आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
श्लोक 193 से 201 प्रजापालन और समंजसत्व
जैसे ग्वालिया गोधन को व्याघ्र और चोरों से बचाता है, वैसे ही राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। बलवान राजा के आने पर भेंट देकर संधि करनी चाहिए, क्योंकि युद्ध हानिकारक है। ग्वालिया दृष्टांत स्वीकार कर राजा को नीतिपूर्वक प्रजापालन करना चाहिए। प्रजापालन के बाद समंजसत्व गुण कहा गया, जिसमें राजा चित्त समाधान कर दुष्टों का निग्रह और शिष्टों का पालन करता है। निष्पक्ष, मध्यस्थ, और समान दृष्टि वाला राजा समंजस कहलाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 193 to 201
श्लोक ( Shlok ) 193
अन्यच्च गोधनं गोपो व्याघ्रचोराद्युपक्रमात् । यथा रक्षत्यतन्द्रालुर्भूपोऽप्येवं निजाः प्रजाः ॥१९३।।
जिस प्रकार ग्वाला आलस्यरहित होकर अपने गोधनकी व्याघ्र चोर आदि उपद्रवों-से रक्षा करता है उसी प्रकार राजाको भी अपनी प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १९३॥
Just as a cowherd, free from sloth, vigilantly protects his herd of cattle from threats such as tigers, thieves, and other calamities,in the same manner should a king diligently safeguard his subjects from all forms of affliction.193
श्लोक ( Shlok ) 194 –196
यथा च गोकुलं ‘गोमिन्यायाते संदिदृक्षया । सोपचारमुपेत्येनं तोषयेद् धनसम्पदा ॥१९४।।भूपोऽप्येवं बली कश्चित् स्वराष्ट्रं यद्यभिद्रवेत्। तदा वृद्धैः समालोच्य सन्दध्यात् पणबन्धतः ॥१९५॥जनक्षयाय सङ्ग्रामो बह्वपायो दुरुत्तरः । तस्मादुपप्रदानाद्यैः सन्धेयोऽरिर्बलाधिकः ॥१९६॥
जिस प्रकार ग्वाला उन पशुओंके देखनेकी इच्छासे राजाके आनेपर भेंट लेकर उसके समीप जाता है, और धन सम्पदाके द्वारा उसे संतुष्ट करता है उसी प्रकार यदि कोई बलवान् राज़ा अपने राज्यके सन्मुख आवे तो वृद्ध लोगोंके साथ विचारकर उसे कुछ देकर उसके साथ सन्धि कर लेना चाहिये । चूंकि युद्ध बहुतसे लोगोंके विनाशका कारण है, उसमें बहुत सी हानियां होती हैं और उसका भविष्य भी बुरा होता है अतः कुछ देकर बलवान् शत्रुके साथ सन्धि कर लेना ही ठीक है ।।१९४-१९६।।
Just as a cowherd, desirous of securing the well-being of his herd, approaches the king with offerings upon his arrival, and seeks to win his favor through wealth and gifts,even so, when a mighty monarch approaches one’s own kingdom, it is prudent to consult the wise elders and, by presenting gifts, enter into a treaty of peace with him.For verily, war is the cause of great destruction—it brings ruin to multitudes, leads to grievous losses, and its consequences are invariably calamitous;therefore, it is far better to offer tribute and establish concord with a powerful foe than to court the uncertain perils of conflict.194 –196
श्लोक ( Shlok ) 197
इति गोपालदृष्टान्तमू रीकृत्य नरेश्वरः । प्रजानां पालने यत्नं विदध्यान्नयवर्त्मना ॥१९७॥
इस प्रकार राजाको ग्वालाका दृष्टान्त स्वीकार कर नीति- मार्गसे प्रजाका पालन करनेमें प्रयत्न करना चाहिये ।।१९७।।
Thus, the king ought to embrace the example of the cowherd and, treading the path of righteous policy, earnestly endeavor to govern and protect his subjects.197
श्लोक ( Shlok ) 198
प्रजानुपालनं प्रोक्तं पार्थिवस्य जितात्मनः । समञ्जसस्त्वमधुना वक्ष्यामस्तद्गुणान्तरम् ।।१९८।।
इस प्रकार इन्द्रियोंको जीतनेवाले राजाका प्रजापालन नामका गुण कहा। अब समंजसत्व नामका अन्य गुण कहते हैं ।।१९८।।
Thus has been described the virtue known as protection of the subjects in the case of a king who has mastered his senses. Now, we shall expound upon another noble virtue, namely, equanimity (samajñasatva). 198
श्लोक ( Shlok ) 199
राजा चित्तं समाधाय यत्कुर्याद् दुष्टनिग्रहम् । शिष्टानुपालनं चैव तत्सामञ्जस्यमुच्यते ॥१९९॥
राजा अपने चित्तका समाधान कर जो दुष्ट पुरुषोंका निग्रह और शिष्ट पुरुषोंका पालन करता है वही उसका समंजसत्व गुण कहलाता है ।। १९९।।
When the king, having composed his mind in equanimity, restrains the wicked and protects the virtuous, such conduct is known as his virtue of equanimity (samajñasatva). 199
श्लोक ( Shlok ) 200 – 201
द्विषन्तमथवा पुत्रं निगुह्णन्निग्रहोचितम् । अपक्षपतितो दुष्टमिष्टं चेच्छन्ननागसम् ॥२००॥मध्यस्थ वृत्तिरेवं यः समदर्शी समञ्जसः । समञ्जसत्वं तद्भावः प्रजास्वविषमेक्षिता ॥२०१॥
जो राजा निग्रह करने योग्य शत्रु अथवा पुत्र दोनोंका निग्रह करता है, जिसे किसीका पक्षपात नहीं है, जो दुष्ट और मित्र, सभी को निरपराध बनानेकी इच्छा करता है और इस प्रकार मध्यस्थ रहकर जो सबपर समान दृष्टि रखता है वह समंजस कहलाता है तथा प्रजाओंको विषम दृष्टिसे नहीं देखना अर्थात् सबपर समान दृष्टि रखना ही राजाका समंजसत्व गुण है ।।२००-२०१।।
That king alone is called impartial (samanja) who restrains both foe and son alike, if they are deserving of restraint; who shows no partiality; who aspires to render both the wicked and the friendly guiltless; and who, remaining neutral, beholds all with an equal eye. To view all subjects without prejudice and with impartial vision—this indeed is the king’s virtue of equanimity (samajñasatva).200 – 201
श्लोक 202 से 208
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
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