Summary of Ādi purāṇa Parv 47 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 47 (श्लोक 1 से 403) क्रमबद्ध सार :
- सुलोचना जयकुमार को श्रीपाल चक्रवर्ती की कथा सुनाती है। श्रीपाल और वसुपाल दो भाई पुण्डरीकिणी नगरी के राजकुमार थे। वे पिता गुणपाल मुनि के केवलज्ञान प्राप्त होने पर सुरगिरि पर्वत जाते हैं।
- मार्ग में वटवृक्ष के नीचे नृत्य देखते समय श्रीपाल नट-नटी के वेश-भेद को पहचान लेता है, जिससे जयवती (जयावती) की पहचान होती है। विद्याधर अशनिवेग उसे रत्नावर्त पर्वत पर छोड़ देता है।
- वहाँ विभिन्न विद्याधर कन्याएँ (विद्युद्वेगा, सुखावती आदि) आती हैं। श्रीपाल अपने व्रत (गुरु से लिया ब्रह्मचर्य) के कारण उन्हें अस्वीकार करता है।
- अनेक कष्टों के बाद (भेरुण्ड पक्षी द्वारा उठाया जाना, वृद्ध रूप, सर्पिणी कहलाना, अग्नि में डाला जाना, श्मशान में पटका जाना आदि) सुखावती, हरिकेतु आदि की सहायता से वह चक्ररत्न, छत्ररत्न आदि प्राप्त करता है।
- विभिन्न परीक्षाओं, युद्धों (धूमवेग, हरिवर से) और नगरों (गजपुर, हयपुर, सुसीमा आदि) में चमत्कार दिखाकर वह पुण्डरीकिणी लौटता है।
- माता कुबेरश्री और भाई वसुपाल से मिलता है। जयावती आदि 84 कन्याओं से विवाह करता है। पुत्र गुणपाल उत्पन्न होता है।
- गुणपाल को केवलज्ञान होता है, वह तीर्थंकर बनता है। श्रीपाल को पूर्वजन्म स्मरण होता है (सर्वदयित सेठ के रूप में)।
- भगवान गुणपाल के उपदेश से श्रीपाल वैराग्य प्राप्त कर चक्ररत्न त्यागकर दीक्षा लेता है। वह केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष जाता है। उसकी रानियाँ भी देवलोक जाती हैं।
- कथा के अंत में सुलोचना बताती है कि वे दोनों (जयकुमार-सुलोचना) भी पूर्व में स्वर्ग गए थे और अब इस जन्म में हैं।
- जयकुमार भी वैराग्य से दीक्षा लेता है, गणधर बनता है। अंत में भरत चक्रवर्ती, ऋषभदेव के मोक्ष, उनके शरीर का दाह-संस्कार, भरत का शोक-निवारण, और भरत का भी मोक्ष वर्णित है।
- पर्व का समापन ऋषभदेव की स्तुति, उनके मोक्ष-कल्याणक, और धर्म के स्वरूप (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) के निरूपण से होता है।
श्लोक 1 से 12 : श्रीपाल की कथा का प्रारम्भ और नृत्य दृश्य
जयकुमार के पूछने पर सुलोचना श्रीपाल चक्रवर्ती की कथा सुनाने लगती है। जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुण्डरीकिणी नामक प्रसिद्ध नगरी है। वहाँ श्रीपाल और वसुपाल नामक दो भाई सूर्य-चन्द्रमा या नय-पराक्रम के समान राज्य करते हैं। एक दिन माली से पता चलता है कि उनके पिता गुणपाल मुनि को सुरगिरि पर्वत पर केवलज्ञान प्राप्त हुआ है। माता कुबेरश्री प्रसन्न होकर पूजा सामग्री लेकर दर्शन के लिए निकलती हैं, और श्रीपाल-वसुपाल भी उनके पीछे जाते हैं। मार्ग में एक सुन्दर वन में वटवृक्ष के नीचे जगत्पाल चक्रवर्ती की प्रतिमा के समीप नृत्य होता है। श्रीपाल देखते हैं कि एक पुरुष स्त्री वेष में और स्त्री पुरुष वेष में नाच रही है। वह कहता है कि यदि स्त्री स्त्री वेष में नाचे तो नृत्य उत्तम होता। यह सुनकर नटी मूर्छित हो जाती है।
श्लोक 13 से 30 नटी की पहचान और श्रीपाल का अपहरण
नटी के सचेत होने पर एक स्त्री (प्रियरति) श्रीपाल से कहती है कि वह श्रीपुर नगरी के राजा श्रीधर की पुत्री जयवती की परीक्षा के लिए आई है। जन्म के समय भविष्यवाणी हुई थी कि जो नट-नटी के भेद को जान लेगा, वही चक्रवर्ती होगा। प्रियरति अपनी पुत्री मदनवेगा (पुरुष वेष में नाचने वाली) और नट वासव का परिचय देती है। श्रीपाल संतुष्ट होकर उन्हें सम्मानित करता है और पिता के दर्शन के लिए सुरगिरि की ओर चलता है। मार्ग में एक घोड़ा आता है, श्रीपाल उस पर सवार होता है, जो विद्याधर बनकर उसे आकाश में ले उड़ता है। अशनिवेग नामक विद्याधर उसे रत्नावर्त पर्वत पर छोड़ देता है। वहाँ छह राजकन्याएँ आती हैं, जो बताती हैं कि अशनिवेग ने उन्हें जबरदस्ती वहाँ लाया है। श्रीपाल अपना वृत्तान्त कहता है। तभी विद्युद्वेगा नामक विद्याधरी आती है, जो अशनिवेग की बहन है और काम से पीड़ित हो श्रीपाल पर अनुरक्त हो जाती है। वह बताती है कि अशनिवेग ने उसे भेजा है और श्रीपाल उसका साला बनेगा।
श्लोक 31 से 45 विद्युद्वेगा का प्रयास और भेरुण्ड पक्षी द्वारा अपहरण
विद्युद्वेगा रागपूर्ण चेष्टाएँ करती है और विद्याबल से मकान बनाकर राजकन्याओं के साथ बैठ जाती है। अनंगपताका नामक सखी आकर बताती है कि कुबेरश्री ने गुणपाल मुनि से श्रीपाल की खोज कराई, जिससे अशनिवेग उसे लाया। विद्याधर अनलवेग के शत्रु उत्तरश्रेणी राजा से युद्ध कर रहे हैं। विद्युद्वेगा श्रीपाल से विवाह की इच्छा रखती है, किन्तु श्रीपाल गुरु व्रत के कारण मना करता है कि वह केवल गुरुजन द्वारा दी गई कन्या से विवाह करेगा। कन्याएँ प्रयास करती हैं, असफल होने पर विद्युद्वेगा उसे मकान में बंद कर माता-पिता के पास जाती है। श्रीपाल सो जाता है, तब भेरुण्ड पक्षी उसे मांस समझकर उठा ले जाता है और सिद्धकूट चैत्यालय पर रखकर छोड़ देता है।
श्लोक 46 से 64 सिद्धकूट से आगे की यात्रा और रूप परिवर्तन
श्रीपाल स्नान कर जिनालय की पूजा करता है। एक विद्याधर उसे उठाकर शिवंकरपुर ले जाता है, जहाँ अनिलवेग राजा की पुत्री भोगवती है। विद्याधर पूछता है कि यह कौन है, श्रीपाल कहता है ‘विषम सर्पिणी’। क्रोधित होकर विद्याधर उसे अनिलवेग के पास ले जाता है। राजा क्रुद्ध होकर उसे शीत वैताली विद्या से वृद्ध रूप देकर उत्तर श्रेणी के श्मशान में फेंक देता है। वहाँ एक चाण्डालिनी उसे कुत्ते के रूप में पटकती है, फिर पुराना रूप लौटाती है। श्रीपाल भयभीत होता है। हरिकेतु नामक विद्याधर उसे सर्वव्याधिविनाशिनी विद्या देता है और असली रूप लौटाता है। आगे एक विद्याधर बताता है कि यह सुसीमा देश है, जहाँ सात शिलाएँ हैं। इन्हें एक पर एक रखने वाला चक्रवर्ती बनेगा। श्रीपाल ऐसा करता है।
श्लोक 65 से 108 सुखावती का परिचय, रूप परिवर्तन और चैत्यालय की घटनाएँ
श्रीपाल पुष्कलावती मार्ग पूछता है। एक बुढ़िया (सुखावती) बताती है कि वह विद्याधरी है, पिप्पला और मदनवती से संबंधित है। वह श्रीपाल की खोज में आई है और उसे बुढ़ापे का रूप देकर छिपा रही है क्योंकि धूमवेग और हरिवर नामक विद्याधर उन कन्याओं के लिए खतरा हैं। वह अमृत फल देती है और पुरुष रूप धारण कर उसे ले चलती है। सिद्धकूट चैत्यालय में भोगवती और अन्य राजकन्याएँ पूजा करती हैं। एक शिवकुमार का मुँह टेढ़ा होता है, जो श्रीपाल के समीप ठीक हो जाता है। हरिवर क्रोधित होकर श्रीपाल को महाकाल गुफा में फेंक देता है, किन्तु व्यन्तर कुछ नहीं कर पाता। धूमवेग के सेवक उसे पकड़ते हैं और मारने का प्रयास करते हैं, किन्तु शस्त्र फूल बन जाते हैं। नगर में अतिबल नामक दूसरा विद्याधर राजा रहता है (कथा आगे बढ़ती है)।
श्लोक 109 से 122 अग्निकुंड से मुक्ति और कन्या रूप में परीक्षा
धूमवेग विद्याधर श्रीपाल को अग्निकुंड में फेंकता है, जहाँ राजा विमलसेन अपने दुष्ट नौकर को जला रहा था। कुमार की महौषधि से अग्नि निस्तेज हो जाती है और वह बाहर निकल आता है। उस नौकर की पत्नी अग्नि में कूदकर अपनी शुद्धि सिद्ध करती है। कुमार स्त्रियों की माया के कवच की दृढ़ता पर आश्चर्य करता है। विमलसेन की पुत्री कमलावती पर कामरूप पिशाच का आक्रमण होता है, श्रीपाल उसे दूर करता है। राजा पुत्री देना चाहता है, किन्तु कुमार मना करने पर वरसेन उसे घर भेजता है। मार्ग में सुखावती कूबड़ी रूप में आकर प्यास बुझाती है और कुमार को कन्या बना देती है। धूमवेग और हरिवर दोनों उस कन्या पर आसक्त हो जाते हैं और परस्पर द्वेष करते हैं। बंधु उन्हें रोकते हैं कि कन्या जिसे चाहे वही पति बने। कन्या किसी को नहीं चुनती, सुखावती उसे अन्य कन्याओं के पास ले जाती है।
श्लोक 123 से 131 असली रूप, गजपुर में विजय और अगवानी
कन्याओं के बीच श्रीपाल असली रूप में बैठता है, कुछ कन्याएँ लज्जित होती हैं और कुछ प्रीति करती हैं। रात भर सोने के बाद सुखावती उसे उठाकर ले जाती है और बताती है कि वह सदा साथ रही है तथा निमित्तज्ञानियों के अनुसार यहाँ स्त्रीरत्न मिलेगा। श्रीपाल हर्षित होकर गजपुर नगर पहुँचता है। वहाँ मदोन्मत्त गजराज को शास्त्रोक्त 32 क्रीड़ाओं से वश करता है। सूर्योदय पर नगरवासी जानकर पताकाएँ फहराते हैं और पुण्य प्रभाव से अगवानी करते हैं।
श्लोक 132 से 141 हयपुर, सुसीमा पर्वत और विभिन्न परीक्षाएँ
श्रीपाल हयपुर पहुँचता है, जहाँ घोड़ा प्रदक्षिणा देकर खड़ा होता है। नगरवासी सत्कार करते हैं। आगे सुसीमा पर्वत पर पहुँचकर तलवार म्यान से निकालता है, जिसे अन्य नहीं निकाल पाते। गूंगा व्यक्ति जय-जय कहकर प्रणाम करता है, टेढ़ी अंगुली वाला व्यक्ति ठीक हो जाता है और हीरे की भस्म बनाने वाला सफल होता है। ये सभी भावी सेनापति, पुरोहित, स्थपति और मंत्री हैं। विजयपुर की कीर्तिमती पुत्री का वर श्रीपाल होगा, श्रेयस्पुर की वीतशोका का वर गूंगा बोलने से, शिल्पपुर की रतिविमला का वर अंगुली ठीक होने से और धान्यपुर की विमलसेना का वर भस्म बनने से पहचाना जाता है।
श्लोक 142 से 151 धूमवेग से युद्ध और यक्षी की सहायता
सुखावती कुमार को आकाशमार्ग से ले जाती है, धूमवेग रास्ता रोकता है। प्रतिमा की रक्षक देवी विद्याधर रूप में आकर सुखावती को धूमवेग से लड़ने को कहती है और कुमार को ले जाती है। सुखावती युद्ध करती है और धूमवेग को रोकती है। कुमार समीपवती पर्वत पर पहुँचता है, पूर्वभव की माता यक्षी देवश्री आकर परिश्रम दूर करती है और तालाब में जाने को कहती है। कुमार रात भर खंभे पर बैठता है।
श्लोक 152 से 163 रत्न प्राप्ति और सुरगिरि वापसी
सुबह पञ्चनमस्कार मंत्र पढ़कर जिनप्रतिमा की पूजा करता है। यक्षी के उपदेश से कमल से चक्ररत्न, कछुए से छत्ररत्न, नाग से दण्डरत्न, मेंढक से चूड़ामणि, मगर से चर्मरत्न और विच्छू से कौस्तुभ मणि प्राप्त करता है। आभूषण धारण कर बाहर निकलता है। सुखावती धूमवेग को जीतकर तलवार सहित आती है। दोनों सुरगिरि पर्वत पर गुणपाल जिनेन्द्र के समवसरण पहुँचते हैं।
श्लोक 164 से 171 माता-भाई से मिलन और विवाह
श्रीपाल गुणपाल की स्तुति करता है, माता-भाई से विनय करता है और सुखावती की प्रशंसा करता है। वसुपाल के प्रश्न पर भगवान् ने पूर्व कथनानुसार लाभ बताए थे। सात दिनों में नगर पहुँचकर वसुपाल का वारिषेणा आदि से विवाह होता है। श्रीपाल जयावती आदि 84 कन्याओं से विवाहित होता है। दोनों भाई सूर्य-चन्द्रमा के समान पृथ्वी का पालन कर चिरकाल तक सुख भोगते हैं।
श्लोक 172 से 183 गुणपाल का जन्म, विवाह और वैराग्य
जयावती से गुणपाल पुत्र उत्पन्न होता है, चक्ररत्न प्रकट होता है। श्रीपाल इन्द्र लीला से उल्लंघन करता है। गुणपाल का जयसेना आदि विद्याधर कन्याओं से विवाह होता है। कुछ समय बाद गुणपाल चन्द्रग्रहण देख वैराग्य प्राप्त करता है और पूर्वभव स्मरण करता है। पूर्वभव में पद्मक देश के कनकप्रभ था, विद्युत्प्रभा सर्पदंश से मरने पर विरक्त हो समाधिगुप्त मुनि से संयम धारण कर अहमिन्द्र बना।
श्लोक 184 से 191 गुणपाल की दीक्षा और सुखावती का पुत्र
गुणपाल मोह नष्ट कर तप करता है, घातिया कर्म नष्ट कर सयोगी पद (तेरहवाँ गुणस्थान) प्राप्त करता है। सुखावती का पुत्र यशपाल गुणपाल के पास दीक्षा लेकर पहला गणधर बनता है। श्रीपाल विभूति सहित पूजा करता है, दोनों प्रकार का धर्म सुनता है और पूर्वभव पूछता है। भगवान् बताते हैं कि सुलोचना जयकुमार को कथा सुना रही है।
श्लोक 192 से 201 यशपाल की कथा का प्रारम्भ
विदेह क्षेत्र की पुण्डरीकिणी में राजा यशपाल रहता है। वैश्य सर्वसमृद्ध की पत्नी धनश्री और पुत्र सर्वदयित सेठ है, बहिन सर्वदयिता सती है। सर्वदयित की दो पत्नियाँ जयसेना और जयदत्ता हैं। देवश्री सागरसेन की पत्नी है, संतान सागरदत्त, समुद्रदत्त और सागरदत्ता। वैश्रवणदत्त हिस्सेदार है। परिवार प्रेम से रहता है। धनंजय राजा यशपाल को रत्न भेंट करता है, राजा सुवर्ण आदि धन देता है।
श्लोक 202 से 211 सर्वदयिता का त्याग और जितशत्रु का जन्म
सभी वैश्यपुत्र धन कमाने के लिए निकलते हैं और समीप के एक गाँव में ठहरते हैं। रात्रि में समुद्रदत्त घर आकर अपनी पत्नी सर्वदयिता से संभोग करता है और चुपके से वापस लौट जाता है। गर्भ बढ़ने पर सागरदत्त इसे पाप समझकर सर्वदयिता को बिना परीक्षा घर से निकाल देता है। सर्वदयिता भाई सेठ सर्वदयित के पास जाती है, किन्तु वह भी उसे दुराचारिणी कहकर रोक देता है। वह पास के घर में रहती है और नौ महीने बाद पुण्यवान् पुत्र को जन्म देती है। सेठ सर्वदयित इसे कुलकलंक समझकर नौकर से उसे दूर रखवाने को कहता है। बुद्धिमान नौकर उसे विद्याधर जयधाम को सौंप देता है। जयधाम और जयभामा उसे जितशत्रु नाम देकर औरस पुत्र की तरह पालते हैं।
श्लोक 212 से 223 पूर्वभव की समाप्ति और दीक्षा
सर्वदयिता पुत्र-वियोग से स्त्री-वेदना की निन्दा करती है और मरकर पुरुष जन्म लेती है। समुद्रदत्त वापस आकर भाई की निन्दा करता है और सेठ पर क्रोध रखता है। वैश्रवणदत्त सागरदत्त से ईर्ष्या करता है कि सेठ पद उसे मिलना चाहिए था। सागरदत्त और समुद्रदत्त भी ईर्ष्या करते हैं। सेठ सर्वदयित जितशत्रु से समानता पूछता है। जितशत्रु सब वृत्तान्त बताता है। अंगूठी देख सेठ समझता है कि यह भानजा है। वह अपनी अपरीक्षा पर पछताता है, जितशत्रु को पुत्री सर्वश्री, धन और सेठ पद देकर स्वयं विरक्त हो जाता है। जयधाम, जयभामा, जयसेना, जयदत्ता, सागरदत्ता, वैश्रवणदत्ता आदि को आत्मज्ञान होता है। वे सब रतिवर मुनि से संयम धारण कर चिरकाल तप कर स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 224 से 232 पूर्वभव का फल और श्रीपाल की व्याख्या
स्वर्ग से जयधाम वसुपाल, जयभामा जयावती, जयसेना पिप्पली, जयदत्ता मदनावती, वैश्रवणदत्ता विद्युद्वेगा, सागरदत्ता सुखावती, सागरदत्त हरिवर, समुद्रदत्त ज्वलनवेग का पुत्र, वैश्रवणदत्त अशनिवेग और सर्वदयित सेठ श्रीपाल (जयकुमार) बनता है। पूर्वभव में भानजे को माँ से अलग करने के कारण इस भव में भाइयों से अलगाव हुआ। पूर्वभव के द्वेषी धूमवेग, अशनिवेग, हरिवर बने। पूर्वभव की पत्नियाँ इस भव में भी प्रिय रानियाँ हुईं। बहिन के बालक की हिंसा न करने से भाइयों से पुनः समागम हुआ। पूर्व तप के फल से चक्रवर्ती बना और परिग्रह त्याग से शीघ्र मोक्ष मिलेगा।
श्लोक 233 से 241 वैर त्याग और श्रीपाल का वैराग्य
गुणपाल तीर्थंकर के वचन सुन सब वैर छोड़ देते हैं। श्रीपाल जन्म-मृत्यु आदि नष्ट करने के लिए धर्म-अमृत का पान करता है। वह चक्रवर्ती राज्य को कुम्हार के चाक के समान क्षणभंगुर समझता है। आयु वायु, भोग मेघ, संयोग नश्वर, शरीर पाप-पात्र और विभूतियाँ बिजली के समान चंचल हैं। यौवन भ्रष्टि का कारण और विषय-प्रेम द्वेष का मूल है। बुद्धि में विपर्यय रहने तक सुख लगता है, किन्तु सीधी बुद्धि में त्याग योग्य लगता है। अभिलाषा से चित्त-वृक्ष बढ़ता है तो दुःख फल लगते हैं। चिरकाल भोग करने पर भी तृष्णा नहीं मिटी। सभी इष्ट पदार्थ मिलने पर भी सुख नहीं मिलता।
श्लोक 242 से 252 श्रीपाल की दीक्षा और मोक्ष
स्त्रियों से सुख पुरुषत्व नहीं, आत्मा में सुख निश्चय से सच्चा पुरुषत्व है। श्रीपाल चक्ररत्न सहित समस्त परिग्रह त्यागने का निश्चय करता है। सुखावती पुत्र नरपाल का राज्याभिषेक कर सिंहासन देता है। जयवती आदि रानियों और वसुपाल आदि के साथ दीक्षा धारण करता है। बाह्य-अंतरंग तप से कषायरहित चारित्र प्राप्त कर, शुक्ल ध्यान से घातिया कर्म नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त करता है। योगरहित होकर सब कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त करता है। रानियाँ तप कर स्वर्ग जाती हैं। सुलोचना जयकुमार से कहती है कि वे दोनों कथा सुनकर गुणपाल को नमस्कार कर स्वर्ग गए और पुण्य से पुनः जन्म लिया। सभा में सब सुलोचना के वचनों पर विश्वास करते हैं। जयकुमार-सुलोचना सुख भोगते हैं और प्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ प्राप्त करते हैं।
श्लोक 253 से 273 जयकुमार-सुलोचना का विहार और शील परीक्षा
जयकुमार-सुलोचना सुख भोगते हैं। विद्याओं से देव-देशों में विहार की इच्छा से विजयकुमार को राज्य सौंपते हैं। समुद्र, कुलाचल, वनों में विहार कर कैलाश पहुँचते हैं। सुलोचना से दूर होने पर रविप्रभ देव की काञ्चना देवी शील परीक्षा के लिए आती है। वह विद्युत्प्रभा कहकर अनुराग दिखाती है। जयकुमार उसे बहिन कहकर व्रत स्मरण कर मना करता है। क्रुद्ध होकर काञ्चना राक्षसी रूप धारण कर उसे उठाती है। सुलोचना ललकारती है, देवी डरकर अदृश्य हो जाती है। काञ्चना स्वामी के पास जाकर शील-माहात्म्य बताती है। रविप्रभ आश्चर्य कर क्षमा माँगता है, रत्न-पूजा कर स्वर्ग जाता है। जयकुमार-सुलोचना चिरकाल विहार कर नगर लौटते हैं।
श्लोक 274 से 283 जयकुमार की दीक्षा और गणधर पद
जयकुमार आदिनाथ तीर्थंकर के पास वन्दना कर धर्म-प्रश्न सुनता है, कथाएँ और कर्म-बन्ध चर्चा करता है। कर्म-नाश से श्रेष्ठ सुख प्राप्त करता है। अनन्तवीर्य का राज्याभिषेक कर संपदा सौंपता है। स्वयं राग-द्वेष रहित छोटे भाइयों और अन्य वैराग्यी पुत्रों के साथ दीक्षा धारण करता है। भगवान् के समीप वह शासन पात्र के समान सुशोभित होता है। सब परिग्रह त्याग, श्रुत-अर्थ, सात ऋद्धियाँ और चार ज्ञान से अंधकार नष्ट कर वह भगवान् का 71वाँ गणधर बनता है। सुलोचना पति-वियोग से शोकाकुल हो सुभद्रा के समझाने पर ब्राह्मी आयिका से दीक्षा लेती है और अच्युत स्वर्ग में देवी बनती है।
श्लोक 284 से 303 भरत की पूजा और धर्म का स्वरूप
भगवान् वृषभदेव के पास 84,000 मुनि, 3,50,000 आर्यिकाएँ, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएँ, देव-तिर्यञ्च आदि से घिरे भगवान् की पूजा कर भरत धर्म पूछते हैं। भगवान् कहते हैं कि शिष्यों को कुगति से हटाकर उत्तम स्थान पहुँचाने वाला सत्पुरुष धर्म कहलाता है। धर्म के चार भेद हैं—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप। यह धर्म कर्तव्य प्रधान है।
श्लोक 304 से 321 मोक्ष के चार मार्गों का निरूपण और उपदेश
भगवान ऋषभदेव भरत को बताते हैं कि जीव आदि सात तत्त्वों में यथार्थ श्रद्धान सम्यग्दर्शन कहलाता है। यह शंका आदि दोषों से रहित होता है और औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक तीन भावों से विवेचित होता है। संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय के अभाव से जीवादि सात तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान सम्यग्ज्ञान है। कर्मों के आस्रव को रोकने वाला चारित्र या संयम है। कर्मों की निर्जरा कराने वाली वृत्ति तप कहलाती है। ये चारों गुण (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) कषाय सहित होने पर स्वर्ग के कारण हैं, कषायरहित होने पर स्वर्ग और मोक्ष दोनों के कारण हैं। ये मोक्ष के मार्ग हैं और प्राणियों को बड़ी कठिनाई से प्राप्त होते हैं। मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और शुभ-अशुभ योग कर्म-बंध के कारण हैं। मिथ्यात्व पाँच प्रकार का, अविरति 108 प्रकार की, प्रमाद 15, कषाय चार और योग 15 प्रकार के हैं। कर्मों के मूल भेद आठ और उत्तर भेद 148 हैं। बंध चार प्रकार का होता है और कर्म उदय में आकर ही फल देते तथा नए बंध का कारण बनते हैं। भगवान भरत आदि को गृहस्थाश्रम त्यागकर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्र का अभ्यास करने तथा वीतराग मुनियों या गुणस्थानों में अवस्था धारण कर मोक्ष की उपासना करने का उपदेश देते हैं। गृहस्थ बुद्धिमान पुरुष सम्यग्दर्शन पूर्वक दान, शील, उपवास, परमेष्ठी पूजा करें, श्रावक प्रतिमाएँ पालें और सज्जाति आदि सात परमस्थानों को प्राप्त हों। भरत ने भगवान के वचनों का पूर्ण श्रद्धान किया और कैलाश से अयोध्या लौट आए। भगवान ने धर्म-बीज बोया और एक लाख पूर्व से अधिक (एक हजार वर्ष + 14 दिन कम) गणधरों सहित विहार किया।
श्लोक 322 से 331 मोक्ष के पूर्व स्वप्न और संकेत
भगवान ने आयु के अंतिम 14 दिन शेष रहने पर पौष पूर्णिमा को कैलाश पर योग निरोध कर विराजमान हुए। उसी दिन भरत ने स्वप्न देखा कि महामेरु पर्वत सिद्ध क्षेत्र तक पहुँच गया। युवराज अर्ककीर्ति ने महौषधि वृक्ष को रोग नष्ट कर स्वर्ग जाते देखा। गृहपति ने कल्पवृक्ष को फल देकर स्वर्ग जाते देखा। प्रधानमंत्री ने रत्नद्वीप को रत्न देकर आकाश जाते देखा। सेनापति ने सिंह को वज्र-पिंजड़ा तोड़ कैलाश उल्लंघन करते देखा। अनन्तवीर्य ने चन्द्रमा को तीनों लोक प्रकाशित कर ताराओं सहित जाते देखा। सुभद्रा ने इन्द्राणी को शोक करते देखा। चित्रांगद ने सूर्य को आकाश में उड़ते देखा। सबने स्वप्न देखे और सूर्योदय पर पुरोहित से फल पूछा।
श्लोक 332 से 342 मोक्ष-कल्याणक और निर्वाण
पुरोहित ने कहा कि ये स्वप्न भगवान के कर्म-नाश कर मोक्ष जाने का संकेत हैं। आनन्द नामक व्यक्ति ने बताया कि भगवान ने दिव्यध्वनि संकोच कर ली है, सभा शोक में है। भरत सबके साथ कैलाश पहुँचा, तीन प्रदक्षिणा, स्तुति और 14 दिन महामह पूजा की। माघ कृष्ण चतुर्दशी को अभिजित नक्षत्र में भगवान पूर्व दिशा मुख करके पर्यंकासन में विराजमान हुए। शुक्ल ध्यान के तीसरे और चौथे चरण से योग निरोध कर अघातिया कर्म नष्ट किए। औदारिक, तैजस, कार्मण शरीर नष्ट हो सिद्धत्व प्राप्त किया, आठ निज गुणों से युक्त तनुवातवलय में विराजमान हुए।
श्लोक 343 से 354 भस्म-संस्कार और अग्नि-स्थापना
देव लोग मोक्ष-कल्याणक पूजा के लिए आए, भगवान के शरीर को पवित्र मान पालकी में रखा। अग्निकुमार देवों ने सुगन्धित अग्नि से शरीर का दाह किया, जगत में अभूतपूर्व सुगन्ध फैली। इन्द्र ने तीन अग्नियाँ स्थापित कीं: दाहिनी गणधरों के लिए, बाईं अन्य केवलियों के लिए, मध्य तीर्थंकर के लिए। इन्द्र ने भस्म उठाई, ललाट, भुजा, गले, वक्ष में लगाई और पवित्र मान धर्मानुराग में तन्मय हुए। सबने आनन्द नृत्य किया और श्रावकों को उपदेश दिया कि तीन संध्याओं में तीन अग्नियाँ स्थापित कर धर्मचक्र, छत्र, जिन प्रतिमा की पूजा करें और अतिथि बनें।
श्लोक 355 से 371 भरत का शोक और पूर्वभव कथन (प्रथम भाग)
शोकरूपी अग्नि भरत के चित्त को जला रही थी। वृषभसेन गणधर ने शोक दूर करने के लिए सभी के पूर्वभव बताए। वृषभदेव का जीव जयवर्मा से शुरू होकर दसवें भव में अहमिन्द्र से वृषभदेव बना। श्रेयान का जीव घनश्री से श्रेयान बना। भरत का जीव अतिगृद्ध से भरत चक्रवर्ती बना। बाहुबली का जीव सेनापति से बाहुबली बना। वृषभसेन गणधर ने अपना और अनन्तविजय, महासेन, श्रीषेण, गुणसेन, जयसेन आदि के पूर्वभव बताए।
श्लोक 372 से 381 शोक-निवारण उपदेश
वृषभसेन ने भरत से कहा कि संसार में इष्ट-अनिष्ट का संगम होता है और अकस्मात् नाश होता है। भगवान ने आठ कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया, तो विषाद क्यों? हम भी चरमशरीरी हैं, शीघ्र मोक्ष प्राप्त करेंगे। इष्ट मित्र की मृत्यु पर शोक होता है, लेकिन सिद्ध पद पर हर्ष होना चाहिए। भगवान के आठ दुष्ट शत्रु (कर्म) नष्ट हो गए, हानि क्या? देव लोग भी भस्म कर आनन्द मना रहे हैं, तो शोक व्यर्थ है। दर्शन आदि न होने पर शोक ठीक, लेकिन बीती वस्तु पर प्रार्थना भूल है। पिता अद्वितीय गुरु थे, तू तीन ज्ञानों का धारक है, मोह से उत्तमता नष्ट मत कर।
श्लोक 382 से 391 शोक का निवारण और भरत का वैराग्य
संसार में इष्ट-अनिष्ट क्या है? मूर्ख प्राणी द्वेष-राग करता है। काल अनादि और दुःखमय है, संसार को धिक्कार है। जीव के अनन्त काल से सैकड़ों संबंध हो चुके, मोह व्यर्थ है। भगवान का शरीर कर्मज है, स्थायी नहीं, हेय है। भगवान अब हृदय में विद्यमान हैं, चित्त में देखो। वचनों से भरत का शोक शांत हुआ, जैसे दावानल से जला पर्वत बादलों से शांत हो। भरत ने चिन्ता छोड़ गणधर को नमस्कार किया, तृष्णा की निन्दा कर मोक्ष के लिए उत्सुक हो नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 392 से 403 भरत का मोक्ष और स्तुति
भरत ने दर्पण में सफेद बाल देख राज्य को तृण समान मान अर्ककीर्ति को सौंप दिया। समस्त तत्त्व जानकर यम-समिति से पूर्ण संयम धारण किया। मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इन्द्रों द्वारा वन्दनीय और तीन लोक का स्वामी बना। मुनिरूपी हंस के समान विहार कर जनकल्याण किया। अंत में योग निरोध कर तीन शरीर नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया। वृषभसेन आदि मुनि भी निर्वाण को प्राप्त हुए। सबने भगवान ऋषभदेव की स्तुति की कि वे प्रथम तीर्थंकर, कुलकर, मोक्षमार्ग दर्शक हैं। भगवान वृषभनाथ भव्य जीवों को मोक्ष प्रदान करें और शान्ति दें।
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
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