चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 241
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
अभादस्य प्रभामध्ये प्रसन्नं वक्त्रमण्डलम् । नाकनद्यामिवाम्भोजमिव वा बिम्बमैन्दवम् ॥ २४२ ॥
उनकी प्रभाके मध्यमें प्रसन्नतासे भरा हुआ मुख-मण्डल ऐसा सुशोभित होता था मानो आकाशगङ्गामें कमल ही खिल रहा हो अथवा चन्द्रमाका प्रतिविम्ब ही हो ।॥ २४२ ॥
In the midst of that radiance, his countenance, filled with joy, shone brilliantly—as if a lotus were blooming in the Mandakini (the celestial Ganges) or as if it were the very reflection of the moon. || 242 ||
श्लोक ( Shlok ) 243
श्रीमद्गन्धकुटीमध्ये चतुर्भिस्त्रिगुणैर्गणैः । तारागणैः शरच्चन्द्र इव सेव्यो व्यराजत ॥ २४३ ॥
जिस प्रकार तारागणोंसे सेवित शरद्-ऋतुका चन्द्रमा सुशोभित होता है उसी प्रकार बारह सभाओंसे सेवित भगवान् गन्धकुटीके मध्यमें सुशोभित हो रहे थे ॥ २४३ ॥
Just as the autumnal moon shines brilliantly, surrounded by the stars, so did the Lord shine in the midst of the Gandhakuti, served by the twelve assemblies. || 243 ||
श्लोक ( Shlok ) 244 – 248
दत्तादित्रिनवत्युक्तगणेशः खत्रयद्विस । म्प्रोक्तपूर्वधरः शून्यत्रिकाष्ठावधिलोचनः ॥ २४४ ॥ शून्यद्वय चतुः शून्यद्विक पक्षोक्तशिक्षकः । खचतुष्कैकनिर्दिष्टकेवलावगमाग्रणीः ॥ २४५ ॥ चतुर्दशसहस्स्रोक्तविक्रियद्धिविभूषितः । खत्रयाष्टचतुर्ज्ञानपरिषत्परिवारितः ॥ २४६ ॥ खद्वयत्वंद्धिवादीशः सर्वसार्द्धद्विलक्षकः । खचतुष्काष्टवह्नयुक्तवरुणाद्यायिकानुतः ॥ २४७ ॥ त्रिलक्षश्रावकाभ्यर्च्यः श्राविकापञ्चलक्षकः । असङ्ख्यदेवदेवीड्यस्तिर्यक्सङ्ख्यातसेवितः ॥ २४८ ॥
उनके दत्त आदि तेरानवें गणधर थे, दो हजार पूर्वधारी थे, आठ हजार अवधिज्ञानी थे, दो लाख चार सौ शिक्षक थे; दश हजार केवलज्ञानी थे। वे चौदह हजार विक्रिया-ऋद्धिके धारक मुनियोंसे विभूषित थे, आठ हजार मनःपर्यय ज्ञानके धारक उनकी सेवा करते थे, तथा सात हजार छह सौ वादियोंके स्वामी थे। इस प्रकार सब मुनियोंकी संख्या अढ़ाई लाख थी। वरुणा आदि तीन लाख अस्सी हजार आर्यिकाएँ उनकी स्तुति करती थीं। तीन लाख श्रावक और पाँच लाख श्राविकाएँ उनकी पूजा करती थीं। वे असंख्यात देव-देवियोंसे स्तुत्य थे और संख्यात तिर्यश्च उनकी सेवा करते थे ।। २४४ -२४८ ॥
Datta and others were his ninety-three Gandharas; there were two thousand masters of the Purvas, eight thousand possessed of Avadhijnana (clairvoyance), and two lakh four hundred teachers. Ten thousand were possessors of Kevalajnana (omniscience).He was adorned by fourteen thousand monks endowed with Vikriya-riddhi (the supernatural power of transformation); eight thousand possessors of Manahparyaya-jnana (mind-reading) served him, and he was the lord of seven thousand six hundred great debaters (Vadis). In this manner, the total number of monks was two and a half lakhs.Varuna and others, totaling three lakh eighty thousand Aryikas (nuns), offered him hymns of praise. Three lakh Shravakas (laymen) and five lakh Shravikas (laywomen) worshipped him. He was praised by innumerable gods and goddesses, and countless animals (Tiryancha) served him. || 244-248 ||
श्लोक ( Shlok ) 249
प्रादक्षिण्येन भव्येशं परीत्यैते गणाः पृथक् । ४स्वकोष्ठेष्ववतिष्ठन्ति विहिताञ्जलिकुड्मलाः ॥२४९॥
ये सब बारह सभाओंके जीव प्रदक्षिणा रूपसे भव्योंके स्वामी भगवान् चन्द्रप्रभको घेरे हुए थे, सब अपने-अपने कोठोंमें बैठे थे और सभी कमलके मुकुलके समान अपने-अपने हाथ जोड़े हुए थे ॥ २४९ ॥
All these beings of the twelve assemblies surrounded Lord Chandraprabha, the Lord of the Bhavyas (the liberated souls), in a circumambulatory manner; all were seated in their respective halls, with their hands joined in reverence like the buds of a lotus. || 249 ||
श्लोक ( Shlok ) 250
तत्राकृत्रिमसम्भूतभक्तिभारानतः स्फुरन् । मुकुटाग्रमणिः स्तोत्रं द्वितीयेन्द्रोऽभ्यधादिदम् ॥ २५० ॥
उसी समय जो उत्पन्न हुई भक्तिके भारसे नम्र हो रहा है और जिसके मुकुटके अग्रभागमें लगे हुए मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा दूसरा ऐशानेन्द्र इस प्रकार स्तुति करने लगा ।। २५० ।।
At that moment, the second Ishanendra, bowing low under the weight of his newly arisen devotion and with the jewels set in the crest of his crown shimmering brilliantly, began to offer praise in this manner: || 250 ||
श्लोक ( Shlok ) 251
रत्नत्रयेण येनाप्तं रत्नत्रयमनुत्तरम् । त्वं देह्यस्मभ्यमप्युच्चैः सरत्नत्रयसम्पदम् ॥ २५१ ॥
वह कहने लगा कि हे भगवन् ! जिस रत्नत्रयसे आपने उत्कृष्ट रत्नत्रय प्राप्त किया है वही रत्नत्रय-सम्पत्ति आप मुझे भी दीजिये ।। २५१ ।।
He began to speak, “O Lord! Grant me also that same wealth of the Ratnatraya (Three Jewels), by which you have attained the supreme Three Jewels.” || 251 ||
श्लोक 252 से 261
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अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व
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