श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 8 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी और ‘भावप्रकाशनी’ हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
उत्थानिका – जब ऐसा है तो बतलाइये कि देशना का समीचीन पात्र कौन है ? इसके लिए अगला श्लोक कहते हैं –
व्यवहारनिश्चयौ य: प्रबुध्य तत्त्वेन भवति मध्यस्थ: ।
प्राप्नोति देशनाया: स एव फलमविकलं शिष्य: ॥8॥
अन्वय – यः व्यवहारनिश्चयौ तत्त्वेन प्रबुध्य मध्यस्थः भवति सः एव शिष्यः देशनायाः अविकलं फलं प्राप्नोति ॥ अन्वयार्थ – (यः) जो जीव (व्यवहारनिश्चयौ) व्यवहार और निश्चय नय को (तत्त्वेन) वस्तु स्वरूप के द्वारा (प्रबुध्य) यथार्थ रूप से जानकर (मध्यस्थः भवति) मध्यस्थ होता है अर्थात् किसी एक नय को न मानकर अपेक्षा से दोनों को स्वीकार करता है, (स एव) वह ही (शिष्यः) शिष्य (देशनायाः) उपदेश के (अविकलं) सम्पूर्ण (फल) फल को (प्राप्नोति) प्राप्त होता है।
दोनों नय को जानके, जो होता मध्यस्थ । वही शिष्य पाता यहाँ, श्रुत का फल आत्मस्थ ॥८॥
टीकार्थ – जो पुरुष वास्तव में व्यवहार और निश्चय नय को जानकर मध्यस्थ होता है तो नय के पक्षपात से रहित वह शिष्य ही देशना के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करता है। इस ग्रन्थ में मुनियों और श्रावकों के आचरण (चारित्र) की विधि बताई गई है। ज्ञान की अपेक्षा दोनों नयों की जानकारी श्रावक और श्रमण इन दोनों को समान होती है, किन्तु आचरण की अपेक्षा उनमें कुछ विशेषता है। साधुओं को लौकिक व्यवहार का आचरण नहीं करना चाहिए, जैसा कि इसी ग्रन्थ में आगे कहा जायेगा “मुनियों की अलौकिक वृत्ति होती है” प्रत्याख्यान, प्रतिक्रमण, वन्दना, स्तवन आदि रूप अलौकिक व्यवहार कहलाता है। व्यवहार में प्रवृत्ति करते हुए भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे संक्लेश परिणाम उत्पन्न हों। संक्लेश से तीव्र कर्म का बंध होता है क्योंकि वह संक्लेश चारित्र का विरोधी है। जिन परिणामों से आत्मा में निर्विकल्प वीतराग भावों की वृद्धि हो ऐसा व्यवहार करना ही ठीक है। समीचीन व्यवहार ही मोक्षमार्ग में साधकतम होता है। जब तक वीतराग निर्विकल्प समाधि में स्थिरता हाने में असमर्थता हो तब तक सराग चारित्र के अविनाभावी व्यवहार नय का आलम्बन किया जाता है। इस प्रकार शुद्ध निश्चय नय के विषयभूत आत्म स्वभाव में संलीन हो जाने से श्रमण मध्यस्थ होता है। श्रावकों के द्वारा लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार का व्यवहार किया जाता है। लौकिक में भी वही अनुष्ठान करना चाहिए जिससे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र में दोष न लगें।
जैसा कि आगम में कहा भी है “जैनों को वही लौकिक विधि करना चाहिए जो आगम सम्मत हो, जिससे सम्यक्त्व की हानि न हो और व्रतों में दूषण न लगे क्योंकि वही लौकिक विधि प्रामाणिक मानी गई है।” श्रावक निश्चय नय से कहे गये आत्मस्वरूप के ज्ञाता ही होते हैं उसके अनुभवकर्ता नहीं। लौकिक और अलौकिक व्यवहार की क्रियाओं में अनेक बार पुण्य-पाप से प्राप्त फलों में हर्ष-विषाद आदि भाव उत्पन्न होते हैं। वे सारे भाव क्षणभंगुर हैं ऐसा मान कर निश्चय नय के विषयभूत आत्मस्वभाव को समीचीन श्रद्धा का विषय बनाता हुआ राग, द्वेष के अभिप्राय से रहित होने से मध्यस्थ होता है। उपर्युक्त प्रकार से दोनों नयों की मैत्री को समझकर जो आचरण करता है वह देशना के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करता है, यह कथन का तात्पर्य है॥८॥
इस प्रकार श्री अमृतचन्द्राचार्य द्वारा विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय ग्रन्थ की मंगलटीका में पूर्व पीठिका बन्ध नामक प्रथम अधिकार आचार्य विद्यासागर के शिष्य मुनि प्रणम्यसागर द्वारा पूर्ण हुआ।
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 8
‘भावप्रकाशनी’ हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
भावार्थ-जिनवाणीके लिखनेका और उसको सुननेका मुख्य उद्देश्य है कि उससे भूले भटके अज्ञानी जोव वस्तुका निश्चय और व्यवहार स्वरूप समझें अथवा अपना अनादिकालीन भ्रम व अज्ञान मिटावें तथा जो हेय हो उसे छोड़े व जो उपादेय हो उसको ग्रहण करें और ऐसा करके अभी सिद्धि प्राप्त करें ( साध्यको सिद्ध करें)। परन्तु इसके लिये और क्या क्या करना अनिवार्य है, यह जिज्ञासा स्वभावतः होती है जिसका उत्तर है कि जिनवाणीमें यह सामर्थ्य है कि वह स्वतः निश्चय और ववहारका कथन करती है अथवा स्याद्वादरूप कथन करती है । अर्थात् वस्तुमें रहनेवाले धर्मों को क्रमशः कहती है क्योंकि उसमें यह सामर्थ्य नहीं है कि एक ही बारमें सब धर्मों को कह सके । अतः वे सभी धर्म एक ही आधारमें परस्पर मेलसे रहते हैं । अतएव अनेक धर्मवाली वस्तु अनेकान्तरूप कहलाती है तथा उसकी कहनेवाली वाणी या भाषाका नाम ‘स्याद्वाद’ है। इस तरह अनेकान्तरूप वस्तु तथा उसको कहनेवाली भाषाका परस्पर वाच्यवाचक सम्बन्ध है | अतएव यह जिनकाणी स्याद्वादवाणी मानी जाती है जो सब एकान्तरूप विवादोंको मिटाकर मैत्री स्थापित करती है। ऐसी वाणी के द्वारा ही निश्चय और व्यवहारका उपदेश होता है। दूसरी कोई भाषा या वाणी में यह सामर्थ्य नहीं है कि वह निश्चय और व्यवहारको कहनेवाली वाणी के अवलम्बन या सहायता ( निमित्त से जीवोंको सम्यग्ज्ञान होता है और सम्यग्ज्ञानसे माध्यस्थ्य ( वीतरागतारूपनिर्विकल्प ) भाव उत्पन्न होता है, जिसे सम्यक्चारित्र कहते हैं एवं उसका फल मोक्षकी प्राप्ति है, यही सम्पूर्ण फलको प्राप्ति है । संक्षेप में ऐसा समझना कि इन सबमें मूल कारण जिनदेशना–निश्चय और व्यवहारका उपदेश है। उसके बाद निश्चयथ्यवहारका सूत्रानुसार जानना है, उसके पश्चात् माध्यस्थ्यभावका होना है। इस तरह तीनों परस्पर अनुस्यूततया सम्बद्घ है। देशना के अविकल फल आत्मकल्याण या जीवोंके उद्धारके लिये तीनों अनिवार्य है किसीको भी श्रुटि नहीं होना चाहिये । ऐसी स्थिति में सम्यग्दष्टिको स्याद्वादरूप जिनवाणी, एवं निश्चयव्यवहारका ज्ञाता और माध्यस्थ परिणामी अवश्य होना चाहिये तभी वह मोक्षमार्गी व मोक्षगामी परम सुखी आदि महत्त्वपूर्ण फलवाला हो सकता है अन्यथा नहीं, यह सारांश है। फलतः जिनदेशनाके प्राप्त होने पर भी जिन जीवोंका हृदय परिवर्तन नहीं होता ( मिथ्याश्रद्धान नहीं छूटता ) वे कभी संसारसे पार नहीं होते । उनको न जिनवाणीका ज्ञान होता है न वे स्याद्वादको जानते हैं न उनको निश्चय व्यवहारका ज्ञान होता है न माध्यस्थ्यभाव होता है।
निश्चयव्यवहारनयके सम्बन्ध निर्णय —
एवं ववहारणओ पडिसिद्धो जाण णिच्छयणएण ।
णिच्छयणयासिदा पुण मुणिणो पावंति णिव्वाण ॥272॥
–समयसार कुंदकुंदाचार्य
अर्थ–निश्चयरूपसे । वास्तविकमें ) व्यवहारनय हेय या निषिद्ध है क्योंकि उससे मोक्ष नहीं होता, किन्तु निश्चयनय उपादेय है कारण कि उसके आलम्बन से मुनि मोक्ष को जाते हैं अर्थात् मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं इत्यादि लाभ होता है, अस्तु ।
व्यवहारनयके भेदोंमें भेद
(१) लोकव्यवहार, अनेक तरहकी क्रियाओं रूप (२) शास्त्रव्यवहाररूप, जिसके पराश्रित आदि ३ भेद होते हैं। मोक्षमार्गमें वे ही बाधक होते हैं। लोकव्यवहार बाधक नहीं होता यह तात्पर्य है, अस्तु ।। ८ ।।
निश्चयनय और व्यवहारनयमें भूल तथा कारणकार्यमें भूल
कोऊ नयनिश्चयसे आत्माको शुद्ध मान,
भये हैं स्वच्छन्द न पिछाने निजशुद्धता।
कोऊ व्यवहार-दान-शील-तप-भावको ही,
आतमको हित जान छांड़त न मुद्धता ।।
कोऊ व्यवहारनय निश्चयके मारगको
भिन्न-भिन्न पहिचान करे निज उद्धता।
जब जाने निश्चयके भेद व्यवहार सब,
कारण है उपचार माने तब बुद्धता ।।
भावार्थ- (१) संसारमें बहुतसे जीव ऐसे हैं कि जिन्हें नयोंका अर्थात् निश्चयनय, व्यवहारनय, द्रव्याथिकनय, पर्यायाथिकनयका तो ज्ञान नहीं है किन्तु एक सामूहिक मिथ्याज्ञान या अज्ञान पाया जाता है जिससे वे शरोर और जीवको एक ही मानते हैं अतएव वे ‘बहिरात्मा‘ कहलाते हैं। उनका ख्याल ( मान्यता ) ऐसा है कि जब शास्त्रों में लिखा है और उपदेश दिया जाता है कि जीव ( आत्मा ) ‘शुद्ध’ है—अशुद्ध नहीं है, तब उसको शुद्ध करने के लिये क्रियाकांड या उपवासादि तपश्चरण क्यों किया जाय ? व्यर्थ है । ‘पिष्टस्व पेषणं वैयर्थम्’ यह न्याय है अर्थात पिसे हुएको फिर पीसना बेकार है। ऐसा मानकर वे स्वच्छंद होकर वनगजको तरह मनचाहा खानापीना कुकर्म व पाप करना अपना कर्तव्य समझ लेते हैं गरज कि उनको किसी बात का भय व परहेज नहीं रहता। सो आचार्य कहते हैं कि वे अत्यन्त मूर्ख (मूढ़ ) हैं, उन्होंने आत्मा (जीव) की शुद्धताको समझा ही नहीं है और खोटी या गलत धारणाकर संसारमें परिभ्रमणकर रहे हैं। (२) बहुतसे जीव ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि ‘आत्मा अनादिसे अशुद्ध है, उसको शुद्ध करनेके लिये दान तथा शील, संयमादि क्रिया करना चाहिये, वे जरूरी हैं, उनके करने से आत्माका हित या कल्याण होता है या आत्मा शुद्ध हो जाता है इत्यादि । आचार्य कहते हैं कि वे भी मूढ मिथ्यादष्टि हैं उन्होंने भी आत्माको शुद्धता-अशुद्धताको नहीं पहिवाना है एवं भूले हैं। ( ३ ) बहुतसे जीव ऐसे हैं कि जो शुद्धता होने के या मोक्ष प्राप्त करनेके दो मार्ग ( उपाय ) मानते हैं व कहते हैं यथा ( १ ) निश्चय मोक्षमार्ग ( २ ) व्यवहार मोक्षमार्ग, और दोनों पृथक् २ हैं। आचार्य कहते हैं कि वे जीव उदंड हैं अर्थात् ही और लड़ाकू हैं अर्थात् व्यर्थ ही बकवाद और वितंडा करनेवाले हैं, कारण कि मोक्षका मार्ग एक ही है दो नहीं हैं। और वह व्यवहारमार्ग इस प्रकार कहा गया है कि जो जीव अखंड द्रव्य ( वस्तु ) में ज्ञानके द्वारा खंडकल्पना या निर्धार करते हैं परन्तु प्रदेश भेद नहीं करते, वह भेदाश्रित व्यवहार कहा जाता है और वही निश्चयका कारण है; वह हो सकता है, दूसरे प्रकारका कोई व्यवहार निश्चयका कारण नहीं हो सकता, यह सारांश है अर्थात् भिन्न प्रदेशी व्यवहार निश्चयका कारण नहीं हो सकता इत्यादि । अतएव निश्चय (अखंड में खंड करना, व्यवहार या उपचार है ऐसा जानना चाहिये तभी वह ज्ञानी सम्यग्दष्टि हो सकता है अन्यथा अज्ञानी व मिथ्यादष्टि ही समझना चाहिये, किम्बहुना । फलतः नयोंका ज्ञान होना एवं विवक्षाको समझना वस्तु स्वरूपको समझने के लिये अनिवार्य है- बिना उसके तत्त्वका स्वरूप व निश्चयव्यवहारका ज्ञान होना असंभव है इति । देखो, सिद्धान्त यह है कि संयोगी पर्याय ( संसार दशामें ) रहते समय न सर्वथा शुद्ध आत्मा है न सर्वथा अशुद्ध आत्मा है किन्तु द्रव्यार्थिक से शुद्ध… आत्मा है और पर्यायार्थिक नय से अशुद्ध आत्मा है ऐसा निर्धार है, अस्तु ॥ ८ ॥
कथंचित् नयों में हेयता व उपादेयता बतलाते हैं
व्यवहारनय यों तो अन्तमें हेय ( त्याज्य ) है ही किन्तु प्रारम्भ में जबतक हीन दशा रहती हैं अर्थात् निश्चय नय प्रकट नहीं होता तबतक वह भी अपेक्षाकृत उपादेय माना जाता है क्योंकि वह अशुभसे बचाता है शुद्धके सन्मुख करता है अर्थात् संयोगपर्यायमें रहते हुए भी कुछ विवेक जाग्रत होता है, उसको स्थूल रूपसे अच्छे और बुरेका ज्ञान होता है, कषाय मन्द होती है, शुभरागरूप परिणाम होता है, परन्तु यह व्यवहारनय है, एकान्तरूप अप्रशस्त व्यवहारनयसे यह भिन्न है । इस व्यवहारनय में पुण्य व पापका ख्याल नहीं रहता है अर्थात् दोनों मेंसे पुण्यको अच्छा मानता है, पापको बुरा मानता है, दया करना व्रत पालना शीलसंयम धारण करना, लोकोपयोगी कार्य करना, तीर्थाटन करना आदिको वह पुण्य या धर्म मानता है, जो यथार्थ ( निश्चय ) में धर्म नहीं है-मोक्षका कारण नहीं है, प्रत्युत बंधका कारण है किन्तु व्यवहार या उपचारसे उसको घर्म मान लिया जाता है इत्यादि भूल ही है । लेकिन उससे भी कुछ लाभ या बचत होती है, पापका बंध प्रायः नहीं होता पुण्यका बंध होता है जिससे नवग्रेवेयिकतक चला जाता है-अहमिन्द्र बड़ा विभूतिका धारी हो जाता है, परन्तु रहता मिथ्यादृष्टि हो है वहाँ आत्माकी रक्षा नहीं होतो, आत्माकै स्वभावका घात होता ही रहता है, संवरपूर्वक निर्जरा नहीं होती, संसारका अन्त ( मोक्ष ) नहीं होता इत्यादि कमी बनी ही रहती है इत्यादि हानि व लाभ समझना ।
सारांश-धर्म दो तरहका होता है ( १ ) व्यवहारधर्म .२) निश्चयधर्म । अथवा एक लौकिकधर्म दूसरा पारलौकिकधर्म । व्यवहार शब्दके अनेक अर्थ है जैसे व्यवहारका अर्थ, लोकप्रवृत्ति या लोकयात्रा या चालचलन होता है तथा व्यवहारका अर्थ भेद करना भी होता है या सलूक करना होता है इत्यादि । परन्तु यहाँपर – धर्म का प्रकरण होनेसे सम्यक् धर्म व मिथ्या धर्म का विचार किया जाना है। जो धर्म ( आत्म स्वभाव ) सम्यग्दर्शन पूर्वक हो उसको सम्यक् धर्म समझना चाहिए। और जो धर्म मिथ्यादर्शनके साथ हो उसको मिथ्याधर्म समझना चाहिये । तदनुसार मिथ्यादृष्टि के शुभ रागरूप या शुभ प्रवृत्तिरूप ( सदाचाररूप-क्रियाकाण्डरूप ) धर्मके अत्यधिक होनेपर भी वह मिथ्याधर्म में ही गभित ( शामिल ) है, उससे उसको मोक्ष नहीं होता तथा सम्यग्दृष्टिके वह शुभरागरूप धर्म कथंचित् या उपचार से मोक्षका कारण माना जाता है कारण कि उसकी श्रद्धा उस शुभरामरूप धर्मके बारे ( विषय ) में सही है अर्थात् उसको वह मोक्षका कारण नहीं मानता, संसार ( बंध ) का ही कारण मानता है और मिथ्या दृष्टि वैसा नहीं मानता, यह खास भैद धर्म के विषयमें है । फलतः लोकव्यवहार ( लोकाचार ) को अपेक्षा शुभ किया या शुभ प्रवृत्ति कथंचित् उपादेय है। किन्तु परलोकको अपेक्षा वह उपादेय नहीं है, हेय है अर्थात् वह व्यवहारधर्म ( शुभ प्रवृत्तिरूप ) सर्वथा उपादेय नहीं है। निष्कर्ष यह कि मिथ्यात्वके साथ ( शुभरागरूप व्यवहारधर्म ) तथा सम्यक्त्वके साथ भी उक्त व्यवहारधर्म, उपादेय व कार्यकारी, किसी भी हालतमें नहीं है-उससे मोक्ष नहीं हो सकता। किन्तु मोक्ष सिर्फ निश्चयधर्म अर्थात् सम्यग्दर्शनपूर्वक वीतरागतारूप धर्मसे ही हो सकता है अन्यथा नहीं, यह तात्पर्य है। अर्थात् जबतक निश्चयधर्म प्राप्त नहीं होता या निश्चनयका उदय नहीं होता तबतक व्यवहारधर्म या भेद बतानेवाला मय उपादेय है और जब निश्चयधर्मको या निश्चयनयको प्राप्ति हो जाती है सब व्यवहारधर्म व व्यवहारनयको छोड़ दिया जाता है एवं भेदरूप या विकल्परूप या शुभरागरूप निश्चयनय (अशुद्धनिश्चय ) को भी निर्विकल्प दशा ( समाधि ) के समय छोड़ दिया जाता है, एक ज्ञाता-दृष्टामात्र स्वस्थ रह जाता है, किम्बहुना उपादेय व हितकारी निश्चय ही है | इस विषयमें एक-लौकिक दृष्टान्त दिया जाता है।
एक समय दो आदमी किसी तीर्थयात्राको पैदल चले। उनमेंसे एक आदमीको कुछ कमती (धुंधला ) दिखता था और दूसरेको पूरा साफ साफ दिखता था। चलते २ दोनोंको भूख व प्यासकी इच्छा हुई और बेचैन होने लगे । थोड़ी देरके बाद एक गांव मिला, जहाँपर बहुतसे होटल थे दोनों ठहर गये और खाने-पानेको होटलोंमें गये, जो आदमी कम दृष्टिवाला था वह पासवाले एक गंदले (छोटे) होटल में चला गया और वहाँपर उसने खराब बासी विकारी भोजन किया और मलीन विषैला पानी भी पिया । तथा दूसरे अच्छी दष्टिवाले ने अच्छे बड़े साफ होटलमें जाकर भोजन किया, पानी पिया। इसके बाद दोनों आगे चल पड़े। चलते-चलते बीच में वह कम दृष्टिवाला एकदम बीमार हो गया-तड़फड़ाने लगा, चिल्लाने लगा। दूसरा साफ दृष्टिवाला हक्का बक्का होगा या घबड़ा गया कि इसे क्या हो गया है ? आश्चर्य में पड़ गया। लेकिन हिम्मत करके उसको पीठपर रखा तथा बस्ती में ले जाकर दवा कराई किन्तु वह मर गया । दूसरा घर वापिस लौटा और उसके घरवालोंको खबर दी व सब हाल कह सुनाया, सब लोग समझ गये कि यह सब खराब या अशुद्ध विकारों खाने-पीने का नतीजा है अर्थात् उसकी गलती फल है। बस, इसी प्रकार व्यवहारनय (अशुद्धनय) के आलम्बन लेनेका फल मिलता है ( बरबादी होना ) और निश्चयनयके आलम्बनका फल ( आबादी या रक्षा ) मिलता है ऐसा संक्षेप में समझना चाहिये । यही कथंचित् हेयता व उपादेयताका खुलासा है |
उपसंहार
व्यवहारके दो भेद हैं ( १ ) मिथ्यादृष्टि का व्यवहार, जिसको मिथ्या व्यवहार कहते हैं ( २ ) सम्यग्दृष्टिका व्यवहार जिसको सम्यक् व्यवहार कहते हैं, भिन्न २ तरहका होता है। मिध्यादृष्टिका. व्यवहार मूलमें भूलरूप है अर्थात वह भेद ज्ञान रहित है, संयोगी पर्यायके साथ एकत्वरूप है । और सम्यक् दृष्टिका व्यवहार मूल में भूलरूप नहीं है किन्तु भेदज्ञान सहित है तथापि सरागरूप अशुद्ध है अतएव वह हेय ही हैं इसीसे वह कथंचित् उपादेय भी ( हीनदशामें ) माना जाता है, जो मजबूरी की निशानी है, या बलात्कार के समान है । तभी तो वह सम्यग्दृष्टि उससे भी अरुचि या असहयोग करता है उसका स्वामी नहीं बनता इत्यादि । ऐसे भव्य सम्यग्दृष्टि जीवको ही व्यवहारनयसे मोक्षमार्गी कहा जा सकता है किन्तु मिथ्यादृष्टि जीवको कदापि ( व्यवहारनयसे भी ) मोक्षमार्गी नहीं कहा जा सकता और यह सब श्रद्धापर ( भावपर ) निर्भर है, किया या आचरण पर निर्भर नहीं है किम्बहुना, इस तथ्यको निष्पक्ष होकर ठीक २ समझना चाहिये ||८||
नोट-दर्शन ज्ञान चारित्र ( धर्म ) तीनों निश्चय और व्यवहाररूप होते हैं अतएव तीनों में जो भूल या भ्रम है उसको निकालना चाहिए तभी आत्मकल्याण होगा, अन्यथा नहीं, यह ध्यान रहे इति ।
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 8
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