शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82 – 85
अपिधाय सरः सद्यः कश्चिद्विद्याधरः खलः । शिलया नागपाशेन तमवघ्नान्नृपोऽप्यसौ ॥ ८२ ॥शिलां हस्ततलेनाहत्सा गता शतखण्डताम् । विद्याधरोऽपि दुष्टात्मा तदानीं प्रपलायितः ॥८३॥एष पूर्वभवे शत्रुविद्युदंष्ट्राभिधानकः । वज्रायुधोऽपि देवीभिः सह स्वपुरमागमत् ॥ ८४ ॥ एवं सुखेन भूभर्तुः काले गच्छत्ययोदयात् । निधयो नव रत्नानि चतुर्दश तदाऽभवन् ॥८५॥
उसी समय किसी दुष्ट विद्याधरने आकर उस सरोवरको शीघ्र ही एक शिलासे ढक दिया और राजाको नागपाशसे बाँध लिया। राजा वज्रायुधने भी अपने हाथकी हथेलीसे उस शिला पर ऐसा आघात किया कि उसके सौ टुकड़े हो गये । दुष्ट विद्याधर उसी समय भाग गया। यह विद्याधर और कोई नहीं था- पूर्वभवका शत्रु विद्यु-दूदंष्ट्र था। वज्रायुध अपनी रानियोंके साथ अपने नगर में वापिस आ गया। इस प्रकार पुण्योदयसे राजाका काल सुखसे बीत रहा था। कुछ समय बाद नौ निधियाँ और चौदह रत्न प्रकट हुए ।। ८२-८५ ॥
“At that very moment, a wicked Vidyadhara (a being with supernatural powers) arrived and swiftly covered the lake with a massive boulder, binding the king with a Nagapasha (serpent-noose). However, King Vajrayudha struck that boulder with the palm of his hand with such force that it shattered into a hundred pieces.82 – 85
श्लोक ( Shlok ) 86
चक्रवर्तिश्रियं प्राप्य निविष्टं सिंहविष्टरे । कश्चिद्विद्याधरो भीतः शरणं तमुपागतः ॥ ८६ ॥
वह चक्रवर्तीकी विभूति पाकर एक दिन सिंहासन पर बैठा हुआ था कि उस समय भयभीत हुआ एक विद्याधर उसकी शरणमें आया ।। ८६ ॥
“One day, having attained the grand glory and opulence of a Chakravartin (universal emperor), he was seated upon his throne when a terrified Vidyadhara arrived to seek his protection.”86
श्लोक ( Shlok ) 87
तस्यैवानुपदं काचिदुत्खातासिलता खगी । क्रोधानलशिखेवागात् द्योतयन्ती “सभावनीम् ॥८७॥
उसके पीछे ही एक विद्याधरी हाथमें तलवार लिये क्रोधाग्निकी शिखाके समान सभाभूमिको प्रकाशित करती हुई आई ॥ ८७ ॥
“Right behind him, a Vidyadhari (a female celestial being with supernatural powers) arrived holding a sword in her hand, illuminating the assembly hall like a blazing flame of wrath.”87
श्लोक ( Shlok ) 88 – 89
तस्याश्चानुपदं कश्चित्स्थविरः स गदांधरः । समागत्य महाराज दुरात्मैष खगाधमः ॥ ८८ ॥त्वं दुष्टनिग्रहे शिष्टपालने च निरन्तरम् । जागसिं निग्रहः कार्यस्त्वयास्यान्यायकारिणः ॥ ८९ ॥
उस विद्याधरीके पीछे ही हाथमें गदा लिये एक वृद्ध विद्याधर आकर कहने लगा कि हे महाराज ! यह विद्याधर दुष्ट नीच है, आप दुष्ट मनुष्योंके निग्रह करने और सत्पुरुषोंके पालन करनेमें निरन्तर जागृत रहते हैं इसलिए आपको इस अन्याय करने वालेका निग्रह अवश्य करना चाहिये ॥ ८८-८९ ।।
“Right behind that Vidyadhari, an elderly Vidyadhara arrived holding a mace in his hand and said, ‘O Emperor! This Vidyadhara (the one seeking refuge) is wicked and vile. Since you remain ever-vigilant in punishing the wicked and protecting the righteous, you must certainly punish this wrongdoer!'”88 – 89
श्लोक ( Shlok ) 90
कोऽसावन्याय इत्येतत् ज्ञातुमिच्छा तवास्ति चेत् । वदामि देव सम्यक् त्वं प्रणिधाय मनः शृणु ॥९० ll
इसने कौन-सा अन्याय किया है यदि आपको यह जाननेकी इच्छा है तो हे देव ! मैं कहता हूँ, आप चित्तको अच्छी तरह स्थिर कर सुनें ॥ ९० ॥
“‘If you wish to know what injustice he has committed, then O Lord! I shall tell you. Please listen with a steady and attentive mind.’”90
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
*जम्बूद्वीपसुकच्छाख्यविषये ‘खचराचले । श्रेण्यामुत्तरदिग्जायां शुकम्प्रभपुराधिपः ॥ ९१ ॥खगाधीडिन्द्रदत्ताख्यः प्रिया तस्य यशोधरा । तयोरहं सुतो वायुवेगो विद्याधरैर्मतः ॥ ९२ ॥
जम्बूद्वीपके सुकच्छ देशमें जो विजयार्ध पर्वत है उसकी उत्तरश्रेणीमें एक शुक्रप्रभ नामका नगर है। वहाँ विद्याधरोंके राजा इन्द्रदत्त राज्य करते थे। उनकी रानीका नाम यशोधरा था। मैं उन दोनोंका पुत्र हूँ, वायुवेग मेरा नाम है और सब विद्याधर मुझे मानते हैं ॥ ९१-९२ ॥
“On the northern ridge of the Vijayardha Mountain, located in the Sukachha province of Jambudvipa, lies a city named Shukraprabha. There ruled Indradatta, the king of the Vidyadharas. His queen’s name was Yashodhara. I am the son of them both; my name is Vayuvega, and all the Vidyadharas hold me in high esteem.”91 – 92
श्लोक 93 से 102
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |