विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
स्तिमिततमसमाधिध्वस्तनिःशेषदोषं क्रमगमकरणान्तर्द्धानहीनावबोधम् । विमलममलमूर्ति कीर्तिभाजं शुभाजां नमत विमलताप्त्यै भक्तिभारेण भव्याः ॥ ६२ ॥
हे भव्य जीवो ! जिन्होंने अपनी अत्यन्त निश्चल समाधिके द्वारा समस्त दोषोंको नष्ट कर दिया है, जिनका ज्ञान क्रम, इन्द्रिय तथा मनसे रहित है, जिनका शरीर अत्यन्त निर्मल है और देव भी जिनकी कीर्तिका गान करते हैं ऐसे विमलवाहन भगवान्को निर्मलता प्राप्त करनेके लिए तुम सब बड़ी भक्तिसे नमस्कार करो ॥ ६२ ॥
O noble souls (Bhavya Jivas)! Lord Vimalavahana has destroyed all worldly flaws through his profoundly unwavering meditation (Samadhi); his knowledge is free from the limitations of sequence, the senses, and the mind; his form is exceedingly pure, and even the celestial beings sing his praises. To attain your own spiritual purity, bow before him with the utmost devotion. [62]
श्लोक ( Shlok ) 63
तीर्थे विमलनाथस्य सब्जातौ रामकेशवौ । धर्मस्वयम्भूनामानौ तयोश्चरितमुच्यते ॥ ६३ ॥
अथानन्तर श्री विमलनाथ भगवान्के तीर्थमें धर्म और स्वयंभू नामके बलभद्र तथा नारायण हुए इसलिए अब उनका चरित कहा जाता है ।॥ ६३ ॥
Thereafter, during the era of Lord Vimalanath, there lived the Balabhadra named Dharma and the Narayana named Svayambhu. Accordingly, their life stories are now being narrated. [63]
श्लोक ( Shlok ) 64
विदेहेऽस्मिन् प्रतीच्यासीन्मित्रनन्दीति भूभुजः । स्ववशीकृतनिःशेषनिजभोग्यमहीतलः ॥ ६४॥
इसी भरतक्षेत्रके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें एक मित्रनन्दी नामका राजा था, उसने अपने उपभोग करने योग्य समस्त पृथिवी अपने आधीन कर ली थी ।। ६४ ।।
In this very Bharat-kshetra, in the West Videha region, there was a king named Mitranandi. He had brought the entire earth, worthy of his enjoyment, under his complete sovereignty. [64]
श्लोक ( Shlok ) 65
प्रजानामेष रक्तत्वात् प्रजाश्चास्य प्रपालनात् । सर्वदा वृद्धयेऽभूवन् भवेत्स्वार्था परार्थता ॥ ६५ ॥
प्रजा इसके साथ प्रेम रखती थी इसलिए यह प्रजाकी वृद्धिके लिए था और यह प्रजाकी रक्षा करता था अतः प्रजा इसकी वृद्धिके लिए थी- राजा और प्रजा दोनों ही सदा एक दूसरेकी वृद्धि करते थे सो ठीक ही है क्योंकि परोपकारके भीतर स्वोपकार भी निहित रहता है ।। ६५ ।।
The subjects held great affection for him, and thus he was dedicated to the prosperity of the people. Conversely, as he protected the subjects, the people were dedicated to his own prosperity—the King and his subjects were constantly fostering each other’s growth. This is indeed fitting, for within the act of helping others, one’s own welfare is naturally inherent. [65]
श्लोक ( Shlok ) 66
स्वचक्रमिव तस्यासीत्परचक्रं च धीमतः । चक्रबुद्धेः स्वचक्रं च परचक्रमपक्रमात् ॥ ६६ ॥
उस बुद्धिमान्के लिए शत्रुकी सेना भी स्वसेनाके समान थी और जिसकी बुद्धि चक्रके समान फिरा करती थी- चंचल रहती थी उसके लिए क्रमका उल्लंघन होनेसे स्वसेना भी शत्रु-सेनाके समान हो जाती थी ।॥६६॥
For that wise ruler, even the enemy’s army was like his own (due to his influence and strategy); however, for one whose intellect wavered or remained restless like a spinning wheel—thereby violating the proper order of command—even his own army would become like an enemy force. [66]
श्लोक ( Shlok ) 67
अतृप्यदेष भूपालस्तर्पयित्वाऽखिलाः प्रजाः । परोपकारवृत्तीनां परतृप्तिः स्वतृप्तये ॥ ६७ ॥
यह राजा समस्त प्रजाको संतुष्ट करके ही स्वयं संतुष्ट होता था सो ठीक ही है क्योंकि परोपकार करनेवाले मनुष्योंके दूसरोंको संतुष्ट करनेसे ही अपना संतोष होता है ।॥ ६७ ॥
This king found his own satisfaction only after satisfying all his subjects. This is truly fitting, for those dedicated to the welfare of others derive their own contentment solely from the happiness of others. [67]
श्लोक ( Shlok ) 68
कदाचित्समासाद्य सुब्रतं जिनपुङ्गवम् । श्रुत्वा धर्म सुधीर्मत्वा स्वाङ्गभोगादि भंगुरम् ॥ ६८ ॥
किसी एक दिन वह बुद्धिमान् सुव्रत नामक जिनेन्द्रके पास पहुँचा और वहाँ धर्मका स्वरूप सुनकर अपने शरीर तथा भोगादिको नश्वर मानने लगा ।। ६८ ।।
One day, that wise man approached the Jinendra named Suvrata. After listening to the nature of Dharma from him, he began to realize the transient and perishable nature of his own body and worldly enjoyments. [68]
श्लोक ( Shlok ) 69
अङ्गिनो वत सीदन्ति सङ्गमादाहितांहसः । निःसङ्गतां न गच्छन्ति किं गतं न विदन्त्यमी ॥ ६९ ॥
वह सोचने लगा-बड़े दुःखकी बात है कि ये संसारके प्राणी परिग्रहके समागमसे ही पापोंका संचय करते हुए दुःखी हो रहे हैं फिर भी निष्परिग्रह अवस्थाको प्राप्त नहीं होते- सब परिग्रह छोड़ कर दिगम्बर नहीं होते । बड़ा आश्चर्य है कि ये सामनेकी बातको भी नहीं जानते ॥ ६९ ॥
He began to reflect: “It is a matter of great sorrow that the beings of this world, while accumulating sins through their attachment to worldly possessions (Parigraha), continue to suffer, yet they do not embrace the state of non-attachment. It is a great wonder that they do not renounce all possessions to become Digambara; they remain blind even to the truth standing right before them.” [69]
श्लोक ( Shlok ) 70
इति निविंद्य संसाराद् गृहीत्वा संयमं परम् । संन्यस्यागात् त्रयविशद्वाद्धिस्थितिरनुत्तरम् ॥ ७० ॥
इस प्रकार संसारसे विरक्त होकर उसने उत्कृष्ट संयम धारण कर लिया और अन्त समयमें संन्यास धारण कर अनुत्तर विमानमें तैंतीस सागरकी आयुवाला अहमिन्द्र हुआ ।। ७० ।।
Having thus become detached from the world, he embraced supreme self-restraint (Utkrisht Sanyam). At the end of his life, he took the vow of Sanyasa and was reborn in the Anuttara Vimana (the highest celestial vehicle) as an Ahmindra, with a lifespan of thirty-three Sagaras. [70]
श्लोक ( Shlok ) 71
ततो ‘द्वारवतीपुर्या सुतो भद्रमहीपतेः । सुभद्रायाश्च धर्माख्यः सोऽभूत्सुस्वप्नपूर्वकम् ॥ ७१ ॥
वहाँ से चयकर द्वारावती नगरीके राजा भद्रकी रानी सुभद्राके शुभ स्वप्न देखनेके बाद धर्म नामका पुत्र हुआ ।। ७१ ॥
Departing from that celestial realm, he was conceived by Queen Subhadra, the consort of King Bhadra of the city of Dvaravati. Following the sighting of auspicious dreams by the Queen, a son named Dharma was born. [71]
श्लोक 72 से 81
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