भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 192 से 201 वज्रदंत का दिग्विजय और वैभव
वज्रदंत दिग्विजय से लौटा। 32,000 राजाओं ने उसका अभिषेक किया। वह पुण्य से पूज्य, अनुपम शरीर, सौम्य मुख, और सुंदर नेत्रों वाला था। उसके पाँवों में शंख-चक्र चिह्न थे। वह लक्ष्मी, सरस्वती धारण करता था, कीर्ति लोक में फैली थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
प्रैक्षन्त केचिदागत्य सावधानं महाधियः । केचित् किमेतदित्युच्चैः जजल्पुवीक्ष्य पट्टकम् ।।१९२॥
विशाल बुद्धि के धारक कितने ही पुरुष आकर बड़ी सावधानी से उस चित्रपट को देखने लगे और कितने ही उसे देखकर यह क्या है इस प्रकार जोर से बोलने लगे ।।192।।
Many men, endowed with great intellect, came and began to examine the pictorial representation with great care, while others, upon seeing it, loudly exclaimed, “What is this?” ||192||
श्लोक ( Shlok ) 193
तेषां समुचितैर्वाक्यैर्ददती पण्डितोत्तरम् । तत्रास्ते स्म स्मितोद्योसैः किरन्ती पण्डितावितान् ॥१९३॥
वह पंडिता समुचित वाक्यों से उन सबका उत्तर देती हुई और पंडिताभास-मूर्ख लोगों पर मंद हास्य का प्रकाश डालती हुई गंभीर भाव से वहाँ बैठी थी ।।193।।
The learned one, sitting there with a serious demeanor, responded to all of them with appropriate words, and with a subtle smile, she illuminated the foolish pretenders of scholarship. ||193||
श्लोक ( Shlok ) 194
अथदिग्विजयाच्चक्री न्यवृतत् कृतदिग्जयः । प्रणतीकृतनिः शेषनरविद्याधरामरः ॥१९४
अनंतर जिसने समस्त दिशाओं को जीत लिया है और जिसे समस्त मनुष्य विद्याधर और देव नमस्कार करते हैं ऐसा वज्रदंत चक्रवर्ती दिग्विजय से वापस लौटा ।।194।।
Then, Vajradanta Chakravarti, who had conquered all directions and to whom all humans, celestial beings, and divine entities offered their respects, returned from his victorious campaign. ||194||
श्लोक ( Shlok ) 195
ततोऽभिषेकं द्वात्रिंशत्सहस्रधरणीश्वरैः । चक्रवर्ती परं प्रापत् पुण्यैः किं नु न लभ्यते १९५॥
उस समय चक्रवर्ती ने बत्तीस हजार राजाओं द्वारा किये हुए राज्याभिषेक महोत्सव को प्राप्त किया था सो ठीक ही है, पुण्य से क्या-क्या नहीं प्राप्त होता ? ।।195।।
At that time, the Chakravarti had received the grand coronation ceremony performed by thirty-two thousand kings. Indeed, what is not attained through virtue? ||195||
श्लोक ( Shlok ) 196
स च ते च समाकाराः कराङ्घ्रिवदनादिभिः । तथापि तैः समभ्यर्च्यः सोऽभूत् पुण्यानुभावतः ॥१९६॥
यद्यपि वह चक्रवर्ती और वे बत्तीस हजार राजा हाथ, पाँव, मुख आदि अवयवों से समान आकार के धारक थे तथापि वह चक्रवर्ती अपने पुण्य के माहात्म्य से उन सबके द्वारा पूज्य हुआ था ।।196।।
Although the Chakravarti and those thirty-two thousand kings had the same size and form, with equal limbs, face, and other bodily features, the Chakravarti was honored by all of them due to the grandeur of his virtue. ||196||
श्लोक ( Shlok ) 197
अनीदृशवपुश्चन्द्रसौम्यास्यः कमलेक्षणः । पुण्येन स बभौ सर्वानतिशय्य नरामरान् ॥१९७॥
इसका शरीर अनुपम था, मुख चंद्रमा के समान सौम्य था, और नेत्र कमल के समान सुंदर थे । पुण्य के उदय से वह समस्त मनुष्य और देवों से बढ़कर शोभायमान हो रहा था ।।197।।
His body was incomparable, his face as gentle as the moon, and his eyes as beautiful as lotuses. With the rise of his virtue, he appeared more radiant than all humans and gods. ||197||
श्लोक ( Shlok ) 198
शङ्खचक्राङ्कुशादीनि “लक्षणान्यस्य पादयोः । बभुरालिखितानीव लक्ष्म्या लक्ष्माणि चक्रिणः ॥१९८
इसके दोनों पाँवों में जो शंख, चक्र, अंकुश आदि के चिह्न शोभायमान थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी ने ही चक्रवर्ती के ये सब लक्षण लिखे हैं ।।198।।
The marks of conch, discus, goad, and other symbols that adorned his two feet seemed as if Lakshmi herself had inscribed these divine attributes upon the Chakravarti. ||198||
श्लोक ( Shlok ) 199
अमोघशासने तस्मिन् भुवं शासति भूभुजि । न दण्डयपक्षः कोऽप्यासीत् प्रजानामकृतागसाम् ॥ १९९॥
अव्यर्थ आज्ञा के धारक महाराज वज्रदंत जब पृथ्वी का शासन करते थे तब कोई भी प्रजा अपराध नहीं करती थी इसलिए कोई भी पुरुष दंड का भागी नहीं होता था ।।199।।
When the mighty King Vajradanta, who held unwavering authority, ruled the earth, no subject ever committed a crime. Therefore, no one was ever subjected to punishment. ||199||
श्लोक ( Shlok ) 200
स विभ्रद् वक्षसा लक्ष्मी वक्त्राब्जेन च वाग्वधूम्। प्रणाम्य्यामिव लोकान्तं प्राहिणोत कोर्तिमेकिकाम् ॥२००।
वह चक्रवर्ती वक्षःस्थल पर लक्ष्मी को और मुखकमल में सरस्वती को धारण करता था परंतु अत्यंत प्रिय कीर्ति को धारण करने के लिए उसके पास कोई स्थान ही नहीं रहा इसलिए उसने अकेली कीर्ति को लोक के अंत तक पहुँचा दिया था । अर्थात् लक्ष्मी और सरस्वती तो उसके समीप रहती थीं और कीर्ति समस्त लोक में फैली हुई थी ।।200।।
The Chakravarti carried Lakshmi on his chest and Saraswati in his lotus-like mouth. However, there was no place left for him to hold the greatly cherished virtue of fame, so he sent fame alone to the farthest reaches of the world. In other words, Lakshmi and Saraswati resided close to him, while fame spread throughout all the worlds. ||200||
श्लोक ( Shlok ) 201
सुधासूतिरिवोदंशुरंशुमानिव चोत्करः । स कान्ति दीप्तिमप्युच्चैः अधादूभुप्यतोदयः ॥२०१॥
वह राजा चंद्रमा के समान कांतिमान और सूर्य के समान उत्कर (तेजस्वी अथवा उत्कृष्ट टैक्स वसूल करने वाला) था । आश्चर्यकारी उदय को धारण करने वाला वह राजा कांति और तेज दोनों को उत्कृष्ट रूप से धारण करता था ।।201।।
The king was radiant like the moon and resplendent like the sun, shining with both brilliance and authority. He, who bore an extraordinary rise, possessed both radiance and brilliance in the most exceptional manner. ||201||
श्लोक 202 से 208
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
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