विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 243 to 252
श्लोक ( Shlok ) 243
यशोधरा तयो रत्नायुधः सूनुरजायत । एवमेते स्वपूर्वायफलमत्रापुरन्वहम् ॥ २४३ ॥
और यशोधरा आर्यिका स्वर्ग से चयकर इन दोनों- वज्रायुध और रत्नमालाके रत्नायुध नामका पुत्र हुई। इस प्रकारसे सब यहाँ प्रतिदिन अपने-अपने पूर्व पुण्यका फल प्राप्त करने लगे ।। २४३ ।।
“And the Aryika Yashodhara, descending from heaven, was born as the son named Ratnayudha to both Vajrayudha and Ratnamala. In this manner, everyone there began to receive the fruits of their respective past merits every day.” (243)
श्लोक ( Shlok ) 244
श्रुत्वाऽपराजितो धर्ममन्येद्युः पिहितास्त्रवात् । चक्रांयुधाय साम्राज्यं दत्वाऽदीक्षिष्ट धीरधीः ॥ २४४ ॥
किसी दिन धीरबुद्धिके धारक राजा अपराजितने पिहितास्त्रव मुनिसे धर्मोपदेश सुना और चक्रायुधके लिए राज्य देकर दीक्षा ले ली ॥ २४४ ॥
“One day, King Aparajita, the possessor of steady wisdom, listened to the religious discourses of Muni Pihitasrava; thereafter, he handed over the kingdom to Chakrayudha and accepted Initiation (Diksha).” (244)
श्लोक ( Shlok ) 245
वज्रायुधे समारोप्य राज्यं चक्रायुधो नृपः । प्राव्राजीत् स्वपितुः पार्श्वे स तज्जन्मनि मुक्तिभाक् ॥२४५॥
कुछ समय बाद राजा चक्रायुध भी वज्रायुध पर राज्यका भार रखकर अपने पिताके पास दीक्षित हो गये और उसी जन्ममें मोक्ष चले गये ।। २४५ ।।
“After some time, King Chakrayudha also entrusted the weight of the kingdom to Vajrayudha, received initiation from his father, and attained liberation (Moksha) in that very birth.” (245)
श्लोक ( Shlok ) 246
अधिरत्नायुधं राज्यं कृत्वा चक्रायुधान्तिके । वज्रायुधोऽप्यगाद्दीक्षां किं न कुर्वन्ति सात्त्विकाः ॥ २४६ ॥
अब वज्रायुधने भी राज्यका भार रत्नायुधके लिए सौंपकर चक्रायुधके समीप दीक्षा लेली सो ठीक ही है क्योंकि सत्त्वगुणके धारक क्या नहीं करते ? ॥ २४६ ॥
“Now, Vajrayudha also entrusted the burden of the kingdom to Ratnayudha and accepted initiation (Diksha) in the presence of Chakrayudha. This is indeed fitting, for what is impossible for those who possess the quality of purity (Sattvaguna)?” (246)
श्लोक ( Shlok ) 247 – 249
सक्तो रत्नायुधो भोगे त्यक्त्वा धर्मकथामपि । सोऽन्वभूदति गृध्नुत्वात्सुखानि चिरमन्यदा ॥ २४७ ॥मनोरममहोद्याने वज्रदन्तमहामुनि । व्यावर्ण्यमानलोकानुयोगश्रवणवृद्धधीः ॥ २४८ ॥पूर्वजन्मस्मृते में घविजयो योगधारणः । मांसादिकवलं” नादाद् ध्यायन् संसृतिदुःस्थितिम् ॥ २४९ ॥
रत्नायुध भोगोंमें आसक्त था। अतः धर्मकी कथा छोड़कर बड़ी लम्पटताके साथ वह चिरकाल तक राज्यके सुख भोगता रहा। किसी समय मनोरम नामके महोद्यानमें वज्रदन्त महामुनि लोकानुयोगका वर्णन कर रहे थे उसे सुनकर बड़ी बुद्धिवाले, राजाके मेघविजय नामक हाथीको अपने पूर्व भवका स्मरण हो आया जिससे उसने योग धारण कर लिया, मांसादि ग्रास लेना छोड़ दिया और संसारकी दुःखमय स्थितिका वह विचार करने लगा ॥ २४७-२४९ ॥
“Ratnayudha was deeply attached to worldly pleasures. Consequently, setting aside the discourses of Dharma, he continued to indulge in the luxuries of the kingdom with great licentiousness for a long time. At one time, in the magnificent garden named Manorama, the great sage Vajradanta was describing the Lokanuyoga (the science of the universe). Upon hearing this, the King’s elephant, named Meghavijaya—who possessed great intelligence—recalled his previous birth. As a result, he adopted the path of yoga, renounced the consumption of morsels such as meat, and began to contemplate the sorrowful state of the world.” (247–249)
श्लोक ( Shlok ) 250
राजाऽत्र व्याकुलीभूय मन्त्रिवैद्यवरान् स्वयम् । पप्रच्छ को विकारोऽस्य गजस्येत्याहितादरः ॥ २५० ॥
यह देख राजा घबड़ा गया, उसने बड़े बड़े मन्त्र-वादियों तथा वैद्योंको बुलाकर स्वयं ही बड़े आदरसे पूछा कि इस हाथीको क्या विकार हो गया है ? ।। २५० ।।
“Seeing this, the King became distressed. He summoned great masters of mantras and expert physicians, and with great respect, personally inquired: ‘What affliction has befallen this elephant?'” (250)
श्लोक ( Shlok ) 251 – 252
विचार्य ते त्रिदोषोत्थविकारानवलोकनात् । अनुमानादयं धर्मश्रुतेर्जातिस्मरोऽभवत् ॥ २५१ ॥इति सत्पात्रनिष्पन्नशुद्धाहारं घृतादिभिः । मिश्रितं न्यक्षिपत्क्षिप्तं तमभुङ्क्त द्विपोत्तमः ॥ २५२ ॥
उन्होंने जब वात, पित्त और कफसे उत्पन्न हुआ कोई विकार नहीं देखा तब अनुमानसे विचारकर कहा किधर्मश्रवण करनेसे इसे जाति-स्मरण हो गया है इसलिए उन्होंने किसी अच्छे बर्तनमें बना तथा घृत आदिसे मिला हुआ शुद्ध आहार उसके सामने रक्खा जिसे उस गजराजने खा लिया ।। २५१-२५२ ।।
श्लोक 253 से 262
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