आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 31 to 45
श्लोक ( Shlok ) 31 – 33
रत्नावर्तगिरिं याहि स्थितस्तत्रेति सादरम् । भवत्समीपं प्राप्तैवमिति रक्तविचेष्टितम् ॥३१॥दर्शयन्ती समीपस्थं यावत् सौधगृहान्तरम् । इत्युक्त्वाऽनभिलाषं च ज्ञात्वा तस्य महात्मनः ॥३२॥ तत्रैव विद्यया सौधगेहं निर्माप्य निस्त्रपा । स्थिता तद्राजकन्याभिः सह का कामिनां त्रया ॥३३॥
उसने मुझसे कहा था कि तू रत्ना-वर्त पर्वतपर जा, वे वहां विराजमान हैं इसलिये ही मैं आदर सहित आपके पास आई हूं’ ऐसा कहकर उसने रागपूर्ण चेष्टाएं दिखलाई और कहा कि यह समीप ही चुनेका बना हुआ पक्का मकान है परन्तु इतना कहनेपर भी जब उसने उन महात्माकी इच्छा नहीं देखी तब वहींपर विद्याके द्वारा मकान बना लिया और निर्लज्ज होकर उन्हीं राजकन्याओंके साथ बैठ गई सो ठीक ही है क्योंकि कामी पुरुषोंको लज्जा कहांसे हो सकती है ? ॥३१-३३॥
“He instructed me, saying: ‘Go to Mount Ratnavarta, for they are dwelling there.’ Therefore, I have come to you with utmost respect,” she said, displaying gestures filled with passion. She then added, “There is a sturdy house of lime and stone nearby.”
Yet, seeing no inclination in the noble prince’s heart, she used her mystical powers to instantly construct a house right there. Shamelessly, she seated herself within it alongside the royal maidens. And this is but natural—for where can one find modesty in those consumed by desire? ॥31–33॥
श्लोक ( Shlok ) 34 – 45
एत्यानङ्गपताकाऽस्यास्तं सखीत्थमवोचत । त्वत्पितुर्गुणपालस्य सन्निधाने जिनेशितुः ॥३४॥ज्योतिर्वेगागुरुं प्रीत्या कुबेरश्रीः समादिशत् । निजजामातरं क्वापि श्रीपालस्वामिनं मम ॥३५॥ स्वयं स्तनितवेगोऽसौ सुतमन्वेषयेदिति । प्रतिपन्नः सं’ तत्प्रोक्तं भवन्तं मैथुनस्तव ॥३६॥आनीतवानिहेत्येतदवबुध्यात्मनो द्विषम् । पतिं मत्वोत्तरश्रेणेराशङ्क्यानलवेगकम् ॥३७॥स्वयं तदा समालोच्य निवार्य खचराधिपम् ० । उदीर्यान्वेषणोपायं त्वत्स्नेहाहितचेतसः ॥३८॥आनीयतां प्रयत्नेन कुमार इति बान्धवाः । आवां प्रियसकाशं ते प्राहैषुस्त “दिहागते ॥३९॥विद्युद्वगाऽवलोक्य त्वाम् अनुरक्ताऽभवत्त्वया । न त्याज्येति तदाकर्ण्य ‘स विचिन्त्योचितं वचः ॥४०॥मयोपनयनेऽग्राहि व्रतं गुरुभिरर्पितम् । मुक्त्वा गुरुजनानीतां स्वीकरोमि न चापराम् ॥४१॥इत्यवोचत्ततस्ताश्च शृङ्गाररसचेष्टितैः । नानाविधै रञ्जयितुं प्रवृत्ता नाशकंस्तदा ॥४२॥ विद्युद्वेगा ततोऽगच्छत स्वमातृपितृसन्निधौ । पिधाय द्वारमारोप्य सौधाग्रं प्राणवल्लभम् ॥४३llतावानेतुं कुमारोऽपि सुप्तवान् रक्तकम्बलम् । प्रावृत्य तं समालोक्य मेरुण्डः पिशितोच्चयम् ॥४४॥ मत्वा नीत्वा द्विजः सिद्धकूटाग्रे खादितुं स्थितः । चलन्तं वीक्ष्य सोऽत्याक्षीत् स तेषां जातिजो गुणः ll४५ll
इतनेमें विद्युद्वेगा की सखी अनंगपताका आकर कुमारसे इस प्रकार कहने लगी कि ‘आपकी माता कुबेरश्री आपके पिता श्रीगुणपाल जिनेन्द्रके समीप गई हुई थी वहां उसने बड़े प्रेमसे ज्योतिर्वेगाके पिता-से कहा कि मेरा पुत्र श्रीपाल कहीं गया है उसे ले आओ। ज्योतिर्वेगाके पिताने अपने जामाता स्तनितवेगसे कहा कि मेरे स्वामी श्रीपाल कहीं गये हैं उन्हें ले आओ । स्तनितवेगने स्वयं अपने पुत्र अशनिवेगको भेजा, पिताके कहनेसे ही अशनिवेग आपको यहां लाया है, वह आपका साला है। उत्तरश्रेणीका राजा अनलवेग इनका शत्रु है उसकी आशंका कर तुम्हारे स्नेहसे जिनका चित्त भर रहा है ऐसे सब भाईबन्धुओंने स्वयं विचार कर आपके खोजनेका उपाय बतलाया और कहा कि कुमारको बड़े प्रयत्नसे यहां लाया जाय । वे सब विद्याधरोंके अधिपति अनलवेग-को रोकनेके लिये गये हैं और हम दोनोंको आपके पास भेजा है। यहां आनेपर यह विद्युद्वेगा आपको देखकर आपमें अत्यन्त अनुरक्त हो गई है अतः आपको यह छोड़नी नहीं चाहिये । कुमारने ये सब बातें सुनकर और अच्छी तरह विचारकर उचित उत्तर दिया कि मैंने यज्ञो-पवीत संस्कारके समय गुरुजनोंके द्वारा दिया हुआ एक व्रत ग्रहण किया था और वह यह है कि मैं माता-पिता आदि गुरुजनोंके द्वारा दी हुई कन्याको छोड़कर और किसी कन्याको स्वीकार नहीं करूंगा । जब कुमारने यह उत्तर दिया तब वे सब कन्याएं अनेक प्रकारकी शृङ्गाररसकी चेष्टाओंसे कुमारको अनुरक्त करनेके लिये तैयार हुई परन्तु जब उसे अनुरक्त नहीं कर सकीं तब विद्युद्वेगा प्राणपति श्रीपालको मकानकी छतपर छोड़कर और बाहरसे दरवाजा बन्दकर माता-पिताको बुलानेके लिये उनके पास गई । इधर कुमार श्रीपाल भी लाल कम्बल ओढ़कर सो गये, इतने एक भेरुण्ड पक्षीकी दृष्टि उनपर पड़ी, वह उन्हें मांसका पिण्ड समझकर उठा ले गया और सिद्धकूट-चैत्यालयके अग्रभागपर रखकर खानेके लिये तैयार हुआ परन्तु कुमार-को हिलता जुलता देखकर उसने उन्हें छोड़ दिया सो ठीक ही है क्योंकि यह उन पक्षियोंका जन्म-जात गुण है ॥३४-४५॥
Just then, Vidyutvega’s friend, Anangapataka, arrived and addressed the prince, saying: “Your mother, Kuberashri, had gone to your father, the venerable Gunapal Jina. There, with great affection, she requested Jyotirvega’s father, saying: ‘My son Shripal has gone missing; please bring him back.’ Jyotirvega’s father, in turn, commanded his son-in-law, Stanitvega, saying: ‘Our lord Shripal is lost; go and fetch him.’ Stanitvega then instructed his own son, Ashanivega, who brought you here at his father’s behest. Thus, Ashanivega is your brother-in-law.“King Analvega of the northern regions is their enemy, and fearing him, all your affectionate kinsmen deliberated among themselves on how best to search for you. They concluded that you must be brought here with great care. Those brothers, who are lords of the vidyadharas, went forth to hold back Analvega, sending us two to your side.“Now that we are here, Vidyutvega has fallen deeply in love with you at first sight, and therefore you must not abandon her.”Hearing all this, Prince Shripal thoughtfully considered their words and gave a proper reply: “During my sacred thread ceremony, I took a vow before my preceptors that I would accept as wife only a maiden given by my parents or teachers, and none other.”When the prince gave this answer, all the maidens tried with countless alluring gestures to captivate his heart. But when they could not sway him, Vidyutvega, determined, left him alone in the house, locked the door from outside, and went to call his parents.Meanwhile, Prince Shripal wrapped himself in a red blanket and fell asleep. At that moment, a Bherunda bird spotted him, mistaking him for a lump of meat, seized him, and carried him off to place him atop the spire of Siddhakuta Chaityalaya, preparing to eat him. But as the bird noticed the prince stir, it released him unharmed—indeed, for such is the innate instinct of these birds. ॥34–45॥
श्लोक 46 से 64
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30