चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
मत्त्वेति ताभ्यो दत्त्वेष्टं स्वाप्तैः कतिपयैर्वृतः । महादेवीगृहं गत्वा द्विगुणीभूतसम्मदः ॥ ६२ ॥
ऐसा मान कर राजाने उन दासियोंके लियेइच्छित पुरस्कार दिया और द्विगुणित आनन्दित होता हुआ कुछ आप्त जनों के साथ वह रानीके घर गया ।। ६२ ।।
“With these thoughts in mind, the King granted the desired rewards to those handmaidens [who brought the news]. Then, with his joy doubled, he proceeded to the Queen’s chambers accompanied by a few of his most trusted confidants.” || 62 ||
श्लोक ( Shlok ) 63
सापि दृष्ट्वा महीनाथमभ्युत्थातुं कृतोद्यमा । तथैव देवि तिष्ठेति स्थिता राज्ञा निवारिता ॥ ६४ ॥
वहाँ उसने नेत्रोंको सुख देनेवाली रानीको ऐसा देखा मानो मेघसे युक्त आकाश ही हो, अथवा रत्नगर्भा पृथिवी हो अथवा उदय होनेके समीपवर्ती सूर्यसे युक्त पूर्व दिशा ही हो ।। ६३ ।।
“There, he beheld the Queen—so pleasing to the eyes—looking as if she were the sky adorned with a cloud, or the earth holding precious gems within its womb, or like the Eastern horizon just as the sun is about to rise.” || 63 ||
श्लोक ( Shlok ) 64
सापि दृष्ट्वा महीनाथमभ्युत्थातुं कृतोद्यमा । तथैव देवि तिष्ठेति स्थिता राज्ञा निवारिता ॥ ६४ ॥
राजाको देखकर रानी खड़ी होनेकी चेष्टा करने लगी परन्तु ‘हे देवि, बैठी रहो’ इस प्रकार राजाके मना किये जाने पर बैठी रही ।। ६४ ।।
“Upon seeing the King, the Queen attempted to stand up [to show respect], but when the King forbade her, saying, ‘O Devi, please remain seated,’ she stayed as she was.” || 64 ||
श्लोक ( Shlok ) 65
नृपस्तयैकशय्यायामु पविश्य चिरं मुदा । सलज्जया सहालाप्य ययौ तदुचितोक्तिभिः ॥ ६५ ॥
राजा एक ही शय्या पर चिरकाल तक रानीके साथ बैठा रहा और लज्जा सहित रानीके साथ योग्य वार्तालाप कर हर्षित होता हुआ वापिस चला गया ।। ६५ ।।
“The King remained seated with the Queen on the same couch for a long time. After engaging in fitting conversation with the Queen—who was filled with modest grace—he returned to his own quarters, his heart brimming with delight.” || 65 ||
श्लोक ( Shlok ) 66 – 67
दिनेषु केषुचित्पश्चाद्यातेषु प्रकटीभवत् । प्राक् पुण्याद् गुरुशुक्रादिशुभग्रहनिरीक्षणात् ॥ ६६ ॥हरेर्हरिदिवादित्यं सस्यपाकं यथा शरत् । महोदयमिवाख्यातिरसूत सूतमुत्तमम् ॥ ६७ ॥
तदनन्तर कितने ही दिन व्यतीत हो जाने पर पुण्य कर्मके उदयसे अथवा गुरु शुक्र आदि शुभ ग्रहों के विद्यमान रहते हुए उसने जिस प्रकार इन्द्रकी दिशा (प्राची) सूर्यको उत्पन्न करती है, शरद ऋतु पके हुए धानको उत्पन्न करती है और कीर्ति महोदयको उत्पन्न करती है उसी प्रकार रानीने उत्तम पुत्र उत्पन्न किया ॥ ६६-६७ ।।
Thereafter, when several days had passed—through the rising of meritorious karma and under the auspicious influence of the benevolent planets such as Jupiter (Guru) and Venus (Shukra)—the Queen gave birth to an illustrious son.
She brought him forth just as the Direction of Indra (the East) gives birth to the Sun, as the Autumn season produces the ripened grain, and as fame gives rise to great prosperity.66 – 67
श्लोक ( Shlok ) 68
प्रवर्द्धमानभाग्यस्य योग्यस्य सकलश्रियः । श्रीवर्मेति शुभं नाम तस्य बन्धुजनो व्यधात् ॥ ६८ ॥
जिसका भाग्य बढ़ रहा है और जो सम्पूर्ण लक्ष्मी पानेके योग्य है ऐसे उस पुत्रका बन्धुजनोंने ‘श्रीवर्मा’ यह शुभ नाम रक्खा ।। ६८ ।।
Because his fortune was ever-increasing and he was worthy of possessing all forms of prosperity (Lakshmi), his kinsmen gave that son the auspicious name “Shrivarma.” || 68 ||
श्लोक ( Shlok ) 69
प्रबोधो मूर्छितस्येव दुर्विधस्येव वा निधिः । जयो वात्यल्पसैन्यस्य राज्ञस्तोषं चकार सः ॥ ६९ ॥
जिस प्रकार मूर्च्छितको सचेत होनेसे संतोष होता है, दरिद्रको खजाना मिलनेसे संतोष होता है और थोड़ी सेनावाले राजाको विजय मिलनेप्ते संतोष होता है उसी प्रकार उस पुत्र-जन्मसे राजाको संतोष हुआ था ॥ ६ ९ ॥
The King experienced the same profound satisfaction from the birth of his son as a fainting person feels upon regaining consciousness, as a pauper feels upon discovering a hidden treasure, or as a King with a small army feels upon achieving a magnificent victory. || 69 ||
श्लोक ( Shlok ) 70
तस्याङ्गन्तेजसा रत्नदीपिका विहतत्विषः । विभावर्या सभास्थाने नैरर्थक्यं प्रपेदिरे ॥ ७० ॥
उस पुत्रके शरीरके तेजसे जिनकी कान्ति नष्ट हो गई है ऐसे रत्नोंके दीपक रात्रिके समय सभा-भवनमें निरर्थक हो गये थे ।। ७० ।।
In the assembly hall at night, the gem-encrusted lamps became utterly useless; their brilliance was completely eclipsed (dimmed) by the overwhelming radiance emanating from the body of that son. || 70 ||
श्लोक ( Shlok ) 71
शरीरवृद्धिस्तस्यासीद् भिषक्शास्त्रोक्तवृत्तितः । ‘शब्दशास्त्रादिभिः प्रज्ञावृद्धिः सुविहितक्रियाः ॥ ७१ ॥
उसके शरीरकी वृद्धि वैद्यक शास्त्रमें कही हुई विधिके अनुसार होती थी और अच्छी क्रियाओंको करनेवाली बुद्धिकी वृद्धि व्याकरण आदि शास्त्रोंके अनुसार हुई थी ।। ७१ ॥
“His physical growth proceeded according to the principles prescribed in the science of medicine (Ayurveda), while his intellect—which manifested in noble actions—expanded in accordance with the study of Grammar and other classical scriptures.” || 71 ||
श्लोक 72 से 81
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