सरीरमेव पुव्व-कम्म-पागदाणमस्सयं कहिं सुहं कहिं दुहं कहिं मुदं य जम्मयं ।
सरीर-मेव कारणं भयस्स मारणस्स वा मदं तदो हि हेयमेव हेयमेव सव्वदा ॥11॥
खणे बलं खणे विभंगुरं खणे सरोगदं खणे सुसुंदरं खणे विरूवगं णिरामयं ।
खणे हि रागकारणं खणे य रोसकारणं सया समाणरूवदो ण दिस्सदे विचेट्ठिदं ॥12॥
सरीरभावणा वरा…
यह शरीर ही पूर्व कर्मों के फल का आश्रय है, जिससे हमें कभी सुख कभी दुःख मिलता है। यह शरीर कहीं मरता है, कहीं जन्मता है, इसीलिए यह सर्वदा हेय माना गया है। क्षण में यह बलवान, क्षण में भंगुर, क्षण में रोग देने वाला, क्षण में निरोगी, क्षण में अतिसुंदर, क्षण में विरुप, क्षण में ही राग का कारण व क्षण में ही रोष का कारण होता है। इस शरीर की चेष्टाऐं समान रूप से कभी दिखाई नही देती।
Sareer bhavna
This body is the vessel for the fruits of past karma, through which we experience both pleasure and pain. This body dies in one place and is born in another, and for this reason, it is always considered something to be discarded. In one moment, it is strong; in the next, fragile; in one moment, it brings illness; in the next, it is healthy. In one moment, it is exceedingly beautiful; in the next, deformed. In one moment, it is the cause of attachment; in the next, the cause of anger. The actions of this body never appear consistent.
Sareer bhavna reflects on the transient and unreliable nature of the body, highlighting its ever-changing state and the fleeting nature of physical existence
प्राकृत प्रशिक्षण शिविर जयपुर
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी के सानिध्य में 4 अक्टूबर से 6 अक्टूबर 2024 तक भट्टारक जी की नसियाँ जयपुर में प्राकृत जैन विद्या पाठशाला समिति (रजि.), रेवाडी (हरियाणा) द्वारा आयोजित प्राकृत प्रशिक्षण शिविर में 150 अभ्यर्थियों ने भाग लिया।
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