आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
जय एव मदादेशादी दृशोऽन्यायवर्तिनः । समीकुर्यात्ततस्तेन स साधु दमितो युधि ॥ ६२॥
मेरी आज्ञासे जयकुमार ही अन्यायमें प्रवृत्ति करनेवाले इस प्रकारके लोगोंको दण्ड देता है इसलिये इसने युद्धमें जो उसे दण्ड दिया है वह अच्छा ही किया है ।।६२।।
“Jayakumar punishes people who act unjustly on my orders. So the punishment he gave him in the battle was right and proper.” ||62||
श्लोक ( Shlok ) 63
सदोषो यदि निर्ग्राह्यो ज्येष्ठपुत्रोऽपि भूभुजा । इति मार्गमहं ‘तस्मिन्नद्य वर्तयितुं स्थितः ॥६३॥
और की क्या बात ? यदि बड़ा पुत्र भी अपराधी हो तो राजाको उसे भी दण्ड देना चाहिये यह नीतिका मार्ग अर्ककीर्तिपर चलाने के लिये आज में तैयार बैठा हूं ।॥६३॥
“What of it? Even if the eldest son himself becomes a wrongdoer, the king must punish him as well. I stand ready today to uphold this path of justice and apply it to Arkakirti.” ||63||
श्लोक ( Shlok ) 64
अक्षिमाला’ किल प्रत्ता तस्मै कन्याऽवलेपिने” । भवद्भिरविचार्येतद् विरूप’ कमनुष्ठितम् ॥६४॥
आप लोगोंने विचार किये बिना ही उस अभिमानी के लिये अक्षमाला नामकी कन्या दे दी यह बुरा किया है ।।६४।।
“Without due thought, you all gave the maiden named Akshamala to that arrogant man—this was a grievous mistake.” ||64||
श्लोक ( Shlok ) 65
पुरस्कृत्येह तामेतां नीतः सोऽपि प्रतीक्ष्यताम् । सकलंकेति किं मूर्तिः परिहर्तु भवेद्विधोः ॥६५।।
अथवा उस प्रसिद्ध अक्षमाला कन्याकी भेंट देकर आपने उस अर्ककीतिको भी पूज्यता प्राप्त करा दी है सो ठीक ही है क्योंकि यह कलंकसहित है यह समझकर क्या चन्द्रमाकी मूर्ति छोड़ी जाती है ? ॥६५॥
“Or rather, by offering that renowned maiden Akshamala in marriage, you have indeed conferred honor upon even Arkakirti — and so be it. For, knowing that he is tainted with disgrace, should one therefore abandon the form of the moon?” ||65||
श्लोक ( Shlok ) 66
उपेक्षितः सदोषोऽपि स्वपुत्रश्चक्रवर्तिना । इतीदमयशः स्थायि “व्यधायि तदकम्पनैः ॥६६॥
परन्तु चक्रवर्तीने अपराध करनेपर भी अपने पुत्रकी उपेक्षा कर दी-उसे दण्ड नहीं दिया इस मेरे अपयशको महाराज अकंपनने स्थायी बना दिया है ॥६६।।
“Yet, even when his son committed a transgression, the emperor overlooked it and did not punish him — and by this, King Akampana has made my dishonor enduring.” ||66||
श्लोक ( Shlok ) 67
इति सन्तोष्य विश्वेशः सौमुख्यं सुमुखं नयन् । हित्वा ज्येष्ठं तुजं तोक मकरोन्न्यायमौरसम् ॥६७॥
इस प्रकार सबके स्वामी महाराज भरतने सुमुख नामके दूतको संतुष्ट कर उसका मुख प्रसन्न किया और ज्येष्ठ पुत्रको छोड़कर न्यायको ही अपना औरस पुत्र बनाया । भावार्थ-न्यायके सामने बड़े पुत्रका भी पक्ष नहीं किया ॥६७॥
“Thus, the sovereign of all, King Bharata, gladdened the envoy named Sumukha by satisfying him and, setting aside even his eldest son, made justice itself his true offspring.
Meaning: Before justice, he showed no partiality even toward his own eldest son. ||67||
श्लोक ( Shlok ) 68 –72
सुमुखस्तइया भारमिव वोढं तदाक्षमः । स जयोऽकम्पनो देव देवस्य नमति क्रमौ ॥६८॥लब्धप्रसाद इत्युक्त्वा क्षिप्त्वाऽङ्गानि प्रणम्य तम् । विकसद्वदनाम्भोजः समुत्थाय कृताञ्जलिः ॥६९।।इत एवोन्मुखौ तौ त्वत्प्रतीच्छन्तौ मदागतिम् ।आस्थातां चातको वृष्टिं प्रावृषो वाऽदिवार्मुचः ॥७०॥इति विज्ञाप्य चक्रेशात् कृतानुज्ञः कृतत्वरः । सम्प्राप्याकम्पनं नत्वा सजयं विहितादरम् ॥७१॥ गोभिः प्रकाश्य रक्तस्य प्रसादं चक्रवर्तिनः । रवेर्वा वासरारम्भस्तद्वक्त्राब्जं व्यकासयत् ॥७२॥
उसी समय चक्रवर्तीकी दयाका भार वहन करनेके लिये मानो असमर्थ हुआ सुमुख कहने लगा कि ‘हे देव’ जिन्हें आपका प्रसाद प्राप्त हो चुका है ऐसे जयकुमार और अकंपन दोनों ही आपके चरणोंको नमस्कार करते हैं, ऐसा कहकर उस दूतने अपने समस्त अंग पृथ्वीपर डालकर चक्रवर्तीको प्रणाम किया और जिसका मुखरूपी कमल विकसित हो रहा है तथा जिसने हाथ जोड़ रखे हैं ऐसा वह दूत खड़ा होकर फिर कहने लगा कि “जिस प्रकार दो चातक वर्षा ऋतुके पहले बादलसे वर्षा होनेकी इच्छा करते हैं उसी प्रकार जयकुमार और अकंपन आपके समीपसे मेरे आनेकी इच्छा करते हुए इसी ओर उन्मुख होकर बैठे होंगे” ऐसा निवेदन कर जिसने चक्रवर्तीसे आज्ञा प्राप्त की है ऐसे उस दूतने बड़ी शीघ्रतासे जाकर आदरके साथ महाराज अकंपन और जयकुमारको नमस्कार किया तथा वचनोंके द्वारा अनुराग करनेवाले चक्रवर्तीकी प्रसन्नता प्रकट कर उन दोनोंके मुखकमल इस प्रकार प्रफुल्लित कर दिये जिस प्रकार कि दिनका प्रारम्भ समय (प्रातः-काल) किरणोंके द्वारा लाल सूर्यकी प्रसन्नता प्रकटकर कमलोंको प्रफुल्लित कर देता है ॥६८-७२।।
At that very moment, as though unable to bear the weight of the Emperor’s compassion, Sumukha began to speak: “O Lord, both Jayakumar and Akampana, who have already been blessed by your grace, offer their salutations at your feet.” Saying this, the envoy prostrated himself fully upon the ground before the Emperor.
Then, his face blooming like a lotus and his hands joined in reverence, the envoy stood up and continued: “Just as two chataka birds long for rain from the clouds before the monsoon, so too are Jayakumar and Akampana turned toward this place, yearning eagerly for my return from your presence.”
Having thus received the Emperor’s command, the envoy swiftly went to Jayakumar and King Akampana, greeted them both with deep respect, and conveyed the Emperor’s words of affection. By these words, he caused their lotus-like faces to blossom with joy, just as the dawn, with its crimson rays, reveals the Sun’s delight and makes the lotuses bloom.68 –72
श्लोक 73 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61