श्री बृहत् चारित्रशुद्धि विधान
रचयित्री – गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण
प्रकाशक – अंतर्मना धार्मिक एवं पारमार्थिक न्यास (रजि.)
पावन प्रसंग : तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मतिसागरजी महाराज के 87 वें जन्म जयंती के अवसर पर
आशीषानुकम्पा : प.पू. मासोपवासी तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मतिसागरजी महाराज स्थविराचार्य-अन्न एवं षट् रस त्यागी प. पू. आचार्य श्री संभवसागरजी महाराज प. पू. पुष्पगिरि तीर्थप्रणेता आचार्य श्री पुष्पदन्तसागरजी महाराज
शुभाशीर्वाद : साधना महोदधि उभयमासोपवासी उत्कृष्ट मौन सिंहनिष्क्रीडित व्रत साधक अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्नसागरजी महाराज
संस्करण : जनवरी, 2026
प्राप्ति स्थान डॉ. संजय जी, इंदौर 9425076760 अंतर्मना संघ 9685661008
बृहत् चारित्र शुद्धि विधान चारित्र शुद्धि व्रत की परिपालना
तीर्थङ्कर भगवन्तों की दिव्यध्वनि में श्रमण एवं श्रावक के धर्माचरण का उपदेश मिलता है। चारों अनुयोग दिव्यध्वनि से निःसृत है। जिनके माध्यम से सम्यक् जीवनयात्रा को दिशाबोध मिलता है। इस धर्मयात्रा में संसार, शरीर एवं भोगों से परे संयम एवं तपश्चरण मुख्य आधार होता है। संयम साधना की श्रेष्ठतम सौगात अर्थात् मोक्षमार्ग केवल मानव पर्याय को ही मिली है।
“जिस बिना नहीं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जगकीच में”
बिना संयम धारण किए तीर्थङ्कर भगवान् को भी मोक्ष सम्भव नहीं है फिर हमें कैसे मिल सकता है।
आचार्य समन्तभद्र स्नकरण्डक श्रावकाचार में उल्लेख करते हैं-
मोह – तिमिरापहरणे, दर्शन-लाभादवाप्त संज्ञानः । रागद्वेष – निवृत्यै, चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥१॥
मोहान्धकार के दूर होने से सम्यग्दर्शन एवं सम्यग्ज्ञान प्राप्त करके भव्य जीव रागद्वेष की निवृत्ति के लिए चारित्र को धारण करता है। इस प्रकार साधु सम्यक्चारित्र को धारण करते हैं।
व्रतों के माध्यम से संसारी जीवों को सुख का मार्ग प्रशस्त होता है, जीव महाव्रत देशव्रत धारण कर आत्मकल्याण करते हैं। जो असमर्थ, दीन दुःखी, हीन भाग्य वाले व्यक्ति महाव्रत या देशव्रत धारण नहीं कर सकते, वे सामान्य व्रताचरण द्वारा अपना कल्याण करते हैं।
आचार्य अमृतचन्द्र तत्त्वार्थसार में लिखते हैं –
अनगारस्तथागारी स द्विधा परिकथ्यते। महाव्रतोऽनगारः स्याद्गारी स्यादणुव्रतः ॥४/७९॥
अनगार और आगारी के भेद से व्रती दो प्रकार के होते हैं। महाव्रती अनगार (मुनि) और अणुव्रत के धारी आगारी (श्रावक) कहलाते हैं।
शक्त्यनुसार श्रावक धर्म तीन प्रकार का है –
पाक्षिक नैष्ठिक एवं साधक / सामान्य श्रावक अष्ट मुलगा का पालन करते हुए गृहस्थ धर्म का पालन करता है। नैष्ठिक श्रावक प्रतिमा व्रतों का पालन करता है तथा साधक समाधिमरण की भावना से गृह त्याग कर इच्छाओं का निरोध करते हुए व्रत अङ्गीकार करता है।
इस प्रकार श्रावक अपने आत्मकल्याण की भावना से वों का पालन करके मोक्षमार्ग प्रशस्त करता है। सामान्य व्रत अष्टमी, चतुर्दशी, दशलक्षण, सोलहकारण आदि व्रत तो सभी श्रावक शक्त्यनुसार करते ही हैं, परन्तु कुछ विशेष व्रत जो मुख्य रूप से मुनिराज ही करते हैं। श्रावक भी आचार्य परमेष्ठी के निर्देशन में अभ्यास रूप में करके महाव्रत धारण करने हेतु पुण्यवर्धन करते चारित्रशुद्धि भी इसी प्रकार का दीर्घकालिक व्रत है जिसकी विधि निम्नानुसार है। है-
उत्कृष्ट रूप में यह व्रत ६ वर्ष १० माह एवं ८ दिन में सम्पन्न किया जाता
मध्यम १० वर्ष, ३ माह, १५ दिन में १२३४ उपवास
एक माह में १० उपवास यथा-२ द्वितीया, २ पंचमी, २ अष्टमी, २ एकादशी एवं २ चतुर्दशी ।
जघन्य में शक्त्यनुसार १२३४ उपवास २५-३० वर्ष में कर सकते हैं। व्रत का संकल्प भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा को गुरु के समक्ष उपवास, जल या एकाशन द्वारा क्षमतानुसार करें।
बारह सौ चौंतीस व्रतों का विवरण इस प्रकार है –
अहिंसा महाव्रत १२६ उपवास
सत्य महाव्रत ७२ उपवास
अचौर्य महाव्रत ७२ उपवास
ब्रह्मचर्य महाव्रत १८० उपवास
अपरिग्रह महाव्रत २१६ उपवास
रात्रिभोजन त्याग अणुव्रत १० उपवास
मनगुप्ति ९ उपवास
वचनगुप्ति ९ उपवास
कायगुप्ति ९ उपवास
ईर्या समिति ९ उपवास
भाषा समिति ९० उपवास
एषणा समिति ४१४ उपवास
आदान निक्षेपण समिति ९ उपवास
प्रतिष्ठापन समिति ९ उपवास
व्रत के दिन चारित्रशुद्धि व्रत की समुच्चय पूजा करके जाप मन्त्र की तीन माला तथा विशेष मन्त्र की माला करना अनिवार्य है। व्रत के दिन असंयम के कार्य शृङ्गार, टी. व्ही. सीरियल, हिंसक पदार्थों का त्याग के साथ कषाय के आवेग को भी शान्त रखकर स्वाध्याय एवं पाठादि करते हुए बहुमान पूर्वक व्रताचरण करें।
जाप मंत्र – ह्रीं अर्ह असिआउसा चारित्रशुद्धिव्रतेभ्यो नमः ।
भगवत जिनेन्द्र महा अर्चना महोत्सव
श्री चारित्र शुद्धि विधान
मंगलाचरण
चौपाई
पंच परम परमेष्ठी ध्याऊँ, उन चरणों में शीश झुकाऊँ।
तप नय संयम चारित सिद्ध, हुए जगत् में आप प्रसिद्ध ।
आप हमारे आराधक हैं, दर्श आपके शुभ साधक हैं।
जब से प्रभुवर तुमको जाना, तब से प्रभुवर तुमको माना।
कैसे बने थे तुम भगवान, पूछने आया हूँ यह ज्ञान।
राजगृही विपुलाचल पर्वत, समवसरण में वीर है दृढ़व्रत।
राजा श्रेणिक की जिज्ञासा, भगवन बनने की है आशा।
तीर्थंकर पद कैसे पायें, वीर ने चारित शुद्धि बताये।
हेम वर्ण राजा ने कीना, तीर्थकर पद का सुख लीना।
जो भी इस व्रत को है धरता, स्वर्ग अपवर्ग की मंजिल पाता।
यह जग है भोगों का मेला, भोग के साथ हजार झमेला।
जग का हर सुख, दुख लाता है, अंत में दुर्गति ले जाता है।
काल अनंता से भटके हैं, लाख चौरासी में अटके हैं।
पुण्य योग से नरतन पाया, मिल गई जैनधर्म की छाया।
सच्चे सुख की राह यही है, गुरुवर की हर बात सही है।
चारित शुद्धि व्रत गुरु करते, ले आशीष भक्त भी तरते।
चारित शुद्धि व्रत को करना, श्रद्धा से शुभ भाव को धरना।
महान व्रत को महान करते, व्रत करते जो महान बनते।
जीवन को यदि सार्थक करना, इस व्रत को है धारण करना।
उत्तम मध्यम जघन्य रूप में, जैसी शक्ति उसी रूप में।
व्रत करके उद्यापन करना, चारित शुद्धि विधान को करना।
कर्मों के बादल को हरना, दुखमय इस संसार से तरना।
दोहा
तप का सूरज जब तपे, करम सभी नश जाय। सर्व सिद्ध भगवान को, शत शत शीश नवाय ॥
समुच्चय पूजा
अहिंसा व्रत पूजा
अर्ध्यावली
