आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142 – 143
मूकः श्रेयः पुरे जातस्तस्य भावी पुरोहितः । शिवसेनमहीपालः श्रीमांस्तन्नगरेश्वरः ॥१४२॥ वीतशोका ह्वया तस्य तनूजा वनजेक्षणा । मूकभाषणमादेशः कुमारस्य तदापने ॥१४३॥
वह गूंगा श्रेयस्पुरमें उत्पन्न हुआ था और इसका भावी पुरोहित था, उसी श्रेयस्पुर नगरका स्वामी राजा शिवसेन था, उसके कमलके समान नेत्रवाली वीतशोका नामकी पुत्री थी उसके वरके विषयमें निमित्तज्ञानियोंने आदेश दिया था कि जिसके समागमसे यह गूँगा बोलने लगेगा, वही इसका वर होगा ॥१४२-१४३॥
That mute man had been born in the city of Shreyaspura, and he was destined to become the future royal priest of Emperor Shripal. The ruler of Shreyaspura was King Shivsena, who had a daughter named Vitashoka, with eyes as lovely as lotus petals. The seers had proclaimed that her destined husband would be the man whose presence would cause the mute to miraculously find his voice.॥142–143॥
श्लोक ( Shlok ) 144 – 145
“कुण्डः शिल्पपुरोत्पन्नः स्थपतिस्तस्य भाव्यसौ । नाम्ना नरपतिस्तत्पुरेशो नरपतेः सुता ॥१४४॥रत्यादिविमलासार्द्धं तयेतस्य समागमः । अङ्गुलिप्रसादेशात् स्मरव्यपदया चिरम् ॥१४५॥
जिसकी अंगुली टेढ़ी थी वह शिल्पपुरमें उत्पन्न हुआ था और इसका होनहार स्थपति रत्न था । उसी शिल्पपुर के राजाका नाम नरपति था उसके रतिविमला नामकी पुत्री थी, निमित्तज्ञानियोंने बताया था कि जिसके देखनेसे इसकी टेढ़ी अंगुली फैलने लगेगी उसीके साथ कामक्रीड़ा करनेवाली इस कन्याका चिरकाल तक समागम रहेगा ॥१४४-१४५॥
The man with the crooked finger had been born in the city of Shilpapura, and he was destined to become the master artisan—the jewel among architects—of Emperor Shripal’s court. In that same city, King Narapati ruled, and he had a daughter named Rativimala. The seers had foretold that the man whose mere sight would cause her crooked finger to straighten would be the one with whom this maiden would share enduring conjugal joy.॥144–145॥
श्लोक ( Shlok ) 146 – 147
स वज्रमणिपाकस्य प्रधानपुरुषो भवेत् । तस्य धान्यपुरेजातिर्विशालस्तत्पुराधिपः ॥१४६॥सुता विमलसेनास्य श्रीपालस्य तदाप्तये । आदेशस्तस्य तद्वज्रमणिपाको महौजसः ॥१४७॥
जो हीराओंका भस्म बना रहा था वह इसका मंत्री होनेवाला था और धान्यपुर नगरमें पैदा हुआ था, उसी धान्यपुर नगरके राजाका नाम विशाल था उसकी एक विमलसेना नामकी कन्या थी, निमित्तज्ञानियोंने बत-लाया था कि जिसके आनेपर हीराओंका भस्म बन जायगा वही महा तेजस्वी श्रीपाल इसका पति होगा ।।१४६-१४७।।
The man who had been attempting to prepare diamond ash was destined to become Shripal’s minister, and he had been born in the city of Dhanyapura. In that same city ruled King Vishala, whose daughter was named Vimalsena. The seers had foretold that the man whose mere arrival would cause the diamond ash to be successfully created would be the supremely radiant Shripal, destined to be her husband.॥146–147॥
श्लोक ( Shlok ) 148
इत्यादेश वरं ज्ञात्वा सर्वे स्वं स्वं पुरं ययुः । तदा कुमारमूढवाऽयान्नभोभागे सुखावती ॥१४८॥
इस प्रकार निमित्तज्ञानियोंके आदेशानुसार उस पुरुषको पहिचान कर वे सब अपने अपने नगरको चले गये और उसी समय सुखावती श्री कुमारको लेकर आकाशमार्गसे चलने लगी ॥१४८॥
Thus, recognizing the destined man in accordance with the proclamations of the seers, each of those individuals returned to their respective cities. At that very moment, Sukhaavati took Prince Shripal with her and began to soar through the sky.॥148॥
श्लोक ( Shlok ) 149
धूमवेगो विलोक्यैनं विद्विषो भीषणारवः । अभितर्ज्य स्थितो रुध्वा खे खेटकयुतासिभृत् ॥१४९॥
चलते चलते इसे धूमवेग शत्रु मिला, वह कुमारको देखकर भयंकर शब्द करने लगा, और डांट दिखाकर रास्ता रोक आकाशमें खड़ा हो गया, उस समय खेटक और तलवार दोनों शस्त्र उसके पास थे ॥ १४९।।
As they journeyed onward, they encountered their enemy Dhumavega, who, upon seeing the prince, let out a terrifying roar. Brandishing threats and blocking their path, he stood menacingly in the sky, armed with both a club and a sword.॥149॥
श्लोक ( Shlok ) 150 – 151
तदा “पूर्वोदिताचार्यां देवता याऽस्य पालिका” । सा विद्याधररूपेण समुपेत्य सुखावतीम् ॥१५०॥मुक्त्वा कुमारमभ्येत्य विभीर्विद्याधराधमम् । नियुध्य विजयस्वेति निजगाद निराकुलम् ॥१५१॥
उसी समय पहले कही हुई प्रतिमापर जो इसकी रक्षा करनेवाली देवी रहती थी वह विद्याधरका रूप धारण कर आई और सुखावतीको छोड़कर कुमारको ले गई तथा सुखावतीसे कह गई कि तू निर्भय हो निराकुलतापूर्वक इस नीच विद्याधरसे लड़ना और इसे जीतना ॥१५०-१५१॥
At that very moment, the goddess appointed to protect the prince—who dwelt within the image previously mentioned—arrived, having assumed the form of a Vidyadhara. She took Shripal from Sukhaavati’s side and carried him away, saying to Sukhaavati, “Be fearless and unwavering; engage this vile Vidyadhara in battle without hesitation, and you shall surely triumph over him.”॥150–151॥
श्लोक 152 से 163
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141