आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 161 to 181
श्लोक ( Shlok )161 – 164
कमनीयैरतिप्रीतिमा लाय रतनोत्तराम् । जाह्नवी दशितावर्तनाभिः कूलनितम्बिका ॥१६१॥”चटुलोज्ज्वलपाठीनलोचना रमणोन्मुखी । तरङ्गगबाहुभिर्गाढमालिङ्गनसमुत्सुका ॥ १६२॥स्वभावसुभगा दृष्टहृदया स्वच्छतागुणात् । तटद्वयवनोत्फुल्लसुमनोमालभारिणी ॥ १६३॥”अतिवृद्धरसा वेगं सन्धर्तुमसहा द्रुतम् । पश्य कान्ते प्रियं याति स्वानुरूपं पयोनिधिम् ।।१६४।।
वह जाते समय मनोहर वचनोंसे सुलोचनाको बहुत ही संतुष्ट करता जाता था । वह कहता था कि हे प्रिये, देखो यह गंगा नदी अपने अनुरूप समुद्ररूपी पति-के पास बड़ी शीघ्रतासे जा रही है, यह अपनी नाभिरूपी भौंर दिखला रही है, दोनों किनारे ही इसके नितम्ब हैं, चंचल और उज्वल मछलियां ही नेत्र हैं, यह क्रीड़ा अथवा पतिके लिये सन्मुख है, तरंगरूपी भुजाओंके द्वारा गाढ़ आलिंगनके लिये उत्कण्ठित सी जान पड़ती है, स्वभावसे सुन्दर है, अपने स्वच्छतारूपी गुणोंसे सबका हृदय हरनेवाली है, दोनों किनारोंपर वनके फूले हुए पुष्पोंकी माला धारण कर रही है, इसका रस अथवा पानी सब ओरसे बढ़ रहा है और अपना वेग नहीं संभाल सक रही है ।।१६१-१६४।।
As he walked on, he continued to delight Sulochana with sweet and captivating words. He said, “Beloved, behold how this sacred Ganga hastens eagerly to her consort, the ocean, so well matched to her own majesty. See how she reveals her navel in the form of swirling eddies; her banks form her shapely hips; the lively, resplendent fish are like her roving eyes; she seems to approach her beloved, ready for playful sport or union. Her waves, like outstretched arms, appear yearning for a close embrace. By her very nature, she is supremely beautiful—stealing every heart with her crystal-clear purity. Adorned with garlands of blooming flowers from the forests lining both her banks, her waters swell from every side, and she can scarcely contain her rushing flow.”161 – 164
श्लोक ( Shlok )165
रतेः कामाद् विना नेच्छा न नीचेवूत्तमस्पृहा । सङ्गमे तन्मयी जाता प्रेम नामे दृशं मतम् ॥ साफल्यमेतया नित्यमेति लावण्यमम्बुधेः ॥१६५॥
सो ठीक ही है क्योंकि कामदेवके बिना रतिकी इच्छा नहीं होती है, उत्तम पुरुषोंकी इच्छाएं नीच पदार्थोंपर नहीं होती हैं, यह नदी समुद्रमें जाकर समुद्ररूप ही हो गई हैं सो ठीक ही है क्योंकि प्रेम ऐसा ही होता है, इसके समागमसे ही समुद्रका लावण्य (सौन्दर्य अथवा खारापन) सदा सफल होता है ॥ १६५॥
“It is only fitting,” he continued, “for without the presence of Kāma himself, there can be no desire for union. Noble souls do not yearn for base objects; thus it is right that this river, upon merging with the ocean, becomes one with the ocean itself—for such is the nature of true love. Indeed, only through her confluence does the ocean’s beauty—whether its charm or its riny essence—ever find its full perfection.”165
श्लोक ( Shlok )166
उत्पत्तिर्भूभूतां पत्युर्धरण्यां वर्धिता सती । वार्धिरेव पतिस्तस्मादेषाऽभूत् पापनाशिनी ॥१६६॥
इस गंगा नदीकी उत्पत्ति पर्वतों के पति-हिमवान् पर्वतसे है, पृथिवीपर यह बढ़ी है और समुद्र ही इसका पति है इसलिये ही यह संसारमें पापोंका नाश करनेवाली हुई है ।।१६६।।
“This sacred Ganga was born of Himavan, the lord of mountains; upon the earth she grew and flourished, and the ocean is verily her consort. Thus it is that she has become, in this world, the destroyer of all sins.”166
श्लोक ( Shlok )167 – 168
धवला धार्मिकैर्मान्या सतीनामुपमानताम् । गता कवीश्वरैः सर्वैः स्तूयते देवतेति च ॥१६७॥’गुणिनश्चेन्न के ‘नान्धा संस्तुवन्ति गुणप्रियाः । “इति गङ्गागतैः श्रव्यैः रन्यैश्चातिमनोहरैः ॥१६८॥
यह सफेद है, धर्मात्मा लोगोंके द्वारा मान्य है, सतियोंको इसकी उपमा दी जाती है और सब कवीश्वर यदि गुगीजनोंकी स्तुति न करें तो फिर कौन किसकी स्तुति करेगा ? इस प्रकार सुननेके योग्य गङ्गा सम्बन्धी तथा अन्य अत्यन्त मनोहर कथाओं द्वारा मार्ग तय किया । ॥१६७-१६८।।
“She is radiant in her whiteness, revered by the righteous, and likened by all to the noblest of chaste women. For if the greatest of poets do not extol the virtuous, then who shall ever sing their praises? In this manner, with many delightful and wondrous tales of Ganga and other charming accounts worthy of hearing, they continued upon their way.”167 – 168
श्लोक ( Shlok )169 – 178
ततः कतिपयैरेव प्रयाणैः कुरुजाङ्गलम् । प्राप्य तद्वर्णनाव्याजान्मोदयन् काशिपात्मजाम् ॥१६९॥”आप्त जानपदानीत फलपुष्पादिभिश्च सः । विकसन्नीलनीरे जसरोजातिविराजितैः ॥१७०।। प्रत्येत्येव प्रपश्यन्तीं सरोने त्रैर्वधूवरम् । ‘सद्वप्रजघनाभोगां वापीकूपोरुनाभिकाम् ॥१७१॥ परीतजातरूपोच्चप्राकारकटिसूत्रिकाम् । अलङ्कृतमहावीथिविलसद्बाहुबल्लरीम् ॥१७२॥ सौधोत्तुङ्गकुचां भास्वद्गोपुराननशोभिनीम् । कुङ्मामागुरुकर्पूरकर्दमाद्रितगात्रिकाम् ॥१७३॥ नानाप्रसवसन्दृब्धमालाधमिल्लधारिणीम् । तोरणाबद्धरत्नादिमालालंकृतविग्रहाम् ।।१७४।। आह्वयन्तीमिवोर्ध्वाधः पतत्केत्वग्रहस्तकैः । द्वारासंवृतिविश्रम्भनेत्रां “वासान्तरुत्सुकाम् ॥१७५॥ पुरोहितै पुरन्ध्रीभिर्मन्त्रिभिर्वैश्यविश्रुतैः । दत्तशेषः पुरः स्थित्वा साशीर्वादैः समुत्सुकैः ॥१७६॥तूर्यमङ्गलनिर्घोषैः पुरन्दर इवापरः ।सुलोचनामिवान्यां स्वां प्रविश्य नगरीं जयः ॥१७७॥ राजगेहं महानन्दविधायि विविधर्द्धिमिः ।आवसत् कान्तया सार्द्ध नगर्या हृदयं मुदा ॥१७८॥
तदनन्तर कुछ ही पड़ावों द्वारा कुरुजांगल देश पहुंचकर उसके वर्णनके बहानेसे सुलोचनाको आनन्दित करते हुए जयकुमारने अपनी उस हस्तिनागपुरी नामकी राजधानीमें प्रवेश किया जो कि देशके प्रधान प्रधान पुरुषों द्वारा लाये हुए फल पुष्प आदिकी भेंट तथा खिले हुए नील कमल और सफेद कमलोंसे अत्यन्त सुशोभित सरोवररूपी नेत्रोंसे ‘ऐसी जान पड़ती थी मानो आगे आकर वधू वरको देख ही रही हो। उत्तम धूलीसाल ही जिसका विस्तृत जघन प्रदेश था, बावड़ी और कुएं ही जिसकी विशाल नाभि थी, चारों ओर खड़ा हुआ सुवर्णका ऊंचा परकोटा ही जिसकी करवनी थी, सजी हुई बड़ी बड़ी गलियां ही जिसकी सुशोभित बाहुलताएं थीं, राजभवन ही जिसके ऊंचे कुच थे, देदीप्यमान गोपुररूपी मुखसे जो सुशोभित हो रही थी, केशर, अगुरु और कपूरके विलेपनसे जिसका शरीर गीला हो रहा था, जो अनेक प्रकारके फूलोंसे गुँथी हुई मालारूपी केशपाशको धारण कर रही थी, तोरणों में बांधी गई रत्न आदिकी मालाओंसे जिसका शरीर सुशोभित हो रहा था, जो ऊपर नीचे उड़ती हुई पताकाओंके अग्रभागरूपी हाथों-से बुलाती हुई सी जान पड़ती थी, खुले हुए दरवाजे ही जिसके विश्वासपूर्ण नेत्र थे, जो घर-घर होनेवाले उत्सवोंसे उत्कण्ठित सी जान पड़ती थी और इस प्रकार जो दूसरी सुलोचनाके समान सुशोभित हो रही थी। महाराज के दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित हो आशीर्वाद देने- वाले पुरोहित, सौभाग्यवती स्त्रियां, मंत्री और प्रसिद्ध प्रसिद्ध सेठ लोग सामने खड़े होकर जिसे शेजाक्षत दे रहे हैं ऐसे उस जयकुमारने तुरही आदि माङ्गलिक बाजों के शब्दोंके साथ साथ दूसरे इन्द्रके समान अपनी उस हस्तिनागपुरी में प्रवेश कर अनेक प्रकारकी विभूतियोंसे बहुत भारी आनन्द देनेवाले तथा उस नगरीके हृदयके समान अपने राजभवनमें प्रिया सुलोचनाके साथ साथ बड़े आनन्दसे निवास किया ।।१७०-१७८।।
Thereafter, after but a few halts along the way, Jayakumar arrived in the land of Kuru-jangala. There, under the pretext of describing the marvels of that country, he delighted Sulochana, and so reached his own capital, the famed city of Hastinagpuri. This city seemed like a radiant bride eagerly advancing to behold her bridegroom, adorned with offerings of fruits, flowers, and blossoms of blue and white lotuses presented by the foremost men of the land.
Its broad, dust-swept roads were like an expansive waist; its wells and stepwells, grand and deep, like a splendid navel; its lofty walls of gleaming gold, the ornaments of its slender form; its wide, decorated streets, the graceful arms bedecked with jewels; the towering royal palaces, the high and shapely breasts; the resplendent gopuras, the beaming face; her body moist with unguents of saffron, aloe, and camphor; her tresses, garlands woven of myriad blossoms; her form beautified by strings of gems draped across the gateways; the fluttering banners waving aloft like beckoning hands; the open doors, eyes brimming with trust; the jubilations in every home, her excitement at the bridegroom’s arrival—thus did the city, splendid as another Sulochana, appear.
Yearning to behold their sovereign, the priests offering blessings, fortunate women, ministers, and illustrious merchants stood before him with auspicious tokens in hand. Amidst the resounding music of trumpets and other instruments of victory, Jayakumar—like another Indra himself—entered his Hastinagpuri, and there, in the heart of that radiant city, he dwelt joyfully with his beloved Sulochana, delighting all with the splendor of his royal glory.169 – 178
श्लोक ( Shlok )179 – 181
तिथ्याविपञ्चभिः शुद्धैः शुद्धे लग्ने महोत्सवम् । सर्वसन्तोषणं कृत्वा जिनपूजापुरःसरम् ॥१७९।॥विश्वमङ्गलसम्पत्त्या स्वोचितासनसुस्थिताम् । हेमाङ्गदादिसान्निध्ये राजा जातमहोदयः ॥१८०॥सुलोचनां महादेवीं पट्टबन्धं “व्यधान्मुदा । स्त्रीषु सञ्चितपुण्यासु पत्युरेतावती रतिः ॥१८१॥
तदनन्तर बड़े भारी अभ्युदयको धारण करनेवाले महाराज जयकुमारने शुद्ध तिथि, शुद्ध नक्षत्र आदि पांचों बातोंसे निर्दोष लग्नमें बड़ा भारी उत्सव कराकर सबको संतुष्ट किया और फिर जिनपूजापूर्वक सब मंगल-संपदाओंके साथ साथ हेमांगद आदि भाइयोंके सामने ही अपने योग्य आसनपर बैठी हुई सुलोचनाको बड़े हर्षसे पट्टबन्ध बांधा अर्थात् पट्टरानी बनाया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यसंचय करनेवाली स्त्रियोंमें पतिका ऐसा ही प्रेम होता है ।।१७९-१८१॥
Thereafter, the illustrious Maharaja Jayakumar, who bore the mark of supreme prosperity, chose a flawless moment—pure in date, pure in constellation, and faultless in all five astrological measures—to hold a grand celebration that delighted all who attended. Then, after performing the worship of the Jinas with every auspicious rite, and in the presence of his brothers Hemaṅgada and others, he joyfully tied the coronation diadem upon Sulochana, who sat upon the rightful throne by his side, thus installing her as the chief queen. And rightly so—for among women who have amassed great merit, such is the depth of their husbands’ abiding love.179 – 181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160