नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 112 to 123
श्लोक ( Shlok ) 112 – 117
विद्याधरेण केनापि खच्चरः कोऽपि कीलितः । तरुद्वये स कामस्य दृष्टिगोचरमापतत् ॥ ११२॥असह्यवेदनार्तस्य खेटकस्य च वीक्षणात् । इङ्गितज्ञो हरेः पुत्रोऽङ्गुलिकां बन्धमोचनीम् ॥ ११३ ॥खेटकस्थां समादाय समभ्यज्य विलोचने । कृतोपकारः सम्प्रापत्तस्माद्विद्यात्रयं महत् ॥ ११४ ॥ सुरेन्द्रजालं जालान्तनरेन्द्रं प्रस्तरञ्च सः । पुनः सहस्त्रवक्त्राहिभवने शङ्खपुरणान् ॥ ११५ ॥ बिलान्निर्गत्य नागश्च नागी च मकरध्वजम् । चित्रवर्णं धनुर्नन्दकाख्यासि कामरूपिणीम् ॥ ११६ ॥ मुद्रिकाञ्च प्रसन्नौ तौ समं तस्मै वितेरतुः । कम्पनेन कपित्थांघ्रिपस्याप्तं पादुकद्वयम् ॥ ११७ ॥
आगे चलकर किसी विद्याधरने किसी विद्याधरको दो वृक्षोंके बीच में कीलित कर दिया था वह प्रद्युम्नको दिखाई दिया, वह कीलित हुआ विद्याधर असह्य वेदनासे दुःखी हो रहा था। यद्यपि उसके पास बन्धनसे छुड़ानेवाली गुटिका थी परन्तु कीलित होनेके कारण वह उसका उपयोग नहीं कर सकता था। उसे देखते ही प्रद्युन्न उसकेपास गया और उसके संकेतको समझ गया। उसने विद्याधरके पासकी गुटिका लेकर उसकी आँखों पर फेरा और उसे बन्धनसे मुक्त कर दिया। इस तरह उपकार करनेवाले प्रद्युम्नने उस विद्याधरसे सुरेन्द्र जाल, नरेन्द्र जाल, और प्रस्तर नामकी तीन विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर- वह प्रद्युम्न्न, सहस्त्र-वक्त्र नामक नागकुमारके भवनमें गया वहाँ उसने शङ्ख बजाया जिससे नाग और नागी दोनों ही बिलसे बाहर आये और प्रसन्न होकर उन्होंने उसके लिए मकरचिह्नले चिह्नित ध्वजा, चित्रवर्ण नामका धनुष, नन्दक नामका खङ्ग और कामरूपिणी नामकी अंगूठी दी। वहाँ से चलकर उसने एक कैथका वृक्ष हिलाया जिसके उसपर रहनेवाली देवीसे आकाशमें चलनेवाली दो अमूल्य पादुकाएँ प्राप्त कीं ।। ११२-११७ ।।
Later on, a certain Vidyadhara was pinned between two trees by another Vidyadhara, and Pradyumna happened to see him. The pinned Vidyadhara was suffering from unbearable pain. Although he possessed a magical pill (gutika) capable of freeing him from the bondage, he was unable to use it because he was tightly pinned.
Upon seeing him, Pradyumna went to his side and understood his sign. Taking the pill that was with the Vidyadhara, Pradyumna rubbed it over the Vidyadhara’s eyes and freed him from the confinement. In gratitude for this favor, the Vidyadhara bestowed upon Pradyumna three magical lores (vidyas) named Surendra-jala, Narendra-jala, and Prastara.
Thereafter, Pradyumna went to the abode of the Nagakumara named Sahasra-vaktra. There, he blew a conch shell, causing both the Naga and the Nagi to emerge from their hole. Being highly pleased, they gifted him:
Proceeding from there, he shook a wood-apple (Kaitha) tree, from which the residing goddess rewarded him with two invaluable, sky-walking sandals (padukas).[ 112-117]
श्लोक ( Shlok ) 118 – 119
तेनानर्घ्य नभोयायि देवतायास्तदाश्रितेः । सुवर्णककुभे पञ्चफणाहिपतिनार्पितान् ॥ ११८ ॥तर्पणस्तापनो मोहनाभिधानो विलापनः । मारणश्चेति पञ्चैतान् शरान् सम्प्राप्य पुण्यभाक् ॥ ११९ ॥
वहाँसे चलकर सुवर्णार्जुन नामक वृत्तके नीचे पहुँचा और वहाँ पश्च्च फणवाले नाग-राजके द्वारा दिये हुए तपन, तापन, मोदन, विलापन और मारण नामके पांच वाण उस पुण्यात्माको प्राप्त हुए ।। ११८-११९॥
Proceeding from there, he reached the base of a tree named Suvarnarjuna. There, that virtuous soul (Pradyumna) received five arrows named Tapana, Tapana (or Atapana/Tapana variants), Modana, Vilapana, and Marana from a five-hooded King of Serpents (Naga-raja).[ 118-119]
श्लोक ( Shlok ) 120
मौलिमौषधिमालाञ्च छत्रं चामरयुग्मकम् । दत्तं क्षीरवने मर्कटेनास्मै परितोषिणा ॥ १२० ॥
तदनन्तर वह क्षीरवनमें गया वहाँ सन्तुष्ट हुए मर्कट देवने उसे मुकुट, औषधिमाला, छत्र और दो चमर प्रदान किये ॥ १२० ॥
Thereafter, he went to the Kshiravana (Milk Forest). There, the gratified Markata Deva (Monkey Deity) presented him with a crown, a garland of medicinal herbs, an umbrella, and two fly-whisks (chamaras).[120]
श्लोक ( Shlok ) 121 – 123
“कदम्बमुखीवाप्यां नागपाशमवाप्तवान् । अस्य वृद्धरसोढारः सर्वे तं खगसूनवः ॥ १२१ ॥ यः पातालमुखीवाप्यां पतेत्स सकलेश्वरः । भवेदित्यवदन्कामोऽप्यवगम्य तदिङ्गितम् ॥ १२२ ॥ प्रज्ञप्ति निजरूपेण तस्यां वाप्यामपीपतत् । स्वयं पार्श्वे तिरोधाय स्वरूपं नयवित्स्थितः ॥ १२३ ॥
इसके बाद वह कदम्बमुखी नामकी बावड़ीमें गया और वहाँ के देवसे एक नागपाश प्राप्त किया। तदनन्तर इसकी वृद्धिको नहीं सहनेवाले सब विद्याधरपुत्र इसे पातालमुखी बावड़ी में ले जाकर कहने लगे कि जो कोई इसमें कूदता है वह सबका राजा होता है। नीतिका जाननेवाला प्रद्युम्न उन सबका अभिप्राय समझ गया इसलिए उसने प्रज्ञप्ति विद्याको अपना रूप बनाकर बावड़ी में कुदा दिया और स्वयं अपने आपको छिपाकर वहीं खड़ा हो गया ।। १२१-१२३ ।।
After this, he went to a stepped-well (baori) named Kadambamukhi, where he obtained a Nagapasha (serpent-noose) from the resident deity.
Thereafter, unable to tolerate his rising power and growth, all the sons of the Vidyadharas led him to the Patalamukhi stepped-well and said to him, “Whoever leaps into this well becomes the king of all.”
Pradyumna, who was well-versed in diplomacy and moral policy (niti), immediately understood their true intention. Therefore, he manifested the Prajnapti lore (vidya) in his own likeness and made it leap into the well, while he concealed himself and remained standing right there.[ 121-123]
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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