः (उत्तम तेजको धारण करनेवालेके लिये नमस्कार हो) ये दो मन्त्र बोलना चाहिये ।।६६।। फिर नमः शब्दके साथ परमगुणाय यह पद अर्थात् ‘परमगुणाय नमः’ (उत्कृष्ट गुण वाले के लिये नमस्कार हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये और उसके अनन्तर नमः शब्दसे सहित चतुर्थी विभक्त्यन्त परमस्थान शब्द अर्थात् ‘परमस्थानाय नमः’ (मोक्षरूप उत्तमस्थानवाले के लिये नमस्कार हो) यह पद पढ़ना चाहिये ।। ६७।। इसके पश्चात् क्रमको जानकर ‘परम-योगिने नमः’ (परम योगीके लिये नमस्कार हो) और ‘परमभाग्याय नमः’ (उत्कृष्ट भाग्य-शालीको नमस्कार हो) ये दोनों पद बोलना चाहिये ॥६८॥ तदनन्तर जिसके आगे नमः शब्द लगा हुआ है और चतुर्थी विभक्ति जिसके अन्तमें है ऐसा परर्माद्ध पद अर्थात् ‘परमर्द्धये नमः’ (उत्तम ऋद्धियोंके धारकके लिये नमस्कार हो) और ‘परमप्रसादाय नमः’ (उत्कृष्ट प्रसन्नताको धारण करनेवाले के लिये नमस्कार हो) ये दो मन्त्र पढ़ना चाहिये ॥६९॥ फिर ‘परमकाक्षिताय नमः’ (उत्कृष्ट आत्मानन्दकी इच्छा करनेवालेके लिये नमस्कार हो) और परमविजयाय नमः (कर्मरूप शत्रुओंपर उत्कृष्ट विजय पानेवालेके लिये नमस्कार हो) ये दो मन्त्र बोलना चाहिये ॥७०॥ तदनन्तर ‘परमविज्ञानाय नमः’ (उत्कृष्ट ज्ञानवाले के लिये नमस्कार हो) और उसके बाद ‘परमदर्शनाय नमः’ (परम दर्शनके धारकके लिये नमस्कार हो) यह पद पढ़ना चाहिये ।।७१।।
श्लोक 72 से 81 परमेष्ठी मंत्रों का संग्रह और समापन
इसके पश्चात् ‘परमवीर्याय नमः’ (अनन्त बल शालीके लिये नमस्कार हो) और फिर ‘परमसुखाय नमः’ (परम सुखके धारकको नमस्कार हो) ये मन्त्र कहना चाहिये ।। ७२ ।। इसके अनन्तर सर्वज्ञाय नमः (संसारके समस्त पदार्थोंको जाननेवालेके लिये नमस्कार हो) ‘अर्हते नमः’ (अरहन्तदेवके लिये नमस्कार हो), और फिर ‘परमेष्ठिने नमो नमः’ (परमेष्ठी के लिये बार बार नमस्कार हो) ये मन्त्र बोलना चाहिये ।।७३।। तदनन्तर
‘परमनेत्रे नमो नमः’ (उत्कृष्ट नेताके लिये नमस्कार हो) यह मन्त्र
कहना चाहिये और उसके बाद सम्बोधनान्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार प्रयोग करना चाहिये ॥७४।। तथा इसी प्रकार त्रिलोकविजय, धर्मति और धर्मनेमि शब्दको भी दो दो बार उच्चारण कर अन्तमें स्वाहा पद बोलना चाहिये अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, त्रिलोकविजय त्रिलोकविजय, धर्ममूर्ते धर्ममूर्ते, धर्मनेमे धर्मनेमे स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टि, हे तीनों लोकोंको विजय करनेवाले, हे धर्ममूर्ति और हे धर्मके प्रवर्तक, मैं तेरे लिये हवि समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र बोलना चाहिये ॥ ७५॥ तत्पश्चात् द्विजोंको पहले के समान विधिपूर्वक काम्यमन्त्र पढ़ना चाहिये क्योंकि विद्वान् लोग सब मन्त्रोंसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होना ही मुख्य फल मानते हैं ।।७६।।
परमेष्ठी मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
चूणिः- सत्यजाताय नमः, अहंज्जाताय नमः, परमजाताय नमः, परमाहंताय ननः, परमरूपाय नमः, परमतेजसे नमः, परमगुणाय नमः, परमस्थानाय नमः, परमयोगिने नमः, परमभाग्याय नमः, परमर्द्धये नमः, परमप्रसादाय नमः, परमकाङक्षिताय नमः, परमविजयाय नमः, परमविज्ञानाय नमः, परमदर्शनाय नमः, परमवीर्याय नमः, परमसुखाय नमः, सर्वज्ञाय नमः, अर्हते नमः, परमेष्ठिने नमो नमः, परमनेत्रे नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे त्रिलोकविजय त्रिलोकविजय धर्ममूर्ते धर्ममूर्ते धर्मनेमे धर्मनेमे स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
एते तु पीठिकामन्त्राः सप्त ज्ञेया द्विजोत्तमः । एतैः सिद्धार्चनं कुर्यादाषा’नादिक्रियाविधौ ॥७७॥ क्रियामन्त्रास्त एते स्युराधानादिक्रियाविधौ । सूत्रे गणधरोद्धायें यान्ति साधनमन्त्रताम् ॥७८॥ सन्ध्यास्वग्नित्रये देवपूजने नित्यकर्मणि । भवन्त्याहुतिमन्त्राश्च त एते विधिसाधिताः ॥७६॥ सिद्धार्चासनिधी मन्त्रान् जपेदष्टोत्तरं शतम् । गन्धपुष्पाक्षतार्घादि निवेदनपुरः सरम् ॥८०॥ सिद्धविद्यस्ततो मन्त्रैरेभिः कर्म समाचरेत् । शुक्लवासाः शुचिर्यज्ञोपवीत्यव्यग्रमानसः ॥८१॥
सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, परमजाताय नमः, परमार्हताय नमः, परम-रूपाय नमः, परमतेजसे नमः, परमगुणाय नमः, परमस्थानातय नमः, परमयोगिने नमः, परम-भाग्याय नमः, परमर्द्धये नमः, परमप्रसादाय नमः, परमकाक्षिताय नमः, परमविजयाय नमः, परमविज्ञानाय नमः, परमदर्शनाय नमः, परमवीर्याय नमः, परमसुखाय नमः, सर्वज्ञाय नमः, अर्हते नमः, परमेष्ठिने नमो नमः, परमनेत्रे नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, त्रिलोकविजय त्रिलोकविजय, धर्ममूर्ते धर्ममर्ते, धर्मनेमे धर्मनेमे स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अप-मृत्यु विनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
ब्राह्मणोंको ये ऊपर लिखे हुए सात पीठिका मन्त्र जानना चाहिये और गर्भाधानादि क्रियाओंको विधि करनेमें इनसे सिद्धपूजन करना चाहिये ।।७७।। गर्भाधानादि क्रियाओंकी विधि करनेमें ये मन्त्र क्रियामन्त्र कहलाते हैं और गणधरोंके द्वारा कहे हुए सूत्रमें ये ही साधन मन्त्रपनेको प्राप्त हो जाते हैं ।॥७८॥ विधिपूर्वक सिद्ध किये हुए ये ही मन्त्र संध्याओंके समय तीनों अग्नियोंमें देवपूजनरूप नित्य कर्म करते समय आहुति मन्त्र कहलाते हैं ।॥७९॥ सिद्ध भगवान्की प्रतिमाके सामने पहले गन्ध, पुष्प, अक्षत और अर्ध आदि समर्पण कर एक सौ आठ बार उक्त मन्त्रोंका जप करना चाहिये ।॥८०॥ तदनन्तर जिसे विद्याएँ सिद्ध हो गई हैं, जो सफेद वस्त्र पहने हुए हैं, पवित्र हैं, यज्ञोपवीत धारण किये हुए हैं और जिसका चित्त आकुलतासे रहित है ऐसा द्विज इन मन्त्रोंके द्वारा समस्त क्रियाएँ करें ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 अग्नियों की स्थापना और पूजा
क्रियाओंके प्रारम्भमें उत्तम द्विजोंको रत्नत्रयका संकल्प कर अग्निकुमार देवों के इन्द्रके मुकुटसे उत्पन्न हुई तीन प्रकारकी अग्नियाँ प्राप्त करनी चाहिये ॥८२॥ ये तीनों ही अग्नियाँ तीर्थङ्कर, गणधर और सामान्य केवली के अन्तिम अर्थात् निर्वाणमहोत्सवमें पूजाका अंग होकर अत्यन्त पवित्रताको प्राप्त हुई मानी जाती हैं ।॥८३॥ गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि नामसे प्रसिद्ध इन तीनों महाअग्नियोंको तीन कुण्डों में स्थापित करना चाहिये ।।८४।। इन तीनों प्रकारकी अग्नियोंमें मंत्रोंके द्वारा पूजा करनेवाला पुरुष द्विजोत्तम कहलाता है और जिसके घर इस प्रकारकी पूजा नित्य होती रहती है वह आहिताग्नि अथवा अग्निहोत्री कहलाता है ॥८५॥ नित्य पूजन करते समय इन तीनों प्रकारकी अग्नियोंका विनियोग नैवेद्यके पकानेमें, धूपखेनेमें और दीपक जलानेमें होता है अर्थात् गार्हपत्य अग्निसे नैवेद्य पकाया जाता है, आहवनीय अग्निमें धूप खेई जाती है और दक्षिणाग्निसे दीपक जलाया जाता है ।। ८६ ।। घरमें बड़े प्रयत्नके साथ इन तीनों अग्नियोंकी रक्षा करनी चाहिये और जिनका कोई संस्कार नहीं हुआ है ऐसे अन्य लोगोंको कभी नहीं देनी चाहिये ।। ८७ ।। अग्निमें स्वयं पवित्रता नहीं है और न वह देवतारूप ही है किन्तु अरहन्तदेवकी दिव्य मूतिकी पूजाके सम्बन्धसे वह अग्नि पवित्र हो जाती है ॥८८॥ इसलिये ही द्विजोत्तम लोग इसे पूजाका अंग मानकर इसकी पूजा करते हैं अतएव निर्वाणक्षेत्रकी पूजाके समान अग्निकी पूजा करनेमें कोई दोष नहीं है। भावार्थ-जिस प्रकार जिनेन्द्रदेवके सम्बन्धसे क्षेत्र भी पूज्य हो जाते हैं उसी प्रकार उनके सम्बन्धसे अग्नि भी पूज्य हो जाती है अतएव जिस प्रकार निर्वाण आदि क्षेत्रोंकी पूजा करनेमें दोष नहीं है उसी प्रकार अग्निकी पूजा करने में भी कोई दोष नहीं है ।॥८९॥ ब्राह्मणोंको व्यवहार नयकी अपेक्षा ही अग्निकी पूज्यता इष्ट है इसलिये जैन ब्राह्मणों को भी आज यह व्यवहारनय उपयोगमें लाना चाहिये ।॥९०॥ ये ऊपर कहे हुए मन्त्र साधारण मन्त्र हैं, सभी क्रियाओंमें काम आते हैं अब विशेष क्रियाओंसे सम्बन्ध रखनेवाले विशेष मन्त्रोंको यथासम्भव कहता हूँ ।।९१॥
श्लोक 92 से 101 गर्भाधान, प्रीति, सुप्रीति, और धृति मंत्र
गर्भाधानके मन्त्र-प्रथम ही ‘सज्जातिभागी भव’ (उत्तम जातिको धारण करनेवाला हो) और ‘सद्गृहिभागी भव’ (उत्तम गृहस्थ अवस्थाको प्राप्त होओ) इन दो पदोंका उच्चारण कर पश्चात् नीचे लिखे पद पढ़ना चाहिये ।। ९२ ।। पहले ‘मुनीन्द्रभागी भव’ (महामुनिका पद प्राप्त करनेवाला हो) यह पद बोलना चाहिये और फिर ‘सुरेन्द्रभागी भव’ (इन्द्र पदका भोक्ता हो) तथा ‘परमराज्यभागी भव’ (उत्कृष्ट राज्यका उपभोग करनेवाला हो) इन दो पदोंका उच्चारण करना चाहिये ।। ९३।। तदनन्तर ‘आर्हन्त्यभागी भव’ (अरहन्त पदका प्राप्त करनेवाला हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये और फिर ‘परमनिर्वाणभागी भव’ (परम निर्वाण पदको प्राप्त करनेवाला हो), यह पद कहना चाहिये ॥९४॥ गर्भाधानकी क्रियामें पहलेके मन्त्रोंके साथ साथ यह मन्त्र काममें लाना चाहिये इस प्रकार यह आम्नायके अनुसार मन्त्रोंका विनियोगका क्रम दिखलाया है ।।९५।।
गर्भाधानके समय काम आनेवाले विशेष मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
सज्जातिभागी भव, सद्गृहिभागी भव, मुनीन्द्रभागी भव, सुरेन्द्रभागी भव, परम-राज्यभागी भव, आर्हन्त्यभागी भव, परमनिर्वाणभागी भव ।
अब प्रीतिमन्त्र कहते हैं- ‘त्रैलोक्यनाथो भव’ (तीनों लोकोंके अधिपति होओ) ‘त्रैकाल्य-ज्ञानी भव’ (तीनों कालका जाननेवाला हो) और ‘त्रिरत्नस्वामी भव’ (रत्नत्रयका स्वामी हो) ये तीन प्रीतिक्रियाके मन्त्र हैं ।।९६।।
संग्रह-‘त्रैलोक्यनाथो भव, त्रैकाल्यज्ञानी भव, त्रिरत्नस्वामी भव’ ।
अब सुप्रीति क्रियाके मन्त्र कहते हैं- सुप्रीति क्रिया में ‘अवतारकल्याणभागी भव’ (गर्भकल्या-णकको प्राप्त करनेवाला हो), ‘मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव’ (सुमेरु पर्वतपर इन्द्रके द्वारा जन्माभिषेकके कल्याणको प्राप्त हो), ‘निष्क्रान्तिकल्याणभागी भव’ (निष्क्रमण कल्याणको प्राप्त करनेवाला हो), ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’ (अरहन्त अवस्था-केवलज्ञानकल्याणकको प्राप्त करनेवाला हो), और ‘परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ (उत्कृष्ट निर्वाण कल्याणकको प्राप्त करनेवाला हो) ये मन्त्र विद्वानोंको अनुक्रमसे बोलना चाहिये । अव आगे धृतिमन्त्र कहते हैं सो हे द्विजो, उन्हें तुम प्रीतिपूर्वक सुनो ॥ ९७-१००।।
संग्रह-‘अवतारकल्याणभागी भव, मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव, निष्क्रान्ति-कल्याणभागी भव, आर्हन्त्यकल्याणभागी भव, परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ ।
धृति क्रियाके मन्त्र-गर्भाधान क्रियाके मंत्रोंमें सब जगह दातृ शब्द लगा देनेसे धृति क्रियाके मन्त्र हो जाते हैं, विद्वानोंको अनुक्रमसे उन्हींका प्रयोग करना चाहिये, आधान क्रिया के मंत्रोंसे इन मन्त्रोंमें और कुछ भेद नहीं है। भावार्थ ‘सज्जातिदातृभागी भव’ (सज्जाति-उत्तम जातिको देनेवाला हो), ‘सद्गृहिदातृभागी भव’ (सद्गृहस्थपदका देनेवाला हो), ‘मुनीन्द्रदातृभागी भव’ (महामुनिपदका देनेवाला हो), ‘सुरेन्द्रदातृभागी भव’ (सरेन्द्रपदको देनेवाला हो), ‘परमराज्यदातृभागी भव’ (उत्तमराज्य-चक्रवर्तीक पदका देनेवाला हो), ‘आर्हन्त्यदातृभागी भव’ (अरहन्त पदका देनेवाला हो) तथा ‘परमनिर्वाणदातृभागी भव’ (उत्कृष्ट निर्वाण पदका देनेवाला हो) धृति क्रियामें इन मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये ।।१०१।।
श्लोक 102 से 112 मोद और प्रियोद्भव मंत्र
संग्रह-‘सज्जातिदातृभागी भव, सद्गृहिदातृभागी भव, मुनीन्द्रदातृभागी भव, सुरेन्द्र-दातृभागी भव, परमराज्यदातृभागी भव, आर्हन्त्यदातृभागी भव, परमनिर्वाणदातृभागी भव’ ।
अब मोदक्रियाके मन्त्र कहते हैं- उत्तम मुनियोंने मोदक्रियाके मन्त्र इस प्रकार माने हैं सबसे पहले ‘सज्जातिकल्याणभागी भव’ (सज्जातिके कल्याणको धारण करनेवाला हो) यह पद बोलना चाहिये, फिर सद्गृहिकल्याणभागी भव (उत्तम गृहस्थके कल्याणका धारण करनेवाला हो) यह पद पढ़ना चाहिये, तदनन्तर ‘वैवाहकल्याणभागी भव’ (विवाहके कल्याण को प्राप्त करनेवाला हो) इस पदका उच्चारण करना चाहिये, फिर ‘मुनीन्द्रकल्याणभागी भव’ (महामुनि पदके कल्याणको प्राप्त करनेवाला हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये, इसके बाद ‘सुरेन्द्रकल्याणभागी भव’ ॥१०२॥
(इन्द्र पदके कल्याणका उपभोग करनेवाला हो), यह पद कहना चाहिये, फिर ‘मन्दराभिषेककल्याणभागी भव’ (सुमेरु पर्वतपर अभिषेकके कल्याणको प्राप्त हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये, अनन्तर ‘यौवराज्यकल्याणभागी भव’ (युवराज पदके कल्याण-का उपभोग करनेवाला हो) यह पद कहना चाहिये, तत्पश्चात् मन्त्रोंके प्रयोग करनेमें विद्वान् लोगोंको ‘महाराज्यकल्याणभागी भव’ (महाराज पदके कल्याणका उपभोक्ता हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये, फिर ‘परमराज्यकल्याणभागी भव’ (परमराज्य के कल्याणको प्राप्त हो) यह पद पढ़ना चाहिये और उसके बाद ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’ (अरहन्त पदके कल्याण-का उपभोग करनेवाला हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये ।।१०३-१०७।।
संग्रह ‘सज्जातिकल्याणभागी भव, सद्गृहिकल्याणभागी भव, वैवाहकल्याणभागी भव, मुनीन्द्रकल्याणभागी भव, सुरेन्द्रकल्याणभागी भव, मन्दराभिषेककल्याणभागी भव, यौवराज्यकल्याणभागी भव, महाराज्यकल्याणभागी भव, परमराज्यकल्याणभागी भव, आईं-न्त्यकल्याणभागी भव’ ।
अब प्रियोद्भव मन्त्र कहते हैं-प्रियोद्भव क्रियामें सिद्ध भगवान्की पूजा करनेके बाद नीचे लिखे मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये-
‘दिव्यनेमिविजयाय’, ‘परमनेमिविजयाय’, और ‘आर्हन्त्यनेमिविजयाय’ इन मन्त्रा-क्षरोंके साथ द्विजोंको अन्तमें स्वाहा शब्दका प्रयोग करना अभीष्ट है अर्थात् ‘दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा’ (दिव्यनेमिके द्वारा कर्मरूप शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवालेके लिये हवि समर्पण करता हूँ), ‘परमनेमिविजयाय स्वाहा’ (परमनेमिके द्वारा विजय प्राप्त करनेवालेके लिये समर्पण करता हूँ) और ‘आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा’ (अरहन्त अवस्थारूप नेमिके द्वारा कर्म शत्रुओंको जीतनेवाले जिनेन्द्रदेवके लिये समर्पण करता हूँ) ये तीन मन्त्र बोलना चाहिये ।।१०८-१०९।।
संग्रह-‘दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा, परमनेमिविजयाय स्वाहा, आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा’ । अब जन्म संस्कारके मन्त्र कहते हैं-प्रथम ही सिद्ध भगवान्के अभिषेकके गन्धोदकसे सिंचन किये हुए बालकको यह मन्त्र पढ़कर शिरपर स्पर्श करना चाहिये और कहना चाहिये कि यह तेरी माता कुल, जाति, अवस्था, रूप आदि गुणोंसे सहित है, शीलवती है, सन्तानवती है, भाग्यवती है, अवैधव्यसे युक्त है, सौम्यशान्तमूर्तिसे सहित है और सम्यग्दृष्टि है इसलिये हे पुत्र, इस माताके सम्बन्धसे तू भी अनुक्रमसे दिव्य चक्र, विजयचक्र और परमचक्र तीनों चक्रोंको पाकर सत्प्रीतिको प्राप्त हो ।। ११०-११२।।
श्लोक 113 से 121 जन्म संस्कार की विधि
इस प्रकार आशीर्वाद देकर पिता उसके समस्त अंगोंका स्पर्श करे और फिर प्रायः अपने समान होनेसे उसमें अपना संकल्पकर अर्थात् यह मैं ही हूँ ऐसा आरोपकर नीचे लिखे हुए सुभाषित पढ़े ।। ११३।। हे पुत्र, तू मेरे अङ्ग अङ्गसे उत्पन्न हुआ है और मेरे हृदयसे भी उत्पन्न हुआ है इसलिये तू पुत्र नामको धारण करनेवाला मेरा आत्मा ही है। तू सैकड़ों वर्षों तक जीवित रह ।।११४।। तदनन्तर दूध और घीरूपी पवित्र अमृत उसकी नाभिपर डालकर ‘घातिजयो भव’ (तू घातिया कर्मोंको जीतने-वाला हो) यह मन्त्र पढ़कर युक्तिसे उसकी नाभिका नाल काटना चाहिये ।।११५।। तत्पश्चात् ‘हे जात, श्रीदेव्यः ते जातक्रियां’ कुर्वन्तु अर्थात् हे पुत्र, श्री, ह्री आदि देवियाँ तेरी जन्मक्रियाका उत्सव करें यह कहते हुए धीरे धीरे यत्नपूर्वक सुगन्धित चूर्णसे उस बालकके शरीरपर उबटन करे फिर ‘त्वं मन्दराभिषेकार्हो भव’ अर्थात् तू मेरु पर्वतपर अभिषेक करने योग्य हो यह मन्त्र पढ़कर सुगन्धित जलसे उसे स्नान करावे और फिर ‘चिरं जीव्याः’ अर्थात् तू चिरकालतक जीवित रह इस प्रकार आशीर्वाद देकर उसपर अक्षत डाले ।।११६-११७।। इसके अनन्तर द्विज, ‘नश्यात् कर्ममलं कृत्स्नम्’- अर्थात् तेरे समस्त कर्ममल नष्ट हो जावें यह मन्त्र पढ़ करउसके मुख और नाकमें, औषधि मिलाकर तैयार किया हुआ घी मात्राके अनुसार छोड़े ॥११८॥ तत्पश्चात् ‘विश्वेश्वरीस्तन्यभागी भूयाः’ अर्थात् तू तीर्थ करकी माताके स्तनका पान करने वाला हो ऐसा कहता हुआ माताके स्तनको मन्त्रितकर उसे बालकके मुहमें लगा दे ।।११९।। तदनन्तर जिस प्रकार पहले वर्णन कर चुके हैं उसी प्रकार प्रीतिपूर्वक दान देते हुए उत्सव कर विधिपूर्वक जातकर्म अथवा जन्मकालकी क्रिया समाप्त करनी चाहिये ।। १२० ।। उसके जरायु पटलको नाभिकी नालके साथ साथ किसी पवित्र जमीनको खोदकर मन्त्र पढ़ते हुए गाड़ देना चाहिये ।।१२१।।
श्लोक 122 से 131 जन्मोत्सव और माता का स्नान
उसकी प्रक्रिया इस प्रकार है कि सम्बोधनान्त सम्यग्दृष्टि पद, सर्वमाता पद और वसुन्धरा पदको दो दो बार कहकर अन्तमें स्वाहा शब्द कहना चाहिये । अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे सर्वमातः सर्वमातः वसुन्धरे वसुन्धरे स्वाहा (सम्यग्दृष्टि, सर्वकी माता पृथ्वीमें यह समर्पण करता हूँ) इस मन्त्रसे मन्त्रितकर उस भूमिमें जल और अक्षत डालकर पाँच प्रकारके रत्नोंके नीचे गर्भका वह मल रख देना चाहिये और फिर कभी ‘त्वत्पुत्रा इव
मत पुत्राः चिरंजीविनी भूयासुः’ (हे पृथ्वी तेरे पुत्र-कुलपर्वतोंके समान मेरे पुत्र भी चिरंजीवी हों) यह कहकर घान्य उत्पन्न होनेके योग्य खेतमें जमीनपर वह मल डाल देना चाहिये ॥१२२-१२४।। तदनन्तर क्षीर वृक्षकी डालियोंसे पृथिवीको सुशोभित कर उसपर उस पुत्रकी माताको बिठाकर मंत्रित किये हुए सुहाते गर्म जलसे स्नान कराना चाहिये ।।१२५।। माताको स्नान करानेका मन्त्र यह है-प्रथम ही सम्बोधनान्त सम्यग्दृष्टि पदको दो बार कहना चाहिये फिर आसन्नभव्या, विश्वेश्वरी, अजितपुण्या, और जिन माता इन पदोंको भी सम्बोध-नान्त कर दो दो बार बोलना चाहिये और अन्तमें स्वाहा शब्द पढ़ना चाहिये । भावार्थ-सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्ये आसन्नभव्ये विश्वेश्वरि विश्वेश्वरि ऊर्जितपुष्ये ऊर्जितपुण्ये जिनमातः जिनमातः स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टि, हे निकटभव्य, हे सबकी स्वामिनी, हे अत्यन्त पुण्य संचय करनेवाली, जिन माता तू कल्याण करनेवाली हो) यह मन्त्र पुत्रकी माताको स्नान कराते समय बोलना चाहिये ।।१२६-१२७।। जिस प्रकार जिनेन्द्रदेवकी माता पुत्रके कल्याणोंको देखती है उसी प्रकार यह मेरी पत्नी भी देखे ऐसी श्रद्धासे यह स्नानकी विधि करनी चाहिये ॥१२८।। तीसरे दिन रातके समय ‘अनन्तज्ञानदर्शी भव’ (तू अनन्तज्ञानको देखनेवाला हो) यह मन्त्र पढ़कर उस पुत्रको गोदी में उठाकर ताराओंसे सुशोभित आकाश दिखाना चाहिये ।। १२९॥ उसी दिन पुण्याहवाचनके साथ साथ शक्तिके अनुसार दान करना चाहिये और जितना बन सके उतना सब जीवोंके अभयकी घोषणा करनी चाहिये ॥ १३०॥ इस प्रकार पूर्वाचार्योंने यह जन्मोत्सवकी विधि मानी है-कही है। उत्तम द्विजको आज भी इसका यथायोग्य रीतिसे अनुष्ठान करना चाहिये ।।१३१।।
श्लोक 132 से 142 नामकर्म, बहिर्यान, निषद्या, और अन्नप्राशन मंत्र
अब आगे नामकर्म करते समय जिन मंत्रोंका प्रयोग होता है उन्हें कहते हैं-इस विधिमें सिद्ध भगवान्की पूजा करने के लिये जिन सात पीठिका मंत्रोंका प्रयोग होता है उन्हें पहले ही कह चुके हैं। उनके आगे ‘दिव्याष्टसहस्रनामभागी भव’ आदि तीनों पदोंका उच्चारण कर मन्त्र परिवर्तित कर लेना चाहिये अर्थात् ‘दिव्याष्टसहस्रनामभागी भव’ (एक हजार आठ दिव्य नामोंका पानेवाला हो), ‘विजयाष्टसहस्रनामभागी भव’ (विजयरूप एक हजार आठ नामोंका धारक हो और ‘परमाष्टसहस्रनामभागी भव’ (अत्यन्त उत्तम एक हजार आठ नामोंका पानेवाला हो) ये मन्त्र पढ़ना चाहिये ।
संग्रह-‘दिव्याष्टसहस्रनामभागी भव, विजयाष्टसहस्रनामभागी भव, परमाष्ट-सहस्रनामभागी भव’ ।।१३२-१३३।। बाकीकी समस्त विधि पहले कही जा चुकी है इसलिये दुबारा नहीं कहते हैं अब आगे बहिर्यान क्रियाके मन्त्र नीचे लिखे अनुसार जानना चाहिये ॥१३४॥
सबसे पहले ‘उपनयनिष्क्रान्तिभागी भव’, (तू यज्ञोपवीतके लिये निकलनेवाला हो) यह पद बोलना चाहिये और फिर ‘वैवाहनिष्क्रान्तिभागी भव’ (विवाहके लिये बाहर निकलने वाला हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये ॥१३५॥ तदनन्तर अनुक्रमसे ‘मुनीन्द्रनिष्क्रान्तिभागी भव’ (मुनिपदके लिये निकलनेवाला हो) यह मन्त्र कहना चाहिये और उसके बाद ‘सुरेन्द्र-निष्क्रान्तिभागी भव’ (सुरेन्द्र पदकी प्राप्तिके लिये निकलनेवाला हो) यह पद बोलना चाहिये ।।१३६।। तत्पश्चात् ‘मन्दरेन्द्राभिषेकनिष्क्रान्तिभागी भव’ (सुमेरुपर्वतपर अभिषेकके लिये निकलनेवाला हो) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये और फिर ‘यौवराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’ (युवराज पदके लिये निकलनेवाला हो) यह मन्त्र कहना चाहिये ।।१३७।। तदनन्तर ‘महाराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’ (महाराज पदकी प्राप्तिके लिये निकलनेवाला हो) यह पद बोलना चाहिये और उसके बाद ‘परमराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’ (चक्रवर्तीका उत्कृष्ट राज्य पाने के लिये निकलनेवाला हो) यह मंत्र पढ़ना चाहिये और इसके अनन्तर ‘आर्हन्त्यराज्य-भागी भव’ (अरहन्त पदकी प्राप्तिके लिये निकलनेवाला हो) यह मन्त्र कहना चाहिये ।।१३८॥ इस प्रकार मन्त्रोंको जाननेवाले द्विजोंको इन उपर्युक्त पदोंके द्वारा मंत्रोंका जाप करना चाहिये । बाकी समस्त विधि पहले कह चुके हैं अब आगे निषद्या मन्त्र कहते हैं ।। १३९।।
संग्रह-‘उपनयनिष्क्रान्तिभागी भव, वैवाहनिष्क्रान्तिभागी भव, मुनीन्द्रनिष्क्रान्ति-भागी भव, सुरेन्द्रनिष्कान्तिभागी भव, मन्दराभिषेकनिष्क्रान्तिभागी भव, यौवराज्यनिष्क्रान्ति-भागी भव, महाराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव, परमराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव, आर्हन्त्यनिष्क्रान्ति-भागी भव’ ।
निषद्यामन्त्रः- ‘दिव्यसिंहासनभागी भव’ (दिव्य सिंहासनका भोक्ता हो-इन्द्रके आसनपर बैठनेवाला हो), ‘विजयसिंहासनभागी भव’ (चक्रन्वर्तीके विजयोल्लसित सिहासन पर बैठनेवाला हो) और ‘परमसिंहासनभागी भव’ (तीर्थ करके उत्कृष्ट सिंहासनपर बैठने वाला हो) ये तीन मन्त्र कहना चाहिये । ॥१४०।।
संग्रह-‘दिव्यसिंहासनभागी भव, विजयसिंहासनभागी भव, परमसिंहासनभागी भव’ ।
अब अन्नप्राशन क्रियाके मन्त्र कहते हैं- अन्नप्राशन क्रियाके समय तीन पदोंके द्वारा मन्त्र कहने चाहिये और वे पद दिव्यामृत, विजयामृत और अक्षीणामृत इनके अन्तमें भागी भव ये योग्य पद लगाकर बनाने चाहिये। विद्वानोंको अन्नप्राशन क्रियामें इन पदोंके द्वारा मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये । भावार्थ इस क्रियामें निम्नलिखित मन्त्र पढ़ने चाहिये-‘दिव्यामृत-भागी भव’ (दिव्य अमृतका भोग करनेवाला हो), ‘विजयामृतभागी भव’ (विजयरूप अमृतका उपभोक्ता हो) और ‘अक्षीणामृतभागी भव’ (अक्षीण अमृतका भोवता हो) ।।१४१-१४२।।
श्लोक 143 से 151 व्युष्टि और चौल मंत्र
संग्रहः- ‘दिव्यामृतभागी भव, विजयामृतभागी भव, अक्षीणामृतभागी भव’ । अब यहाँसे आगे शास्त्रानुसार व्युष्टि क्रियाके मंत्र कहते हैं-सबसे पहले ‘उपनयन’ के
आगे ‘जन्मवर्षवर्द्धन’ पद लगाकर ‘भागी भव’ पद लगाना चाहिये और फिर अनुक्रमसे वैवाह-निष्ठ, मुनीन्द्रजन्म, सुरेन्द्रजन्म, मन्दराभिषेक, यौवराज्य, महाराज्य, परमराज्य और आर्हन्त्य-राज्य इन शेष आठ पदोंके साथ ‘वर्षवर्द्धन’ पद लगाकर ‘भागी भव’ यह पद लगाना चाहिये । ऐसा करनेसे व्युष्टिक्रियाके सब मन्त्र बन जावेंगे। भावार्थ-व्युष्टिक्रियामें निम्नलिखित मंत्रोंका प्रयोग करना चाहिये-‘उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव’ (यज्ञोपवीतरूप जन्मके वर्षका बढ़ानेवाला हो), ‘वैवाहिनिष्ठवर्षवर्धनभागी भव’ (विवाह क्रियाके वर्षका वर्धक हो), ‘मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’ (मुनि पद धारण करनेवाले वर्षकी वृद्धिसे युक्त हो), ‘सुरेन्द्र-जन्मवर्षवर्धनभागी भव’ (इन्द्र जन्मके वर्षका बढ़ानेवाला हो), ‘मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव’ (सुमेरु पर्वतपर होनेवाले अभिषेककी वर्ष वृद्धि करनेवाला हो), यौवराज्यवर्षवर्धन-भागी भव’ (युवराज पदकी वर्ष वृद्धि करनेवाला हो), ‘महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ (महाराज पदकी वर्षवृद्धिका उपभोक्ता हो) ‘परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ (चक्रवर्ती के उत्कृष्ट राज्य
की वर्षवृद्धि करनेवाला हो) और ‘आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ (अरहन्त पदवीरूपी राज्यके वर्षका बढ़ानेवाला हो) ।।१४३-१४६।।
संग्रह-‘उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव, वैवाहनिष्ठवर्षवर्द्धनभागी भव, मुनीन्द्रजन्म-वर्षवर्धनभागी भव, सुरेन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव, मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव, यौवराज्यवर्षवर्द्धनभागी भव, महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव, परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव, आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ ।
अब चौलक्रियाके मन्त्र कहते हैं-जिसके आदिमें उपनयन शब्द है और अन्तमें ‘मुण्ड-
भागी भव’ शब्द है ऐसा पहला मन्त्र जानना चाहिये अर्थात् ‘उपनयनमुण्डभागी भव’ (उपनयन क्रियामें मुण्डन करनेवाला हो) यह चौलक्रियाका पहला मन्त्र है ॥१४७।। फिर ‘निर्ग्रन्थ-मुण्डभागी भव’ (निर्ग्रन्थ दीक्षा लेते समय मुण्डन करनेवाला हो) यह दूसरा मन्त्र है और उसके बाद ‘निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव’ (मुनि अवस्थामें केशलोंच करनेवाला हो) यह तीसरा मन्त्र है ।।१४८।। तदनन्तर ‘परमनिस्तारककेशभागी भव’ (संसारसे पार उतारनेवाले आचार्यके केशोंको प्राप्त हो) यह चौथा मन्त्र है और उसके पश्चात् परमेन्द्रकेशभागी भव (इन्द्र पदके केशोंको धारण करनेवाला हो) यह पाँचवाँ मन्त्र बोलना चाहिये ।।१४९।। इसके बाद ‘परमराज्यकेशभागी भव’ (चक्रवर्तीके केशोंको प्राप्त हो) यह छठवाँ मन्त्र है और ‘आई-न्त्यराज्यकेशभागी भव’ (अरहंत अवस्थाके केशोंको धारण करनेवाला हो) यह सातवाँ मन्त्र बोलना चाहिये । द्विजोंको इन मन्त्रोंसे विधिपूर्वक चोटी रखवाना चाहिये । अब आगे लिपि-संख्यानके मन्त्र कहते हैं ।। १५०-१५१।।
श्लोक 152 से 161 लिपिसंख्यान और उपनीति मंत्र
संग्रह-‘उपनयनमुण्डभागी भव, निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव, निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव, परमनिस्तारककेशभागी भव, परमेन्द्रकेशभागी भव, परमराज्यकेशभागी भव, आर्हन्त्यराज्य-केशभागी भव’ ।
लिपिसंख्यानके मन्त्र- ‘शब्दपारभागी भव’ (शब्दोंका पारगामी हो), ‘अर्थपारगामी भागी भव’ (सम्पूर्ण अर्थका जाननेवाला हो) और ‘शब्दार्थसम्बन्धपारभागी भव’ (शब्द तथा अर्थ दोनोंके सम्बन्धका पारगामी हो) ये पद लिपिसंख्यान के समय कहने चाहिये ।।१५२॥
संग्रह ‘शब्दपारगामी भव, अर्थपारगामी भव, शब्दार्थपारगामी भव’ ।
उत्तम द्विज नीचे लिखे हुए मन्त्रोंको उपनीति क्रियाके मन्त्ररूपसे स्मरण करते हैं-
सबसे पहले ‘परमनिस्तारकलिङगभागी भव’ (तू उत्कृष्ट आचार्यके चिह्नोंको धारण करने-वाला हो), फिर ‘परमर्षिलिङगभागी भव’ (परमऋषियोंके चिह्नको धारण करनेवाला हो) और ‘परमेन्द्रलिङगभागी भव’ (परम इन्द्रपदके चिह्नोंको धारण करनेवाला हो) ये मन्त्र बोलना चाहिये । इसी प्रकार अनुक्रमसे परम राज्य, परमार्हन्त्य और परम निर्वाण पदको ‘लिङ्गभागी भव’ पदसे युक्तकर ‘परमराज्यलिङ्गभागी भव’ (परमराज्य के चिह्नोंको धारण करनेवाला हो), ‘परमार्हन्त्यलिङ्गभागी भव’ (उत्कृष्ट अरहन्तदेवके चिह्नोंको धारण करनेवाला हो) और ‘परमनिर्वाणलिङगभागी भव’ (परमनिर्वाणके चिह्नोंका धारक हो) ये मन्त्र बना लेना चाहिये । ॥१५३-१५५॥
संग्रह-‘परमनिस्तारकलिङगभागी भव, परषिलिङगभागी भव, परमेन्द्रलिङगभागी भव, परमराज्यलिङ्गभागी भव, परमार्हन्त्यलिङगभागी भव, परमनिर्वाणलिङगभागी भव’ ।
इन मन्त्रोंसे प्रथम ही शिष्यका संस्कार कर उसे विकाररहित वस्त्रके द्वारा वस्त्रसहित करना चाहिये अर्थात् साधारण वस्त्र पहिनाना चाहिये ।। १५६॥ इसे वस्त्रके भीतर लँगोटी देनी चाहिये और उसपर तीन लड़की बनी हुई मूंजकी रस्सी बाँधनी चाहिये ।।१५७।। तद-नन्तर गणधरदेवके द्वारा कहा हुआ, व्रतोंका चिह्नस्वरूप और मन्त्रोंसे पवित्र किया हुआ सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत धारण कराना चाहिये । यज्ञोपवीत धारण करनेपर वह बालक द्विज कहलाने लगता है ॥ १५८॥ पहले तो वह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण था और अब व्रतोंसे संस्कृत होकर दूसरी बार उत्पन्न हुआ है इसलिये दो बार उत्पन्न होनेरूप गुणोंसे वह द्विज ऐसी रूढ़िको प्राप्त होता है ।।१५९।। उस समय उस पुत्रके लिये विधिके अनुसार गुरुकी साक्षीपूर्वक अणुव्रत देना चाहिये और गुणव्रत तथा शिक्षाव्रत रूपशीलसे सहित व्रतोंके समूहसे उसका संस्कार करना चाहिये । भावार्थ-उसे पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत इस प्रकार व्रत और शील देकर उसके संस्कार अच्छे बनाना चाहिये ।। १६०।। तदनन्तर गुरु उसे उपासकाध्ययन पढ़ाकर और चारित्रके योग्य उसका नाम रखकर अतिबाल विद्या आदिका नियोगरूपसे उपदेश दे ।।१६१।।
श्लोक 162 से 171 उपनीति क्रिया और व्रतचर्या
इसके बाद जिसका संस्कार किया जा चुका है ऐसा वह पुत्र सिद्ध भगवान् की पूजा कर फिर विधिके अनुसार अपने आचार्यकी पूजा करे ।। १६२।। उस दिन उस पुत्रको अपनी जाति या कुटुम्बके लोगोंके घरमें प्रवेश कर भिक्षा माँगना चाहिये और उस भिक्षामें जो कुछ अर्थका लाभ हो उसे आदर सहित उपाध्यायके लिये सौंप देना चाहिये ॥ १६३॥ बाकीकी सब विधि पहले कही जा चुकी है। उसे पूर्णरूपसे करना चाहिये। इसके सिवाय वह जबतक विद्या पढ़ता रहे तब तक उसे ब्रह्मचर्यव्रत पालन करना चाहिये ।।१६४।।
अथानन्तर जिसमें उपासकाध्ययनका संक्षेपसे संग्रह किया है ऐसी इसकी व्रतचर्या-को अनुक्रमसे कहता हूँ ॥ १६५॥ जिसका यज्ञोपवीत हो चुका है ऐसे बालकके लिये शिरका चिह्न (मुण्डन), वक्षःस्थलका चिह्न-यज्ञोपवीत, कमरका चिन्ह-मूंजकी रस्सी और जाँघका चिह्न-सफेद धोती ये चार प्रकारके चिह्न धारण करना चाहिये । इनका निर्णय पहले हो चुका है ।।१६६॥ जो लोग अपनी योग्यताके अनुसार तलवार आदि शस्त्रोंके द्वारा, स्याही अर्थात् लेखनकला के द्वारा, खेती और व्यापारके द्वारा अपनी आजीविका करते हैं ऐसे सदृष्टि, द्विजों को वह यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये ।। १६७।। जिसके कुलमें किसी कारणसे दोष लग गया हो ऐसा पुरुष भी जब राजा आदिकी संमतिसे अपने कुलको शुद्ध कर लेता है तब यदि उसके पूर्वज दीक्षा धारण करनेके योग्य कुलमें उत्पन्न हुए हों तो उसके पुत्र पौत्र आदि संततिके लिये यज्ञोपवीत धारण करने की योग्यताका कहीं निषेध नहीं है। भावार्थ-यदि दीक्षा धारण करने योग्य कुलमें किसी कारणसे दोष लग जावे तो राजा आदिकी संमतिसे उसकी शुद्धि हो सकती है और उस कुलके पुरुषको यज्ञोपवीत भी दिया जा सकता है। न केवल उसी पुरुषको किन्तु उसके पुत्र पौत्र आदि संतानके लिये भी यज्ञोपवीत देनेका कहीं निषेध नहीं है ।।१६८-१६९॥ जो दीक्षाके अयोग्य कुलमें उत्पन्न हुए हैं तथा नाचना गाना आदि विद्या और शिल्पसे अपनी आजीविका करते हैं ऐसे पुरुषोंको यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंकी आज्ञा नहीं है ।॥ १७०।। किन्तु ऐसे लोग यदि अपनी योग्यतानुसार व्रत धारण करें तो उनके योग्य यह चिह्न हो सकता है कि वे संन्यासमरण पर्यन्त एक धोती पहनें ॥ १७१।।
श्लोक 172 से 181 व्रतचर्या और दश अधिकार
यज्ञोपवीत धारण करनेवाले पुरुषोंको माँस-रहित भोजन करना चाहिये, अपनी विवाहिता कुलस्त्रीका सेवन करना चाहिये, अनारम्भी हिंसाका त्याग करना चाहिये और अभक्ष्य तथा अपेय पदार्थका परित्याग करना चाहिये ।।१७२॥ इस प्रकार जो द्विज व्रतोंसे पवित्र हुई अत्यन्त शुद्ध वृत्तिको धारण करता है उसके व्रतचर्याकी पूर्ण विधि समझनी चाहिमे ॥१७३॥ अब उन द्विजोंके लिये उपासकाध्ययन सूत्रमें जो दश अधिकार कहे हैं उन्हें यथाक्रमसे नामके अनुसार कहता हूँ ॥ १७४।॥ उन दश अधिका रोंमें पहला अतिबाल विद्या, दूसरा कुलावधि, तीसरा वर्णोत्तमत्व, चौथा पात्रत्व, पाँचवाँ सृष्टयधि-कारिता, छठवाँ व्यवहारेशिता, सातवाँ अवध्यत्व, आठवाँ अदण्डधता, नौवाँ मानार्हता और दशवाँ प्रजा सम्बन्धान्तर है। उपासकसंग्रहमें अनुक्रमसे ये दश अधिकारवस्तुएँ बतलाई गई हैं। उन्हीं अधिकार वस्तुओंका उनके नामके अनुसार यहाँ संक्षेपसे कुछ विवरण करता हूँ । ।।१७५-१७७।। द्विजोंको जो बाल्य अवस्थासे ही लेकर विद्या सिखलानेका उद्योग किया जाता है उसे अतिबालविद्या कहते हैं, यह विद्या द्विजोंको अत्यन्त इष्ट है ।। १७८।। इस अति-बाल विद्याके अभावमें द्विज मूर्ख रह जाता है उसे हेय उपादेयका ज्ञान नहीं हो पाता और वह अपनेको झरुमूठ द्विज माननेवाले पुरुषोंके द्वारा ठगाया जाकर मिथ्या शास्त्रके अध्ययन में लग जाता है ।।१७९।। इसलिये द्विजोंको उचित है कि वे बाल्य अवस्थामें ही श्रावकाचारके शास्त्रोंका अभ्यास करें क्योंकि उपासकाचारके शास्त्रोंके द्वारा जिसे अच्छे संस्कार प्राप्त हो जाते हैं वह निज और परको तारनेवाला हो जाता है ॥१८०॥ अपने कुलके आचारकी रक्षा करना द्विजोंकी कुलावधि क्रिया कहलाती है। कुलके आचारकी रक्षा न होनेपर पुरुष-की समस्त क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं और वह अन्य कुलको प्राप्त हो जाता है ।। १८१।।
श्लोक 182 से 191 दश अधिकारों का विवरण
समस्त वर्णों में श्रेष्ठ होना ही इसकी वर्णोत्तम क्रिया है, इस वर्णोत्तम क्रियासे ही यह प्रशंसाको प्राप्त होता है और निज तथा परका उद्धार करनेमें समर्थ होता है ॥१८२॥ यदि इसके वर्णोत्तम क्रिया नहीं है अर्थात् इसका वर्ण उत्तम नहीं है तो इसके उत्कृष्टता नहीं हो सकती और जो उत्कृष्ट नहीं है वह न तो अपने आपको शुद्ध कर सकता है और न दूसरेको ही शुद्ध कर सकता ‘है ।।१८३।। जो स्वयं उत्कृष्ट नहीं है ऐसे द्विजको अपनी शुद्धिकी इच्छासे अन्य कुलिङगियों अथवा कुब्रह्मकी सेवा करनी पड़ती है और ऐसी दशामें वह निःसन्देह उन लोगों में उत्पन्न हुए दोषोंको प्राप्त होता है। भावार्थ-सदा ऐसे ही कार्य करना चाहिये जिससे वर्णकी उत्तमता में बाधा न आवे ।। १८४।॥ गुणोंका गौरव होनेसे दान देने के योग्य पात्रता भी इन्हीं द्विजोंमें होती है क्योंकि जो गुणोंसे अधिक होता है वह संसारमें सब लोगोंके द्वारा पूजित होनेवाले लोगों के द्वारा भी पूजा जाता है ।। १८५।। इसलिये द्विजोंको चाहिये कि वे अपने आपमें गुणों- के द्वारा की हुई पात्रताको दृढ़ करें अर्थात् गुणी पात्र दनें क्योंकि पात्रताके अभावमें मान्यता नहीं रहती और मान्यताके न होनेसे राजा लोग भी धन हरण कर लेते हैं ।॥ १८६॥ जिनकी सृष्टि उत्तम है ऐसे द्विजोंको मिथ्यादृष्टियों के द्वारा की हुई सृष्टिको दूरसे ही छोड़कर अपनी सृष्टिके अधिकारोंकी रक्षा करनी चाहिये ।।१८७ ।। अन्यथा मिथ्यादृष्टि लोग अपने दूषित सृष्टिवादसे लोगोंको और राजाओंको मोहित कर कुमार्गगामी बना देंगे ।। १८८।। इसलिये नय और तत्त्वोंको जाननेवाले द्विजको चाहिये कि वह मिथ्यादृष्टियोंकी अन्यसृष्टिको दूरसे ही छोड़कर अनादिक्षत्रियोंके द्वारा रची हुई धर्मसृष्टिकी ही प्रभावना करे ॥१८९।। तथा इस धर्मसृष्टिका आश्रय लेनेवाले राजाओंसे ऐसा कहे कि तीर्थङ्करोंके द्वारा रची हुई यह सृष्टि अनादिकालसे चली आई है। भावार्थ-यह धर्मसृष्टि तीर्थङ्करोंके द्वारा रची हुई है और अनादि कालसे चली आ रही है इसलिये आप भी इसकी रक्षा कीजिये ॥ १९०॥ यदि द्विज राजाओंसे ऐसा नहीं कहेंगे तो वे अन्य लोगोंके द्वारा की हुई सुष्टिको मानने लगेंगे जिससे उनका ऐश्वर्य नहीं रह सकेगा तथा अरहन्तके मतको माननेवाले लोग भी उसी धर्मको मानने लगेंगे ।।१९१।।
श्लोक 192 से 201 दश अधिकारों का continuation
परमागमका आश्रय लेनेवाले द्विजोंको जो प्रायश्चित्त आदि कार्योंमें स्वतन्त्रता है उसे हो व्यवहारेशिता कहते हैं ।। १९२।। व्यवहारेशिता के अभावमें द्विज न अपने आपको शुद्ध कर सकेगा और न दूसरेको ही शद्ध कर सकेगा तथा स्वय अशुद्ध होनेपर यदि दूसरेसे अपनी शुद्धि करना चाहे तो वह कभी कृती नहीं हो सकेगा ।।१९३।। जिसका अन्तःकरण स्थिर है ऐसा उत्तम द्विज अवध्याधिकारमें भी स्थित रहता है अर्थात् अवध्य है क्योंकि ब्राह्मण गुणोंकी अधि-कताके कारण किसी दूसरेके द्वारा वध करने योग्य नहीं होता ।। १९४।। सब प्राणियोंको नहीं मारना चाहिये और विशेषकर ब्राह्मणोंको नहीं मारना चाहिये। इस प्रकार गुणोंकी अधिकता और हीनतासे हिंसामें भी दो भेद माने गये हैं ।॥ १९५॥ इसलिये यह धार्मिक जनोंमें अपनी अवध्यताको पुष्ट करे। यथार्थमें वह धर्मका ही माहात्म्य है कि जो इस धर्ममें स्थित रहकर किसी से तिरस्कृत नहीं हो पाता ॥ १९६॥ यदि वह अपनी अवध्यताको पुष्ट न करेगा तो सब लोगों से वध्य हो जावेगा अर्थात् सब लोग उसे मारने लगेंगे और ऐसा होनेपर अर्हन्तदेवके धर्मकी
प्रामाणिकता नष्ट हो जावेगी ॥१९७।। इसलिये सब प्रकारके प्रयत्नोंसे सनातनधर्मकी रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि अच्छी तरह रक्षा किया हुआ धर्म ही चराचर पदार्थोंसे भरे हुए संसार-में उसकी रक्षा कर सकता है ।।१९८।। इसी प्रकार धर्ममें जिसका अन्तःकरण स्थिर है ऐसे इस द्विजको अपने अदण्डयत्वका भी अधिकार है क्योंकि धर्ममें स्थिर रहनेवाला मनुष्य ही दूसरेके लिये दण्ड देने में समर्थ हो सकता है ।।१९९।। इसलिये धर्मदर्शी लोगोंके द्वारा दिखलाई हुई धर्मात्मा जनोंकी आम्नायका विचार करता हुआ ही धार्मिक राजा अधर्मी जनोंको दण्ड देता है ॥२००॥ जिस प्रकार अपना हित चाहनेवाले पुरुषोंके द्वारा देव द्रव्य और गुरुद्रव्य त्याग करने योग्य है उसी प्रकार ब्राह्मणका धन भी त्याग करने योग्य है। इसलिये ही द्विज दण्ड देने के योग्य नहीं है ।। २०१।।
श्लोक 202 से 211 दश अधिकारों का समापन
इस युक्तिसे अपने में अधिक गुणोंका आरोप करता हुआ वह जितेन्द्रिय दण्ड देनेवाले राजा आदिके समक्ष अपने आपको अदण्डय अर्थात् दण्ड न देने योग्य पक्ष में ही स्थापित करता है। भावार्थ-वह अपने आपमें इतने अधिक गुण प्राप्त कर लेता है कि जिससे उसे कोई दण्ड नहीं दे सकते ॥ २०२॥ इस अधिकारके अभावमें अन्य पुरुषोंके समान ब्राह्मण भी दण्डित किया जाने लगेगा जिससे वह दरिद्र हो जावेगा और दरिद्र होनेसे न तो इस लोकमें सुखी हो सकेगा और न परलोकमें ही ॥ २०३॥ यह ब्राह्मण जो अच्छी तरह सन्मानके योग्य होता है वही इसका मान्यत्व अधिकार है सो ठीक ही है क्योंकि जो गुणोंसे अधिक होता है अर्थात् जिसमें अधिक गुण पाये जाते हैं वही सत्पुरुषोंके द्वारा सन्मान करने योग्य, वन्दना करने योग्य और पूजा करने योग्य होता है ॥ २०४॥ इस अधिकारके न होनेसे उत्तम पुरुष इसका सन्मान नहीं करेंगे और उससे स्थान मान लाभ आदिका अभाव होनेके कारण वह अपने पदसे च्यूत हो जावेगा। इसलिये द्विजको चाहिये कि वह यह गुण (मान्यत्व गुण) बड़े यत्नसे अपने आपमें आरोपित करे क्योंकि ज्ञान चारित्र आदि सम्पदाए ही उसका यत्न हैं इसलिये राजाओंको उसकी पूजा करनी चाहिये ।।२०५-२०६।। प्रजान्तर अर्थात् अन्य धर्मावलम्बियोंके साथ सम्बन्ध होनेपर भी जो अपनी उन्नतिसे च्युत नहीं होना है वह इसका प्रजासंबन्धान्तर नामका गुण है ॥२०७॥ जिस प्रकार काले लोहके साथ मिला हुआ सुवर्ण विवर्णताको प्राप्त हो जाता है उस प्रकार अन्य पुरुषोंके साथ सम्बन्ध होनेपर इस ब्राह्मण के अपने गुणोंके उत्कर्ष में कुछ बाधा नहीं आती है। भावार्थ-लोहेके सम्बन्धसे सुवर्णमें तो खराबी आ जाती है परन्तु उत्तम द्विजमें अन्य लोगोंके सम्बन्धसे खराबी नहीं आती ॥२०८॥ किन्तु जिस प्रकार रसायन अपने साथ सम्बन्ध रखनेवाले लोहेको शीघ्र ही अपने गुण प्राप्त करा देती है उसी प्रकार यह ब्राह्मण भी अपने साथ सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषोंको शीघ्र ही अपने गुण प्राप्त करा देता है ।॥ २०९।। इसलिये कहना चाहिये कि यह प्रजासम्बन्धान्तर गुण, धर्मकी प्रभावनाको बढ़ानेवाला सबसे बड़ा गुण है क्योंकि इसीके द्वारा यह द्विज्ज अपने गुणोंसे अन्य लोगोंको अपने आधीन कर सकता है ।।२१०।। इस गुणके न रहनेपर ब्राह्मण अन्य लोगोंके सम्बन्धसे अपने गुणोंकी हानि कर सकता है और ऐसा होनेपर इसकी गुणवत्ता ही नष्ट हो जावेगी ।।२११।।
श्लोक 212 से 223 व्रतचर्या और ब्राह्मण सृष्टि
इसलिये जो अतिबालविद्या आदि दश प्रकारके नियोग निरूपण किये हैं उन्हें यथायोग्य रीतिसे स्वीकार करनेवाला द्विज ही सब लोगोंको मान्य हो सकता है ।। २१२॥ इन गुणोंमें जो अन्य विशेष गुण बहुत विस्तारके साथ विवेचन करनेके योग्य हैं उन्हें उपासका-ध्ययनशास्त्रसे विस्तारपूर्वक समझ लेना चाहिये ।। २१३।। इस प्रकार व्रतचर्या क्रियाकी विधि का वर्णन करते समय उस क्रियाके योग्य मंत्रोंके प्रसंगसे उत्तम आचरणवाले द्विजोंके द्वारा माननीय दश अधिकारोंका निरूपण किया ।। २१४।। इस प्रकरणमें जिनका वर्णन पहले कर चुके हैं उन्हें क्रियामन्त्र जानना चाहिये और जो सात पीठिकामन्त्र इस नामसे प्रसिद्ध हैं उन्हें सामान्यविषयक समझना चाहिये अर्थात् वे मन्त्र सभी क्रियाओंमें काम आते हैं ।॥२१५॥ वे साधारण मन्त्र सभी क्रियाओंमें काम आते हैं इसलिये मंत्रोंके जाननेवाले विद्वान् उन्हें औत्स-गिक अर्थात् सामान्य मन्त्र कहते हैं ।।२१६।। इनके सिवाय जो विशेष मन्त्र हैं वे ऊपर कही हुई क्रियाओंमें दिखला दिये गये हैं। अब व्रतचर्यासे आगेके जो मन्त्र हैं वे द्विजोंको अपनी आम्नाय (शास्त्र परम्परा) के अनुसार समझ लेना चाहिये ॥ २१७॥ जो इन मन्त्रोंको क्रियाओं में यथायोग्य रूपसे काममें लाता है वह योग्य आचरण करनेवाला उत्तम द्विज लोकमें सन्मान को प्राप्त होता है ॥२१८।। जिस प्रकार अस्त्र-शस्त्र धारण कर तैयार हुए मुख्य मुख्य योद्धा सेनापतिके बिना कुछ भी नहीं कर सकते उसी प्रकार मंत्रोंसे रहित क्रियाएं भी प्रयोग करने-वाले पुरुषोंकी कुछ भी सिद्धि नहीं कर सकतीं ।॥ २१९।। इसलिये शास्त्रोंका अभ्यास करनेवाले द्विजोंको यह सब विधि अच्छी तरह जानकर मन्त्रोच्चारणके साथ साथ सब क्रियाएं विधि-पूर्वक करनी चाहिये ।। २२० ।। इस प्रकार जिसने धर्मके द्वारा विजय प्राप्त की है, जो धार्मिक क्रियाओंमें निपुण है और जिसे धर्म प्रिय है ऐसे भरतक्षेत्रके अधिपति महाराज भरतने राजा लोगोंकी साक्षीपूर्वक अच्छे अच्छे व्रत धारण करनेवाले उन उत्तम द्विजोंको अच्छी शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्णकी सृष्टि की अर्थात् ब्राह्मणवर्णकी स्थापना की ॥२२१॥ इस प्रकार महाराज भरतसे जिन्हें सत्कारका योग प्राप्त हुआ है, व्रतोंके परिचयसे जिनका चारित्र सुन्दर और उदार हो गया है, जो शास्त्रों के अर्थोंको जाननेवाले हैं और श्रीवृषभ जिनेन्द्रके मतानुसार धारण की हुई दीक्षासे जो पूजित हो रहे हैं ऐसे वे ब्राह्मण संसार में बहुत ही प्रसिद्धिको प्राप्त हुए और खूब ही उनका आदर-सन्मान किया गया ।। २२२।। तदनन्तर इक्ष्वाकुकुलचूड़ामणि महाराज भरत जैनमार्ग में अच्छी तरह स्थित रहनेवाले उन ब्राह्मणोंको सदाचारमें स्थिर कर प्रतिदिन उनका सन्मान करते हुए अपने आपको धन्य मानने लगे सो ठीक ही है क्योंकि आनन्दसे युक्त तथा उत्कृष्टताको प्राप्त हुई अपनी सृष्टिको देखता हुआ ऐसा कौन पुण्यवान् पुरुष है जो अपने आपको कृतकृत्य न माने ।। २२३।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषा-नुवादमें द्विजोंकी उत्पत्तिमें क्रियामन्त्रोंका वर्णन करनेवाला यह चालीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
आदिपुराण सारांश पर्व 40
हिन्दी-भाषानुवाद
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आदिपुराण सारांश
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena