श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102 – 104
“इत्यपायं विचिन्त्यैकं दुर्वाक्यं कलहप्रियम् । प्राहिणोत्सोऽपि तौ प्राप्य सहसैवाह दुर्मुखः ॥ १०२ ॥इत्यादिशति वां देवस्तारको मारको द्विषाम्। युष्मद्गृहे किलैकोऽस्ति ख्यातो गन्धगजो महान् ॥१०३॥आश्वसौ मे प्रहेतव्यो नो चेद्युष्मच्छिरोद्वयम् । खण्डीकृत्याहरिष्यामि गर्ज मज्जयसेनया ॥ १०४ ॥
इस प्रकार अपायका विचार कर उसने दुर्वचन कहनेवाला एक कलह-प्रेमी दूत भेजा और वह दुष्ट दूत भी सहसा उन दोनों भाइयोंके पास जाकर इस प्रकार कहने लगा कि शत्रुओंको मारनेवाले तारक महाराजने आज्ञा दी है कि तुम्हारे घरमें जो एक बड़ा भारी प्रसिद्ध गन्धहस्ती है वह हमारे लिए शीघ्र ही भेजो अन्यथा तुम दोनोंके शिर खण्डित कर अपनी विजयी सेनाके द्वारा उस हाथीको जबरदस्ती मँगा लूँगा ॥ १०२-१०४ ।।
Having thus devised a means of harm, he dispatched a quarrelsome messenger, one given to harsh and insolent speech. That wicked envoy hastened to the presence of the two brothers and declared:
“The mighty King Tāraka, destroyer of enemies, commands thus: ‘Send at once for my use that renowned and exceedingly noble Gandhahastī elephant which dwells in your household. Otherwise, after severing the heads of you both, I shall have that elephant brought forcibly by my victorious army.’” ॥ 102–104 ॥
श्लोक ( Shlok ) 105
इत्यसभ्यमसोढव्यं तेनोक्तं कलहार्थिना । श्रुत्वाऽचलोऽचलो वोच्वैधर्धीरोदात्तोऽब्रवीदिदम् ॥ १०५ ॥
इस प्रकार उस कलहकारी दूतके द्वारा कहे हुए असभ्य तथा सहन करनेके अयोग्य वचन सुनकर पर्वतके समान अचल, उदार तथा धीरोदात्त प्रकृतिके धारक अचल बलभद्र इस तरह कहने लगे ।। १०५ ।।
Hearing those uncouth and intolerable words spoken by that fomentor of discord, Acala Balabhadra—firm as a mountain, noble in spirit, and possessed of a lofty and magnanimous nature—spoke thus: ॥ 105 ॥
श्लोक ( Shlok ) 106
गजो नाम कियान् शीघ्रमेत्वसावेव सेनया । तस्मै ददामहेऽन्यच्च येनासौ स्वास्थ्यमाप्नुयात् ॥ १०६ ॥
कि हाथी क्या चीज है ? तारक महाराज ही अपनी सेनाके साथ शीघ्र आवें । हम उनके लिए वह हाथी तथा अन्य वस्तुएँ देंगे जिससे कि वे स्वस्थता-कुशलता (पक्ष में स्वः स्वर्गे तिष्ठ-तीति स्वस्थः ‘शर्परि खरि विसर्गलोपो वा वक्तव्यः’ इति वार्तिकेन सकारस्य लोपः । स्वस्थस्य भावः स्वास्थ्यम् ) मृत्युको प्राप्त कर सकेंगे ॥ १०६ ॥
“What indeed is this matter of an elephant? Let King Tāraka himself come swiftly, together with his army. We shall bestow upon him that elephant—and many other things besides—by means of which he shall attain ‘well-being,’ that is to say, the felicity of the next world through death.” ॥ 106 ॥
श्लोक ( Shlok ) 107
इत्यादि तेन गम्भीरमभ्युद्य स विसर्जितः । पवमान इव प्राप्य तत्कोपाग्निमदीपयत् ॥ १०७ ॥
इस प्रकार गम्भीर वचन कह कर अचल बलभद्रने उस दूतको विदा कर दिया और उसने भी जाकर हवाकी तरह उसकी कोपानिको प्रदीप्त कर दिया ।। १०७ ।।
Having spoken these grave words, Acala Balabhadra dismissed the messenger; and that envoy, returning, inflamed Tāraka’s blaze of wrath as though fanning fire with the wind. ॥ 107 ॥
श्लोक ( Shlok ) 108
तच्छ्रुत्वा सोऽपि कोपाग्निप्रदीप्तः पावकप्रभः । तौ पतङ्गायितावित्थं मत्क्रोधाग्नेरवोचताम् ॥ १०८ ॥
यह सुनकर कोपाग्निसे प्रदीप्त हुआ तारक अग्निके समान प्रज्वलित हो गया और कहने लगा कि इस प्रकार वे दोनों भाई मेरी क्रोधामिके पतंगे बन रहे हैं ॥ १०८ ॥
Hearing this, Tāraka, kindled by the fire of anger, blazed forth like a raging flame and exclaimed: “Thus are those two brothers becoming moths destined for the fire of my wrath!” ॥ 108 ॥
श्लोक ( Shlok ) 109
इत्यनालोच्य कार्याङ्ग सङ्गतः सचिवैः समम् । स्वयमभ्युत्थितं मत्वा प्रस्थितः प्राप्तुमन्तकम् ॥ १०९ ॥
उसने मंत्रियोंके साथ बैठकर किसी कार्यका विचार नहीं किया और अपने आपको सर्वशक्ति-सम्पन्न मान कर मृत्यु प्राप्त करनेके लिए प्रस्थान कर दिया ॥ १०९ ॥
He neither sat in counsel with his ministers nor deliberated upon the course of action; but, deeming himself possessed of absolute power, he set forth toward his own destruction. ॥ 109 ॥
श्लोक ( Shlok ) 110 – 111
दुर्णयाभिमुखो मूर्खश्चालयित्वाऽखिलामिलाम् । षडङ्गेन बलेनासौ प्राप्य तावुदयोन्मुखौ ॥ ११० ॥समुल्लङ्घितमर्यादः कालान्तजलधि जयन् । अरुणहारुणस्तूर्ण पुरं स्वबलवेलया ॥ १११ ॥
अन्याय करनेके सम्मुख हुआ वह मूर्ख षडङ्ग सेनासे समस्त पृथिवीको कँपाता हुआ उदय होनेके सम्मुख हुए उन दोनों भाइयोंके पास जा पहुँचा। उसने सब मर्यादाका उलंघन कर दिया था इसलिए प्रलयकालके समुद्रको भी जीत रहा था। इस प्रकार अतिशय दुष्ट तारकने शीघ्र ही जाकर अपनी सेनारूपी वेला (ज्वारभाटा) के द्वारा अचल और द्विपृष्ठके नगरको घेर लिया ।। ११०-१११ ।।
That foolish Tāraka, bent upon unrighteous aggression, advanced with his sixfold army, causing the whole earth to tremble, and approached those two brothers whose glory was rising ever higher. Having transgressed every limit of propriety, he seemed even to surpass the ocean at the time of cosmic dissolution. Thus did the exceedingly wicked Tāraka swiftly surround the city of Acala and Dviṣpṛṣṭha with the swelling tide of his vast army. ॥ 110–111 ॥
श्लोक 112 से 121
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