श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 42 to 53
श्लोक ( Shlok ) 42
कदम्बवृक्षमूलस्थः सोपवासोऽपराद्धके । माघज्योत्स्नाद्वितीयायां विशाखक्षैऽभवज्जिनः ॥ ४२ ॥
वहाँ उन्होंने कदम्ब वृक्षके नीचे बैठकर उपवासका नियम लिया और माघशुक्ल द्वितीयाके दिन सायकालके समय विशाखा नक्षत्रमें चार घातिया कर्मोंको नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त किया । अब वे जिनराज हो गये ॥ ४२ ॥
“There, seated beneath a Kadamba tree, He took a vow of fasting. On the evening of the second day of the bright half of the month of Magha (Magha-Shukla-Dwitiya), under the Vishakha constellation, He destroyed the four Ghatiya Karmas (destructive karmas) and attained Kevala-Jnana (infinite omniscience). He now became the Jin-Raja (the Sovereign Victor).”42
श्लोक ( Shlok ) 43
सौधर्ममुख्यदेवेन्द्रास्तदैवैनमपूजयन् । तत्कल्याणं न विस्तार्य नाम्नोऽन्त्यस्योदये यतः ॥ ४३ ॥
सौधर्म आदि इन्द्रोंने उसी समय आकर उनकी पूजा की। चूँकि भगवान्का वह दीक्षा-कल्याणक नाम कर्मके उदय से हुआ था अतः उसका विस्तारके साथ वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४३ ॥
“Immediately, Saudharma and the other Indras (lords of the celestial realms) arrived and performed His worship. Since the Lord’s Kevala-Jnana (omniscience) was attained through the fruition of His specific Kalyanaka-Nama-Karma, its grandeur and details are so vast that they cannot be described in full.”43
श्लोक ( Shlok ) 44 – 49
षट्षष्टिमितधर्मादिगणभृद्धृन्दवन्दितः । खद्वयद्वये कविज्ञात पूर्वपूर्वधरावृतः ॥ ४४ ॥खद्वयद्विनवाग्न्युक्तशिक्षकाभिष्टुतक्रमः । शून्यद्वयचतुःपञ्चप्रोक्तावधिबुधश्रितः ॥ ४५ ॥ शून्यत्रिकर्तुविख्यातश्रुतकेवलवीक्षणः । खचतुष्कैकनिर्णीतविक्रियद्धिविभूषितः ॥ ४६ ॥ षट्सहस्त्रचतुर्ज्ञानमानितक्रमपङ्कजः । खद्वयद्विचतुः प्रोक्तवादिसाधितमच्च्छूतिः ॥ ४७ ॥ शून्यत्रयद्विसप्तोक्तपिण्डिताखिलमण्डितः । शून्यत्रयर्तुशून्यैकसेनार्याद्यायिकादिष्टत् ॥ ४८ ॥ द्विलक्षश्रावकोपेतः श्राविकातुर्यलक्षकः । पूर्वोक्तदेवदेवीड्य स्तिर्यक्सङ्ख्यातसंस्तुतः ॥ ४९ ॥
वे धर्मको आदि लेकर छयासठ गणधरोंके समूहसे वन्दित थे, बारह सौ पूर्वधारियोंसे घिरे रहते थे, उनतालीस हजार दो सौ शिक्षक उनके चरणोंकी स्तुति करते थे, पाँच हजार चार सौ अवधिज्ञानी उनकी सेवा करते थे, छह हजार केवलज्ञानी उनके साथ थे, दश हजार विक्रिया ऋद्धिको धारण करनेवाले मुनि उनकी शोभा बढ़ा रहे थे, छह हजार मनःपर्ययज्ञानी उनके चरण-कमलोंका आदर करते थे और चार हजार दो सौ वादी उनकी उत्तम प्रसिद्धिको बढ़ा रहे थे। इस प्रकार सब मिलकर बहत्तर हजार मुनियोंसे वे सुशोभित थे, एक लाख छह हजार सेना आदि आर्यिकाओंको धारण करते थे, दो लाख श्रावकोंसे सहित थे, चार लाख श्राविकाओंसे युक्त थे, असंख्यात देव-देवियोंसे स्तुत्य थे और संख्यात तिर्यञ्चों से स्तुत थे ।॥ ४४-४९ ।।
“He was worshipped by a group of sixty-six Gandharas (chief disciples), led by Dharma. He was surrounded by one thousand two hundred Purvadhari scholars (masters of the ancient scriptures). Thirty-nine thousand two hundred teachers (Shikshaks) praised His feet, while five thousand four hundred sages possessing Avadhijnana (clairvoyance) served Him.
He was accompanied by six thousand Kevalis (omniscient beings). Ten thousand monks endowed with Vikriya-Riddhi (the supernatural power to transform their physical form) enhanced His glory. Six thousand sages possessing Manah-Paryayajnana (knowledge of others’ thoughts) honored His lotus feet, and four thousand two hundred Vadi (master debaters and orators) spread His noble fame.
In this manner, He was graced by a total of seventy-two thousand monks. His assembly further included one hundred and six thousand Aryikas (nuns) led by Sena, two hundred thousand Shravakas (laymen), and four hundred thousand Shravikayas (laywomen). He was praised by innumerable celestial beings (Devas and Devis) and a vast number of Tiryanchas (animals and birds).”44 – 49
श्लोक ( Shlok ) 50 – 53
स तैः सह विहृत्याखिलार्यक्षेत्राणि तर्पयन् । धर्मवृष्ट्या क्रमात्प्राप्य चम्पामब्दसहस्त्रकम् ॥ ५० ॥स्थित्वाऽत्र निष्क्रियं मासं नद्या राजतमालिका । सम्झायाश्चित्तहारिण्याः पर्यन्तावनिवर्तिनि ॥५१॥ अग्रमन्दरशैलस्य सानुस्थानविभूषणे । वने मनोहरोद्याने पल्यङ्कासनमाश्रितः ॥ ५२ ॥ मासे भाद्रपदे ज्योत्स्नाचतुर्दश्यापराह्नके । विशाखायां ययौ मुक्ति चतुर्णवतिसंयतैः ॥ ५३ ॥
भगवान् ने इन सबके साथ समस्त आर्यक्षेत्रोंमें विहार कर उन्हें धर्मवृष्टिसे संतृप्त किया और क्रम-क्रमसे चम्पा नगरीमें आकर एक हजार वर्ष तक रहे। जब आयुमें एक मास शेष रह गया तब योग-निरोधकर रजत-मालिका नामक नदीके किनारेकी भूमि पर वर्तमान, मन्द्रागिरिकी शिखरको सुशोभित करनेवाले मनोहरोद्यान में पर्यङ्कासनसे स्थित हुए तथा भाद्रपदशुक्ला चतुर्दशीके दिन सायंकालके समय विशाखा नक्षत्रमें चौरानवे मुनियोंके साथ मुक्तिको प्राप्त हुए ॥ ५०-५३ ॥
“Accompanied by all these followers, the Lord wandered through all the Aryakshetras (noble lands), saturating them with the ‘rain of Dharma’ (spiritual teachings). Eventually, He arrived in the city of Champa, where He remained for one thousand years.
When only one month of His life remained, He performed Yoga-nirodha (the final cessation of all mental, vocal, and physical activities). Seated in the Paryankasana (lotus posture) within the Manohara-Udyan—which adorns the peak of Mandragiri and is situated on the banks of the river Rajata-Malika—He attained Mukti (ultimate liberation/Moksha). This occurred on the evening of the fourteenth day of the bright half of the month of Bhadrapada (Bhadrapada-Shukla-Chaturdashi), under the Vishakha constellation, along with ninety-four other monks.”50 – 53
श्लोक 54 से 61
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