आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52 – 55
तत्समीपे नृपेणामा यद्वा तद्वा मुखागतः । शङ्कमानो वचो वक्तुं श्रेष्ठ्यपायं विचिन्त्य सः ॥५२॥स्वीकृत्य शयनाध्यक्षं ‘सामदानैस्त्वया निशि । देवतावत्तिरोभूय राजन् पितृसमं गुरुम् ॥५३॥विनयाद् विच्युतं राजश्रेष्ठिनं तव सन्निधौ । विधाय सर्वथा मा स्थाः कार्यकाले स हूयताम् ।।५४।।इति वक्तव्यमित्याख्यत् “सोऽपि सर्वं तथाकरोत् । अर्थाथिभिरकर्तव्यं न लोके नाम किञ्चन ॥५५
वह मंत्री कुबेरदत्त सेठके सामने राजाके साथ मुँहपर आये हुए यद्वा तद्वा वचन कहनेमें कुछ डरता था इसलिये वह सेठको राजाके पाससे हटाना चाहता था । उसने राजाके शयनगृहके मुख्य पहरेदारको समझा बुझाकर और कुछ धन देकर अपने वश कर लिया, उसे समझाया कि तू रातके समय देवताके समान तिरोहित होकर राजासे कहना कि हे राजन्, राजसेठ कुबेरमित्र पिताके समान बड़े हैं, सदा अपने पास रखने में उनकी विनय नहीं हो पाती इसलिये उन्हें हमेशा अपने पास नहीं रखिये, कार्यके समय ही उन्हें बुलाया जाय इस प्रकार फल्गुमतिने शयनगृहके अध्यक्षसे कहा और उसने भी सब काम उसीके कहे अनुसार कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि धन चाहनेवाले लोगों के द्वारा नहीं करने योग्य कार्य इस संसारमें कुछ भी नहीं है ।॥५२-५५॥
“That minister, Phalgumati, though outwardly speaking whatever came to his lips in the presence of Kubera-datta and the king, inwardly feared him; therefore, he sought to remove the merchant from the king’s side. He cunningly persuaded and bribed the chief guard of the royal bedchamber, bringing him under his sway. Instructing him, he said: ‘At night, appearing before the king like a divine being, tell him, “O King, Kubera-mitra, though venerable as a father, cannot maintain due humility if kept constantly by your side; it would be better to summon him only when needed for state affairs.”’
Phalgumati thus gave his instructions, and the chief of the bedchamber carried out every detail exactly as directed. Truly, it is so—there is nothing in this world that the avaricious will not stoop to do in their pursuit of wealth.” ॥52–55॥
श्लोक ( Shlok ) 56
श्रुत्वा तद्वचनं राजा “सभीराहूय मातुलम् । नागन्तव्यमनाहूतैरित्यनालोच्य सोऽब्रवीत् ॥५६॥
शयनगृहके अधिकारीकी बात सुनकर राजाको भी कुछ भय हुआ और उसने बिना विचारे ही मामा (कुबेरमित्र) को बुलाकर कह दिया कि आप बिना बुलाये न आवें ।।५६।।
“Hearing the words of the chief of the bedchamber, the king too was seized by a measure of fear, and without thoughtful deliberation, summoned his uncle Kubera-mitra and said, ‘You shall not come to me unless called.’” ॥56॥
श्लोक ( Shlok ) 57
पश्चाद् विषविपाकिन्यः प्रागनालोचितोक्तयः । श्रेष्ठी तद्वचनात् सद्यः सोद्वेगं स्वगृहं ययौ ॥५७॥
जो बात पहले विना विचार किये ही कही जाती है उसका फल पीछे विषके समान होता है। राजाके वचन सुनकर सेठ भी दुःख सहित शीघ्र ही अपने घर चला गया ॥५७।।
“Words spoken hastily, without due reflection, bear fruits as bitter as poison. Hearing the king’s command, the merchant, filled with sorrow, swiftly returned to his home.” ॥57॥
श्लोक ( Shlok ) 58 – 60
राजा कदाचिदव्राजी घटया ललिताख्यया । विहारार्थ वनं तत्र वाप्यामालोक्य विस्मयात् ॥५८।।तटशुष्कांघ्रिपासन्नशाखाग्रस्थपरिस्फुरन् । ‘परार्ध्यवायसानीतपद्मरागमणिप्रभाम् ॥५९।।मणिं मत्वा प्रविश्यान्तर्नेषु केनाप्य’ लम्भ्यसौ । भ्रान्त्या प्रवर्तमानानां कुतः क्लेशाद् विना फलम् ॥६०॥
किसी एक दिन राजा ललितघट नामक हाथीपर बैठकर विहार करनेके लिये वनमें गया, उस वनमें एक बावड़ी थी, उसके तटपर एक सूखा वृक्ष था, उसकी एक शाखा बावड़ीके निकटसे निकली थी, उस शांखाके अग्रभागपर एक कोवेने कहींसे देदीप्यमान बहुमूल्य पद्मराग मणि लाकर रख दी। बावड़ी में उस मणिकी कान्ति पड़ रही थी, राजा तथा उसके सब साथियों ने उस कान्तिको मणि समझा और यह देखकर सवको आश्चर्य हुआ उस मणिको लेनेके लिये सब बावड़ी के भीतर घुसे परन्तु उनमें से वह मणि किसीको भी नहीं मिली सो ठीक ही है क्योंकि भ्रान्तिसे प्रवृत्ति करनेवाले पुरुषोंको क्लेशके सिवाय और क्या फल मिल सकता है ।।५८-६०।।
“One day, the king set out for a forest excursion, mounted upon an elephant named Lalitaghaṭa. In that forest stood a well, beside which grew a withered tree; from it extended a branch reaching near the edge of the well. Upon the tip of this branch, a crow had placed a resplendent and precious padmaraga gem it had found somewhere. The radiance of the gem fell upon the waters of the well, and the king and all his companions, beholding the shimmering light, mistook it for a jewel lying within. Struck with wonder, they all descended into the well seeking to claim the gem; yet none found it. Truly, it is so—for what fruit can men gain but suffering when they act upon delusion?” ॥58–60॥
श्लोक ( Shlok ) 61
चिरं निरीक्ष्य निर्विण्णाः सर्वे ते पुरसागमन् । बुद्धिर्नाग्रेसरी यस्य न निर्बन्धः फलत्यसौ ॥६१॥
उन सब लोगोंने बावड़ी में वह मणि बहुत देरतक देखी परन्तु जब नहीं मिली तब उदास हो अपने नगरको लौट आये सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रयत्नमें बुद्धि अग्रेसर नहीं होती वह प्रयत्न कभी सफल नहीं होता ॥ ६१ ॥
“All those men gazed long into the well, searching for the gem; yet when it could not be found, they returned to their city in dejection. Truly, it is so—for any endeavor not led by wisdom can never meet with success.” ॥61॥
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51