पद्मनन्दि पंचविंशतिका इस ग्रन्थनामसे ही सूचित होता है कि प्रस्तुत ग्रन्थमें श्रीमुनि पद्मनन्दीके द्वारा रचित पच्चीस विषय समाविष्ट हैं, जो इस प्रकार हैं-
१. धर्मोपदेशामृत
श्लोक 1 -7 | श्लोक 8 -13 | श्लोक 14 | श्लोक 15-16 | श्लोक 17-18
इस अधिकारमें १९८ श्लोक हैं। संसार की आपाधापी में हम अक्सर शरीर और भौतिक वस्तुओं को ही अपना मान बैठते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आत्मा इस शरीर को छोड़कर परलोक की लंबी यात्रा पर निकलती है, तब उसके पास संबल क्या होता है? आचार्य श्री मुनि पद्मनन्दी जी ने अपने अमर ग्रंथ ‘पद्मनन्दि-पञ्चविंशतिका’ के प्रथम अधिकार ‘धर्मोपदेशामृत’ में इसी प्रश्न का समाधान दिया है।
१. धर्म का सच्चा वक्ता कौन? (प्रमाणिकता की कसौटी)
आचार्य स्पष्ट करते हैं कि धर्म का उपदेश केवल वही दे सकता है जो सर्वज्ञ और वीतराग हो। संसार में झूठ के केवल दो ही मूल कारण हैं:
- अज्ञानता: विषय का पूर्ण ज्ञान न होना।
- कषाय: क्रोध, मान, माया या लोभ के वशीभूत होना।
चूँकि सर्वज्ञ देव इन दोनों दोषों से मुक्त हैं, इसलिए उनकी वाणी ही निर्बाध सुख देने वाले धर्म का वास्तविक प्रमाण है (श्लोक ६)।
२. धर्म: परलोक का ‘पाथेय’
जैसे एक देश से दूसरे देश जाते समय यात्री अपने साथ ‘पाथेय’ (मार्ग में खाने की सामग्री) रखता है ताकि यात्रा सुखद हो, वैसे ही इस लोक से परलोक की लंबी यात्रा का पाथेय ‘धर्म’ है। बिना धर्म के यह यात्रा अत्यंत कष्टकारी हो जाती है।
३. धर्म के दो रूप: व्यवहार और निश्चय
आचार्य ने धर्म को दो दृष्टियों से समझाया है:
| धर्म का स्वरूप | आधार और कार्य | फल |
| व्यवहार धर्म | जीवदया, रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र), १० धर्म। | दुर्गति से रक्षा, मनुष्य एवं देव गति के सुख। |
| निश्चय धर्म | समस्त संकल्प-विकल्पों से रहित शुद्ध आत्म-परिणति। | अजर-अमर पद, शाश्वत और निराकुल मोक्ष सुख। |
महत्वपूर्ण नोट: व्यवहार धर्म केवल तब तक उपादेय (स्वीकार्य) है जब तक वह निश्चय धर्म का साधक बने। यदि कोई केवल सांसारिक सुखों के लिए इसे करता है, तो वह मोक्ष का मार्ग नहीं है।
४. जीवदया: मोक्ष की नसैनी
आचार्य ने जीवदया को धर्म-वृक्ष की जड़ और मोक्ष-महल की नसैनी (सीढ़ी) कहा है (श्लोक ८)। संसार में ‘जीवितदान’ (प्राणों की रक्षा) को सबसे बड़ा दान माना गया है। श्लोक १० के अनुसार, एक रोगी व्यक्ति भी सोने-चाँदी के प्रलोभन के आगे अपने जीवन को ही प्रिय मानता है। अतः दया के बिना तप और त्याग निरर्थक हैं।
५. गृहस्थ और मुनि: एक-दूसरे के पूरक
यद्यपि मुनि धर्म श्रेष्ठ है, पर गृहस्थ धर्म (गृहिधर्म) भी अत्यंत आवश्यक है। क्यों?
- मुनि रत्नत्रय के धारक होते हैं।
- उनके शरीर की स्थिति गृहस्थों द्वारा दिए गए भक्तिपूर्ण आहार पर निर्भर है।
- जो गृहस्थ अपने छह आवश्यकों का पालन करते हुए मुनियों की सेवा करता है, उसी का जीवन प्रशंसनीय है। इसके विपरीत, केवल धन अर्जन और भोगों में मस्त रहना जीवन को बंधन बनाना है (श्लोक १३)।
6. श्रावक धर्म: ११ प्रतिमाएँ और ७ व्यसन त्याग
गृहस्थ जीवन (श्रावक धर्म) की नींव ७ व्यसनों के त्याग पर टिकी है। आचार्य स्पष्ट करते हैं कि बिना व्यसन छोड़े व्रत टिक नहीं सकते। व्यसन वे मार्ग हैं जो मनुष्य को कल्याण से हटाकर अकल्याण में धकेल देते हैं।
- उदाहरण: जुए (द्यूत) के व्यसन में फँसकर युधिष्ठिर आदि को जो कष्ट झेलने पड़े, वे इतिहास में प्रमाण हैं।
- ११ प्रतिमाएँ: इन व्यसनों के त्याग के उपरांत ही श्रावक ‘दर्शन’ और ‘व्रत’ आदि के माध्यम से ११ सीढ़ियों (प्रतिमाओं) पर चढ़ता है।
7. देशचारित्र बनाम सकलचारित्र
ग्रन्थ में पाँच पापों (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह) के त्याग की सीमा के आधार पर दो भेद किए गए हैं:
- देशचारित्र: जहाँ गृहस्थ इन पापों का त्याग आंशिक (एकदेश) रूप से करता है।
- सकलचारित्र: जहाँ मुनि इन पापों का पूर्ण रूप से त्याग करते हैं।
8. मुनि के २८ मूलगुण: साधना का आधार
मुनि धर्म में २८ मूलगुणों का पालन अनिवार्य है। आचार्य एक अद्भुत उदाहरण देते हैं (श्लोक ४०)—”जो मुनि मूलगुणों को छोड़कर केवल उत्तरगुणों के पालन में लगा है, वह उस मूर्ख के समान है जो शत्रु से अपना सिर बचाने के बजाय केवल अंगुली बचाने का प्रयास कर रहा है।”
प्रमुख मूलगुणों का स्वरूप:
- दिगम्बरत्व (अचेलकत्व): वस्त्र का त्याग केवल परंपरा नहीं, बल्कि संयम की आवश्यकता है। वस्त्र होने पर उसे धोने का आरम्भ (हिंसा), फटने पर व्याकुलता (परिग्रह) और छिन जाने पर क्रोध उत्पन्न होता है।
- केशलोच, स्थितिभोजन (खड़े होकर भोजन), भूमि शयन और समता।
9. रत्नत्रय: व्यवहार और निश्चय दृष्टि
मोक्ष का मार्ग ‘रत्नत्रय’ (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र) है, जिसे आचार्य ने दो स्तरों पर समझाया है:
| स्वरूप | सम्यग्दर्शन | सम्यग्ज्ञान | सम्यक्चारित्र |
| व्यवहार | देव-शास्त्र-गुरु पर श्रद्धान | स्व-पर का संशय रहित ज्ञान | कर्मास्रव से विरति |
| निश्चय | निर्मल आत्म-ज्योति का निर्णय | आत्मा का ही बोध | आत्मा में ही स्थित होना |
विशेष: व्यवहार रत्नत्रय पुण्य-पाप के बंध का कारण है, जबकि निश्चय रत्नत्रय कर्मों को निर्मूल कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है (श्लोक ८१)।
10. साधु की महिमा और श्रावक का कर्तव्य
आचार्य कहते हैं कि यद्यपि आज प्रत्यक्ष ‘केवलज्ञानी’ मौजूद नहीं हैं, किंतु उनकी वाणी (जिनागम) और उसके रक्षक ‘साधु’ आज भी हमारे बीच हैं।
- साधु जहाँ पैर रखते हैं, वह भूमि तीर्थ बन जाती है।
- उनकी भक्ति साक्षात् जिनेन्द्र देव की पूजा के समान है।
- मुनि की उपासना श्रावक का अनिवार्य कर्तव्य है, क्योंकि वे ही मोक्षमार्ग के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
11. आत्मा के प्रति विभिन्न मत और यथार्थ
आचार्य ने आत्मा के संबंध में फैले भ्रमों का संक्षेप में विवेचन किया है (श्लोक १३४-१३९):
- चार्वाक: इसे पंचभूतों से उत्पन्न जड़ मानते हैं।
- सांख्य: इसे केवल अकर्ता (भोक्ता) मानते हैं।
- बौद्ध (सौत्रान्तिक): इसे क्षणिक मानते हैं।
- वैशेषिक: इसे नित्य और व्यापक मानते हैं।
आचार्य इन मतों का खंडन कर आत्मा के यथार्थ स्वरूप (ज्ञाता-दृष्टा और स्व-संवेदन गोचर) को जानने पर बल देते हैं।
12. मनुष्य पर्याय: ‘अन्धक-वर्तकीय न्याय’
आचार्य कहते हैं कि करोड़ों कल्प बीतने के बाद बड़ी मुश्किल से हमें यह मनुष्य देह मिली है। इसे ‘अन्धक-वर्तकीय न्याय’ (अंधे के हाथ में अचानक बटेर लग जाना – एक दुर्लभ संयोग) कहा गया है।
- यदि इसे पाकर भी हम विषयों में मुग्ध रहे, तो यह अनमोल अवसर नष्ट हो जाएगा।
- उत्तम कुल, बुद्धि और चतुरता मिलना और भी दुर्लभ है। जो इन सबको पाकर धर्म की आराधना नहीं करता, वह उस मूर्ख के समान है जिसने हाथ में आए चिंतामणि रत्न को कचरा समझकर फेंक दिया।
13. मृत्यु का कोई कैलेंडर नहीं होता
अक्सर हम धर्म को ‘रिटायरमेंट’ के लिए टाल देते हैं। हम सोचते हैं—”अभी तो युवा हैं, धन है, शरीर पुष्ट है, धर्म बाद में करेंगे।”
आचार्य चेतावनी देते हैं (श्लोक १६७-१७०): “मृत्यु किस समय ग्रास बना लेगी, इसका कोई नियम नहीं है।” बुद्धिमान वही है जो अनिश्चित काल की प्रतीक्षा न कर, आज ही आत्म-हित में लग जाए।
14. आभासी सुख बनाम वास्तविक सुख
संसार में हर प्राणी सुख चाहता है, पर उसे मिलता क्यों नहीं? कारण है—अविवेक।
- आभासी सुख: सातावेदनीय कर्म के उदय से कुछ समय के लिए इंद्रिय तृप्ति होना। चूँकि संयोग स्थायी नहीं है, इसलिए वियोग होते ही पुनः संताप (दुःख) होता है।
- वास्तविक सुख: जो आकुलता के अभाव में है। यह केवल मोक्ष में ही संभव है, जहाँ आत्मा अनन्त काल तक निराकुल और बाधारहित शाश्वत सुख का अनुभव करती है (श्लोक १०९)।
15. उत्तम क्षमा और दस धर्म
तपस्वियों के लिए आचार्य का विशेष निर्देश है कि अज्ञानी जनों द्वारा पहुँचाई गई बाधाओं को शांति से सहन करें। यही ‘उत्तम क्षमा’ है। ये दस धर्म (क्षमा, मार्दव, आर्जव आदि) ही संवर (कर्मों को रोकने) के वास्तविक कारण हैं।
16. उपसंहार: धर्म की महिमा
अधिकार के अंत में (श्लोक १७९-१९८) आचार्य ने धर्म की महिमा का गान किया है। वर्तमान काल में बुद्धि की कमी के कारण यदि कोई समस्त शास्त्रों का अभ्यास न कर सके, तो भी उसे ‘श्रुत’ (आगम) के उस भाग का अभ्यास अवश्य करना चाहिए जो मुक्ति का साधक हो।
२. दानोपदेशन : गृहस्थ के पापों का प्रक्षालन और लक्ष्मी का बीज
इस अधिकारमें ५४ श्लोक हैं। श्रावक जीवन में धन का अर्जन अपरिहार्य है, लेकिन इस अर्जन के साथ अनजाने में कई पाप भी जुड़ जाते हैं। आचार्य पद्मनन्दी ने ‘दानोपदेशन’ (५४ श्लोक) अधिकार में बताया है कि दान केवल परोपकार नहीं, बल्कि स्वयं की आत्मा को शुद्ध करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
१. दान: पाप-मल को धोने वाला जल
आचार्य एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण देते हैं—जिस प्रकार पानी कपड़े पर लगे रक्त या गंदगी को धोकर उसे स्वच्छ कर देता है, वैसे ही सत्पात्र दान श्रावक द्वारा कृषि, व्यापार और वाणिज्य में किए गए अनिवार्य पापों (हिंसा आदि) को धो देता है (श्लोक ५-७, १३)। यह श्रावक के छह आवश्यक कर्तव्यों में सर्वप्रमुख है।
२. वट-वृक्ष का उदाहरण: दान का फल
दान देने से लक्ष्मी घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है। आचार्य इसे एक बीज के माध्यम से समझाते हैं:
- यदि एक छोटा-सा वट का बीज उपजाऊ भूमि में बोया जाए, तो वह विशाल वृक्ष बनकर हजारों नए बीज और शीतल छाया प्रदान करता है।
- इसी प्रकार, सुपात्र को दिया गया थोड़ा-सा दान भी भविष्य में कई गुना होकर वैभव और शांति के रूप में वापस लौटता है (श्लोक ८, १४, ३८)।
३. दाता और पात्र की उन्नति
आचार्य ने दान देने वाले गृहस्थ की तुलना एक राजमिस्त्री (राज) से की है। जैसे राजमिस्त्री ऊँचा भवन बनाते समय स्वयं भी क्रमशः ऊँची सीढ़ियों पर चढ़ता जाता है, वैसे ही मुमुक्षु साधुओं को आहारादि दान देने वाला श्रावक, साधु को रत्नत्रय में स्थित करने के साथ-साथ स्वयं भी ऊँचे पद (स्वर्ग या मोक्ष) की ओर अग्रसर होता है (श्लोक ९)।
४. धनवान कौन: स्वामी या सेवक?
आचार्य ने धन के मोह में फंसे व्यक्ति पर तीखा कटाक्ष किया है:
- जो संपन्न होकर भी दान नहीं देता, वह धन का स्वामी नहीं बल्कि उस कोषाध्यक्ष (खजांची) के समान है जो दूसरों के धन की रक्षा तो करता है, पर स्वयं एक पैसे का उपभोग या सदुपयोग नहीं कर सकता (श्लोक ३६)।
- ऐसे व्यक्ति का धन संचय व्यर्थ है। उसकी तुलना में वह कौआ भी श्रेष्ठ है जो भोजन मिलने पर काँव-काँव करके अपने साथियों को बुलाता है और मिल-बाँटकर खाता है (श्लोक ४५-४६)।
५. पात्रों का वर्गीकरण
अधिकार के अंत में दान के प्रभाव को समझने के लिए पात्रों का भेद बताया गया है (श्लोक ४८-४९):
- उत्तम पात्र: रत्नत्रय के धारी दिगंबर मुनि।
- मध्यम पात्र: देशव्रती श्रावक (ऐलक, क्षुल्लक आदि)।
- जघन्य पात्र: अविरत सम्यग्दृष्टि।
- कुपात्र और अपात्र: मिथ्यादृष्टि या संयमहीन, जिन्हें दान देने का फल वैसा नहीं होता जैसा सत्पात्रों को देने से मिलता है।
3 अनित्यपञ्चाशत्: क्या हमारा शोक करना व्यर्थ है?
संसार में हम अक्सर किसी के जाने पर या वस्तुओं के खोने पर दुखी होते हैं। लेकिन आचार्य पद्मनन्दी ने अपनी कृति के तीसरे अधिकार ‘अनित्यपञ्चाशत्’ (५५ श्लोक) में एक ऐसा सत्य उद्घाटित किया है, जो हमें हर वियोग में शांत रहने की शक्ति देता है।
१. संयोग और वियोग: एक स्वाभाविक सत्य
आचार्य बताते हैं कि शरीर, धन, स्त्री और पुत्र—ये सब स्वभाव से ही अस्थिर हैं। इनका संयोग (मिलना) और वियोग (बिछड़ना) प्रकृति का नियम है। ज्ञानी वही है जो इन दोनों स्थितियों में न तो बहुत हर्षित हो और न ही विषादग्रस्त।
२. मृत्यु की अनिवार्यता: सांप और लकीर का उदाहरण
आचार्य एक बहुत ही प्रभावशाली रूपक का प्रयोग करते हैं:
“जिसका आयु कर्म जिस समय समाप्त होना है, उसका प्राणान्त उसी क्षण होगा।”
इसे न मानकर शोक करना वैसा ही है जैसे ‘सांप के निकल जाने के बाद उसकी लकीर को पीटते रहना’ (श्लोक १०)। जब जीवन रूपी सर्प निकल गया, तब धर्म का संचय न करके केवल विलाप करना निष्फल है।
३. पक्षी और वृक्ष: संसार का रैन बसेरा
आचार्य ने संसार की नश्वरता को समझाने के लिए एक सुंदर उदाहरण दिया है (श्लोक १६):
- जिस प्रकार रात होने पर पक्षी अलग-अलग दिशाओं से आकर एक वृक्ष पर बसेरा करते हैं।
- सुबह होते ही वे पुनः अपनी-अपनी दिशाओं में उड़ जाते हैं।
- ठीक वैसे ही, जीव अलग-अलग योनियों से आकर एक कुल या परिवार में जन्म लेते हैं और आयु पूरी होते ही अन्य कुलों में चले जाते हैं।
ऐसी स्थिति में, किसी के चले जाने पर शोक करना केवल अज्ञानता है, क्योंकि कोई भी सदा के लिए किसी का नहीं है।
४. इष्ट वियोग में शोक का त्याग
अधिकार का मुख्य उद्देश्य हमें मानसिक शांति प्रदान करना है। जब हम यह समझ लेते हैं कि संसार का हर पदार्थ (चेतन हो या अचेतन) अस्थिर है, तो हम ‘इष्ट वियोग’ (प्रिय वस्तु या व्यक्ति का बिछड़ना) के दुःख से मुक्त हो जाते हैं। आचार्य प्रेरणा देते हैं कि शोक करने के बजाय उस अमूल्य समय को धर्म की साधना में लगाना चाहिए।
एकत्वसप्तति: स्वयं की खोज और साम्य का मार्ग
अक्सर हम शांति और सुख को तीर्थों, शास्त्रों या बाहरी वस्तुओं में खोजते हैं। लेकिन आचार्य पद्मनन्दी अपनी कृति के चौथे अधिकार ‘एकत्वसप्तति’ (८० श्लोक) में स्पष्ट करते हैं कि वह परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर प्राणी के भीतर अवस्थित है।
१. अज्ञानता का परदा: लकड़ी और अग्नि का उदाहरण
आचार्य कहते हैं कि जैसे लकड़ी के भीतर अग्नि अव्यक्त रूप से विद्यमान होती है, पर हर कोई उसे देख नहीं पाता, वैसे ही परमात्मा हमारे भीतर है।
- शास्त्रों का जाल: कितने ही विद्वान केवल शास्त्रों के शब्दों में उलझकर उस ‘चेतन तत्व’ को प्राप्त नहीं कर पाते।
- जात्यन्ध-हस्ती न्याय: जैसे अंधे व्यक्ति हाथी के एक-एक अंग को छूकर उसे पूरा हाथी समझ लेते हैं, वैसे ही मन्दबुद्धि लोग सत्य को एकान्त रूप से ग्रहण कर अपना अहित करते हैं।
२. द्वैत से अद्वैत की ओर
आचार्य ने संसार और मोक्ष के मूल अंतर को ‘बुद्धि’ के स्तर पर समझाया है:
- द्वैत बुद्धि (संसार): जहाँ कर्म-आत्मा, शुभ-अशुभ, राग-द्वेष और बन्ध-मोक्ष जैसे भेद बने रहते हैं, वहाँ संसार का परिभ्रमण है।
- अद्वैत बुद्धि (मुक्ति): जब योगी समस्त बाह्य पदार्थों से भिन्न एक अखंड आत्मा का अनुभव करता है, तब वह मुक्ति के सम्मुख होता है। यहाँ तक कि ‘मैं शुद्ध हूँ’—यह विकल्प भी शांत हो जाता है।
३. मोक्ष की इच्छा भी बाधक?
एक अत्यंत क्रांतिकारी विचार यहाँ प्रस्तुत किया गया है (श्लोक ५१-५३):
“मुमुक्षु योगी मोह के निमित्त से उत्पन्न होने वाली ‘मोक्ष की इच्छा’ को भी प्राप्ति में बाधक मानते हैं।”
जब आत्मा पूरी तरह निर्विकल्प होती है, तभी वह अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है। जहाँ इच्छा है, वहाँ अभी पूर्ण विश्राम नहीं है।
४. साम्य: परमात्मा की उपासना का एकमात्र उपाय
जिनेन्द्र देव ने उस परम पद को पाने का एक ही मार्ग बताया है—साम्य (समता)। इसके अन्य नाम हैं:
- स्वास्थ्य, समाधि, योग, चित्तनिरोध और शुद्धोपयोग।
साम्य का अर्थ: शुद्ध चैतन्य को छोड़कर आकृति, अक्षर, वर्ण या अन्य किसी भी विकल्प का न रहना ही वास्तविक साम्य है (श्लोक ६३-६५)।
५. परंज्योति: क्या छोड़ें और क्या अपनाएँ?
अधिकार के अंत में आचार्य स्पष्ट निर्देश देते हैं:
- हेय (त्यागने योग्य): कर्म और राग-द्वेष।
- उपादेय (ग्रहण करने योग्य): उपयोगस्वरूप ‘परंज्योति’ (शुद्ध आत्मा)।
इस आत्म-तत्त्व के निरंतर अभ्यास का अंतिम फल शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति है।
५. यतिभावनाष्टक – इस अधिकारमें ९ श्लोक हैं। यहाँ उन मुनियोंकी स्तुति की गई है जो पाँचों इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके विषयभोगोंसे विरक्त होते हुए ऋतुविशेषके अनुसार अनेक प्रकारके कष्टोंको सहते हैं और भयानक उपसर्गक उपस्थित होनेपर भी कभी समाधिसे विचलित नहीं होते।
६. उपाससंस्कार- इस अधिकारमें ६२ श्लोक हैं। यहाँ सर्वप्रथम व्रत और दानके प्रथम प्रवर्तक आदि जिनेन्द्र और राजा श्रेयांसके द्वारा धर्मकी स्थितिको दिखलाकर उसका स्वरूप बतलाया है। पश्चात् सम्पूर्ण और देशके भेदसे दो भेदरूप उस धर्मके स्वामियोंका निर्देश किया है। उनमें देशतः उस धर्मको धारण करनेवाले श्रावकोंके ये छह कर्म आवश्यक बतलाये गये हैं- देवपूजा, निर्ग्रन्थ गुरुकी उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान (७)। तत्पश्चात् सामायिक व्रतके स्वरूपका दिग्दर्शन कराते हुए उसके लिये सात व्यसनोंका परित्याग अनिवार्य निर्दिष्ट किया गया है (९)।
आगे यथाक्रमसे (१४-१७,१८-१९,२०-२१,२२-२५,२५-३०,३१-३६) गृहस्थके उन देवपूजा आदि छह आवश्यकोंका विवेचन करके जीवदया (३७-४१) की आवश्यकता दिखलायी गई है। तत्पश्चात् कर्मक्षयकी कारण होनेसे बारह अनुप्रेक्षाओंके स्वरूपको बतलाकर उनके निरन्तर चिन्तनकी प्रेरणा की गई है (४२-५८)। अन्तमें जो उत्तमक्षमादिरूप दस धर्म मुनियोंके लिये निर्दिष्ट किये गये हैं उनका सेवन यथाशक्ति आगमोक्त विधिसे श्रावकोंको मी करना चाहिये, यह निर्देश करते हुए विशुद्ध आत्मा और जीवदया इन दोनोंके संमेनलको मोक्षका करण बतलाकर इस अधिकारको पूर्ण कियागया है।
७. देशव्रतोद्योतन- इस अधिकारमें २७ श्लोक हैं। यहाँ अनेक मिथ्यादृष्टियोंकी अपेक्षा एक
सम्यग्दृष्टिको प्रशंसाका पात्र बतलाया है तथा उस सम्यग्दर्शनके साथ मनुष्यभवके प्राप्त हो जानेपर तपको ग्रहण करनेकी ही प्रेरणा की है। यदि कदाचित् कुटुम्ब आदिके मोह अथवा अशक्तिके कारण उस तपका अनुष्ठान करना सम्भव न हो तो फिर सम्यग्दर्शनके साथ छह आवश्यकों, आठ मूल्यगुणों व पाँच अणुव्रतादिरूप बारह उत्तरगुणोंको तो धारण करना ही चाहिये। साथ ही रात्रिभोजनका परित्याग करते हुए पवित्र व योग्य वस्त्रसे छाने गये जलका पीना तथा शक्तिके अनुसार मौन आदि अन्य नियमोंका पालन करना भी श्रावकके लिये पुण्यका वर्धक है (४-६)। चूँकि श्रावक अनेक पापप्रचुर कार्योंको करके धनका उपार्जन करता है, अतएव इस पापसे मुक्त होनेके लिये उसके लिये दानकी आवश्यकता और उसके महत्त्वचको दिखलाकर सत्पात्रके लिये आहारदिरूप चार प्रकरके दानकी विशेष प्रेरणा की गई है (७-१७)।
श्रावकके छह आवश्यकोंमें देवदर्शन व पूजन प्रथम है। देवदर्शनादिके विना उस गृहस्थाश्रमको पत्थरकी नाव जैसा निर्दिष्ट किया गया है (१८)। इसके लिये चैत्यालयका निर्मापण अतिशय पुण्यवर्धक है। कारण यह कि उस चैत्यालयके सहारे मुनि और श्रावक दोनोंका ही धर्म अवस्थित रहता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष; इन चार पुरुषाथोंमें सर्वश्रेष्ठ मोक्ष ही है। यदि धर्म पुरुषार्थ उस मोक्षके साधक रूपमें अनुष्ठित होता है तो वह भी उपादेय है। इसके विपरीत यदि वह भोगादिककी अभिलाषासे किया जाता है तो वह धर्म पुरुषार्थ भी पापरूप ही है। कारण यह कि अणुव्रत या महाव्रत दोनोंका ही उद्देश्य एकमात्र मोक्षकी प्राप्ति है, इसके विना वे भी दुखके ही कारण है (२५-२६)।
८. सिद्धस्तुति इस अधिकारमें २९ श्लोक हैं। यहाँ प्रथमतः सिद्धोंको नमस्कारपूर्वक उनसे अपने कल्याणकी प्रार्थना करते हुए ज्ञानावरणादि आठ कर्मोके क्षयसे क्रमशः सिद्धोंके कौनसे गुण प्रादुर्भूत होते हैं, इसका निर्देश किया गया है (६)। तत्पश्चात् उनके ज्ञान-दर्शन एवं सुखादिकी विशेष प्ररूपणा की गई है।
९. आलोचना – इस अधिकारमें ३३ श्लोक हैं। यहाँ जिनन्द्रके गुणोंका कीर्तन करते हुए यह बतलाया है कि मन, वचन और काय तथा कृत, कारित व अनुमोदन; इनको परस्पर गुणित करनेपर जो नौ स्थान (मनकृत, मनकारित और मनानुमोदित आदि) प्राप्त होते हैं उनके द्वारा प्राणीके पाप उत्पन्न होता है। उसे दूर करनेके लिये जिनेन्द्र प्रभुके आगे आत्मनिन्दा करते हुए ‘वह मेरा पाप मिथ्या हो’ ऐसा विचार करना चाहिये। अज्ञानता या प्रमादके वशीभूत होकर जो पाप उत्पन्न हुआ है उस निष्कपट भावसे जिनेन्द्र व गुरुके समक्ष प्रगट करना, इसका नाम आलोचना है। यद्यपि जिनेन्द्र भगवान् सर्वज्ञ होनेसे उस सब पापको स्वयं जानते हैं, फिर भी आत्मशुद्धिके लिये दोषोंकी आलोचना करना आवश्यक है। कारण कि साधुके मूल और उत्तर गुणोंके परिपालनमें जो दोष दृष्टिगोचर होते हैं, उनकी आलोचना करनेसे हृदयसे भीतर कोई शल्य नहीं रहता (७-९)।
आगे यहाँ यह भी कहा गया है कि प्राणीके असंख्यात संकल्प-विकल्प और तदनुसार उसके असंख्यात पाप भी होते हैं। ऐसी अवस्थामें आगमोक्त विधिसे उन सब पापोंका प्रायश्चित्त करना सम्भव नहीं है। अत एव उन सबके शोधनका एक प्रमुख उपाय है अपने मन और इन्द्रियोंको बाह्य पदाथोंकी ओरसे हटाकर उनका परमात्मस्वरूपके साथ एकीकरण करना। इसके लिये मनके ऊपर विजय प्राप्त करना आवश्यक हैं। कारण कि उस मनकी अवस्था ऐसी है कि समस्त परिग्रहको छोड़कर वनका आश्रय ले लेनेपर भी वह मन बाह्य पदाथोंकी ओर दौड़ता है। अत एव उसके ऊपर विजय प्राप्त करनेके लिये उसे परमात्मस्वरूप चिन्तनमें लगाना श्रेयस्कर है। इस प्रकार विवेचन करते हुए अन्तमें यह निर्दिष्ट किया गया है कि सर्वज्ञ प्रभुने जिस चरित्रका उपदेश दिया है उसका परिपालन इस कलि कालमें दुष्कर है। अतएव जो भव्य जीव इस समय तन्मय होकर उस सर्वज्ञ वीतराग प्रभुकी केवल भक्ति ही करता है वह उस दृढ़ भक्तिके प्रसादसे