आदिपुराण षोडशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 16 by Acharya Jinasena
भगवान वृषभदेव के यशस्वती से भरत सहित 99 पुत्र और ब्राह्मी पुत्री उत्पन्न हुईं। सुनंदा से बाहुबली और सुंदरी उत्पन्न हुए। बाहुबली का रूप अनुपम था, उनका ललाट चंद्रमा सा, मुख कमल सा, और वक्ष मरकतमणि सा था। उनके चरण लाल कमल से शोभायमान थे। वे स्त्रियों के हृदय में प्रवेश करते थे। सभी राजकुमार भरत जैसे थे, उनके शरीर सुगंधित, नेत्र कामदेव के अस्त्र से, और भुजाएँ कठोर थीं। उनके आभूषणों में यष्टि, हार, और रत्नावली थीं। हार 11 प्रकार के थे, जैसे विजयछंद और नक्षत्रमाला। ब्राह्मी और सुंदरी किशोरावस्था में भगवान के पास पहुँचीं। उनकी शोभा हंसी और चंद्रमा को लज्जित करती थी। भगवान ने उन्हें विद्या की महिमा बताई। उन्होंने ब्राह्मी को वर्णमाला और सुंदरी को गणित सिखाया। भगवान ने व्याकरण, छंद, और अलंकार का उपदेश दिया। पुत्रों को अर्थशास्त्र, नृत्य, और आयुर्वेद सिखाया। कल्पवृक्ष नष्ट होने से प्रजा व्याकुल हुई। भगवान ने छह कर्म और वर्ण व्यवस्था स्थापित की। इंद्र ने नगर और देश बनाए। भगवान का अभिषेक देवों ने किया। वे मुकुट, हार, और नुपूरों से शोभायमान हुए। प्रजा के लिए दंड और नियम बनाए। पुत्रों को राज्य सौंपकर वे इक्ष्वाकु कहलाए। उनका 63 लाख पूर्व का राज्यकाल सुखमय था। पुण्य और धर्म की महिमा से मोक्ष मार्ग प्रशस्त हुआ।
श्लोक 1 से 11 भगवान वृषभदेव के पुत्र-पुत्रियाँ
सर्वार्थसिद्धि के अहमिंद्र स्वर्ग से अवतीर्ण होकर भगवान वृषभदेव की यशस्वती देवी से पुत्र उत्पन्न हुए। वज्रनाभि में पीठ नामक भाई अब वृषभसेन, महापीठ अब अनंतविजय, विजय अब अनंतवीर्य, वैजयंत अब अच्युत, जयंत अब वीर, और अपराजित अब वरवीर हुए। यशस्वती से भरत सहित 99 चरमशरीरी और प्रतापी पुत्र हुए। भगवान ने यशस्वती से ब्राह्मी नामक पुत्री उत्पन्न की। आनंद पुरोहित का जीव सुनंदा से बाहुबली और अनुंधरी सुनंदा से सुंदरी नामक पुत्री हुई। सुंदरी और बाहुबली से सुनंदा शोभायमान हुई। बाहुबली 24 कामदेवों में प्रथम था, जिसका रूप अनुपम था। उसके काले केश कामदेव के कवच से शोभायमान थे।
श्लोक 12 से 21 बाहुबली का शारीरिक वर्णन (ऊपरी भाग)
बाहुबली का ललाट अष्टमी चंद्रमा सा विस्तृत था। कुंडलों से उसका मुख चकवा-चकवी युक्त कमल सा था। मंद हास्य और लक्ष्मी से उसका मुखरूपी सरोवर नेत्र-कमलों से शोभायमान था। विजयछंद हार से उसका वक्षःस्थल मरकतमणि पर्वत सा था। उसके कंधे द्वीप के छोटे पर्वत से थे। लंबी भुजाओं से उसका बाहुबली नाम सार्थक था। वह नाभिमंडल को कुलाचल के सरोवर सा धारण करता था। करधनी से उसका कटिप्रदेश सर्प से घिरे सुमेरु सा था। उसके ऊरु केले के खंभे से थे। उसकी जंघाएँ प्रतिमायोग के कारण सी थीं।
श्लोक 22 से 31 बाहुबली का अधोभाग और प्रभाव
बाहुबली के चरण लाल कमल से शोभायमान थे, कोमल, अंगुलियों से युक्त, और लक्ष्मी से सुशोभित थे। वह उदार और चरमशरीरी होकर भी मानिनी स्त्रियों के हृदय में प्रवेश करता था। स्त्रियाँ उसके रूप को स्वप्न में देखती थीं। वे उसे मनोभव, मदन आदि नामों से पुकारती थीं। कामदेव की किंवदंती युक्तिरहित थी, पर बाहुबली बल से जगत् संहार कर सकता था। सभी राजकुमार भरत जैसे थे। वे क्रमशः युवावस्था को प्राप्त हुए। उनका यौवन वसंत से वृक्षों सा था। वे मंदहास्य, लाल हाथ, और ऊँची भुजाओं से वृक्ष से थे। उनके केश सुगंध से भ्रमरों को आकर्षित करते थे।
श्लोक 32 से 41 राजकुमारों की शारीरिक शोभा
राजकुमारों के शरीर से सुगंध फैलती थी, जिससे भ्रमर व्याकुल होते थे। उनके कान मकर चिह्नित कुंडलों से शोभायमान थे। कामदेव ने उनके नेत्र-कमल और भौंह-धनुष से स्त्रियों को वश में किया। उनका शरीर दैदीप्यमान, मुख सुंदर, और नेत्र मधुर थे। उनकी भौंहें विलासी, ललाट प्रशंसनीय, और कपोल चंद्रमा को लज्जित करते थे। उनके ओठ अनुराग से लाल और स्वर मृदंग सा था। कंठ के मोती अक्षर से थे। उनका वक्षस्थल लक्ष्मी से, कंधे विजयलक्ष्मी से, और भुजाएँ कठोर थीं। उनकी नाभि शोभा की भूमि थी। उनका कटिप्रदेश कामदेव के तंबू सा था।
श्लोक 42 से 51 राजकुमारों का अधोभाग और आभूषण
राजकुमारों के ऊरु सुंदर और जंघाएँ कामदेव के तरकश से थीं। उनके पैर लाल कमलों को तिरस्कृत करते थे। उनकी शोभा उनके शरीर में ही थी। वे आभूषणों से फूलों से वन से शोभायमान थे। उनके पास यष्टि, हार, और रत्नावली जैसे आभूषण थे। यष्टि पाँच प्रकार की थी: शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक, प्रकांडक, और तरलप्रबंध। ये मणिमध्या और शुद्धा दो-दो प्रकार की थीं। मणिमध्या को सूत्र और रत्नावली भी कहते हैं। अंतर से गुँथी यष्टि अपवर्तिका थी।
श्लोक 52 से 61 हारों के प्रकार
शीर्षक में एक स्थूल मोती, उपशीर्षक में तीन क्रमिक मोती थे। प्रकांडक में पाँच मोती, अवघाटक में एक मणि और घटते मोती थे। तरलप्रबंध में एकसमान मोती थे। हार लड़ियों की संख्या से 11 प्रकार के थे। इंद्रच्छंद में 1008, विजयछंद में 504 लड़ियाँ थीं। 108 लड़ियों का हार, 81 का देवच्छंद था। 64 का अर्धहार, 54 का रश्मिकलाप, 32 का गुच्छ था। 27 का नक्षत्रमाला, 24 का अर्धगुच्छ, 20 का माणव, और 10 का अर्धमाणव था।
श्लोक 62 से 71 आभूषणों की विविधता
मणि लगाने पर हार माणव कहलाते थे। शीर्षक शुद्ध हार था, जो 11 भेदों में था। सभी हार 55 प्रकार के थे। अर्धमाणव में मणि से फलकहार, सोपान (3 फलक), और मणिसोपान (5 फलक) थे। भगवान ने पुत्रों के लिए ये आभूषण बनाए। राजकुमार इनसे ज्योतिषी देवों से शोभायमान थे। भरत सूर्य, बाहुबली चंद्रमा सा था। शेष पुत्र ग्रह-नक्षत्र से थे। ब्राह्मी दीप्ति, सुंदरी चाँदनी सी थी। भगवान मेरु सा शोभायमान थे।
श्लोक 72 से 81 ब्राह्मी और सुंदरी का आगमन
भगवान सिंहासन पर बैठे और कला-विद्या उपदेश में चित्त लगाया। ब्राह्मी और सुंदरी मांगलिक वेश में उनके पास पहुँची। वे किशोर अवस्था में स्तन-कुड्मलों से सुंदर थीं। वे बुद्धिमती, विनीत, और रूपवती थीं। उनकी चाल हंसी को तिरस्कृत करती थी। उनके नख दर्पण में प्रतिबिंब से दिक्कन्याओं को रौंदती सी थीं। नुपूरों से वे हंसियों को गति सिखाती सी थीं। उनके ऊरु और जंघाएँ कांति फेंकती सी थीं। उनका जघन भाग करधनी से सौभाग्य का घर सा था। उनकी नाभि होमकुंड सा थी।
श्लोक 82 से 93 ब्राह्मी और सुंदरी की शोभा
उनकी रोमराजी धूप की शिखा सी थी। उनका मध्यभाग कृश, भुजाएँ कोमल थीं। हार उनके स्तनों पर हँसता सा था। उनका कंठ सुंदर, स्वर कोयल सा, और मुख मंदहास्य से था। उनके दाँत, कटाक्ष, और नेत्र कामदेव के अस्त्र से थे। केशों से उनके कपोल चंद्रमा को लज्जित करते थे। उनका केशपाश यमुना सा था। उनकी कांति से आकृति सौंदर्य का समूह सी थी। लोग उन्हें दिव्य, नागकन्या, या लक्ष्मी मानते थे। वे भगवान को प्रणाम करने पहुँचीं।
श्लोक 94 से 101 भगवान का संबोधन
भगवान ने पुत्रियों को गोद में बैठाकर प्रेम से कहा कि देव अमरवन चले गए। उन्होंने कहा कि तुम शील और विनय से वृद्धा सी हो। विद्या से तुम्हारा जन्म सफल होगा। विद्या से सम्मान और यश मिलता है। विद्या कल्याणकारी, कामधेनु, और चिंतामणि है। यह बंधु, मित्र, और धन है।
श्लोक 102 से 111 विद्या का उपदेश
भगवान वृषभदेव ने पुत्रियों से कहा कि विद्या ग्रहण करो, क्योंकि यह इसके लिए उचित काल है। उन्होंने आशीर्वाद देकर श्रुतदेवता को सुवर्ण पट्ट पर स्थापित किया और वर्णमाला व संख्याओं का उपदेश दिया। ब्राह्मी ने अ से ह तक शुद्ध अक्षरावली और सुंदरी ने गणित शास्त्र धारण किया। वाङ्मय के बिना शास्त्र-कला नहीं होती, अतः भगवान ने पहले वाङ्मय सिखाया। दोनों कन्याओं ने दोषरहित वाङ्मय का अध्ययन किया। वाङ्मय में व्याकरण, छंद, और अलंकार शामिल हैं।
श्लोक 112 से 121 शास्त्रों का विस्तार
भगवान का व्याकरण शास्त्र सौ से अधिक अध्यायों वाला और गंभीर था। उन्होंने छंदशास्त्र के 26 भेदों का उपदेश दिया। प्रस्तार, नष्ट आदि छह प्रत्ययों का निरूपण किया। अलंकारों में उपमा, रूपक, यमक आदि और शब्दालंकार, अर्थालंकार व दश गुणों का वर्णन किया। ब्राह्मी और सुंदरी की विद्याएँ व्याकरण-ज्ञान से परिपक्व हुईं। वे सरस्वती के अवतार हेतु पात्र बनीं। भगवान ने भरत आदि पुत्रों को भी शास्त्र पढ़ाए। भरत को अर्थशास्त्र और नृत्यशास्त्र सिखाया।
श्लोक 122 से 131 पुत्रों को शास्त्र उपदेश
वृषभसेन को गंधर्व शास्त्र, अनंतविजय को चित्रकला, सूत्रधार और मकान निर्माण विद्या सिखाई। बाहुबली को कामनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद, और रत्नपरीक्षा आदि शास्त्र पढ़ाए। भगवान ने लोक उपकार हेतु सभी शास्त्र पुत्रों को सिखाए। उनकी विद्याएँ प्रकाशित होने से उनका तेज अद्भुत हुआ। पुत्रों से वे सूर्य किरणों सा शोभायमान थे। भोग भोगते हुए उनका 20 लाख पूर्व वर्षों का कुमारकाल पूर्ण हुआ।
श्लोक 132 से 141 कल्पवृक्षों का नाश और प्रजा की व्यथा
काल प्रभाव से औषधियाँ और बिना बोया धान्य विरल हो गया। कल्पवृक्ष रस-वीर्य रहित होने से प्रजा रोगग्रस्त हुई। व्याकुल प्रजा नाभिराज और फिर भगवान के पास गई। प्रजा ने कहा कि हे देव, कल्पवृक्ष नष्ट हो गए, धान्य नहीं फलते, भूख-प्यास और शीत-आतप से हम दुखी हैं। हे युगकर्ता, हमारी रक्षा के उपाय बताइए।
श्लोक 142 से 151 भगवान का चिंतन और समाधान
प्रजा के दीन वचन सुनकर भगवान ने सोचा कि विदेह क्षेत्र की स्थिति यहाँ लागू करनी चाहिए। असि, मषी आदि छह कर्म और क्षत्रिय आदि वर्ण यहाँ स्थापित हों। कल्पवृक्ष नष्ट होने से कर्मभूमि प्रकट हुई, अतः प्रजा को छह कर्मों से आजीविका करनी चाहिए। भगवान ने प्रजा को आश्वासन दिया। उनके स्मरण से इंद्र आया और प्रजा की जीविका के उपाय किए। इंद्र ने अयोध्या में जिनमंदिर और चार दिशाओं में मंदिर बनाए।
श्लोक 152 से 161 देशों और नगरों की रचना
इंद्र ने कौशल, अयोध्या आदि नगर, वन, और देशों की रचना की। सुकोशल, अवंती, कुरु आदि देश बनाए। कुछ देश नदी-वर्षा से सींचे गए। पृथ्वी स्वर्ग के टुकड़ों सी शोभायमान हुई। विजयार्ध से समुद्र तक देश जल और दुर्लभता से युक्त थे। सीमाओं पर अंतपाल किले बने। म्लेच्छ जातियाँ मध्य देशों की रक्षा करती थीं।
श्लोक 162 से 171 गाँव और नगरों का वर्णन
देशों में कोट, प्राकार से राजधानियाँ शोभायमान थीं। गाँव बाड़, शूद्र-किसानों, और तालाबों से युक्त थे। सौ घरों वाला छोटा, पाँच सौ वाला बड़ा गाँव था। छोटे गाँव की सीमा एक कोस, बड़े की दो कोस थी। नदी, पहाड़ आदि सीमा चिह्न थे। नगर बगीचे, तालाबों, और भवनों से युक्त था। नदी-पर्वत से घिरा नगर खेट, केवल पर्वत से घिरा खर्वट था।
श्लोक 172 से 182 नगरों और कर्मों की व्यवस्था
पाँच सौ गाँवों से घिरा नगर मडंब, समुद्र किनारे का पत्तन था। नदी किनारे का द्रोणमुख, धान्य ढेर वाला संवाह था। एक राजधानी में 800 गाँव थे। इंद्र ने नगर-गाँवों का विभाग कर पुरंदर नाम पाया। प्रजा को बसाकर वह स्वर्ग गया। भगवान ने असि, मषी, कृषि, विद्या, वाणिज्य, और शिल्प छह कर्मों का उपदेश दिया। असि शस्त्र सेवा, मषी लेखन, कृषि खेती थी।
श्लोक 183 से 192 वर्ण व्यवस्था और कृतयुग
भगवान ने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण बनाए। शास्त्र से जीविका करने वाले क्षत्रिय, खेती-व्यापार वाले वैश्य, सेवा करने वाले शूद्र थे। शूद्र कारु और अकारु थे। प्रजा अपने कर्म करती थी। भगवान की आज्ञा से कार्य होते थे। उन्होंने कर्मयुग शुरू कर कृतयुग कहलाया। आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा को प्रजापति बने। प्रजा सुखी हुई तो देवों ने उनका सम्राट अभिषेक किया।
श्लोक 193 से 208 राज्याभिषेक का वर्णन
देवों ने भगवान वृषभदेव का दिव्य जल से अभिषेक किया। संसार आनंद से भर गया, देव इंद्र के साथ अयोध्या आए। अयोध्या पताकाओं से सजाई गई। राजमंदिर में भेरियाँ बजीं, वारस्त्रियाँ मंगल गान गाईं, देवांगनाएँ नृत्य करने लगीं। बंदीजन पराक्रम पढ़ते थे, देव ‘जय जीव’ घोषणा करते थे। मिट्टी की वेदी पर रत्नों से आनंदमंडप बना। पुष्प, मणियाँ, और रेशमी चंदोवा शोभायमान थे। देवांगनाओं से मार्ग रुका, अप्सराएँ चमर ढोलीं। नुपूरों से दिशाएँ शब्दायमान हुईं। गंधर्व संगीत और किन्नर यश गाते थे। देवों ने सुवर्ण कलशों से अभिषेक शुरू किया।
श्लोक 209 से 221 अभिषेक के जल स्रोत
गंगा और सिंधु का हिमवत से गिरता जल लाया गया। गंगाकुंड और सिंधुकुंड का स्वच्छ जल आया। अन्य नदियों और सरोवरों का जल भी लाया गया। श्री-ह्री देवियाँ कमल-केसर युक्त जल लाईं। सुगंधित कमल और समुद्रों का जल आया। नंदीश्वर आदि का स्वच्छ जल सुवर्ण कलशों में लाया गया। भगवान का अभिषेक हुआ, उनका शरीर जल को पवित्र करता था। जल धारा राज्यलक्ष्मी सी शोभायमान थी। यह संताप नष्ट करती थी। इंद्र ने मनुष्यों के मन-शरीर को भी शुद्ध किया। देवांगनाओं के कटाक्ष जल में प्रतिबिंबित हुए।
श्लोक 222 से 231 अभिषेक की शोभा
पवित्र जल से पृथ्वी संतुष्ट सी बढ़ी। भगवान मेरु सा शोभायमान थे। नाभिराज आदि राजाओं ने अभिषेक किया। नगरवासियों ने सरयू जल से चरण धोए। व्यंतर इंद्रों ने प्रीतिपूर्वक पूजा की। तीर्थजल, कषाय जल, और सुगंधित जल से अभिषेक हुआ। भगवान ने गरम जल से स्नान किया। छोड़े गए माला-वस्त्र से पृथ्वी शोभायमान हुई। बंदीजन मंगल-पाठ पढ़ते थे। देवों ने स्वर्गीय माला-आभूषणों से अलंकृत किया।
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलंकरण
नाभिराज ने भगवान के मस्तक पर मुकुट रखा। पट्टबंध राज्यलक्ष्मी को स्थिर करता सा था। भगवान माला, कुंडल, हार, और करधनी से सुशोभित थे। उनका मुकुट लक्ष्मी का क्रीड़ाचल सा था। यज्ञोपवीत हिमवान् की गंगा सा था। भुजाएँ कड़ों से कल्पवृक्ष सी थीं। चरण नुपूरों से कमल से थे। वे भूषणांग कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। इंद्र ने आनंद नाटक कर स्वर्ग गया। देव-असुर अपने स्थानों को लौटे।
श्लोक 242 से 251 वर्ण और कर्म व्यवस्था
भगवान ने कर्मभूमि में प्रजा का पालन शुरू किया। प्रजा की सृष्टि, आजीविका, और मर्यादा के नियम बनाए। भुजाओं से क्षत्रिय, ऊरुओं से वैश्य, पैरों से शूद्र बनाए। भरत ब्राह्मणों की रचना करेंगे। विवाह व्यवस्था बनाई कि शूद्र केवल शूद्रकन्या से, वैश्य वैश्य-शूद्रकन्या से, क्षत्रिय क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रकन्या से, ब्राह्मण मुख्यतः ब्राह्मणकन्या से विवाह करें। अन्य वर्ण की आजीविका करने वाले को दंडित करने का नियम बनाया। छह कर्मों से कर्मभूमि कहलाई। हा, मा, धिक्कार दंड व्यवस्था बनाई। दुष्टों का निग्रह और सज्जनों का पालन शुरू हुआ।
श्लोक 252 से 261 राजा और दंड
दंडहीनता में मात्स्यन्याय होगा। दंड से प्रजा कुमार्ग से बचेगी। राजा को गाय से दूध दुहने सा कर वसूल करना चाहिए। भगवान ने हरि, अकंपन, काश्यप, सोमप्रभ को महामांडलिक राजा बनाया। सोमप्रभ कुरुराज, हरि हरिकांत, अकंपन श्रीधर, काश्यप मधवा बने। ये चार हजार राजाओं के अधिपति थे।
श्लोक 262 से 271 भगवान के नाम और राज्य
भगवान ने कच्छ आदि को अधिराज बनाया। पुत्रों को महल-संपत्ति दी। इक्षु रस संग्रह का उपदेश देकर इक्ष्वाकु कहलाए। सर्वार्थसिद्धि से आए, अतः गौतम कहलाए। तेज के रक्षक होने से काश्यप, मनन करने से मनु-कुलधर कहलाए। प्रजा उन्हें विधाता, विश्वकर्मा आदि नामों से पुकारती थी। उनका 63 लाख पूर्व का राज्यकाल पुत्र-पौत्रों के सुख में बीता। वे साम्राज्यलक्ष्मी का सुख लेते थे। इंद्र भोग सामग्री भेजता था। पुण्य से सुख मिलता है।
श्लोक 272 से 275 पुण्य और धर्म की महिमा
पुण्य से भोग, लक्ष्मी, आयु, रूप, समृद्धि, चक्रवर्ती पद, अरहंत पद, और निर्वाण मिलता है। धर्म स्वर्ग-मोक्ष के सुख देता है। दान, नमस्कार, शील, और उपवास से पुण्य मिलता है। भगवान स्थिर भोगों का अनुभव करते थे और पृथ्वी का शासन करते थे।
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