विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
अस्मिन् जन्मन्यमुं मन्ये मुनेरस्योपकारकम् । खगमेतत् कृतं सोढायन्मुक्तिमयमेयिवान् ॥ १४२ ॥
इस जन्ममें तो मैं इस विद्याधरको इन मुनिराजका उपकार करनेवाला मानता हूँ क्योंकि, इसके द्वारा किये हुए उपसर्गको सहकर ही ये मुक्तिको प्राप्त हुए हैं ।। १४२ ।।
“In this life, I actually consider this Vidyadhara to be a benefactor to the Muniraj; for it was only by enduring the ordeal inflicted by him that the Saint attained the ultimate state of Moksha.” [142]
श्लोक ( Shlok ) 143
आस्तां तावदिदं भद्र भद्रं निर्वृतिकारणम् । प्राक्तनस्यापकारस्य वद केन प्रतिक्रिया ॥ १४३ ॥
हे भद्र ! इस कल्याण करनेवाले मोक्षके कारणको जाने दीजिये। आप यह कहिये कि पूर्व-जन्ममें किये हुए अपकारका क्या प्रतिकार हो सकता है ? ।। १४३ ॥
“O noble one! Let go of this matter regarding the cause of his auspicious liberation. Tell me, is there truly any way to retaliate against an offense that was committed in a previous life?” [143]
श्लोक ( Shlok ) 144
इत्याकर्ण्य फणीन्द्रस्तत्कथ्यतां सा कथा मम । कथमित्यन्वयुक्तासावादित्याभं समुत्सुकाः ॥ १४४ ॥
यह सुनकर धरणन्द्रने उत्सुक होकर आदित्याभसे कहा कि वह कथा किस प्रकार है? आप मुझसे कहिये ।। १४४ ।।
Hearing this, Dharanendra became curious and said to Adityabha, “What is that story? Please, tell it to me.” [144]
श्लोक ( Shlok ) 145
शृणु वैरं विसृज्यास्मिन् बुद्धिमन् शुद्धचेतसा । तत्प्रपञ्चं वदामीति देवो विस्पष्टमभ्यधात् ॥ १४५ ॥
वह देव कहने लगा कि हे बुद्धिमान् ! इस विद्युदंष्ट्र पर वैर छोड़कर शुद्ध हृदयसे सुनो, मैं वह सब कथा विस्तारसे साफ-साफ कहता हूँ ।। १४५ ।।
The deity replied, “O wise one! Cast aside your enmity toward Vidyudanshtra and listen with a pure heart; I shall narrate that entire history to you clearly and in great detail.” [145]
श्लोक ( Shlok ) 146
द्वीपेऽस्मिन् भारते सिंहपुराधीशो महीपतिः । सिंहसेनः प्रिया तस्य रामदत्ताऽभवत्सती ॥ १४६ ॥
इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्रमें सिंहपुर नगरका स्वामी राजा सिंहसेन था उसकी रामदत्ता नामकी पतिव्रता रानी थी ।॥१४६॥
In the Bharatakshetra of this very Jambudvipa, there was a king named Simhasena, the ruler of the city of Simhapura. His queen was the devoted and virtuous Ramadatta. [146]
श्लोक ( Shlok ) 147
श्रीभूतिः सत्यघोषाको मन्त्री तस्य महीपतेः । श्रुतिस्मृतिपुराणादिशास्त्रविद् ब्राह्मणोत्तमः ॥ १४७ ॥
उस राजाका श्रीभूति नामका मंत्री था, वह श्रुति स्मृति तथा पुराण आदि शास्त्रोंका जानने वाला था, उत्तम ब्राह्मण था और अपने आपको सत्यघोष कहता था।।१४७॥
The king had a minister named Shribhuti, who was well-versed in the Shrutis, Smritis, Puranas, and other scriptures. He was a noble Brahman and used to refer to himself as Satyaghosha (one whose voice is truth). [147]
श्लोक ( Shlok ) 148 – 151
पद्मखण्डपुरे श्रेष्ठिसुदत्ताख्यसुमित्रयोः । भद्रमित्रः सुतो रत्नद्वीपे पुण्योदयात्स्वयम् ॥ १४८ ॥उपार्जितपरार्थोरुरत्नः सिंहपुरे स्थिरम् । तिष्ठासुर्मन्त्रिणं दृष्ट्वा सर्वमावेद्य तन्मतात् ॥ १४९ ॥तस्य हस्ते स्वरत्नानि स्थापयित्वा स बान्धवान् । आनेतुं पद्मखण्डाख्यं गत्वा तस्मान्निवर्त्य सः ॥१५०॥ पुनरभ्येत्य रत्नानि सत्यघोषमयाचत । सोऽपि तद्रत्नमोहेन न जानामीत्यपाद्भुत ॥ १५१ ॥
उसी देशके पद्मखण्डपुर नगरमें एक सुदत्त नामका सेठ रहता था। उसकी सुमित्रा स्त्रीसे मद्रमित्र नामका पुत्र हुआ उसने पुण्योदयसे रत्नद्वीपमें जाकर स्वयं बहुत से बड़े-बड़े रत्न कमाये। उन्हें लेकर वह सिंहपुर नगर आया और वर्दी स्थायी रूपसे रहनेकी इच्छा करने लगा। उसने श्रीभूति मंत्री से मिलकर सब बात कही और उसकी संमतिसे अपने रत्न उसके हाथमें रखकर अपने भाई-बन्धुओंको लेनेके लिए वह पद्मखण्ड नगर में गया। जब वहाँसे वापिस आया तब उसने सत्यघोषले अपने रत्न माँगे परन्तु रत्नोंके मोहमें पड़कर सत्यघोष बदल गया और कहने लगा कि मैं कुछ नहीं जानता ।। १४८-१५१ ।।
In the city of Padmakhandapura of that same country, there lived a merchant named Sudatta. He had a son named Madramitra, born of his wife Sumitra. Through the rise of his good fortune, Madramitra traveled to Ratnadvipa and personally acquired many large, precious gems.
Bringing them to the city of Simhapura, he desired to settle there permanently. He met with the minister Shribhuti, discussed everything, and—with the minister’s consent—entrusted the gems to him before departing for Padmakhanda to bring back his kinsmen. When he returned and asked Satyaghosha (Shribhuti) for his gems, the minister, overcome by greed for the jewels, changed his stance and claimed, “I know nothing of this.” [148–151]
श्लोक 152 से 161
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विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141
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