आदिपुराण 23 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 23 by Acharya Jinasena
पर्व 23 में गंधकुटी , दिव्य वातावरण , समवसरणविभूति का वर्णन हैं।
आदिपुराण पर्व 23 (श्लोक 1–196) का संक्षिप्त सारांश
1. गंधकुटी का वर्णन (श्लोक 1–24)
तीन कटनीदार पीठ पर कुबेर द्वारा निर्मित गंधकुटी अत्यंत भव्य है। यह मणियों, रत्नों, स्वर्ण जालियों, पुष्पमालाओं और धूप-दीप से सुशोभित है। इसकी शोभा इंद्रधनुष, मेघमुक्त आकाश और हंसों से युक्त सरोवर जैसी प्रतीत होती है। गंधकुटी की ऊँचाई, चौड़ाई और विस्तार अद्भुत है, जो स्वर्ग के विमानों को भी लज्जित करती है।
2. सिंहासन और भगवान वृषभदेव (श्लोक 25–30)
गंधकुटी के मध्य में स्वर्ण सिंहासन स्थित है, जो मेरु पर्वत के शिखर को भी तिरस्कृत करता है। इस पर प्रथम तीर्थंकर भगवान वृषभदेव विराजमान हैं। वे अपने तेज से सूर्य को मात देते हैं और देवगण उनकी पुष्पवर्षा, धूप-दीप आदि से पूजा करते हैं।
3. दिव्य वातावरण (श्लोक 31–59)
- पुष्पवर्षा: देवों द्वारा बरसाए गए पुष्पों से समस्त भूमि सुगंधित हो उठती है।
- अशोक वृक्ष: मरकत मणि से निर्मित यह वृक्ष भ्रमरों और कोयलों के मधुर स्वर से भगवान की स्तुति करता प्रतीत होता है।
- छत्रत्रय: चंद्रमा जैसे श्वेत छत्र भगवान के ऊपर विराजमान हैं, जो तीनों लोकों के प्रतीक हैं।
- चमर सेवा: यक्षों द्वारा ढुलाए जा रहे चमर आकाशगंगा और क्षीरसागर की लहरों जैसे दिखते हैं।
4. भगवान की दिव्यता (श्लोक 60–98)
- भगवान वृषभदेव का शरीर स्वर्णिम, निर्मल और कामदेव-विजयी है।
- उनकी दिव्यध्वनि समस्त भाषाओं में गूँजती है और अज्ञान को दूर करती है।
- इंद्र, देवगण और इंद्राणी भक्तिभाव से उनकी पूजा करते हैं।
5. समवसरण की रचना (श्लोक 77–196)
समवसरण की भूमि अद्भुत सौंदर्य से परिपूर्ण है:
- मानस्तंभ, सरोवर और परिखा आकाश को स्पर्श करते हैं।
- लतावन, नाट्यशालाएँ और ध्वजाएँ मनोहर शोभा बिखेरती हैं।
- चार वन (अशोक, सप्तपर्ण, आम्र, चंपक) देवांगनाओं और भ्रमरों से गुंजायमान हैं।
- तीन कोट (स्वर्ण, रत्न, स्फटिक) और श्रीमंडप भगवान के ऐश्वर्य को प्रकट करते हैं।
6. इंद्रों की स्तुति (श्लोक 116–162)
देवगण भगवान वृषभदेव की स्तुति करते हुए कहते हैं:
- “आप तीनों लोकों के स्वामी, कर्मबंधन के विध्वंसक और मोक्षमार्ग के प्रदर्शक हैं।”
- “आपका शरीर कामदेव को जीतने वाला, निर्विकार और अनंत गुणों से युक्त है।”
- “आपकी दिव्यध्वनि समस्त भाषाओं में व्याप्त है और ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।”
7. भगवान का प्रभाव (श्लोक 163–196)
- भगवान के दर्शन मात्र से देव, मनुष्य और पशु सभी कृतार्थ हो जाते हैं।
- समवसरण में उपस्थित सभी जीव भक्ति, ज्ञान और शांति का अनुभव करते हैं।
- जो भी इस दिव्य लीला का स्मरण करता है, वह अर्हंत पद की प्राप्ति का अधिकारी बनता है।
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 23
श्लोक 1 से 11 गंधकुटी का निर्माण और उसकी शोभा
कुबेर ने सुमेरु के तीसरे पीठ पर रत्नजटित, पवित्र गंधकुटी बनाई। यह इंद्रधनुष रचती, फूलों और चमरों से शोभती थी। सूर्य से स्पर्धा करती यह स्वर्ग के विमानों को लज्जित करती थी। ऊँचे शिखरों और पताकाओं से यह देवों को बुलाती-सी लगती थी।
श्लोक 12 से 21 गंधकुटी की अलौकिक सुंदरता
गंधकुटी तीन पीठों सहित लक्ष्मी की प्रतिमा-सी थी। मोतियों, सुवर्ण जालियों और रत्नमालाओं से अलंकृत यह भ्रमरों और स्तोत्रों से स्तुति करती-सी लगती थी। सुगंध, फूल और धूप से यह स्त्री-सी शोभती थी।
श्लोक 22 से 31 सिंहासन और भगवान की उपस्थिति
गंधकुटी ने सुगंध से दिशाएँ भर दीं। यह छह सौ धनुष विस्तृत थी। इसके मध्य रत्नमय सिंहासन पर भगवान वृषभदेव अधर विराजमान थे। इंद्र ने फूल बरसाए, जो भ्रमरों से गूंजते थे।
श्लोक 32 से 41 पुष्पवर्षा और अशोक वृक्ष
पुष्पवर्षा ने बारह योजन तक पराग फैलाया। भगवान के समीप अशोक वृक्ष रत्नमय पत्तों और फूलों से नृत्य करता और स्तुति करता था। इंद्र ने इसे मुख्य वृक्ष बनाया।
श्लोक 42 से 51 छत्र और चमरों की शोभा
तीन सफेद छत्र चंद्रमा को जीतते थे, रत्नों से जड़े थे। यक्षों के चमर क्षीरसागर-से लगते थे, जो आकाशगंगा-सी शोभती थीं। ये भगवान के यश को प्रकट करते थे।
श्लोक 52 से 61 चमर और दुंदुभि का वैभव
चमरों की संख्या चौंसठ थी, जो चक्रवर्ती से राजा तक घटती थी। ये चंद्रमा-सी कांति से स्पर्धा करते थे। दुंदुभि मधुर शब्द करते थे, जिन्हें मयूर प्रेम से देखते थे।
श्लोक 62 से 71 दिव्यध्वनि और प्रभामंडल
नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। समवसरण भूमि भगवान की प्रभा से शोभती थी, जिसमें सात भव दिखते थे। उनकी दिव्यध्वनि सर्वभाषारूप थी, जो मोह नष्ट करती थी।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का वर्णन
दिव्यध्वनि भगवान का गुण थी। समवसरण में भगवान सिंहासन पर थे। सभा पताकाओं, सरोवरों और परिखा से शोभती थी, जो इंद्रों को बुलाती-सी लगती थी।
श्लोक 82 से 91 समवसरण की संरचना
समवसरण नृत्यशालाओं, धूपघटों, वनों, ध्वजाओं और कल्पवृक्षों से युक्त थी। स्फटिक कोट और श्रीमंडप इसे अलंकृत करते थे। सौधर्मेंद्र ने इसमें प्रवेश किया।
श्लोक 92 से 101 भगवान के दर्शन और पूजा
भगवान चार मुखों से शोभित, अनंतचतुष्टय के स्वामी थे। उनकी प्रभा सूर्य से स्पर्धा करती थी। इंद्र और इंद्राणी ने प्रणाम कर उनकी पूजा की।
श्लोक 102 से 111 भगवान के चरणों की पूजा
भगवान वृषभदेव के चरणकमलों की नख-किरणें देवों के मस्तकों को स्पर्श करती थीं, मानो शेषाक्षत अर्पित कर रही हों। इंद्रों ने भक्ति से प्रणाम किया, उनके मस्तक चरण-प्रभा से पवित्र हुए। इंद्राणी ने अप्सराओं संग नमस्कार किया, नख-किरणें उसके स्तनों पर पड़ीं। इंद्र कल्पवृक्ष-से पूजा करते दिखे। इंद्रों और इंद्राणी ने गंध, पुष्प, धूप, अक्षत आदि से चरणों की पूजा की। इंद्राणी ने रत्न-चूर्ण से मंडल बनाया और जलधारा छोड़ी।
श्लोक 112 से 121 इंद्राणी की भक्ति और स्तुति का प्रारंभ
इंद्राणी ने रत्नमय दीपकों से भगवान की पूजा की, जो भक्ति में योग्यता का विचार नहीं करती। उसने धूप, दीप और अमृत-पिंड अर्पित किए, जो चंद्रमा-से लगते थे। फलों से भी उसने हर्षपूर्वक पूजा की। देवों ने भी भक्ति की, पर वीतराग भगवान को इससे प्रयोजन नहीं था, फिर भी वे भक्तों को फल देते थे। इंद्र प्रसन्नचित्त होकर भगवान की स्तुति करने लगे, अपनी भक्ति को गुण-रत्नों के खजाने की पूजा बताया।
श्लोक 122 से 131 भगवान के गुणों की स्तुति
इंद्रों ने कहा कि भगवान सर्वज्ञ, अविनाशी और जगत् के हितकारी हैं। उनकी गुण-किरणें कर्म-कलंक हटाकर चमकती हैं। वे संसार-लता को शांत परिणाम से उखाड़ते हैं। चार कषायों और कामदेव को उन्होंने तप और चारित्र से जीता। उनका शरीर विकाररहित और शांतिसुख का प्रतीक है, जो तीनों लोकों के गुरु होने को दर्शाता है।
श्लोक 132 से 141 भगवान के शरीर का वैभव
भगवान का शरीर सुंदर, सुगंधित, लक्षणयुक्त और दैदीप्यमान है। यह विकार-मल से मुक्त, वज्रमय संधियों वाला और अपार शक्ति का धारक है। यह सूर्य-सा तेजस्वी और स्वर्ग से रत्न-धारा लाता है। जन्म पर फूलों की वृष्टि और अभिषेक ने उनका माहात्म्य फैलाया। तपकल्याणक में देव उनकी सेवा करते थे।
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा और उपासना
भगवान मोक्षमार्ग के धाता, तीनों लोकों के स्वामी और गुणों के खजाने हैं। वे मित्र, गुरु और पितामह हैं, जिनका ध्यान मोक्ष देता है। योगी उनके अगम का चिंतन करते हैं। उनकी चमरें, सिंहासन, छत्र और अशोकवृक्ष उनकी महिमा दर्शाते हैं। ये संसार से मुक्ति दिलाते हैं।
श्लोक 152 से 161 समवसरण का वैभव और स्तुति
दुंदुभि और पुष्पवर्षा से समवसरण गूंजता था, मयूर शब्द करते थे। चमरें कांति बढ़ाती थीं। भगवान की दिव्यध्वनि सर्वभाषारूपी और तत्त्वज्ञान देने वाली थी। उनकी वाणी तीर्थ और मोक्षमार्ग है। वे सर्वज्ञ, सर्वजित् और तीर्थंकर हैं। इंद्रों ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में पूजा।
श्लोक 162 से 171 इंद्रों की नमस्कार और भगवान का रूप
बत्तीस इंद्रों ने स्तुतियाँ कीं और नमस्कार किया। वे समवसरण में बैठे। भगवान का शरीर सुवर्ण-सा, भुजाएँ हाथी-सी, मुख चंद्र-सा और नेत्र कमल-से थे। चमरों से घिरा यह शरीर कामदेव को जीतता था। देवांगनाएँ उनके मुख को असंतुष्ट होकर देखती थीं।
श्लोक 172 से 181 भगवान के शरीर की प्रशंसा
भगवान का मुख कमल-सा, नेत्र विशाल और शरीर सुगंधित था। यह क्रोध-राग से मुक्त और शांत था। चरण लाल कमल-से, सिंहासन रत्नमय और छत्र चंद्र-सा था। उनका चरित्र जीवों का हित करता था। अशोकवृक्ष उनकी सेवा में शोभता था।
श्लोक 182 से 191 समवसरण के अवयवों की स्तुति
समवसरण में पुष्पवर्षा, ध्वजाएँ, मानस्तंभ, सरोवर, लतावन और चार वन शोभते थे। धूपघट, नाट्यशालाएँ, कल्पवृक्ष और स्तूप उनकी महिमा बढ़ाते थे। ये कल्याणकारी थे।
श्लोक 192 से 196 समवसरण की संरचना और प्रभाव
समवसरण में मानस्तंभ, सरोवर, कोट, सभाएँ और पीठिका थी। बारह गण क्रम से बैठते थे। भगवान स्याद्वाद-रथ पर सवार थे। उनकी स्तुति करने वाला अर्हंत अवस्था पाता है।
पर्व 24
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