आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 44 पोदनपुर का सौंदर्य और दूत का प्रवेश
दूत पोदनपुर के बाहरी क्षेत्रों में धान, ईख, और जलाशयों से युक्त मनोहर दृश्य देखता है। वह नगर के गोपुर द्वार को पार कर बाजार और राजा के आंगन में प्रवेश करता है, जहां घोड़े और हाथियों से कीचड़युक्त दृश्य उसे प्रभावित करता है। वहां की समृद्धि और रत्नों की राशि को देखकर वह कृतार्थ अनुभव करता है। दूत द्वारपालों के माध्यम से अपना परिचय देकर बाहुबली के समीप पहुंचता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 32 to 44
श्लोक ( Shlok ) 32–36
सुगन्धिकलमामोदसंवादि श्वसितानिलैः । वासयन्तीर्दिशः शालिकणिशैरवतंसिताः ॥३२॥पीनस्तनतटोत्सङ्गगलधर्माम्बुबिन्दुभिः । मुक्ता लङ्कारजां लक्ष्मीं घटयन्तीर्निजोरसि ॥३३॥सरजोऽब्जरजःकोर्णसीमन्तरुचिरैः कचैः । ‘चूडामाबध्नतीः स्वैरग्रन्थितोत्पलदामकैः ॥ ३४।॥दधतीरातपक्लान्तमुखपर्यन्तसङ्गिनीः । लावण्यस्येव कणिकाः श्रमघर्माम्बुविप्रुषः ॥३५।।शुकान् शुकच्छदच्छायैः रुचिराङगीस्तनांशुकैः । छोत्कुर्वतीः कलक्वाणं सोऽपश्यच्छालिगोपिकाः ॥३६॥
जो सुगन्धित धानकी सुगन्धिके समान सुवासित अपनी श्वासकी वायुसे दशों दिशाओंको सुगन्धित कर रही थीं, जिन्होंने धानकी वालोंसे अपने कानों के आभूषण बनाये थे, जो अपने वक्षःस्थलपर स्थूल स्तनतटके समीपमें गिरती हुई पसीनेकी बूंदोंसे मोतियोंके अलंकारसे उत्पन्न होनेवाली शोभाको धारण कर रही थीं, जो परागसहित कमलोंकी रजसे भरे हुए माँगसे सुन्दर तथा अच्छी तरह गंथी हुई नीलकमलोंकी मालाओंसे सुशोभित केशोंसे चोटियाँ बाँधे हुई थीं, जो घाम से दुःखी हुए मुखपर लगी हुई सौन्दर्य के छोटे छोटे टुकड़ोंके समान पसीनेकी बूंदोंको धारण कर रही थीं, जिनके शरीर तोते के पंखोंके समान कान्ति वाली-हरी हरी चोलियोंसे सुशोभित हो रहे थे, और जो मनोहर शब्द करती हुई छो छो करके तोतोंको उड़ा रही थी ऐसी धानकी रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ उस दूतने देखीं ।।३२-३६।।
The messenger beheld women, fragrant as the scented breath of ripened rice fields, whose presence perfumed the ten directions;
who adorned their ears with earrings fashioned from grains of rice;
who bore the adornment of glistening pearls, born from beads of sweat falling near their full bosoms;whose hair was tied in graceful braids, adorned with garlands of indigo lotuses, rich with pollen;
whose brows, marked with the beauty of the lotus’s pollen, were exquisitely bound;who bore droplets of sweat upon sun-stricken faces like tiny shards of beauty;whose bodies were clad in verdant silks, shimmering like the feathers of parrots;and who, with soft cooing sounds, chased away the very parrots that sought to pluck the grains.Such were the guardians of the rice fields, as beheld by the messenger.32–36
श्लोक ( Shlok ) 37
भ्रमद्यात्र कुटीयन्त्रचीत्कारैरिक्षुवाटकान् । फूत्कुर्वत इवाद्राक्षीदतिपीडाभयेन सः ॥३७॥
जो चलते हुए कोल्हुओंके चीत्कार शब्दों के बहाने अत्यन्त पीड़ासे मानो रो ही रहे थे ऐसे ईखके खेत उस दूतने देखे ॥३७॥
The messenger beheld the fields of sugarcane, where, amid the ceaseless wails of the crushing mills,the crops seemed to weep in profound agony, as though mourning their fate.37
श्लोक ( Shlok ) 38
उपक्षेत्रं च गोधेनुर्महोधोभरमन्थराः । वात्सकेनोत्सुकाः स्तन्यं क्षरतोर्निचचाय सः ॥३८॥
खेतोंके समीप ही, बड़े भारी स्तनके भारसे जो धीरे धीरे चल रही हैं, जो बछड़ों के समूहसे उत्कण्ठित हो रही हैं और जो दूध झरा रही हैं ऐसी नवीन प्रसूता गायें भी उसने देखी ॥ ३८।।
Near the fields, he saw fresh cows, burdened with heavy udders, moving slowly,anxious amidst their herds of calves, and gently yielding streams of nourishing milk.38
श्लोक ( Shlok ) 39
इति रम्यान् पुरस्यास्य सीमान्तान् स विलोकयन् । मेने कृतार्थमात्मानं लब्धतद्दर्शनोत्सवम् ॥३९॥
इस प्रकार इस नगरके मनोहर सीमाप्रदेशों को देखता हुआ और उन्हें देखकर आनन्द प्राप्त करता हुआ वह दूत अपने आपको कृतार्थ मानने लगा ॥३९॥
hus, beholding the charming borderlands of the city and finding joy in their sight,the messenger felt a deep sense of fulfillment and gratitude within himself.39
श्लोक ( Shlok ) 40
उपशल्यभुवः कुल्याप्रणालीप्रसृतोदकाः । शालोक्षुजीरकक्षेत्रै वृंतास्तस्य मनोऽहरन् ।।४०।।
जिनके चारों ओर नहरकी नालियोंसे पानी फैला हुआ है और जो धान ईख और जीरेके खेतोंसे घिरी हुई हैं ऐसी उस नगरके बाहरकी पृथिवियां उस दूतका मन हरण कर रही थीं ॥४०॥
The lands beyond that city, watered by canals and ditches,encircled by fields of rice, sugarcane, and cumin,captivated and enraptured the heart of the messenger.40
श्लोक ( Shlok ) 41
वापीकूपतडागैश्च सारामैरम्बुजाकरै । पुरस्यास्य बहि र्देशास्तेनादृश्यन्तं हारिणः ॥४१॥
बावड़ी, कुएं, तालाब, बगीचे और कमलों के समूहोंसे उस नगरके बाहरके प्रदेश उस दूतको बहुत ही मनोहर दिखाई दे रहे थे ॥४१॥
The lands beyond the city, adorned with stepwells, wells, ponds, gardens, and clusters of lotuses,appeared exceedingly delightful and enchanting to the messenger.41
श्लोक ( Shlok ) 42
पुरगोपुरमुल्लङ्घच स निचायन् वणिक्पथान् । तत्र “पूगीकृतान् मेने रत्नराशीन्निधीनिव ॥४२॥
नगरके गोपुरद्वारकोउल्लंघन कर बाजार के मार्गों को देखता हुआ वह दूत वहाँ इकट्ठी की हुई रत्नोंकी राशियोंको निधियोंके समान मानने लगा ॥४२॥
Passing beyond the city’s towering gates and surveying the bustling market streets,the messenger regarded the amassed heaps of gems and treasures as akin to vast treasuries.42
श्लोक ( Shlok ) 43
नृपोपा ‘यनवाजीभलालामदजलाविलम् । कृतच्छटमिवालोक्य सोऽभ्यनन्दन्नृपाङ्गणम् ॥४३॥
जो राजाकी भेंटमें आये हुए घोड़े और हाथियोंकी लार तथा मदजलसे कीचड़सहित हो रहा था और उससे ऐसा मालूम होता था मानो उसपर जल ही छींटा गया हो ऐसे राजाके आँगनको देखकर वह दूत बहुत ही प्रसन्न हो रहा था ।॥४३।।
Observing the royal courtyard, where the drool of horses and elephants mingled with mud from revelers,and where it seemed as if water had been splashed haphazardly,the messenger found himself greatly pleased by the lively scene.) 43
श्लोक ( Shlok ) 44
स निवेदितवृत्तान्तो महादौवारपालकैः । नयं नृपासनासीनमुपासी दद् वचोहरः ॥४४॥
जिसने मुख्य मुख्य द्वारपालोंके द्वारा अपना वृत्तान्त कहला भेजा है ऐसा वह दूत राजसिंहासन पर बैठे हुए महाराज बाहुबली के समीप जा पहुँचा ।।४४।।
The messenger, bearing the account sent forth by the chief gatekeepers,approached the presence of King Bāhubalī seated upon his royal throne.44
श्लोक 45 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
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