आदिपुराण 24 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 24 by Acharya Jinasena
पर्व 24 में भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति, जीवतत्त्व का विस्तृत वर्णन, भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन हैं।
आदिपुराण पर्व 24: श्लोक 1 से 186 का संक्षिप्त सारांश
भगवान् वृषभदेव ने अपने ज्ञान से जगत् को मोह से जगा दिया। राजर्षि भरत को एक साथ तीन समाचार मिले: उनके पिता को केवलज्ञान, पुत्र का जन्म, और चक्ररत्न का प्रकट होना। भरत ने पहले भगवान् की पूजा का निश्चय किया और सेना सहित समवसरण पहुँचे। वहाँ उन्होंने भगवान् का दिव्य स्वरूप देखा और उनकी प्रदक्षिणा व पूजा की। फिर उन्होंने भगवान् की विस्तृत स्तुति की, उन्हें सर्वज्ञ, परमात्मा और मोक्षदाता बताया। स्तुति के बाद भरत ने तत्त्वों के स्वरूप, मार्ग और फल के बारे में प्रश्न किया। भगवान् ने दिव्यध्वनि से जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल तत्त्वों का वर्णन किया। उन्होंने जीव के उपयोग, पर्याय, संसार, मोक्ष और सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र को मोक्ष के साधन बताए। भगवान् ने चार पुरुषार्थ, लोकों का स्वरूप और तीर्थंकरों के कल्याणकों का भी निरूपण किया। यह सुनकर भरत ने सम्यग्दर्शन और अणुव्रत ग्रहण किए। वृषभसेन, ब्राह्मी, सुंदरी आदि ने दीक्षा ली, और कई श्रावकों ने व्रत धारण किए। अंत में, भरत बाहुबली सहित अयोध्या लौटे, जहाँ उनकी शोभा जिनवाणी के समान थी।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 24
श्लोक 1 से 11 श्रीवृषभदेव की जय और भरत का पूजा निश्चय
भगवान् श्रीवृषभदेव ने अपने ज्ञान से मोहरूपी विष को दूर कर समस्त जगत् को जगा दिया। राजर्षि भरत को एक साथ तीन समाचार मिले: उनके पिता को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, अंतःपुर में पुत्र जन्मा, और आयुधशाला में चक्ररत्न प्रकट हुआ। भरत ने इन समाचारों को सुनकर यह विचार किया कि इनमें से पहले किसका उत्सव करना चाहिए। उन्हें लगा कि केवलज्ञान धर्म का फल, पुत्र काम का फल, और चक्ररत्न अर्थ का फल है। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि सबसे पहले धर्मकार्य अर्थात् भगवान् की पूजा करनी चाहिए। इसके लिए वे अपने भाई, अंतःपुर की स्त्रियों और नगर के प्रमुख लोगों के साथ पूजा सामग्री लेकर भगवान् की वंदना के लिए तैयार हुए।
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान और पूजा
महाराज भरत नगाड़ों की गंभीर ध्वनि के साथ सेना सहित समवसरण की ओर प्रस्थान करते हैं। उनकी सेना समुद्र की लहरों और ध्वजाओं से सुशोभित दिखती है। समवसरण पहुँचकर वे प्रदक्षिणा देते हैं, मानस्तंभों और धर्मचक्रों की पूजा करते हैं, और गंधकुटी में भगवान् वृषभदेव को श्रेष्ठ सिंहासन पर विराजमान देखते हैं। वे भगवान् की भक्ति में लीन होकर पूजा के लिए आगे बढ़ते हैं।
श्लोक 22 से 31 भगवान् वृषभदेव का दिव्य स्वरूप और भरत की पूजा
भगवान् वृषभदेव चमरों, छत्रों, और पुष्पवृष्टि से सुशोभित दिखते हैं, मानो सुमेरु पर्वत हों। उनकी प्रभा और दिव्य ध्वनि से आनंद फैलता है। भरत उनकी प्रदक्षिणा करते हैं और उत्कृष्ट सामग्री से पूजा करते हैं। पूजा के बाद वे घुटनों पर बैठकर भगवान् को नमस्कार करते हैं और स्तुति शुरू करते हैं।
श्लोक 32 से 41 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 1)
भरत भगवान् को ब्रह्मा, परमज्योति, सृष्टिकर्ता, सर्वदर्शी, और आत्मभू कहकर स्तुति करते हैं। वे उन्हें हिरण्यगर्भ, परमात्मा, शंकर, और सर्वज्ञ बताते हैं। भगवान् को योगी, सिद्ध, और धर्म के अधिपति कहते हुए उनकी महिमा का वर्णन करते हैं।
श्लोक 42 से 51 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 2)
भरत भगवान् को उत्तम, स्थिर, अचल, और संसार का अंत करने वाला कहते हैं। वे उनके आठ प्रातिहार्यों और छत्रत्रितय की शोभा की प्रशंसा करते हैं। भगवान् का सिंहासन लोकभार धारण करने वाला प्रतीत होता है। भरत उनकी भक्ति में तल्लीन होकर स्तुति करते हैं।
श्लोक 52 से 61 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 3)
भरत भगवान् की प्रभा को पुण्यरूप जल मानते हैं। उनकी दिव्यध्वनि मोह को नष्ट करती है। वे भगवान् को सर्वव्यापी, स्वयंभू, और क्षायिक गुणों से युक्त कहते हैं। उनका ज्ञान और दर्शन एक साथ कार्य करते हैं, जो आश्चर्यजनक है।
श्लोक 62 से 71 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 4)
भरत भगवान् के अनंत बल और सम्यक्चारित्र की प्रशंसा करते हैं। उनका सुख विषय-कषाय से मुक्त है। वे उनके जन्म के चमत्कारों का वर्णन करते हैं और उन्हें सर्वगत, सनातन कहते हैं। उनकी भक्ति से प्रेरित होकर भरत स्तुति करते हैं।
श्लोक 72 से 81 भरत की स्तुति समापन और तत्त्व प्रश्न
भरत भगवान् की भक्ति में अपनी अक्षमता स्वीकार करते हैं और उनकी कृपा माँगते हैं। स्तुति के बाद वे सभा में बैठते हैं और तत्त्वों के स्वरूप, मार्ग, और फल के बारे में प्रश्न करते हैं। भगवान् गंभीर वाणी से जवाब शुरू करते हैं।
श्लोक 82 से 91 भगवान् की दिव्यध्वनि और तत्त्व वर्णन
भगवान् की दिव्यध्वनि बिना प्रयत्न के प्रकट होती है। वे जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, और काल द्रव्यों का वर्णन करते हैं। तत्त्व को सम्यग्ज्ञान और मुक्ति का आधार बताते हुए इसके भेदों (दो, तीन, चार, पाँच, छह) का विवेचन करते हैं।
श्लोक 92 से 101 जीवतत्त्व का विस्तृत वर्णन
भगवान् जीव को चेतन, अनादि, ज्ञाता, और कर्ता बताते हैं। उसका स्वभाव ऊर्ध्वगमन और संकोच-विस्तार करना है। वे गति, इंद्रिय आदि मार्गणाओं और गुणस्थानों से जीव के अन्वेषण की व्याख्या करते हैं। ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग के भेद भी स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 102 से 111 जीवतत्त्व का उपयोग और पर्याय
भगवान् वृषभदेव बताते हैं कि ज्ञानोपयोग वस्तुओं को भेदपूर्वक ग्रहण करता है, इसलिए इसे साकार कहते हैं, जबकि दर्शनोपयोग सामान्य रूप से ग्रहण करता है, इसलिए यह अनाकार है। जीव को जीव, प्राणी, जंतु, क्षेत्रज्ञ, पुरुष, पुमान्, आत्मा, अंतरात्मा और ज्ञानी जैसे पर्यायवाची शब्दों से जाना जाता है। जीव का स्वरूप नित्य है, पर उसकी पर्यायें अनित्य हैं। यह उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त है। मिथ्यादृष्टि लोग इसके स्वरूप को गलत समझते हैं और विवाद करते हैं।
श्लोक 112 से 121 मिथ्यानय और मोक्ष के साधन
मिथ्यादृष्टि लोग आत्मा के अस्तित्व, नित्यता, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और मोक्ष को लेकर भिन्न-भिन्न मत रखते हैं। भगवान् भरत को इन मिथ्या नयों को छोड़कर सही जीवतत्त्व समझने को कहते हैं। जीव की दो अवस्थाएँ हैं: संसार और मोक्ष। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्ष के साधन हैं। इनमें से किसी एक की कमी से मोक्ष संभव नहीं है।
श्लोक 122 से 131 मोक्षमार्ग और तत्त्वों की शुद्धता
कुछ मूर्ख लोग केवल एक या दो साधनों से मोक्ष मानते हैं, पर यह गलत है। आप्त, आगम और पदार्थों में श्रद्धा से सम्यग्दर्शन शुद्ध होता है। आप्त वह है जो कर्मों से मुक्त और कृतकृत्य हो। आगम आप्त का वचन है। जीव के भव्य, अभव्य और मुक्त तीन भेद हैं। भव्य जीव सिद्धि प्राप्त कर सकता है, अभव्य नहीं। मुक्त जीव कर्मबंधन से मुक्त हैं।
श्लोक 132 से 141 अजीवतत्त्व का वर्णन
अजीवतत्त्व के पाँच भेद हैं: धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल। धर्म गति में और अधर्म स्थिति में सहायक है, पर ये स्वयं प्रेरक नहीं हैं। आकाश स्थान देता है और काल परिवर्तन का सहकारी कारण है। काल दो प्रकार का है: व्यवहारकाल और निश्चयकाल। व्यवहारकाल से निश्चयकाल का बोध होता है।
श्लोक 142 से 151 अजीव के गुण और पुद्गल के भेद
निश्चयकाल लोकाकाश में असंख्यात अणुओं से जाना जाता है और एकप्रदेशी होने से अनस्तिकाय है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल अमूर्तिक हैं, जबकि पुद्गल मूर्तिक है। पुद्गल में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श होते हैं। इसके स्कंध और परमाणु दो भेद हैं। परमाणु सूक्ष्म और नित्य हैं। पुद्गल के छह भेद हैं: सूक्ष्मसूक्ष्म, सूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, स्थूलसूक्ष्म, स्थूल और स्थूलस्थूल।
श्लोक 152 से 161 पुद्गल भेद और तत्त्व निरूपण
पानी आदि स्थूल और पृथिवी आदि स्थूलस्थूल हैं। जो इन तत्त्वों का सही श्रद्धान करता है, वह परब्रह्म अवस्था पाता है। भगवान् वृषभदेव भरत को चार पुरुषार्थ, मार्ग, फल, बंध, मोक्ष, लोकों का स्वरूप, स्वर्ग, और तीर्थंकरों के कल्याणकों का वर्णन करते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान के द्रव्यों का स्वरूप बताते हैं।
श्लोक 162 से 172 भरत और अन्य की प्रबुद्धता
तत्त्व सुनकर भरत आनंदित होते हैं और सम्यग्दर्शन व अणुव्रत ग्रहण करते हैं। वे गुरुदेव से प्रबुद्ध होकर शोभित होते हैं। सभा धर्मामृत से संतुष्ट होती है। वृषभसेन दीक्षा लेकर प्रथम गणधर बनते हैं। अन्य राजा और राजकन्याएँ भी दीक्षा लेते हैं।
श्लोक 173 से 181 गणधर और श्रावकों का उत्थान
वृषभसेन, सोमप्रभ, ब्राह्मी, सुंदरी आदि दीक्षा लेते हैं। श्रुतकीर्ति और प्रियव्रता श्रावक व्रत ग्रहण करते हैं। अनंतवीर्य मोक्ष के अग्रगामी बनते हैं। मरीचि को छोड़ अन्य तपस्वी पुनः दीक्षित होते हैं।
श्लोक 182 से 186 भरत का अयोध्यापुरी में प्रवेश
भगवान् की पूजा कर भरत बाहुबली आदि के साथ अयोध्या लौटते हैं। वे सूर्य के समान प्रभावशाली और विजयी प्रतीत होते हैं। अयोध्या जिनवाणी की तरह शोभित होती है, जिसमें पदार्थों का विस्तार, पवित्रता और आनंद भरा है।
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