आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 272 to 286
श्लोक ( Shlok ) 272 – 286
व्रतं दत्तवतः स्थानं तस्य मे दर्शयत्यसौ । मामवादीद् गृहीत्वैन माव्रजन्नहमन्तरे ॥२७२॥वज्रकेतोर्महावीथ्यां देवतागृहकुक्कुटम् । भास्वत्किरणसंशोष्यमाणधान्योपयोगिनम् ॥२७३॥ पुंसो हतवतो दण्डं जिनदेवार्पितं धनम् । लोभादपह्नु वानस्य धनदेवस्य दुर्मतेः ॥२७४।। रसनोत्पाटनं हारमनर्घ्य मणिनिर्मितम् । श्रेष्ठिनः प्राप्य चौर्येण गणिकायै समर्पणात् ॥२७५॥रतिपिङ्गलसंज्ञस्य शूले तलवरार्पणम् । निशि मातुः कनीयस्याः कामनिर्लुप्तसंविदः ॥२७६॥ पुत्र्या गेहं गतस्याङ्गच्छेदनं पुररक्षिणः । क्षेत्रलोभान्निजे ज्येष्ठे मृते दण्डहते सति ॥२७७॥ लोलस्यान्वर्थसंज्ञस्य विलापं देशनिर्गमे । द्यूते सागरदत्तेन प्रभूते निर्जिते धने ॥२७८।।दातुं समुद्रदत्तस्य निश्शक्तेरातपे क्रुधा । परिर्वाद्धतदुर्गन्धधूमान्तर्वतिनश्चिरम् ॥ २७९ ॥निरोधमभयोद्धो षणायामानन्ददेशनात् । अङ्गकस्य नृपोरभ्भ्रवातिनः करखण्डनम् ॥२८०॥आनन्दराजपुत्रस्य तद्भुक्त्याऽवस्कराशनम् । मद्यविक्रयणे बालं कञ्चिदाभरणेच्छया ॥२८१॥हत्वा भूमौ विनिक्षिप्तवत्यास्तत्संविधानकम् । प्रकाशितवती स्वात्मजे शुण्डायाश्च निग्रहम् ॥ २८२॥पापान्येतानि कर्माणि पश्यन् हिंसादिदोषतः । अत्रामुत्र च पापस्य परिपाकं दुरुत्तरम् ॥२८३॥अवधार्यानभिप्रेतव्रतत्त्यागो’ भवाद् भयात् । भ्रेषमोषमृषायोषाश्लेषहिंसादिदूषिताः ॥२८४॥नात्रैव किन्त्वमुत्राऽपि ततश्चित्रवधोचिताः । अस्माकमपि दौर्गत्यं प्राक्तनात् पापकर्मणः ॥२८५॥इदं तस्मात् समुच्चेयं पुष्पं सच्चेष्टितैः पुरु । इति तं मोचयित्वाऽग्रहीषं दीक्षां मुमुक्षया ॥२८६॥
व्रत देने-वाले गुरुका स्थान मुझे दिखा” ऐसा मेरे पिताने मुझसे कहा तब मैं उन्हें साथ लेकर चला । रास्तेमें मैंने देखा कि वज्रकेतु नामके एक पुरुषको दण्ड दिया जा रहा है। पितासे मैंने उसका कारण पूछा, तब कहने लगे कि यह सूर्यकी किरणोंमें अपना अनाज सुखा रहा था और किसी मन्दिरका मुर्गा उसे खा रहा था। इसने उसे इतना मारा कि बेचारा मर गया। इसलिये ही लोग इसे दण्ड दे रहे हैं। आगे चलकर देखा कि जिनदेवके द्वारा रखी हुई धरोहरको लोभसे छुपाने वाले दुर्बुद्धि धनदेवकी जीभ उखाड़ी जा रही है। कुछ आगे चलकर देखा कि एक सेठके घरसे बहुमूल्य मणियोंका हार चुराकर वेश्याको देनेके अपराधमें रतिपिङ्गलको कोतवाल शूलीपर चढ़ा रहा है, किसी जगह देखा कि कामवासनासे जिसका सब ज्ञान नष्ट हो गया है ऐसा एक कोतवाल रातमें अपनी माताकी छोटी बहिनकी पुत्रीके घर गया था इसलिये राज्यकर्मचारी उसका अंग काट रहे हैं। दूसरी जगह देखा कि सार्थक नाम धारण करनेवाले एक लोल नामके किसानने खेतके लोभ-से अपने बड़े लड़केको डण्डोंसे मार मारकर मार डाला है, इसलिये उसे देशनिकालेकी सजादी जा रही है और वह विलाप कर रहा है। आगे जानेपर देखा कि सागरदत्तने जुआमें समुद्रदत्तका बहुत सा धन जीत लिया था परन्तु समुद्रदत्त देनेमें असमर्थ था इसलिये उसने क्रोधसे उसे बहुत देर तक दुर्गन्धित धुआंके बीच धूपमें बैठाल रखा है, किसी जगह देखा कि आनन्द महाराजके अभय घोषणा कराये जानेपर भी उनके पुत्र अंगकने राजाका मेढ़ा मारकर खा लिया है इसलिये उसके हाथ काटकर उसे विष्ठा खिलाया जा रहा है और अन्य स्थानपर देखा कि मद्य पीनेवाली स्त्रीने मद्य खरीदनेके लिये आभूषण लेनेकी इच्छासे किसी बालकको मारकर जमीनमें गाड़ दिया था, वह यह समाचार अपने पुत्रसे कह रही थी कि किसी राज कर्मचारीने उसे सुन लिया इसलिये उसे दण्ड दिया जा रहा है। हिंसा आदि दोषोंसे उत्पन्न हुए इन पापकार्योंको देखकर मैंने निश्चय किया कि पापका फल इस लोक तथा परलोक दोनों ही जगह बुरा होता है। मैंने संसारके भयसे व्रत छोड़ना उचित नहीं समझा। मैं सोचने लगा कि हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीसेवन आदिसे दूषित हुए पुरुषोंको इसी जन्ममें अनेक प्रकारके वध-बन्धनका दुःख भोगना पड़ता हो सो बात नहीं किन्तु परलोकमें भी वही दुःख भोगने पड़ते हैं, हमारी यह दरिद्रता भी तो पहले के पापकर्मोंसे मिली है, इसलिये सदाचारी पुरुषोंको इस पुण्यका अधिकसे अधिक संचय करना चाहिये यह सोचकर मैंने अपने पिताको छोड़कर मोक्षकी इच्छासे दीक्षा धारण कर ली है ।।२७२-२८६॥
When my father said to me, “Show me the place where the guru who gave you these vows resides,” I set forth with him. Along the way, I saw a man named Vajraketu being punished. I asked my father the reason, and he replied, “He was drying his grain in the sun, and a rooster belonging to a temple came and began to eat it. He struck the rooster so violently that the poor creature died; hence the people are punishing him.”
A little further on, we saw a man named Dhanadeva, who, out of greed, had hidden a trust deposited in his care by a devotee of the Jina; his tongue was being torn out for this misdeed. Proceeding onward, we witnessed Ratipingala, who, after stealing a necklace of precious jewels from a wealthy merchant’s house and giving it to a courtesan, was being impaled by the city guards for his crime.
Elsewhere, I beheld a man, his mind destroyed by lust, who had gone at night to the house of his mother’s younger sister’s daughter; the royal officials were severing his limbs as punishment. In another place, we saw a farmer named Lol, bearing the ironic name “Sarthaka” (meaning “fruitful”), who, overcome by greed for his field, had beaten his elder son to death with sticks, for which he was being sentenced to exile and was lamenting bitterly.
Going further, I saw Sagaradatta, who had won a great sum from Samudradatta in gambling. When Samudradatta could not pay, Sagaradatta, in wrath, forced him to sit for a long time amid foul smoke and scorching sun. In another place, I observed that although King Anand had declared a royal edict of nonviolence, his son Angaka had slain the royal ram and eaten it; thus, his hands were being cut off, and he was being made to consume excrement.
Elsewhere, a woman addicted to wine, wishing to obtain ornaments to buy more liquor, had killed a child and buried him in the ground. She was recounting this to her son when a royal officer overheard her and seized her for punishment.
Seeing these sinful acts born of violence, falsehood, theft, sexual misconduct, and other evils—and the suffering they brought—I firmly resolved that the fruits of sin are dreadful in both this world and the next. I realized it was not right to abandon vows out of fear of worldly hardship, for men tainted by such evils suffer great torments not only here but also beyond this life. Indeed, our own poverty was the result of past sinful deeds. Therefore, I concluded that the virtuous should strive to accumulate as much merit as possible, and with a heart set upon liberation, I abandoned my father and embraced the vows of renunciation. ॥272–286॥
श्लोक 287 से 296
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271