आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354 | श्लोक 355 से 371 | श्लोक 372 से 381
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 382 to 391
श्लोक ( Shlok ) 382
देहच्युतौ यदि गुरोर्गुरु शोचसि त्वं तं भस्मसात्कृतिमवाप्य विवृद्धरागाः ।प्राग्जन्मनोऽपि परि कर्मकृतोऽस्य कस्मादानन्दनृत्तमधिकं विदधुर्द्युनाथाः ॥ ३८२॥
पूज्य पिताजीका शरीर छूट जानेसे यदि तू इतना अधिक शोक करता है तो बतला, जन्मसे पहले ही उनकी सेवा करनेवाले और बढ़े हुए अनुरागको धारण करनेवाले ये देव लोग भगवान्के शरीरको भस्म कर इतना अधिक आनन्द नृत्य क्यों कर रहे हैं ? भावार्थ-ये देव लोग भी भगवान् से अधिक प्रेम रखते थे, जन्मसे पहले ही उनकी सेवामें तत्पर रहते थे फिर ये उनके शरीरको जलाकर क्यों आनन्द मना रहे हैं इससे मालूम होता है कि भगवान् का शरीर छूट जाना दुःखका कारण नहीं है तू व्यर्थ ही क्यों शोक कर रहा है ? ॥ ३८२।।
“If you grieve so deeply at the passing of your revered father’s body, then tell me—why do these celestial beings, who have served Him since before His birth and who have cherished Him with profound devotion, rejoice and dance with delight as they consign His body to the flames?
Consider this: these gods, who loved Him even more dearly than you, are celebrating—thus it is clear that the Lord’s departure from His mortal frame is no cause for sorrow. Why, then, do you allow yourself to languish in needless grief?” ॥382॥
श्लोक ( Shlok ) 383
नेक्षे विश्वदृशं शृणोमि न वचो दिव्यं तदङ्घ्रिद्वये नम्नस्तनखभाविभासिमुकुटं कतु लभे नाधुना ।तस्मात् स्नेहवशोऽस्म्यहं बहुतरं शोकीति चेदस्त्विदं किन्तु भ्रान्तिरियं व्यतीत विषयप्राप्त्यै भवत्प्रार्थना ॥३८३॥
कदाचित् तू यह कहेगा कि ‘अब में उनके दर्शन नहीं कर रहा हूं, उनके दिव्य वचन नहीं सुन रहा हूं, और उनके दोनों चरणोंमें नम्र होकर उनके नखोंकी कान्तिसे अपने मुकुटको देदीप्यमान नहीं कर पाता हूं, इसलिये ही स्नेहके वशसे आज मुझे बहुत शोक हो रहा है तो तेरा यह कहना ठीक है परन्तु बीती हुई वस्तुके लिये प्रार्थना करना तेरी भूल ही है ॥ ३८३॥
“Perhaps you say, ‘Now I can no longer gaze upon Him, nor hear His divine words; I can no longer bow humbly at His feet and let the radiance of His toenails make my crown shine brilliantly—and so, overcome by love, I am consumed with sorrow today.’ If this is what you feel, then your words are understandable; yet know that to yearn for what has already passed is but a futile mistake.” ॥383॥
श्लोक ( Shlok ) 384
त्रिज्ञानधृत् त्रिभुवनैकगुरुगुरुस्ते स्नेहेन मोहविहितेन विनाशयेः किम् ।स्वोदात्ततां शतमखस्य न लज्जसे किं तस्मात्तव प्रथममुक्तिगतिं न वेत्सि ॥३८४।॥
हे भरत, तेरे पिता तो तीनों लोकोंके अद्वितीय गुरु थे और तू भी तीन ज्ञानोंका धारक है फिर इस मोहजात स्नेह-से अपनी उत्तमता क्यों नष्ट कर रहा है ? क्या तुझे ऐसा करते हुए इन्द्रसे लज्जा नहीं आती ? अथवा क्या तू यह नहीं समझता है कि मैं इन्द्रसे पहले ही मोक्षको प्राप्त हो जाऊंगा ? ॥३८४।।
“O Bharat, your father was the peerless preceptor of the three worlds, and you yourself are endowed with the three kinds of knowledge—why, then, do you allow your excellence to be diminished by this affection born of delusion? Do you not feel ashamed before Indra, witnessing you thus? Or do you not grasp the truth that you shall attain liberation even before Indra himself?” ॥384॥
श्लोक ( Shlok ) 385
इष्टं कि किनिष्टमत्र वितथं सङ्कल्प्य जन्तुर्जडः किञ्चिद्वेष्टयपि वष्टि किञ्चिदनयोः कुर्यादपि व्यत्ययम् । तेनै नोऽनु गतिस्ततो भववने भव्योऽप्यभव्योपमो भ्राम्यत्येष कुमार्गवृत्तिरधनो” वाऽऽतङ्कभीदुःखितः ॥३८५।।
इस संसारमें क्या इष्ट है ? क्या अनिष्ट है ? फिर भी यह मूर्ख प्राणी व्यर्थ ही संकल्प कर किसीसे द्वेष करता है, किसीको चाहता है और कभी दोनोंको उलटा समझ लेता है, इसलिये ही इसके पापकी परम्परा चलती रहती है और इसलिये ही यह भव्य होकर भी अभव्यकी तरह दुखी, निर्धन, कुमार्गमें प्रवृत्ति करनेवाला और रोगोंसे भयभीत होता हुआ इस संसाररूपी वनमें भ्रमण करता रहता है ।॥ ३८५।।
“What, indeed, in this world is truly desirable? And what is undesirable? Yet the foolish creature, caught in vain imaginings, harbors hatred toward some and affection toward others, and oftentimes mistakes one for the other. Thus the chain of his sinful deeds continues unbroken. Even when possessing the potential for liberation, he behaves like one devoid of it—tormented, impoverished, straying along misguided paths, and terrified of afflictions, he wanders endlessly through the forest of this world.” ॥385॥
श्लोक ( Shlok ) 386
भव्यस्यापि भवोऽभवद् भवगतः कालादिलब्धेर्विना
कालोऽनादिरचिन्त्यदुःखनिचितो धिक् धिक् स्थितिं संसृतेः ।इत्येतद्विदुषाऽत्र शो’च्यमथवा नैतच्च यद्देहिना भव्यत्वं बहुधा महीश सहजा वस्तुस्थितिस्तादृशी ॥३८६॥
काल आदि लब्धियोंके बिना पूज्य भव्य जीवको भी संसारमें रहना पड़ता है, यह काल अनादि है तथा अचिन्त्य दुःखोंसे भरा हुआ है इसलिये संसारकी इस स्थितिको बार बार धिक्कार हो, यही सब समझ विद्वान् पुरुष-को इस संसारमें शोक नहीं करना चाहिये अथवा जीवोंका यह भव्यत्वपना भी अनेक प्रकारका होता है । हे राजन्, वस्तुका सहज स्वभाव ही ऐसा है ॥ ३८६॥
“Even the venerable, worthy soul, though destined for liberation, must remain in the cycle of worldly existence if it lacks the acquisitions of time and other essential attainments. This time is without beginning and brimming with inconceivable sorrows—therefore, cursed again and again be this condition of worldly existence! Understanding this well, a wise person should not grieve amidst the world. Moreover, even the potential for liberation (bhavyatva) varies greatly among souls. O King, such is the inherent nature of things.” ॥386॥
श्लोक ( Shlok ) 387
गतानि सम्बन्वशतानि जन्तोरनन्तकालं परिवर्तनेन नावेहि किं त्वं हि विबुद्ध विश्वो वृथैव मुह्यै किमिहेतरो वा ॥३८७।।
हे भरत, तू तो संसार-का स्वरूप जाननेवाला है, क्या तू यह नहीं जानता कि अनन्त कालसे परिवर्तन करते रहनेके कारण इस जीवके सैकड़ों सम्बन्ध हो चुके हैं ? फिर क्यों अज्ञानीकी तरह व्यर्थ ही मोहित होता है ।।३८७।।
“O Bharat, you are one who truly understands the nature of this world—do you not realize that, through the endless course of time, the soul has formed hundreds of relationships, ever changing with the tides of existence? Then why, like the ignorant, do you allow yourself to be needlessly deluded?” ॥387॥
श्लोक ( Shlok ) 388
कर्मभिः कृतमस्यापि न स्थास्नु त्रिजगत्पतेः । शरीरादि ततस्त्याज्यं मन्वते तन्मनीषिणः ॥३८८॥
तीनों लोकोंके अधिपति भगवान् वृषभदेवका शरीर भी तो कर्मोंके द्वारा किया हुआ है इसलिये वह भी स्थायी नहीं है और इसलिये ही विद्वान् लोग उसे हेय समझते हैं ॥३८८॥
“Even the body of Lord Rishabhadeva, sovereign of the three worlds, was fashioned by karma, and thus it too is impermanent; therefore, the wise regard it as something to be renounced.” ॥388॥
श्लोक ( Shlok ) 389
प्रागक्षिगोचरः सम्प्रत्येष चेतसि वर्तते । भगवांस्तत्र कः शोकः पश्यैनं तत्र सर्वदा ॥३८९॥
जो भगवान् पहले आंखोंसे दिखाई देते थे वे अब हृदयमें विद्यमान् हैं इसलिये इसमें शोक करनेकी क्या बात है ? तू उन्हें अपने चित्तमें सदा देखता रह ।। ३८९॥
“He who once appeared before your eyes now dwells within your heart—what cause, then, is there for sorrow? Gaze upon Him forever in the sanctuary of your mind.” ॥389॥
श्लोक ( Shlok ) 390
इति मनसि यथार्थ चिन्तयन् शोकवह्निं शमय विमलबोधाम्भोभिरित्यावभाषे ।गणभृदथ स चक्री दावदग्धो महीध्रो नवजलदजलैर्वा तद्वचोभिः प्रशान्तः ॥३९०॥
इस प्रकार मनमें वस्तुके यथार्थ स्वरूपका चिन्तवन करता हुआ तू निर्मल ज्ञानरूपी जलसे शोक-रूपी अग्नि शान्त कर, ऐसा गणधर वृषभसेनने कहा तब चक्रवर्ती भी जिस प्रकार दावानलसे जला हुआ पर्वत नवीन बादलोंके जलते शान्त हो जाता है उसी प्रकार उनके वचनोंसे शान्त हो गया ।।३९०।।
“Thus, reflecting within yourself upon the true nature of reality, extinguish the wildfire of sorrow with the pure waters of knowledge”—so spoke the venerable Ganadhara Vrishabhasena. Hearing these words, the Chakravartin’s anguish was calmed, just as a mountain scorched by forest fire is soothed by the life-giving rains of fresh clouds. ॥390॥
श्लोक ( Shlok ) 391
चिन्तां व्यपास्य गुरुशोककृतां गणेश मानम्य नम्र मुकुटो निकटात्मबोधिः ।निन्दन्नितान्तनितरां निजभोगतृष्णां मोक्षोष्णकः स्वनगरं व्यविशद् विभूत्या ॥३९१।।
जिसे आत्मज्ञान शीघ्र होनेवाला है और जिसका मुकुट नम्रभूत हो रहा है ऐसे भरतने पिताके शोकसे उत्पन्न हुई चिन्ता छोड़कर गणधरदेवको नमस्कार किया और अत्यन्त बढ़ी हुई अपनी भोगविषयक तृष्णा की निन्दा करते हुए तथा मोक्षके लिये उत्सुक होते हुए उसने बड़े वैभवके साथ अपने नगरमें प्रवेश किया ।। ३९१।।
He, to whom self-realization was soon to dawn, and whose crown bowed low in humility—such was Bharat, who, casting aside the anxiety born of grief for his father, reverently saluted the noble Ganadhara. Denouncing the insatiable thirst for worldly pleasures that had swelled within him, and yearning earnestly for liberation, he then returned to his magnificent city with great splendor. ॥391॥
श्लोक 392 से 403
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354 | श्लोक 355 से 371 | श्लोक 372 से 381