आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
शिलातलेषु तप्तेषु निवेशितपदद्वयाः । प्रलम्बितभुजास्तस्थुगिर्यग्रग्रावगोचरे ॥१५२॥
पर्वतोंके अग्रभागकी चट्टानोंकी तपी हुई शिलाओंपर दोनों पैर रखकर तथा दोनों भुजाएं लटका कर खड़े होते थे ।।१५२॥
Standing upon the searing rocks at the summit of the mountains, they placed both feet firmly upon the heated stone, letting their arms hang loose by their sides in motionless stillness.152
श्लोक ( Shlok ) 153 –154
तप्तपांशुचिता भूमिः दावदग्धा वनस्थली । याता जलाशयाः शोषं दिशो धूमान्धकारिताः ॥१५३॥इत्यत्युग्रतर ग्रीष्मे संप्लुष्ट गिरिकानने । तस्थुरातपयोगेन ते सोढजरठातपाः ।॥१५४।।
जिस ग्रीष्मऋतुमें पृथिवी तपी हुई धूलिसे व्याप्त हो रही है, वनके सब प्रदेश दावानलसे जल गये हैं, तालाब सूख गये हैं और दिशाएं धूएंसे अन्धकारपूर्ण हो रही हैं इस प्रकारके अत्यन्त कठिन और जिसमें पर्वतोंके वन जल गये हैं ऐसी ग्रीष्मऋतुमें तीव्र संताप सहन करते हुए वे मुनिराज आतापन योग धारण कर खड़े होते थे ।।१५३-१५४।।
In the blazing summer season, when the earth is covered with scorching dust, the forest regions are consumed by wildfires, the ponds have dried up, and the quarters are darkened with smoke—when even the wooded slopes of the mountains have been reduced to ashes—amidst such extreme and oppressive heat, those noble monks stood firm in Ātāpan Yoga, enduring the intense suffering in steadfast pursuit of their austerities.153 –154
श्लोक ( Shlok ) 155
मेघान्धकारिता शेषदिक्चक्रे जलदागमे । योगिनो गमयन्ति स्म तरुमूलेषु शर्वरीः ॥१५५॥
जिसमें समस्त दिशाओंका समूह बादलों के छा जानेसे अन्धकारयुक्त हो गया है ऐसी वर्षाऋतु में वे योगी वृक्षोंके नीचे ही अपनी रात्रियाँ बिता देते थे ।।१५५।।
In the rainy season, when all the quarters of the sky are veiled in darkness by gathering clouds, those yogis would pass their nights beneath the trees, undisturbed and absorbed in their practice.155
श्लोक ( Shlok ) 156
मुसलस्थूलधाराभिः वर्षत्सु जलवाहिषु” । निशामनैषुर व्यथ्या वार्षिकों ते महर्षयः ॥१५६॥
जब बादल मूसलके समान मोटी मोटी धाराओंसे पानी बरसाते थे तब वे महर्षि वर्षाऋतुकी उन रात्रियोंको निश्चल होकर व्यतीत करते थे ।। १५६।।
When the clouds poured down torrents of rain in thick, pounding streams like pestles, those great sages would remain unmoving, passing the nights of the rainy season in steadfast stillness. 156
श्लोक ( Shlok ) 157
ध्यानगर्भगृहान्तःस्था धृतिप्रावारसंवृताः । सहन्ते स्म महासत्त्वास्ते घनाघनदुदिनम् ॥१५७।।
ध्यानरूपी गर्भगृहके भीतर स्थित और धैर्यरूपी ओढनी को ओढे हुए वे महाबलवान् मुनि बादलोंसे ढके हुए दुदिनोंको सहन करते थे ।। १५७।।
Dwelling within the sanctum of meditation and clad in the mantle of steadfast patience, those mighty monks endured the gloomy days veiled by clouds, unwavering in their inner strength.157
श्लोक ( Shlok ) 158
ते हिमानी परिक्लिष्टां तनुर्याष्ट हिमागमे । दधुरभ्यवकाशेषु शयाना मौनमास्थिताः ॥१५८॥
शीत-ऋतुके दिनों में मौन धारण कर खुले आकाशमें शयन करते हुए वे मुनि बहुत भारी बर्फ से अत्यन्त दुःखी हुई अपने शरीरको लकड़ी के समान निश्चल धारण करते थे ॥ १५८॥
During the days of the winter season, observing silence and sleeping beneath the open sky, those monks—afflicted by the intense cold and heavy snowfall—held their bodies motionless like wood, enduring the pain with unwavering stillness.158
श्लोक ( Shlok ) 159
अनग्नमुषिता” एव नग्नास्तेऽनग्निसेविनः । धृतिसंमितै “रङगेः सेहिरे हिममारुतान् ॥१५९॥
वे मुनि नग्न होकर भी कभी अग्निसेवन नहीं करते थे, वस्त्रोंसे सहित हुए के समान सदा निर्द्वन्द्व रहते थेऔर धैर्यरूपी कवचसे ढके हुए अंगोंसे शीतल पवनको सहन करते थे ॥ १५९ ॥
Though unclothed, those monks never sought the warmth of fire; ever free from dualities, they dwelt in equanimity as if clothed, enduring the chill winds with limbs shielded by the armor of unwavering patience.159
श्लोक ( Shlok ) 160
हैमनोबु त्रियामासु स्थगितास्ते हिमोच्चयैः । प्रवारितै रिवाङगैः स्वैर्धीराः स्वैरमशेरत ॥१६०॥
शीतऋतुकी रात्रियोंमें बर्फके समूहसे ढके हुए वे धीर वीर मुनिराज स्वतन्त्रतापूर्वक इस प्रकार शयन करते थे मानो उनके अंग वस्त्रसे ही ढंके हों ।। १६०।।
On wintry nights, covered in heaps of snow, those calm and valiant sages lay in repose with perfect composure, as if their limbs were wrapped in garments—though in truth they rested bare, clothed only in their fearless freedom.160
श्लोक ( Shlok ) 161
“त्रिकालविषयं योगमास्थायैवं दुरुद्वहम् । सुचिरं धारयन्ति स्म धीरास्ते धृतियोगतः ॥१६१॥
इस प्रकार वे धीर वीर मुनि तीनों काल-सम्बन्धी कठिन योग लेकर अपने धैर्यगुणके योगसे उन्हें चिर कालतक धारण करते थे ।।१६१।।
Thus, those steadfast and heroic monks undertook the most arduous practices pertaining to all three seasons, and through the power of their unwavering patience, they bore them resolutely for a long duration.161
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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