सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11
English translation of Uttar Puran parv 53- shlok 12 to 22
श्लोक ( Shlok ) 12 – 13
इत्याविष्कृतसञ्चिन्तः सुस्वान्तः स्वस्य सन्ततौ । सुस्थाप्यात्मजमात्मीयं पतिं धनपतिं सताम् ॥ १२ ॥नरेन्द्रैर्बहुभिः सार्धं “निर्जुनानो रजो मुदा । अर्हनन्दनपूज्यान्तेवासित्वं प्रत्यपद्यत ॥ १३ll
इस प्रकार विचार कर उत्तम हृदयको धारण करनेवाले राजा नन्दिषेणने अपने पद पर सज्जनोत्तम धनपति नामक अपने पुत्रको विराजमान किया और स्वयं अनेक राजाओंके साथ पाप कर्मको नष्ट करता हुआ बड़े हर्षसे पूज्य अर्हन्नन्दन मुनिका शिष्य बन गया ।। १२-१३ ।।
“Reflecting in this manner, King Nandishen—possessing a noble and virtuous heart—installed his son, Dhanapati (the best among righteous men), upon the throne. Then, accompanied by many other kings, he joyfully became a disciple of the venerable Muniraj Arhannandan, setting out to destroy his sinful karmas.” (12-13)
श्लोक ( Shlok ) 14 – 15
एकादशाङ्गधारी सन्नुक्ततद्योग्यकारणैः । स्वीकृत्य तीर्थकृन्नाम संन्यस्यान्ते समाधिमान् ॥ १४ ॥शुक्ललेश्यो द्विहस्ताङ्गको ग्रैवेयकमध्यमे । अहमिन्द्रः सुभद्राख्ये विमाने मध्यमेऽजनि ॥ १५ ॥
तदनन्तर ग्यारह अङ्गका धारी होकर उसने आगममें कही हुई दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीर्थकर नामकर्मका बन्ध किया और आयुके अन्तमें संन्यास मरण कर मध्यम ग्रेवेयक के सुभद्र नामक मध्यम विमानमें अहमिन्द्रका जन्म धारण किया। वहाँ उसके शुक्ल लेश्या थी, और दो हाथ ऊँचा शरीर था ।। १४-१५ ॥
“Subsequently, having mastered the Eleven Angas (sacred scriptures), he bound the Tirthankara-nam-karma through the sixteen contemplative reflections (Solah Karana Bhavanas), such as ‘Purity of Perception’ (Darshan-vishuddhi), as prescribed in the Agamas. At the end of his life, he embraced the vow of Sanyasa-marana (a peaceful, meditative death) and was reborn as an Ahamindra in the middle celestial car named Subhadra, located in the Middle Graiveyaka. There, he possessed Shukla Leshya (the purest white thought-coloration) and a body two cubits high.” (14-15)
श्लोक ( Shlok ) 16
चतुः शतेषु पञ्चोत्तरेष्वहः स्वेष निःश्वसन् । शून्यत्रितयसप्तद्विप्रमिताब्देषु विश्वणन् ॥ १६ ॥
चार सौ पाँच दिनमें श्वास लेता था और सत्ताईस हजार वर्ष बाद आहार ग्रहण करता था ।। १६ ।।
“He would take a breath once every four hundred and five days, and he would consume food only after an interval of twenty-seven thousand years.”16
श्लोक ( Shlok ) 17
विक्रियावधिवीर्यत्विद्व्याप्तासप्तमभूमिकः । सप्तविंशतिवार्ध्यायुरथ भुक्त्वाखिलं सुखम् ॥ १७ ॥आयुरन्ते ततस्तस्मिन्नागमिष्यति भूतलम् । द्वीपेऽस्मिन् भारते काशीविषये वृषभान्वये ॥ १८ ॥सुप्रतिष्ठमहाराजो पाराणस्या महीपतिः । तस्यासीत् पृथिवीषेणा देवी तस्या गृहाङ्गणे ॥ १९ ॥षण्मासान् साररत्नानि ववृषुः सुरवारिदाः । सितषष्ठयां विशाखायां मासि भाद्रपदे शुभान् ॥ २० ॥ स्वप्नान् षोडश संवीक्ष्य वारणं चाननागतम् । ज्ञात्वा पत्युः फलं तेषां परितुष्टाग्निमित्रके ॥ २१ ॥शुभयोगे सितज्येष्ठद्वादश्यां तं सुरोत्तमम् । सोदपीपददुत्तुङ्गमैरावतमिवोर्जितम् ॥ २२ ॥
उसकी विक्रिया ऋद्धि, अवधिज्ञान, बल और कान्ति सप्तमी पृथिवी तक थी तथा सत्ताईस सागर उसकी आयु थी। इस प्रकार समस्त सुख भोगकर आयुके अन्तमें जब वह पृथिवी तल पर अवतीर्ण होनेको हुआ तब इस जम्बूद्वीपके भारत-वर्ष सम्बन्धी काशी देशमें बनारस नामकी नगरी थी। उसमें सुप्रतिष्ठ महाराज राज्य करते थे। सुप्रतिष्ठका जन्म भगवान् वृषभदेवके इक्ष्वाकु वंशमें हुआ था। उनकी रानीका नाम था पृथिवी-षेणा था। रानी पृथिवीषेणाके घरके आंगनमें देवरूपी मेघोंने छह माह तक उत्कृष्ट रत्नोंकी वर्षा की थी। उसने भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन विशाखा नक्षत्रमें सोलह शुभ स्वप्न देखकर मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। उसी समय वह अहमिन्द्र रानीके गर्भमें आया । पतिके मुखसे स्वप्नों-का फल जानकर रानी पृथिवीषेणा बहुत ही हर्षित हुई। तदनन्तर ज्येष्ठशुक्ल द्वादशीके दिन अग्निमित्र नामक शुभयोगमें उसने ऐरावत हाथीके समान उन्नत और बलवान् अहमिन्द्रको पुत्र रूपसे उत्पन्न किया ॥ १७-२२ ॥
“His supernatural powers (Vikriya Riddhi), clairvoyance (Avadhijnana), strength, and radiance extended as far as the seventh hellish earth, and his lifespan was twenty-seven Sagar (an immense cosmological unit of time).
After enjoying these celestial pleasures, when his life approached its end and he was to descend to the Earth, there was a city named Varanasi in the Kashi region of Bharat-Varsha within this Jambudvipa. It was ruled by King Supratishtha, born into the Ikshvaku lineage of Lord Rishabhdev. His Queen’s name was Prithivishena.
For six months, heavenly clouds rained down exquisite gems into the courtyard of Queen Prithivishena’s palace. On the sixth day of the bright half of the month of Bhadrapada, under the Vishakha constellation, the Queen saw sixteen auspicious dreams and witnessed an elephant entering her mouth. At that very moment, the soul of the Ahamindra entered her womb. Upon hearing the interpretation of these dreams from her husband, the Queen was filled with great joy.
Subsequently, on the twelfth day of the bright half of the month of Jyeshtha, during the auspicious Agnimitra yoga, she gave birth to that powerful and noble Ahamindra as a son, who was as majestic as the Airavata elephant.” (17-22)
श्लोक 23 से 34
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