आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 62 से 71 बाहुबली के अहंकार पर क्रोध और समाधान की शुरुआत
भरत कहते हैं कि उनके भाई, विशेषकर बाहुबली, यौवन के उन्माद में योद्धा होने का दंभ पाले हैं। वे घोषणा करते हैं कि पृथिवी का उपभोग केवल वही करेंगे, और भाइयों को उनकी आज्ञा माननी होगी, अन्यथा युद्ध अपरिहार्य है। वे बाहुबली के अहंकार को विशेष रूप से निंदनीय मानते हैं, क्योंकि वह बुद्धिमान और प्रेमी होने के बावजूद विरोध कर रहा है। क्रोध में बढ़-चढ़कर बोलने पर पुरोहित उन्हें शांत करते हैं और उपायपूर्वक कार्य शुरू करने का सुझाव देते हैं, जिसे भरत स्वीकार
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
राज्यं कुलकलत्रं च नेष्टं साधारणं द्वयम् । भुङ्क्ते सार्द्ध परैर्यस्तन्न नरः पशुरेव सः ॥५२॥
राज्य और कुलवती स्त्रियाँ ये दोनों ही पदार्थ साधारण नहीं हैं, इनका उपभोग एक ही पुरुष कर सकता है। जो पुरुष इन दोनोंका अन्य पुरुषों के साथ उपभोग करता है वह पशु ही है ।।५२।।
Both sovereignty and a noble wife are not to be treated as ordinary possessions;
They are meant to be enjoyed by a single man alone.
He who shares them with others is but a beast, unworthy of the title of man.Verse 52
श्लोक ( Shlok ) 53
किमत्र बहुनोक्तेन त्वामेत्य प्रणमन्तु ते। यान्तु वा शरणं देवं त्रातारं जगतां जिनम् ॥५३॥
इस विषय में बहुत कहने से क्या लाभ है या तो वे आकर आपको प्रणाम करें या जगत्की रक्षा करनेवाले जिनेन्द्र देवकी शरण को प्राप्त हों ॥५३॥
What gain is there in further discourse on this matter?
Let them either come and bow before you,
Or seek refuge in the shelter of Lord Jinendra, the protector of the world.Verse 53
श्लोक ( Shlok ) 54
न तृतीया गतिस्तेषामेवैषां द्वितयी गतिः। प्रविशन्तु त्वदास्थानं वनं वामी मुगैः समम् ॥५४।।
आपके उन भाइयों की तीसरी गति नहीं है, इनके ये ही दो मार्ग हैं कि या तो वे आपके शिविरमें प्रवेश करें या मृगों के साथ वनमें प्रवेश करें ।। ५४।।
Your brothers have but two fates before them—
Either they will enter your camp and submit to your leadership,
Or they will venture into the wilderness, lost among the deer.Verse 54
श्लोक ( Shlok ) 55
स्वकुलान्युल्सुकानीव दहन्त्यननुवर्तनैः । अनुवर्तीनि तान्येव नेत्रस्यानन्दथुः परम् ॥५५।।
सजातीय लोग परस्परके विरुद्ध आचरणसे अंगारेके समानजलाते रहते हैं और वे ही लोग परस्परमें अनुकूल रहकर नेत्रोंके लिये अतिशय आनन्द रूप होते हैं ।॥५५॥
hose of the same kin, through actions contrary to one another, burn with the intensity of flames;
Yet when they align in harmony, they become a source of utmost joy to the eyes.Verse 55
श्लोक ( Shlok ) 56
प्रशान्तमत्सराः शान्तास्त्वां नत्वा नम्रमौलयः । सोदर्याः सुखमेधन्तां त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणः ॥५६॥
इसलिये ये आपके भाई मात्सर्य छोड़कर शान्त हो मस्तक झुकाकर आपको नमस्कार करें और आपकी प्रसन्नताकी इच्छा रखते हुए सुखसे वृद्धिको प्राप्त होते रहें ।॥५६।।
Therefore, let these brothers of yours cast off jealousy and abide in peace .Let them bow their heads in reverence before you,
And, desiring your favor, prosper evermore in happiness and growth.Verse 56
श्लोक ( Shlok ) 57
इति शासति शास्त्रज्ञे पुरोधसि सुमेधसि। प्रतिपद्यापि तत्कार्य चक्री चुक्रोध तत्क्षणम् ॥५७॥
इस प्रकार शास्त्रके जाननेवाले बुद्धिमान् पुरोहितके कह चुकनेपर चक्रवर्ती भरतने उसीके कहे अनुसार कार्य करना स्वीकार कर उसी क्षण क्रोध किया ॥५७॥
Thus, when the wise royal priest—well-versed in the scriptures—had spoken,Emperor Bharata, accepting his counsel, resolved to act upon it,And in that very moment, wrath arose within him.Verse 57
श्लोक ( Shlok ) 58 –59
आरुष्टकलुषां दृष्टि क्षिपन्दिक्ष्विव दिग्बलिम् । सधूमामिव कोपाग्नेः शिखां भ्रकुटिमुत्क्षिपन् ॥५८॥ भ्रातु भा’ण्डकृतामर्ष विषवेगमिवोद्वमन् । वाक्छलेनो च्छलन् रोषाद् बभाषे परुषा गिरः ॥५९॥
जो क्रोधसे कलुषित हुई अपनी दृष्टिको दिशाओंके लिये बलि देते हुएके समान सब दिशाओंमें फेंक रहे हैं, क्रोध-रूपी अग्निकी धूम सहित शिखाके समान भृकुटियाँ ऊंची चढ़ा रहे हैं, भाईरूपी मूलधनपर किये हुए क्रोधरूपी विषके वेगको जो वचनोंके छलसे उगल रहे हैं और जो क्रोधसे उछल रहे हैं ऐसे महाराज भरत नीचे लिखे अनुसार कठोर वचन कहने लगे ॥५८-५९॥
His gaze, tainted by wrath, darted toward all quarters,
As though offering oblations of fury to the directions themselves.
His brows arched high like the smoke-crowned flames of the fire of anger;
And the venom of rage—borne of fury toward his own brothers, the roots of his power His gaze, tainted by wrath, darted toward all quarters,
As though offering oblations of fury to the directions themselves.
His brows arched high like the smoke-crowned flames of the fire of anger;
And the venom of rage—borne of fury toward his own brothers, the roots of his power—
He began to spew forth, cloaked in the guise of words.
Thus, leaping with wrath, the great Emperor Bharata
Began to utter harsh and fiery words, as follows His gaze, tainted by wrath, darted toward all quarters,
As though offering oblations of fury to the directions themselves.
His brows arched high like the smoke-crowned flames of the fire of anger;
And the venom of rage—borne of fury toward his own brothers, the roots of his power—He began to spew forth, cloaked in the guise of words.Thus, leaping with wrath, the great Emperor Bharata
Began to utter harsh and fiery words, as follows
He began to spew forth, cloaked in the guise of words.
Thus, leaping with wrath, the great Emperor Bharata
Began to utter harsh and fiery words, as follows—Verses 58–59
श्लोक ( Shlok ) 60
कि किमात्थ दुरात्मानो भ्रातरः प्रणतां न माम् । पश्य मद्दण्डचण्डोल्कापातात्तान् शल्कसात्कृतान् ॥६०॥
हे पुरोहित, क्या कहा ? क्या कहा ? वे दुष्ट भाई मुझे प्रणाम नहीं करते हैं, अच्छा तो तू उन्हें मेरे दण्ड रूपी प्रचण्ड उल्कापातसे टुकड़े किया हुआ देख ॥ ६०॥
“What did you say, O priest? What did you say?
Those wicked brothers refuse to bow before me?
Very well, then—witness them shattered into pieces
By the blazing meteoric wrath of my punishment!”Verse 60
श्लोक ( Shlok ) 61
अदृष्टमश्रुतं कृत्यमिदं वैरमकारणम् । अवध्याः किल कुल्यत्वादिति तेषां मनीषितम् ॥६१॥
उनका यह कार्य न तो कभी देखा गया है, न सुना गया है, उनका यह वैर बिना कारण ही किया हुआ है, उनका ख्याल है कि हम लोग एक कुलमें उत्पन्न होने के कारण अवध्य हैं ।॥ ६१।।
Never has such conduct been seen, nor even heard of—
This enmity of theirs is without cause or reason.
They fancy themselves inviolable, merely because we were born of the same noble line!Verse 61
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
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