आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 स्वयंवर का निर्णय
सुमति के स्वयंवर प्रस्ताव को सबने स्वीकार किया, क्योंकि यह नीतिसम्मत और वैर-रहित था। राजा ने मंत्रियों को विदा कर सुप्रभा और पुत्र हेमांगद से विचार-विमर्श किया। उन्होंने कुल के वृद्धों और बंधुओं से परामर्श लिया। राजा ने विभिन्न प्रकार के दूत भेजकर राजाओं को स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया, जिसमें निसृष्टार्थ, मितार्थ और उपहार सहित पत्र ले जाने वाले दूत शामिल थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192 –193
श्रुत्वा सर्वार्थवित्सर्वं सर्वार्थः प्रत्युवाच ‘तत् । भूमिगोचरसम्बन्धः स नः प्रागपि विद्यते ॥१९२॥अपूर्वलाभः श्लाघ्यश्च विद्याधरसमाश्रयः । विचार्य तत्र कस्मैचिद्दे येयमिति निश्चितम् ॥१९३॥
यह सब सुनकर समस्त विषयोंको जानने-वाला सर्वार्थ नामका मंत्री बोला कि भूमिगोचरियों के साथ तो हम लोगोंका सम्बन्ध पहलेसे ही विद्यमान है, हां, विद्याधरोंके साथ सम्बन्ध करना हम लोगोंके लिये अपूर्व लाभ है तथा प्रशंसनीय भी है इसलिये विचारकर विद्याधरोंमें ही किसीको यह कन्या देनी चाहिये ऐसा मेरा निश्चित मत है ।।१९२-१९३।।
Hearing all this, the wise minister Sarvārtha—well-versed in all matters—spoke thus: “With the rulers of the earth, our alliances already stand established. But to forge a bond with the Vidyādharas would indeed be a rare and noble gain for us, and one worthy of great praise. Therefore, upon due consideration, it is my firm conviction that this maiden should be given in marriage to one among the Vidyādharas alone.”192 –193
श्लोक ( Shlok ) 194
सुमतिस्तं निशम्यार्थ’ ‘युक्तानामाह युक्तवित् । न युक्तं वक्तुमप्येतत् ‘सर्ववैरानु बन्धकृत् ॥१९४।।
तदनन्तर वहांपर एकत्रित हुए सब लोगोंका अभिप्राय जानकर योग्य बातको जाननेवाला सुमति नामका मंत्री बोला कि यह सब कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि ये सभी बातें शत्रुता उत्पन्न करनेवाली हैं ।॥१९४।।
Thereafter, having discerned the opinions of all those assembled, the wise minister Sumati—knower of what is proper and fitting—spoke thus: “All this discourse, though seemingly reasonable, is not truly appropriate, for such deliberations are liable to sow seeds of enmity.”194
श्लोक ( Shlok ) 195
किं भूमिगोचरेष्वस्या वरो नास्तीति चेतसि । चक्रिणोऽपि भवेत्किञ्चिद् वैरस्यं प्रस्तुतश्रुतेः ॥ १९५॥
विद्याधरको कन्या दी हैं यह सुननेसे चक्रवर्ती के चित्तमें भी क्या भूमिगोचरियोंमें इसके योग्य कोई वर नहीं है यह सोचकर कुछ बुरा लगेगा ।। १९५।।
On hearing that the maiden has been given to a Vidyādhara, even the mind of the Emperor may be disquieted, pondering thus—“Is there, then, no worthy suitor among the sons of the earth?” Such a thought may indeed cause him some displeasure. 195
श्लोक ( Shlok ) 196 –197
दृष्टः सम्यगुपायोऽयं मयाऽत्रैकोऽविरोधकः । श्रुतः पूर्वपुराणेषु स्वयंवरविधिर्वरः ॥१९६। सम्प्रत्यकम्पनोपक्रमं तदस्त्वायुगावधि । “पुरुतत्पुत्रवत्सृष्टि ख्यातिरस्यापि जायताम् ॥१९७॥
इस विषयमें किसीसे विरोध नहीं करनेवाला एक अच्छा उपाय मैंने सोचा है और वह यह है कि प्राचीन पुराणोंमें स्वयंवरकी उत्तम विधि सुनी जाती है। यदि इस समय सर्वप्रथम अकम्पन महाराजके द्वारा उस विधिका प्रारम्भ किया जाय तो भगवान् वृषभदेव और उनके पुत्र सम्राट् भरतके समान संसारमें इनकी प्रसिद्धि भी युगके अन्ततक हो जाय ।।१९६-१९७।।
In this matter, I have conceived of a noble course that shall give rise to no enmity from any quarter. It is this: in the ancient Purāṇas, the rite of svayaṃvara is praised as most excellent. If, at this moment, that noble custom is initiated by none other than King Akampana himself, then—like the venerable Ṛṣabha Deva and his illustrious son Emperor Bharata—his fame too shall endure in this world until the very end of the age.196 –197
श्लोक ( Shlok ) 198
दीयतां कृतपुण्याय कस्मैचित् कन्यका स्वयम् । वेधसा” विप्रियं” नोऽमा माभूद् भूभृत्सु केनचित् ।१९८।
इसलिये यह कन्या स्वयंवरमें जिसे स्वीकार करे ऐसे किसी पुण्यशाली राजकुमारको देनी चाहिये। ऐसा करनेसे हम लोगोंका आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेव अथवा युगव्यवस्थापक सम्राट् भरतसे कुछ विरोध नहीं होगा, और न राजाओंका भी परस्पर में किसी के साथ कुछ वैर होगा ।। १९८।।
Therefore, this maiden should be given in marriage to that fortunate prince whom she herself shall choose in the svayaṃvara. By so doing, we shall incur no opposition to the will of Ādibrahmā—Bhagavān Ṛṣabhadeva—or to that of the age-establishing Emperor Bharata; nor shall any discord arise among the assembled kings, one with another.198
श्लोक ( Shlok ) 199
इत्येवमुक्तं तत्सर्वैः सम्मतं सहभूभुजा । नहि मत्सरिणः सन्तो न्यायमार्गानुसारिणः ॥१९९।॥
इस प्रकार सुमति नामके मंत्रीके द्वारा कही सब बातें राजाके साथ साथ सबने स्वीकृत कीं सो ठीक ही है क्योंकि नीतिमार्गपर चलनेवाले पुरुष मात्सर्य नहीं करते ।।१९९।।
Thus, all the words spoken by the minister named Sumati were accepted not only by the king but by all others as well—rightly so, for those who tread the path of righteousness are untouched by envy.199
श्लोक ( Shlok ) 200 – 201
तान् सम्पूज्य विसर्ज्याभूद् भूभृ त्तत्कार्यतत्परः । स्वयमेव गृहं गत्वा सर्व तत्संविधानकम् ॥२००॥निवेद्य ‘सुप्रभायाश्च हृष्टो हेमाङ्गदस्य च। वृद्धै कुलक्रमायातै रालोच्य च सनाभिभिः ॥२०१॥
तदनन्तर राजाने सन्मानकर मंत्रियों को विदा किया और स्वयं कार्य करनेमें जुट गया। उसने सबसे पहले घर जाकर ऊपर लिखे हुए समाचार सुप्रभादेवी और हेमांगद नामके ज्येष्ठ पुत्रको कह सुनाये तथा कुलपरम्परासे आये हुए वृद्ध पुरुषों और सगोत्री बन्धुओंके साथ पूर्वापर विचार किया ।।२००-२०१।
Thereafter, the king, having duly honored the ministers, dismissed them and turned his attention to the task at hand. First, he returned to the royal palace and conveyed the aforementioned news to Queen Suprabhā and to his eldest son, Hemāṅgada. Then, in accordance with family tradition, he held counsel with the venerable elders of the lineage and the kinsmen of his own clan, reflecting thoughtfully upon all aspects, past and future.200 – 201
श्लोक 202 से 213
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
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