Hindi Translation of Adi purana Parv 32
श्लोक 1 से 12 : चक्रवर्ती भरत का गुफा की ओर प्रस्थान
अथानन्तर- दूसरे दिन जिन्हें जल्दी हो रही है और जो हरएक प्रकारसे तैयार हैं ऐसे सेनापति लोग चक्रवर्तीके चलनेके समयकी प्रतीक्षा करने लगे ॥१॥ हाथियोंके समूह की सेना, घोड़ोंके समूहकी सेना और पैदल चलनेवाले सैनिक, इन सबकी भीड़से केवल महा-राजका आंगन ही नहीं भर गया था किन्तु विजयार्थ पर्वतके वन भी भर गये थे ।।२।। विजयी हाथीपर चढ़ा हुआ और अनेक श्रेष्ठ राजाओंसे घिरा हुआ चक्रवर्ती जब विजयके लिये निकला तब ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि ऐरावत हाथीपर चढ़ा हुआ और देवोंसे घिरा हुआ इन्द्र सुशोभित होता है ।।३।। भरतकी वह सेना कुछ पश्चिमकी ओर जाकर सेनापतिके द्वारा शुद्ध किये हुए मार्गमें संकुचित होकर चल रही थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो वह ईर्यापथ शुद्धिको ही प्राप्त हुई हो ।।४।। जिस प्रकार मुनियोंकी विशुद्धता उत्तम गुणस्थान (आठवें, नौवें दशवें रूपी सीढियोंसे युक्त श्रेणी (उपशम श्रेणी अथवा क्षपकश्रेणी) पर चढ़ती है उसी प्रकार चक्रवर्तीकी सेना, जिसपर उत्तम सीधी सीढ़ियां बनी हुई हैं ऐसी विजयार्ध पर्वत की श्रेणीपर जा चढ़ी थी ।।५।। वहां तमिस्त्रा नामकी वह गुफा थी जो कि पर्वतकी चौड़ाई के बराबर लम्बी थी, आठ योजन ऊंची थी और उससे डेवढ़ी अर्थात् बारह योजन चौड़ी थी जो अपनी ऊँचाईके बराबर ऊंचे और कुछ अधिक छह छह योजन चौड़े वज्रमयी किवाड़ोंके युगल धारण कर रही थी जिसके दरवाजेकी चौखट महामूल्य रत्नोंसे बनी हुई होनेसे अत्यन्त देदीप्यमान थी, जो अपने नीचेसे निकलते हुए सिन्धु नदीके प्रवाहसे सुशोभित थी, चक्रवर्तीके सेनापतिको छोड़कर जिसे और कोई उघाड़ नहीं सकता था, जो सेनापतिके द्वारा पहले ही उघाड़ दी जानेसे शान्त पड़ गई थी-भीतरकी गरमी निकल जानेसे ठण्डी पड़ गई थी। जो यद्यपि जगत्की सृष्टिके समान अनादि थी तथापि किसीके द्वारा बनाई हुईके समान मालूम प्राप्त होती थी, अत्यन्त गम्भीर (गहरी) होनेके कारण जिसे मुनि लोग जिनवाणीके समान मानते थे क्योंकि जिनवाणी भी अन्त्यन्त गम्भीर (गूढ़ अर्थोसे भरी हुई) होती है। जो जीवित रहने की आशाके समान लम्बी थी, मूर्छाके समान अन्धकारमयी थी, गरमी निकल जाने तथा भीतरका प्रदेश शुद्ध हो जानेसे जो नीरोग अवस्थाको प्राप्त हुईके समान जान पड़ती थी, जिसमें चक्रवर्तीकी सेनाको छोड़कर अन्य किसीका प्रवेश करना मना था, जिसके द्वारपर रक्षाकी सब विधि की गई थी, जिसके समीप मंगलद्रव्य रक्खे हुए थे और इसलिये जो प्रसूता (बच्चा उत्पन्न करनेवाली) स्त्रीकी कुटी (प्रसूति गृह) के समान जान पड़ती थी ॥६-१२॥
श्लोक 13 से 21 : गुफा में प्रवेश और मार्ग संशय
सुई की नोकसे भी जिसका भेद नहीं हो सकता ऐसे कज्जलके समान गाढ़ अन्धकारसे भरी हुई उस गुफाको देखकर चक्रवर्तीकी सेना दूरसे ही भयभीत हो गई थी ।॥१३॥ तदनन्तर जिसे चक्रवर्ती ने आज्ञा दी है ऐसे सेनापतिने पुरोहितके साथ साथ, उस अन्धकारसे निकलनेका उपाय करने के लिये फिर प्रयत्न किया ॥१४।। उन्होंने गुफाकी दोनों ओरकी दीवालोंपर काकिणी और चूड़ामणि रत्नसे एक एक योजनकी दूरीपर सूर्य और चन्द्रमाके मण्डल लिखे ॥ १५॥ तदनन्तर उन मण्डलोंके प्रकाशसे जिसमें प्रकाश किया जा रहा है, चांदनी और धूप दोनों ही जिसमें मिल रहे हैं तथा जिसका सव अन्धकार नष्ट हो गया है, ऐसे गुफाके मध्य भागमें सेनाने प्रवेश किया ।।१६।। आगे आगे सेनापतिके साथ साथ चक्ररत्नरूपी देदीप्यमान दीपक चल रहा बा और उसके पीछे पीछे उसी मार्गसे दो भागोंमें विभक्त होकर सेना चल रही थी ॥१७॥ गृह सेना, सिन्धु नदीके प्रवाहके पूर्व तथा पश्चिमकी ओरके दोनों मार्गोंमें सिन्धु नदीके जलका उपयोग करती हुई जा रही थी ।।१८।। उन दोनों मार्गोपर चलती हुई तथा सेनापतिके द्वारा इश की हुई वह सेना उस समय दिशाओं सम्बन्धी संशयकी द्विविधताको प्राप्त हो रही थी अर्थात् उसे इस बातका संशय हो रहा था कि पूर्वदिशा कौन है ? और पश्चिम दिशा कौन है ? ॥१९॥ तदनन्तर जिनमें घास और पानी अधिक है ऐसे कितने ही मुकाम चलकर महाराज भरतने गुफाकी आधी भूमि तय की ॥ २०।। और जहां पर ‘उन्मग्नजला’ नदी ‘निमग्नजला’ नदीके साथ साथ दोनों तरफकी दीवालोंके कुण्डोंसे निकलकर सिन्धु नदीमें प्रविष्ट होती है उस स्थानपर चक्रवर्तीकी सेना जा पहुँची ॥२१॥
श्लोक 22 से 31 : नदियों का पार करना
महाराज भरतेश्वर उन दोनों नदियों के किनारेके समीप ही सेना ठहाकर कौतुकके साथ उन दोनों नदियोंकी विषमता देखने लगे ।।२२।। इन दोनोंमेंसे एक अर्थात् निमग्नजला तो लकड़ी आदिको शीघ्र ही नीचे ले जा रही है और दूसरी अर्थात् उन्मग्नजला प्रत्येक पदार्थको शीघ्र ही ऊपरकी ओर उछाल रही है। यद्यपि ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं तथापि किसी प्रकार यहाँ आकर सिन्धु नदीमें मिल रही है ॥२३॥ इन नदियोंके उतरनेका उपाय क्या है ? इस प्रकार विचार करते हुए चक्रवर्तीने वहां खड़े खड़े ही शीघ्र ही अपने स्थपति (सिलावट) रत्नको बुलाया ॥ २४।। जिनका पानी ऊपर तथा नीचेकी ओर जा रहा है ऐसी उन दोनों नदियोंको देखते हुए सिलावट रत्नने उन्हें अपनी दृष्टिमात्रसे ही क्षणभरमें अंजलि भर जलके समान तुच्छ समझ लिया ॥२५॥ उसने समझ लिया कि इस उन्मग्नजला नदीको इसके नीचे रहनेवाला महावायु ऊपरकी ओर उछा-लता है और इस निमग्नजला नदीको उसके ऊपर रहनेवाला महावायु नीचेकी ओर ले जाता है ।।२६।। इसलिये इन दोनोंका पुल बाँधनेके सिवाय और क्या उपाय हो सकता है ऐसा विचार कर उत्तम वैद्यके समान कार्यकुशल सिलावट रत्नने उन नदियोंके पार होनेका उपाय अर्थात् पुल बाँधनेका उपाय प्रारम्भ कर दिया ॥ २७॥ उसने अपनी दिव्य शक्तिकी सामर्थ्यसे निर्जन वनोंमें जो कुछ बड़े बड़े वृक्ष थे वे मँगवाये । भावार्थ अपने आश्रित देवोंके द्वारा सघन जंगलोंसे बड़े बड़े वृक्ष मँगवाये ॥२८॥ उसने मजबूत लकड़ियोंके द्वारा जलके भीतर मजबूत खम्भे खड़े कर उनपर पुल तैयार कर दिया ॥२९॥ अधिक समय लगनेपर सेनाके दुःख होगा इस बातका विचार कर उस गंभीर बुद्धिके धारक सिलावटने भरतेश्वरकी आज्ञ से क्षण भरमें ही पुल तैयार कर दिया था ।॥३०॥ पुल तैयार होते ही सेनाओंने आनन्दसे कोलाहल किया और उसी समय चक्रवर्तीकी समस्त सेना उतरकर नदियोंके उस किनारे पर जा पहुंची ।॥३१॥
श्लोक 32 से 41 : गुफा से बाहर निकलना
दूसरे दिन हाथियोंके समूहसे घिरे हुए महाराज भरतने अनेक राजाओं के साथ साथ उसी जलमय महामार्गसे कठिन रास्ता तय किया ।। ३२ ।। तदनन्तर कितने ही मुकाम चलकर और उस पर्वतरूपी दुर्ग (कठिन मार्ग) को उल्लंघन कर वे उस गुफाके उत्तर द्वारपर जा पहुँचे ।। ३३॥ आगे चलनेवाली हाथियोंकी सेनाके द्वारा उघाड़े हुए उत्तर द्वारको उल्लंघन कर चक्रवर्तीने विजयार्ध पर्वतके वनकी भूमिमें निवास किया ॥ ३४।। माताके उदर के समान गुहाके गर्भमें चिरकाल तक निवास कर वहाँसे बाहर निकले हुए सैनिकोंने ऐसा माना था मानो दूसरा जन्म ही प्राप्त हुआ हो ।॥ ३५॥ सेनाको बाहर प्रकट करती हुई वह गुफा ऐसी जान पड़ती थी मानो पहले वह बड़ी भारी तृष्णा इस मनुष्य समूहको निगल गई थी परन्तु पचानेकी शक्ति न होनेसे अब उसे फिर बाहर उगल रही हो ।॥ ३६॥ उस समय पंखोंके समान वनलताओंकी शाखाओंके अग्रभागसे हवा करता हुआ वायु ऐसा जान पड़ता था मानो चिरकालतक गुफाकी गरमीसे दुःखी हुई सेनाको आश्वासन ही दे रहा हो ।॥३७॥ जिसने ऋतु सम्बन्धी अनेक फल-फूल धारण किये हैं और जो वायुसे हिल रहा है ऐसा वह वन उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो चक्रवर्तीके आनेपर संतुष्ट होकर हिलते हुए अपने शाखा रूपी हाथोंके समूहसे नृत्य ही कर रहा हो ।॥ ३८।। जब सेनापति पहलेकी तरह यहांके भी पश्चिम म्लेच्छ खण्डको जीत चुका तब महाराज भरत अपनी सेनाओंके द्वारा मध्यम म्लेच्छ खण्डको जीतनेके लिये उद्यत हुए ॥ ३९॥ यद्यपि भरत सूर्यके समान उत्तर दिशाकी ओर निकले थे तथापि जिस प्रकार सूर्य अपने कर अर्थात् किरणोंसे लोगोंको पीड़ित करता है, पृथिवी का रस अर्थात् जल सुखा देता है, और मनुष्योंको संतप्त करता है उस प्रकार उन्होंने अपने कर अर्थात् टेक्ससे लोगोंको पीड़ित नहीं किया था, पृथिवीका रस अर्थात् आनन्द नहीं सुखाया था-नष्ट नहीं किया था और न मनुष्योंको संतप्त अर्थात् दुःखी ही किया था ।॥४०॥ सूर्य उत्तर दिशामें पहुँचकर अपनी किरणोंसे सन्ताप करता है परन्तु महाराज भरतने पृथिवीका संताप दूर कर दिया था ॥४१॥
श्लोक 42 से 51 : म्लेच्छ खंड पर विजय का उद्यम
जिनमें अनेक व्यूहोंकी रचना की गई है और जो परस्परमें मिली हुई हैं ऐसी भरतकी सेनाएँ न तो उनसे बहुत दूर ही जाती थीं और न स्वच्छन्दतापूर्वकइधर उधर ही घूमती थीं ।॥४२।। चक्रवर्तीकी विजयी सेनाओंने अनेक किले अपने वश किये, जिन्हें कोई वश नहीं कर सकता था, ऐसे राजाओंको वश किया और शत्रुओंके देश घेरे ॥४३॥ बलवान्के साथ युद्ध नहीं करना, शरणमें आये हुएकी रक्षा करना, और अपनी पृथिवीकी रक्षा करनेमें प्रयत्न करना यही विजयकी इच्छा करनेवाले राजाके योग्य आचरण हैं ।॥४४॥ इस प्रकार जिनकी सेना अथवा पराक्रमको कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ऐसे चक्रवर्ती भरतने चक्ररत्नके पीछे पीछे जाते हुए अपनी सेनाके द्वारा वहाँकी कितनी ही भूमिको अपने आधीन कर लिया ।।४५।। इतनेमें ही चिलात और आवर्त नामके दो म्लेच्छ राजाओंने शत्रुओंकी सेनाके द्वारा अपनी सेनाका पराभव होता सुना ॥४६॥ हमारे देशमें शत्रुओंकी सेना आकर उपस्थित होना यह हम दोनोंके लिये बिलकुल नई बात है, इस आये हुए संकटका हमें प्रतिकार करना चाहिये ऐसा विचार कर वे दोनों ही म्लेच्छ राजा परस्पर मिल गये ।।४७।। तदनन्तर जिसमें प्रायः करके धनुष धारण करनेवाले योद्धा हैं, तथा जो हाथियों और घोड़ोंके समूहसे सहित हैं ऐसी उन दोनों राजाओंकी सेना इधर उधरसे आकर इकट्टी मिल गई ॥४८॥ जिन्होंने भारी युद्ध करनेका उद्योग किया है ऐसे वे दोनों ही राजा क्रोधित होकर तथा पराक्रम प्रकट कर चक्रवर्तीकी सेनाओं के साथ विजिगीषुपनको प्राप्त हुए अर्थात् उन्हें जीतनेकी इच्छासे उनके प्रतिद्वन्द्वी हो गये ॥४९॥ इसीके बीच, बुद्धिमान् धीरवीर तथा सफलतापूर्वक कार्य करनेवाले मंत्रियोंने उन दोनों राजाओंको युद्धके उद्योगसे रोककर नीचे लिखे अनुसार हितकारी वचन कहे ॥५०॥ हे प्रभो, सिद्धिकी इच्छा करनेवालोंको बिना विचारे कुछ भी नहीं करना चाहिये क्योंकि जो बिना विचारे कार्य करते हैं उनके कार्योंकी सिद्धि बहुत दूर हो जाती है ।॥५१॥
श्लोक 52 से 61 : म्लेच्छ राजाओं की रणनीति
हमारी सेनाको रोकनेवाला यह कौन राजा है ? कहांसे आया है ? इसकी सेना कितनी है और यह कितना बलवान् है इन सब वातोंका विचार किये बिना ही उसकी सेनाके सन्मुख किसी भी तरह नहीं जाना चाहिये ।।५२॥ विजयार्थ पर्वतको उल्लंघन करनेवाला यह कोई साधारण मनुष्य नहीं है, यह या तो कोई देव होगा या कोई दिव्य प्रभावका धारक होगा इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ।। ५३ ।। इसलिये युद्धका उद्योग दूर रहे, हम लोगोंको किसी किलेका आश्रय लेना चाहिये, क्योंकि किलेका आश्रय लेनेवाले पुरुष बड़ेसे बड़े शत्रुको सहज ही जीत सकते हैं ।॥५४।। हिमवान् पर्वतसे विजयार्थ पर्वत तक और गङ्गा नदीसे सिन्धु नदीके किनारे तक का यह हमारा क्षेत्र स्वभावसे ही किलेके समान है, इसका पराभव कौन कर सकता है ? इसे कौन जीत सकता है ? ॥५५॥ और दूसरी बात यह भी है कि हमारी कुल-परम्परासे चले आये नागमुख और मेघमुख नामके जो देव हैं वे अवश्य ही शत्रुओंको रोक लेंगे ।।५६।। इस प्रकार मन्त्रियोंके वचनोंसे जिन्हें विजय करनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है ऐसे उन दोनों राजाओं ने शीघ्र ही पूजन कर देवताओंका स्मरण किया ।। ५७।। स्मरण करते ही नागमुख देव, बादलों का आकार धारण कर घनघोर गर्जना करते हुए चारों ओर भंझा वायुके साथ साथ जलकी वृष्टि करने लगे ।।५८।। मेघोंके द्वारा बरसाया हुआ वह जल भरतेश्वरकी सेनाको डुबोकर ऊपर नीचे तथा अगल बगल चारों ओर बहने लगा ॥५९॥ यद्यपि वह जल इतना अधिक बरसा था कि उसने आकाश और पृथिवीके अन्तरालको व्याप्त कर बाहर एक समुद्र सा बना दिया था परन्तु चक्रवर्ती के शिबिर (छावनी) में वस्त्रका एक टुकड़ा भिगोने योग्य भी वृष्टि नहीं हुई थी ।।६०।। उस समय भरतकी सेनाके ऊपर छत्ररत्न था और नीचे चर्मरत्न था, उन दोनों रत्नोंसे घिरकर रुकी हुई सेना ऐसी मालूम होती थी मानो चारों ओरसे सी ही दी गई हो अर्थात् चर्मरत्न और छत्ररत्न इन दोनोंमें चारों ओरसे टांके लगाकर बीचमें ही रोक दी गई हो ॥६१।।
श्लोक 62 से 71 : जयकुमार का पराक्रम
उस जलके प्रवाहमें भरतकी वह सेना सात दिनतक दोनों रत्नोंके भीतर ठहरी थी और उस समय वह ठीक अंडाके समान जान पड़ती थी ॥ ६२।। जिसमें चक्ररत्नके द्वारा प्रकाश किया जा रहा है ऐसे उस बारह योजन लम्बे-चौड़े अण्डाकार तम्बूमें ठहरी हुई भरतकी सेना सब तरहकी पीड़ासे रहित थी ॥६३।। उस बड़े तम्बूमें चारों दिशाओंमें चार दरवाजे विभक्त किये गये थे, उसके भीतरकी रक्षा सेनापतिने की थी और बाहरसे जय-कुमार उस सेनाकी रक्षा कर रहे थे ॥ ६४।। उस समय सिलावट रत्नने अनेक प्रकारके कपड़े के तम्बू, घासकी बड़ी बड़ी झोपड़ियां और आकाशमें चलनेवाले रथ भी तैयार किये थे ॥६५॥ बाहर कोलाहल सुनकर ‘यह क्या है’ इस प्रकार कहते हुए राजाओंने क्रोधित होकर अपना हाथ तलवारकी ओर बढ़ाया ।। ६६ ।। तदनन्तर, उस समय जिन्हें चक्रवर्तीने आदेश दिया है ऐसे गणबद्ध जातिके देवोंने क्रुद्ध होकर अपने हुंकार शब्दोंके द्वारा क्षणभरमें नागमुख देवोंको हटा दिया ।।६७।। अतिशय बलवान् कुरुवंशी राजा जयकुमारने भी दिव्य रथपर बैठकर सिंह-गर्जना करते हुए, दिव्य शस्त्रोंके द्वारा उन नागमुख देवोंको जीता ॥६८॥ उस समय युद्धके आंगनमें निरन्तर बाणोंकी वर्षा करता हुआ और शरीरपर कवच धारण किये हुए वह जयकुमार वर्षाऋतुके बादलके समान सुशोभित हो रहा था ।॥६९॥ जयकुमारके द्वारा छोड़े हुए वे देदीप्यमान बाण युद्धके आंगनमें ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो छिपे हुए नागमुखों को देखनेके लिये जलाये हुए दीपक ही हों ।। ७० ।। तदनन्तर वह जयकुमार नागमुख और मेव-मुख देवोंको जीतकर तथा मेधेश्वर नाम पाकर उस युद्धसे वापिस लौटा ॥ ७१।।
श्लोक 72 से 81 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण
उस समय वह जयकुमार बिजली गिरानेके पहले भयंकर शब्द करते हुए बादलोंकी गर्जनाके समान अपनी तेज गर्जनाके द्वारा मेघमुख देवोंको जीतता हुआ मेघेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ था ।।७२।। बार-बार बजते हुए दुन्दुभियों के शब्दोंसे जिन्होंने समस्त दिशाएँ बहिरी कर दी हैं ऐसे देवों ने इस जयकुमारके पराक्रमसे सन्तुष्ट होकर इसका जयजयकार किया था ।।७३।। तदनन्तर जिसका पराक्रम देख लिया गया है ऐसे इस जयकुमारकी चक्रवर्तीने भी बार-बार प्रशंसा की और उस वीरका सत्कार कर उन्होंने उसे मुख्य शूरवीरके पदपर नियुक्त किया ।।७४।। इन्द्र-जालके समान वह नागमुख देवोंका उपद्रव शान्त हो जानेपर जिसकी जीत प्रकट हो रही है ऐसी वह भरतकी सेना पुनः स्वस्थताको प्राप्त हो गई अर्थात् उपद्रव टल जानेपर सुखका अनुभव करने लगी ।॥७५॥ नागमुख देवोंकी सेनाके भाग जानेपर वे दोनों ही चिलात और आवर्त नामके म्लेच्छ राजा निर्बल हो गये और भयसे घबड़ाकर चक्रवर्तीके चरणोंके समीप आकर प्रणाम करने लगे ।॥७६॥ उन्होंने अपराध क्षमा कराकर भरतके लिये बहुत सा धन तथा यशरूपी धन दिया और ‘हे देव, प्रसन्न होइए’ इस प्रकार कहकर उनकी दासता स्वीकार की ।।७७।। इस समस्त पृथिवीको शत्रुरहित करते हुए प्रथम निधिपति-चक्रवर्तीने फिर अपनी सेनाके साथ साथ हिमवान् पर्वतके किनारे तक गमन किया ।॥७८॥ गमन करते समय अपने विजयी हाथियोंके द्वारा सिन्धु नदी के किनारेकी भूमिको खूंदते हुए भरतेश्वर जब सिन्धुप्रपात पर पहुँचे तब सिन्धु देवीने उनका अभिषेक किया ॥७९॥ वह देवी भरतको अपने निवास स्थानके समीप आया हुआ जानकर रत्नोंका अर्घ लेकर परिवारके साथ उनके पास आई थी ।।८०।। और उसने अपने हाथसे सुवर्णके सैकड़ों कलशोंमें भरे हुए सिन्धु नदीके पवित्र जलरो भद्रासनपर बैठे हुए महाराज भरतका अभिषेक किया था ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 : हिमवान् पर्वत की ओर प्रस्थान
अभिषेक करनेके बाद उस देवीने मंगलरूप वस्त्राभूषण पहने हुए महाराज भरतको विजयसूचक आशीर्वादों से आनन्दित किया तथा यह भी कहा कि हे देव, आज आपके दर्शनसे मैं पवित्र हुई हूँ ।।८२।। वहां उस सिन्धु देवीका दिया हुआ दिव्य भद्रासन प्राप्त कर भरतने आगेके लिये प्रस्थान किया और कुछ दूर तक पीछे पीछे आती हुई सिन्धु देवीको बिदा किया ॥८३॥ हिमवान् पर्वत के समीप पहुंचकर उसके किनारोंको जीतते हुए भरत कितने ही मुकाम चलकर हिमवत् कूट के निकट जा पहुंचे ॥८४।। वहाँ उन्होंने पुरोहितके साथ साथ उपवास कर और दिव्य अस्त्रों की पूजा कर डाभकी पवित्र शय्यापर शयन किया ।।८५।। अस्त्रोंकी पूजा करना यह एक प्रकारकी विधि ही है, कुछ चक्रवर्तीका असमर्थपना नहीं है, ऐसा विचार कर राजाओंने जिनका सन्मान किया है ऐसे भरतराजने बिना प्रयत्नके ही अपना वजूकाण्ड नामका धनुष डोरीसे सहित किया ।॥८६॥ और वैशाख नामका आसन लगाकर अपने नामके अक्षरोंसे चिह्नित तथा ऊपरकी ओर जानेवाला अपना अमोघ (अव्यर्थ) दिव्य बाण उस धनुषपर रक्खा ।।८७।। जिस समय सिंहनाद करते हुए भरतने वह बाण छोड़ा था उस समय देवोंके समूहने संतुष्ट होकर उनपर फूलोंकी अञ्जलियाँ छोड़ी थीं, अर्थात् फूलोंकी वर्षा की थी ॥८८॥जिसकी गति कहीं भी स्खलित नहीं होती ऐसा वह वाण ऊपरकी ओर दूरतक जाकर वहाँपर रहनेवाले देवके भवनमें पड़कर उस भवनको हिलाता हुआ हिमवत्कूटपर जा पहुँचा ।।८९।। मागध देवके समान कुछ विचार कर जिसने चक्रवर्तीका आगमन समझ लिया है ऐसा वहाँका रहनेवाला देव अपना मस्तक झुकाता हुआ चला ॥९०॥ और जिसने अपना कुछ क्रोध रोक लिया है ऐसा वह देव धनुषकी चापका स्पर्श करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा जहाँपर कि चक्रवर्ती विराजमान थे ॥ योग्य नहीं है फिर भी आज आपने उसका उल्लंघन कर दिया है इसलिये आपका चरित्र ९१।।
श्लोक 92 से 101 : हिमवान् देव का सत्कार
वह देव भरतसे कहने लगा कि हे देव, यह हिमवान् पर्वत अत्यन्त ऊँचा है और साधारण पुरुषोंके द्वारा उल्लंघन करने मनुष्योंको उल्लंघन करनेवाला अर्थात् लोकोत्तर है ।॥९२॥ हे देव, बहुत दूर बने हुए हम लोगोंके आवास कहाँ ? और आपका बाण कहां ? तथापि पड़ते हुए इस बाणने हम सबको एक ही साथ कम्पित कर दिया ॥९३॥ हे देव, यह आपका प्रताप बाणके व्याजसे आकाशमें उछलता हुआ ऐसा जान पड़ता था मानो हम लोगोंको गणबद्ध (चक्रवर्तीके आधीन रहनेवाली एक प्रकारकी देवोंकी सेना) देवोंके स्थानपर नियुक्त होनेके लिये बुला ही रहा था ।।९४।। जिसने समुद्रको भी जीत लिया है और विजयार्थ पर्वतकी गुफाओंके भीतर भी आक्रमण कर लिया है ऐसा यह आपका विजय करने का उद्यम आज हिमवान् पर्वतके शिखरोंपर भी फैल रहा है ॥ ९५।। हे प्रभो, आपका समस्त दिग्विजय सिद्ध हो चुका है इसलिये हे जयशील, आपकी जय हो, आप समृद्धिमान् हों और सदा बढ़ते रहें इस प्रकार आपका जयजयकार बोलना पुनरुवत है ।। ९६।। इस प्रकार उच्चारण करता हुआ जो जय जय शब्दोंसे वाचाल हो रहा है ऐसा वह उत्तम देव अन्य अनेक उत्तम देवोंके साथ साथ सब तरहके उपचारोंसे भरतकी सेवा करने लगा ।।९७।। तथा राजाओंके योग्य विधिसे राजाधिराज भरतका अभिषेक कर उसने उनके लिये औषधियोंके समूहके साथ गोशीर्ष नामका चन्दन सर्पित किया ।। ९८।। और कहा कि हे देव, आपके क्षेत्रमें रहनेवाले ये देव आपकी प्रसन्नताकी इच्छा करते हुए दूरसे ही मस्तक झुकाकर आपके लिये नमस्कार कर रहे हैं ।॥९९।। इसलिये हे देव, हम लोगोंपर प्रसन्नतासे चञ्चल हुई दृष्टि डालिये क्योंकि स्वामीकी प्रसन्नता प्राप्त होना ही सेवक लोगोंकी आजीविका प्राप्त होना है। भावार्थ-स्वामी लोग सेवकोंपर प्रसन्न रहें यहीं उनकी उचित आजीविका है ।।१००।। हे स्वामिन्, आप उचित आज्ञाओंके द्वारा हम लोगोंको सन्मानित करनेके योग्य हैं अर्थात् आप हम लोगोंको उचित आज्ञाएँ दीजिये क्योंकि सेवक लोग स्वामीकी आज्ञा मिलनेको आजीविका (तनख्वाह) की प्राप्तिसे भी कहीं बढ़कर मानते हैं ।। १०१।।
श्लोक 102 से 111 : हिमवान् देव का सत्कार और पर्वत की प्रशंसा
इस प्रकारके उस देवके वचनोंकी प्रशंसा करते हुए भरतने उन सब उत्तम देत्रोंका सत्कार किया और सवको अपने आधीन कर विदा कर दिया ॥१०२॥ उस समय अपने इच्छानुसार स्वरोंका चढ़ाव-उतार करनेवाले किन्नर देव उस पर्वतके लतागृहोंके प्रदेशों में ‘भरतने हिमवान् देवको जीत लिया है’ इस बातको सूचित करने-वाले मंगलगीत गा रहे थे ॥ १०३॥ उस समय वहां किन्नर देवोंकी स्त्रियोंके स्तन ढकनेवाले वस्त्रोंको बार-बार हिलाता हुआ तथा तालाबकी तरंगोंको छिन्न भिन्न करता हुआ उस हिमवान् पर्वतके वनोंका वायु धीरे धीरे बह रहा था ।। १०४।। स्थल कमलिनियोंके वनके चारों ओर केशरसे उत्पन्न हुआ रज फैलाता हुआ तथा हिमवान् पर्वतके लतागृहोंसे आया हुआ शीतल वायु महाराज भरतकी सेवा कर रहा था ।। १०५।। दिग्विजय करनेसे प्राप्त हुई भरतकी कीति जयलक्ष्मीके साथ साथ स्थलकमलिनियोंके समान हिमवान् पर्वतके लतागृहोंमें फैल रही थी ॥१०६॥ जिन्होंने फूले हुए स्थल कमलोंसे उपहारका काम किया है ऐसे हिमवान् पर्वतके स्थलोंमें चारों ओर देखते हुए भरतको बहुत ही संतोष होता था ।।१०७।। वह हिमवान् पर्वत ठीक भरतके समान था क्योंकि जिस प्रकार भरत उच्चैवृत्ति अर्थात् उत्कृष्ट व्यवहार धारण करनेवाले थे उसी प्रकार वह पर्वत भी उच्चैर्वृत्ति अर्थात् बहुत ऊँचा था, जिस प्रकार भरतने अपने तेजसे समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली थी उसी प्रकार उस पर्वतने भी अपने विस्तार से समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली थीं, जिस प्रकार भरत आयति अर्थात् उत्तम भवितव्यता (भविष्यत्काल) धारण करते थे उसी प्रकार वह पर्वत भी आयति अर्थात् लम्बाई धारण कर रहा था और जिस प्रकार भरतके पास अनेक रत्नरूपी सम्पदाएँ थीं उसी प्रकार उस पर्वत के पास भी अनेक रत्नरूपी सम्पदाएँ थीं। इस प्रकार अपनी समानता रखनेवाले उस हिमवान् पर्वतको भरतने बहुत कुछ माना था-आदरकी दृष्टिसे देखा था ।॥ १०८॥ इसी बीचमें, जब कि महाराज भरत अपनी दृष्टि हिमवान् पर्वतपर डाले हुए थे उसकी शोभा निहार रहे थे तब पुरोहित उन्हें आनन्दित करनेके लिये नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट वचन कहने लगा ॥१०९।। हे प्रभो, यह हिमवान् पर्वत बहुत ही उत्तुङ्ग अर्थात् ऊँचा है, सदा श्री अर्थात् शोभा से सहित रहता है और कुलक्षोणीभूत् अर्थात् कुलाचलोंमें श्रेष्ठ है इसलिये आपका अनुकरण करता है-आपकी समानता धारण करता है क्योंकि आप भी तो उत्तुङ्ग अर्थात् उदारमना हैं, सदा श्री अर्थात् राज्यलक्ष्मीसे सहित रहते हैं और कुलक्षोणीभृत् अर्थात् वंशपरम्परासे आये हुए राजाओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ११०॥ अहा, कितना आश्चर्य है कि यह बड़ा भारी पर्वत, जो कि कठिनाईसे चढ़ने योग्य है और जिसका पार होना अत्यन्त कठिन है, डोरीपर बाण रखते ही आपके पुण्य प्रतापसे आपके वश हो गया है ॥ १११।।
श्लोक 112 से 121 : हिमवान् पर्वत की शोभा
इसकी सुवर्णमयी श्रेणी अनेक प्रकार के रत्नोंसे सुशोभित हो रही है, सौ योजन ऊँची है और ऐसी जान पड़ती है मानो टांकीसे गढ़ कर ही बनाई गई हो ।। ११२।। अपने पूर्व और पश्चिमके कोणोंसे ‘लवण समुद्रमें प्रवेश कर’ पड़ा हुआ यह पर्वत ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो पृथिवीके नापनेका एक दण्ड ही हो ॥११३॥ हे भरतश्रेष्ठ, यह श्रेष्ठ पर्वत भरतक्षेत्रसे दूने विस्तारवाला है और मूल, मध्य तथा ऊपर तीनों भागोंमें इसका एक समान विस्तार है ।।११४।। जिसमें सिद्ध, विद्याधर और नागकुमार निरन्तर निवास करते हैं ऐसी यह मनोहर वनकी पंक्ति इस पर्वतके प्रत्येक शिखरपर शोभाय-मान हो रही है ।।११५॥ देदीप्यमान मणियोंसे चित्र विचित्र हुए इस पर्वतके किनारेके प्रदेश बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे हैं और भीतर पड़ते हुए देवांगनाओंके प्रतिबिम्बोंसे ऐसे जान पड़ते हैं मानो उनमें अनेक चित्र ही खींचे गये हों ॥ ११६।। सुन्दर लतागृहोंसे अपनी इच्छानुसार उपभोग करने योग्य इस पर्वतके किनारोंपर अपनी अपनी स्त्रियोंके साथ विद्याधर लोग टहल रहे हैं ।॥ ११७।। जो देव लोग अपनी अप्सराओंके साथ इस पर्वतके निर्जन पवित्र और रमणीय किनारोंपर क्रीड़ा कर लेते हैं फिर उन्हें किसी दूसरी जगह संतोष नहीं होताहै ॥११८॥ जो फूले हुए फूलरूपी हास्यसे सहित हैं ऐसे इसके किनारेके वनके प्रदेश ऐसे जान पड़ते हैं मानो अपनी शोभासे देवोंके बगीचेकी शोभाकी हँसी ही कर रहे हों ॥११९॥ यह पर्वत अपने मस्तक (शिखर) से उस शोभाको धारण करता है, जो कि, सदा नाशरहित है और स्मृतिके जानकार पण्डित लोग जिसे इन्द्राणीके सौभाग्यका अहंकार दूर करनेवाली कहते हैं ।॥१२०॥ इसके मस्तकपर पद्म नामका वह सरोवर है जिसमें कि श्री देवीका निवास है, शास्त्रकारोंने जिसका बहुत कुछ वर्णन किया है, जिसमें स्वच्छ जल भरा हुआ है, और जो फूले हुए सुवर्ण कमलोंसे सुशोभित है ।॥१२१।।
श्लोक 122 से 130 : हिमवान् की नदियाँ और दोष
यह पर्वत क्रमसे इस पद्मसरोवरके पूर्व तथा पश्चिम तोरणसे निकली हुई गङ्गा और सिन्धुनामकी महानदियोंको धारण करता है ।। १२२।। तथा पद्म सरोवरके उत्तर तोरणद्वारसे निकलकर उत्तरकी ओर गई हुई रोहितास्या नदीको भी यह पर्वत धारण करता है ॥ १२३॥ यह पर्वत इन अलंघ्य तीन महानदियोंसे ऐसा सुशो-भित होता है मानो उत्साह, मन्त्र और प्रभुत्व इन तीन शक्तियोंसे अपना भूभृद्भाव अर्थात् राजा पना (पक्षमें पर्वतपना) ही प्रकट कर रहा हो ॥ १२४॥ देदीप्यमान तथा दिशाओंको व्याप्त करनेवाले अपने अनेक शिखरोंसे यह पर्वत ऐसा जान पड़ता है मानो आकाशरूपी आँगनको कीलोंसे युक्त कर देवोंका मार्ग ही रोक रहा हो ॥ १२५ ॥ इस पर्वतराजपर देवोंके अनेक आवास हैं जो कि अपनी शोभासे स्वर्गकी बहुत भारी शोभा की भी हंसी करते हैं ।॥ १२६॥ इस प्रकार इस पर्वतमें अनेक गुण होनेपर भी एक बड़ा भारी दोष है और वह यह कि यह स्वयं गुरु अर्थात् बड़ा होकर भी अपने चारों ओर लगे हुए अगुरु द्रुम अर्थात् छोटे छोटे वृक्षोंको धारण करता है (परिहार पक्षमें अगुरु द्रुमका अर्थ अगुरु चन्दनके वृक्ष लेना चाहिये) ॥१२७।। यह पर्वत जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवकी सदृशता धारण करता है क्योंकि जिस प्रकार भगवान् वृषभदेव अपनी अलंघ्य महिमासे उदग्र अर्थात् उत्कृष्ट हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी अपनी अलंघ्य महिमासे उदग्र अर्थात् ऊँचा है और जिस प्रकार भगवान् वृषभदेवने अपनी गरिमा अर्थात् गुरुपने से समस्त विश्वको व्याप्त कर लिया था उसी प्रकार इस पर्वतने भी अपनी गरिमा अर्थात् भारीपनसे समस्त विश्वको व्याप्त कर लिया है। भावार्थ-जिस प्रकार भगवान् वृषभदेवका गुरुपना समस्त लोकमें प्रसिद्ध है उसी प्रकार इस पर्वतका भारीपना भी लोकमें प्रसिद्ध है, अथवा इस पर्वतने अपने विस्तारसे लोकका बहुत कुछ अंश व्याप्त कर लिया है ।॥ १२८॥ इस प्रकार जब पुरोहित उस पर्वतकी उत्कृष्ट शोभाका वर्णन कर चुका तब भरतेश्वरने भी प्रसन्न होकर उस पर्वतकी प्रशंसा की ।। १२९।। अपने उपभोग करने योग्य क्षेत्रकी सीमा स्वरूप हिमवान् पर्वतकी प्रशंसा कर महाराज भरत कुतूहलवश वृषभाचलको देखनेको लिये लौटे ।।१३०।।
श्लोक 131 से 141 : वृषभाचल का दर्शन
जो सौ योजन ऊँचा है, मूल तथा ऊपर क्रमसे सौ और पचास योजन चौड़ा है एवं ऊपर की ओर उठा हुआ होनेसे पृथिवीके मस्तकके समान जान पड़ता है। जिसके ऊपरके गनोहर प्रदेश केलोंके समूहसे सुशोभित लतागृहोंसे आकाशगामी देव तथा विद्याधरोंके उपभोग करने योग्य हैं, नाग सहजना और नागकेशरके वृक्षोंसे घिरे हुए तथा सेवन करने योग्य जिस पर्वत के समीपके वनों को देव लोग कभी नहीं छोड़ते हैं। अपने तटपर लगे हुए स्फटिक मणियोंकी फैलती हुई प्रभासे जिसने समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली हैं, जिसका शरीर शरऋतुके बादलों से बना हुआ-सा जान पड़ता है और जो सदा देव तथा विद्याधरोंसे सहित रहता है, ऐसे उस पर्वतको लोकके एक आभूषणके समान देखते हुए श्रीमान् भरतने अपने यशका प्रतिविम्व माना था ।।१३१-१३५॥ जो एक सफेद रंगका है और जो कल्पान्त काल तक कभी नष्ट नहीं होता ऐसे उस वृषभाचलको अपने यशकी राशिके समान देखते हुए महाराज भरत बहुत ही आनन्दित हुए थे ।। १३६।। उस समय वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त शत्रुओं की मायाको नष्ट करनेवाले चक्रवर्ती भरतको अपने सभीप आता हुआ जानकर चारों ओर बहनेवाले बनके वायुके द्वारा सामने जाकर उनका स्वागत सत्कार ही कर रहा हो ॥१३७।। वहांपर भरतने उस पर्वतके किनारे के समीप विश्राम करते हुए विद्याधर नागकुमार और किन्नर देवों के द्वारा गाया हुआ अपना निर्मल यश भी सुना था ।।१३८ ।। स्फटिकके समान
निर्मल और विजयलक्ष्मीके मुख देखने के लिये मंगलमय दर्पणके समान उस वृषभाचलके किनारे की दीवाले भरतका मन हरण कर रही थीं ।॥ १३९।। समस्त पृथिवीको जीतनेवाले चक्रवर्ती भरतको उस पर्वतके किनारेकी शिलाकी दीवालोंपर अपने नामके अक्षर लिखने में बहुत कुछ संतोष हुआ था ।।१४०।। चक्रवर्ती भरतने काकिणी रत्न लेकर ज्योंही वहाँ कुछ लिखनेकी इच्छा की त्योंही उन्होंने वहाँ लिखे हुए हजारों चक्रवर्ती राजाओंके नाम देखे ॥ १४१।।
श्लोक 142 से 154 : भरत की प्रशस्ति
असंख्यात करोड़ कल्पोंमें जो चक्रवर्ती हुए थे उन सबके नामोंसे भरे हुए उस वृषभाचलको देखकर भरत को बहुत ही विस्मय हुआ ।। १४२ ।। तदनन्तर जिसका कुछ अभिमान दूर हुआ है ऐसे चक्रवर्ती ने आश्चर्यचकित होकर इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीको अनन्यशासन अर्थात् जिसपर दूसरेका शासन न चलता हो ऐसा नहीं माना था । भावार्थ-वृषभाचलकी दीवालोंपर असंख्यात चक्रतियों के नाम लिखे हुए देखकर भरतका सब अभिमान नष्ट हो गया और उन्होंने स्वीकार किया कि इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीपर मेरे समान अनेक शक्तिशाली राजा हो गये हैं ।।१४३।। चक्रवर्ती भरतने किसी एक चक्रवर्तीके नामकी प्रशस्तिको स्वयं-अपने हाथसे मिटाया और वैसा करते हुए उन्होंने प्रायः समस्त संसारको स्वार्थपरायण समझा ।।१४४।।
अथानन्तर-यश ही जिसका धन है ऐसे चक्रवर्तीने अपने हाथके तलभागके समान चिकने उस शिलापट्टगर नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट अर्थसे भरी हुई प्रशस्ति लिखी ॥१४५॥ स्वस्ति श्री इक्ष्वाकु वंशरूपी आकाशका चन्द्रमा और चारों दिशाओंकी पृथिवीका स्वामी में भरत हूँ, मैं अपनी माताके सौ पुत्रोंमें से एक बड़ा पुत्र हूँ, श्रीमान् हूँ, मैंने समस्त विद्याधर देव और भूमिगोचरी राजाओंको नम्रीभूत किया है, प्रजापति भगवान् वृषभदेवका पुत्र हूँ, गनु हूं, मान्य हूँ, शूरवीर हूँ, पवित्र हूँ, उत्कृष्ट बुद्धिका धारक हूँ, चरमशरीरी हूँ, धीर वीर हूँ चक्रतियोंमें प्रथम हूँ और इसके सिवाय जिस विजयीने दिग्विजयके समय समस्त पृथिवीमण्डल की परिक्रमा दी है अर्थात् समस्त पृथिवीमण्डलपर आक्रमण किया है, जिसके जल और स्थल में चलनेवाले अठारह करोड़ घोड़े हैं, जिसकी विजयी सेनामें चौरासी लाख मदोन्मत्त हाथी निर्मल और विजयलक्ष्मीके मुख देखनेके लिए मगलमय दर्पणके समान उस वृषभाचलके किनारे-की दीवारे भरतका मन हरण कर रही थी ।। १३९ ॥ समस्त पृथिवीको जीतनेवाले चक्रवर्ती भरतको उस पर्वतके किनारेकी शिलाकी दीवारोपर अपने नामके अक्षर लिखनेमे बहुत कुछ सन्तोप हुआ था ।। १४० ।। चक्रवर्ती भरतने काकिणी रत्न लेकर ज्यों ही वहाँ कुछ लिखनेकी इच्छा की त्यो ही उन्होने वहाँ लिखे हुए हजारो चक्रवर्ती राजाओके नाम देखे ॥१४१।। असख्यात करोड कल्पोमें जो चक्रवर्ती हुए थे उन सबके नामोसे भरे हुए उस वृपभाचलको देखकर भरत-को वहुत ही विस्मय हुआ ।। १४२ ।। तदनन्तर जिसका कुछ अभिमान दूर हुआ है ऐसे चक्र-वर्तीने आश्चर्यचकित होकर इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीको अनन्यशासन अर्थात् जिसपर दूसरेका शासन न चलता हो ऐसा नही माना था। भावार्थ वृपभाचलकी दीवालोपर असंख्यात चक्रर्वार्तयोके नाम लिखे हुए देखकर भरतका सव अभिमान नष्ट हो गया और उन्होने स्वीकार किया कि इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीपर मेरे समान अनेक शक्तिशाली राजा हो गये है ।। १४३ ।। चक्रवर्ती भरतने किसी एक चक्रवर्तीके नामकी प्रशस्तिको स्वयं अपने हाथसे मिटाया और वैसा करते हुए उन्होने प्रायः समस्त ससारको स्वार्थपरायण समझा ।। १४४ ॥
अथानन्तर – यश ही जिसका धन है ऐसे चक्रवर्तीने अपने हाथके तलभागके समान चिकने उस शिलापट्टपर नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट अर्थसे भरी हुई प्रशस्ति लिखी ॥ १४५ ॥ स्वस्ति श्री इक्ष्वाकु वशरूपी आकाशका चन्द्रमा और चारो दिगाओकी पृथिवीका स्वामी मै भरत हूँ, मैं अपनी माताके सौ पुत्रोमे-से एक वडा पुत्र हूँ, श्रीमान् हूँ, मैने समस्त विद्याधर देव और भूमिगोचरी राजाओको नम्रीभूत किया है, प्रजापति भगवान् वृषभदेवका पुत्र हूँ, मनु हूँ, मान्य हूँ, शूरवीर हूँ, पवित्र हूँ, उत्कृष्ट बुद्धिका धारक हूँ, चरमगरीरी हूँ, धीर वीर हूँ, चक्रर्वातयोमे प्रथम हूँ और इसके सिवाय जिस विजयीने दिग्विजयके समय समस्त पृथिवीमण्डल-की परिक्रमा दी है अर्थात् समस्त पृथिवीमण्डलपर आक्रमण किया है, जिसके जल और स्थल-मे चलनेवाले अठारह करोड़ घोड़े है, जिसकी विजयी सेनामे चौरासी लाख मदोन्मत्त हाथी सेनाकी धूलिसे समस्त दिशाओके साथ-साथ आकाश भर जाता है, समस्त दियाओको वन करनेवाले जिसका चन्द्रमाकी कलाओके समान निर्मल यग कुलपर्वतोके मध्यभागमे देव लोग बार-वार गाते हैं, दिग्विजयके समय चक्रके पीछे-पीछे चलनेसे थकी हुई जिसकी रोनाओने हिमवान् पर्वतकी तराईको उल्लंघन कर दियाओके अन्तभागमे विश्राम लिया है, जो थी नाभिराजका पांत्र है, श्री वृपभदेवका पुत्र है, जिसने छह खण्डोसे मुगोभित इस समस्त पृथिवीका पालन किया है और जो समस्त राजाओंको जीतनेवाला है ऐसे मुझ भरतने लक्ष्मीको नव्वर समझकर जगत्मे फैलनेवाली अपनी कीर्तिको इस पर्वतपर स्थापित किया है ।। १४६ – १५४ ॥
श्लोक 155 से 171 : गंगापात पर अभिषेक
इस प्रकार चक्रवर्तीने अपनी प्रगस्ति स्वयं अक्षरोके द्वारा लिखी, जिस समय चक्रवर्ती उक्त प्रगस्ति लिख रहे थे उस समय देव लोग उनपर फूलोकी वर्षा कर रहे थे ।। १५५ ।। वहाँ जोर-जोरसे शब्द करते हुए गम्भीर नगाड़े वज रहे थे, आकागमें देव लोग जय-जय इस प्रकार संकड़ो आगी-वर्वाद रूप गब्दोंका उच्चारण कर रहे थे ।। १५६ ।। और गंगा नदीके जलकी बूँदोंके समूहको धारण करता हुआ तथा कल्पवृक्षोके सघन वनको हिलाता हुआ वायु धीरे-धीरे वह रहा था ।।१५७॥ भरतके नामके अक्षरोकी पंक्ति केवल गिलाकी दीवारपर ही नही लिखी गयी थी किन्तु उन्होने काले चिह्नके वहानेसे चन्द्रमाके मण्डलमें भी लिख दी थी। भावार्थ चन्द्रमा के मण्डलमे जो काला-काला चिह्न दिखाई देता है वह उसका चिह्न नही है, किन्तु भरतके नामके अक्षरोकी पंक्ति ही है, यहाँ कविने अपतुति अलंकारका आश्रय लेकर वर्णन किया है ।।१५८।। अन्य प्रशस्तियोके समान भरतकी इस प्रगस्तिमें भी लेख, साक्षी और उपभोग करने-योग्य क्षेत्र ये तीनो ही वाते थी क्योकि लेख तो वृपभाचलपर लिखा ही गया था, दिग्विजय करनेसे छह खण्ड भरत उपभोग करनेयोग्य क्षेत्र था और देव लोग साक्षी थे ।। १५९ ।। अहा, यह चक्रवर्ती वडा प्रतापी है क्योकि इसने समस्त दिशाओको जीतते समय पूर्व पश्चिम और दक्षिणके तीनो समुद्रपर्यन्त समस्त भूमण्डलपर आक्रमण किया है – समस्त भरत-को अपने वा कर लिया है। यद्यपि विजयार्थ पर्वत उल्लघन करनेयोग्य नही है तथापि इसने उसे लीला मात्रमें ही उल्लंघन कर दिया है और इसकी कीति स्थल कमलिनीके समान हिमालय पर्वतकी शिखरपर आरूढ़ हो गई है। इस प्रकार जिनका पराक्रम देख लिया गया है ऐसे उन भरत महाराजकी बड़े बड़े देव भी स्तुति कर रहे थे और अपनी अपनी स्त्रियोंसे सहित विद्या-धर लोग भी भाग्यसे उन्हें बढ़ा रहे थे अर्थात् आशीर्वाद दे रहे थे ।। १६०-१६२।।
तदनन्तर-जिन्हें देवोंने फिर भी उत्साहित किया है ऐसे महाराज भरत अपने विजय के उद्योगको कम न करते हुए गङ्गापात (जहाँ हिमवान् पर्वतसे गङ्गा नदी पड़ती है उसे गङ्गा-पात कहते हैं) के सन्मुख इस प्रकार गये मानो उसके शब्दोंके द्वारा बुलाये ही गये हों ।। १६३।। ऊपरसे गिरती हुई गङ्गा नदीके जलके समीपसे उछटे हुए छोटे छोटे जलकण राजाओंके हाथियों के मदकी बूंदोंके साथ इस प्रकार मिल रहे थे मानो वे दोनों परस्पर फाग ही खेलना चाहते हों अर्थात् एक दूसरेको सींचना ही चाहते हों ।॥ १६४।। पड़ते हुए गङ्गाजलकी भंवरोंसे जिसका कौतूहल बढ़ रहा है ऐसे भरतका गङ्गापातके स्थानपर अर्घ धारण करनेवाली गङ्गा देवीने सामने आकर सत्कार किया ।। १६५॥ गङ्गादेवीने चक्रवर्ती भरतको पूर्व दिशाकी ओर मुख कर सिंहासनपर बैठाया और फिर सुखकारी, शीतल तथा चन्द्रमाकी किरणोंकी हँसी करनेवाले गङ्गा नदीके जलसे उनका अभिषेक किया ॥ १६६॥ जिसमें मंगल संगीत, आशीर्वाद वचन और तुरही आदि वाजोंके शब्द मिले हुए हैं ऐसे अभिषेकको समाप्त कर विजयशील भरतने उसी गङ्गादेवीसे सब वस्त्राभूषण भी प्राप्त किये ।।१६७।। तदनन्तर देदीप्यमान रत्नोंकी किरणोंसे जिसने आकाश भी व्याप्त कर लिया है और जो इन्द्रधनुष सहित सुमेरु पर्वतकी शिखरके समान जान पड़ता है ऐसा एक सिंहासन गङ्गादेवीने भरतके लिये समर्पित किया ।।१६८।। और फिर ‘सदा बढ़नेवाले हे महाराज भरत, आप चिर कालतक बढ़ते रहिये, चिरकाल तक जीवित रहिये और चिरकाल तक आनन्दित रहिये अथवा समृद्धि-मान् रहिये इस प्रकार आशीर्वाद देकर भरत महाराजके द्वारा बिदा की हुई वह गङ्गादेवी तिरोहित हो गई ।।१६९।।
अथानन्तर-सेनाके साथ साथ गङ्गाके किनारे किनारे जाते हुए भरतकी अनेक देशोंके स्वामी-राजाओंने और गङ्गा नदीके जलकी बूंदोंको धारण करनेवाले वायुने सेवा की थी ।।१७०।। गङ्गा किनारे के वनोंके समीपवर्ती भागोंमें पीछेसे आता हुआ वनका वायु चक्रवर्ती को सुखी कर रहा था ।। १७१।।
श्लोक 172 से 181 : विजयार्थ पर्वत की ओर वापसी
वहांके वनमें भीलोंकी स्त्रियोंके केशोंके समूहको उड़ाता हुआ, नृत्य करते हुए वनमयूरोंकी पूंछपर बार-बार टकराता हुआ, भूमरोंको इधर-उधर भगाता हुआ, फूली हुई बनकी लताओंको कुछ कुछ हिलाता हुआ और पहाड़ी झरनोंके स्पर्णसे शीतल हुआ वायु चारों ओर वह रहा था ।।१७२-१७३।। विजय करनेवाली सेनाके द्वारा दवाय हुए उन देशोंमें निवास करनेवाले राजा लोग तमू होकर प्रत्येक पड़ावपर महाराज भरतकी आराधना करते थे ।।१७४।। इस प्रकार उत्तर भरत क्षेत्रकी समस्त पृथिवीको वशकर बिजयी महाराज भरत फिरसे विजयार्थ पर्वतकी तराईमे आ पहुँचे ॥ १७५।। वहाँ पर उन्होंने सेना ठहराकर सेनापतिके लिये आज्ञा दी कि ‘गुफाका द्वार उघाड़कर शीघ्र ही पूर्व सण्डकी विजय प्राप्त करो’ ।।१७६।। जब तक सेनापति म्लेच्छराजाओंको जीतकर वापिस आया तब तक सुखपूर्वक रहते हुए महाराज भरतके छह महीने बहींपर व्यतीत हो गये ॥ १७७।। विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण तथा उत्तर श्रेणीपर निवास करनेवाले विद्याधर लोग अपने अपने स्वामियों के साथ महाराज भरतका दर्शन करनेके लिये वहींपर आये ॥ १७८।। दूरसे ही मस्तक झुकाने-वाले विद्याधर राजाओंने नखोंकी किरणोंके समूहके बहानेसे महाराज भरतकी आज्ञा अपने शिरपर धारण की थी। भावार्थ नमस्कार करते समय विद्याधरराजाओंके मस्तक पर जो भरत महाराजके चरणोंके नखोंकी किरणें पड़ती थीं उनसे वे ऐसे मालुम होते थे मानो भरतकी आज्ञा ही अपने मस्तकपर धारण कर रहे हों ।॥ १७९॥ नमि और विनमि दोनों ही विद्याधरोंके राजा अपने मुख्य धनकी सामग्रीके साथ भरतके दर्शन करनेके लिये समीप आये ॥१८०॥ नमि और विनमि जो अन्य किसीको नहीं मिलनेवाली विद्याधरोंचे देशकी मुख्य धनरूप सम्पत्ति भेंटमें लाये थे उससे गहाराज भरतको भारी संतोष हुआ था ।।१८१॥
श्लोक 182 से 191 : सुभद्रा से विवाह और म्लेच्छ खंड की विजय
जिरा प्रकार नदियों के प्रवाहसे समुद्र पूर्ण हो जाता है उसी प्रकार उस समय नमि और विनमिके द्वारा उपहारमें लाये हुए कन्यारत्न आदि अनेक रत्नोंके समूहसे महाराज भरतकी इच्छा पूर्ण हो गई थी ॥१८२॥ श्रीमान् भरतने राजा नमिकी बहिन सुभद्रा नामकी उत्तम कन्याके साथविद्याधरोंके योग्य मंगलाचारपूर्वक विवाह किया ॥१८३॥ रसकी धाराके समान मनोहर उस सुभद्राको पाकर उत्कृष्ट आनन्दसे भरे हुए चक्रवर्तीने अपना जन्म सफल माना था ।।१८४।।
इतने में ही जिसने अपनी सेनाके द्वारा समस्त म्लेच्छ राजाओंकी सेना जीत ली है ऐसे सेनापति ने जयलक्ष्मीको आगे कर महाराज भरतके दर्शन किये ।।१८५।। जिसने अपना कार्य पूर्ण किया है ऐसे सेनापतिका सन्मान कर और आये हुए म्लेच्छ राजाओंको बिदाकर सम्राट् भरतेश्वर दक्षिणकी पृथिवीकी ओर आनेके लिये तैयार हुए ॥ १८६॥ उस समय विजयके लिये प्रस्थान करनेकी सूचना देनेवाली भेरियाँ राजाओंकी सेनारूपी समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न करती हुई चारों ओर बज रही थीं ।।१८७॥ चक्ररत्न जिसके आगे चल रहा है ऐसी भरतकी सेनाने पहलेसे ही उघाड़ी हुई काण्डकप्रपात नामकी प्रसिद्ध गुफामें प्रवेश किया ।।१८८।। उस सेनाने गङ्गा नदीके दोनों किनारोंपर की दो बड़ी बड़ी गलियोंमेंसे, सेनापतिके द्वारा जिसका द्वार पहलेसे ही खोल दिया गया है ऐसी उस गुफाको पार किया ।।१८९।। सेनाके द्वारा छोड़ी हुई वह गुफा ऐसी जान पड़ती थी मानो चिरकालसे उच्छ्वास ही ले रही हो और वह सेना भी गुफाके रोध से निकलकर ऐसी मालूम होती थी मानो फिरसे जीवित हुई हो ।। १९०।। वहाँ नाट्यमाल नामके देवने दक्षिण गुफाके द्वारपर पूर्णकलश आदि मंगलद्रव्य रखकर तथा रत्नोंके अर्धसे अर्घ देकर भरत महाराजकी अगवानी की थी-सामने आकर सत्कार किया था ॥१९१।।
श्लोक 192 से 199 : दिग्विजय की पूर्णता
भरत महाराजने अनेक प्रकारकी स्तुति करनेवाले उस नाट्यमाल नामके श्रेष्ठ देवका सत्कार कर उसे अपने स्थानपर जानेके लिये बिदा कर दिया ॥ १९२॥ धनुष बाण धारण करनेवाले विद्याधर चारों ओरसे आकाशमार्गको घेरकर, सूर्यके समान अन्धकारसे परे रहकर उदय होनेवाले चक्रवर्तीकी परिचर्या करते थे ॥ १९३॥ जिनमें नमि और विनमि मुख्य हैं ऐसे विद्या-धरों सहित तथा विजयार्ध पर्वतकी गुफाके भीतरी अन्धकारको दूर हटाकर सूर्यके समान किरणोंके समूहसे दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह निधियोंका अधिपति चक्रवर्ती समस्त जीवलोकको आनन्दित करता हुआ उदित हुआ अर्थात् गुफाके बाहर निकला ।।१९४।। रस-युक्त नवीन कोमल पत्तोंके भीतर प्रवेश करनेसे मन्द हुआ तथा देवांगनाओंके स्तनतटपर लगे हुए रेशमी वस्त्रोंमें जिसकी सुगन्धि प्रवेश कर गई है ऐसा वायु जिस समय उस विजयार्ध पर्वतकी गुफाओंमें धीरे धीरे बह रहा था उस समय निधियोंके स्वामी चक्रवर्तीकी सेनाके । डेरोंकी रचना शुरू हुई थी ।। १९५।। देवदारु वृक्षोंके कोमल पत्तोंके संपुटको भेदन करनेवाला तथा गङ्गा नदीके जलकी बूंदोंको बार-बार हिलाता हुआ और विजयार्ध पर्वतके किनारेके अन्त भागसे आता हुआ वायु गर्मीसे उत्पन्न हुए महाराज भरतके पसीनेको दूर कर रहा था ॥१९६।। चक्रवर्तीके द्वारा आज्ञा प्राप्त होने मात्रसे ही जिसने अपनी विजयी सेनाओंके द्वारा बहुत शीघ्र समस्त म्लेच्छ खण्ड जीत लिये हैं और जो जयलक्ष्मीको ले आया है ऐसा सेनापति अपना मस्तक झुकाये हुए, निधियोंके स्वामी भरत महाराजके समीप आ उपस्थित हुआ । उस समय भरत ठीक जिनेन्द्रदेवके समान मालूम होते थे क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्र देवके समीप सदा जयलक्ष्मी विद्यमान रहती है उसी प्रकार उनके समीप भी जयलक्ष्मी सदा विद्यमान रहती थीं ।॥१९७॥ विजयी भरतने (चिलात और आनर्त नामके) दोनों म्लेच्छराजाओं को जीतकर हिमवान् पर्वतके स्वामी हिमवान् देवको कुछ ही समय में जीता, तथा (गङ्गा सिन्धु नामकी) दोनों देवियोंसे प्रणाम कराकर (उनके द्वारा दिये हुए) दो दिव्य भद्रासन स्वीकृत किये, और विजयार्ध पर्वतको लीला मात्रमें जीतकर उसके समीपवर्ती राजाओंको जीतते हुए उन्होंने सेनापतिके साथ-साथ छह खण्ड़ोंसे सुशोभित भरत क्षेत्रकी समस्त पृथिवी को जीता ॥१९८॥ जिनका हाथ अथवा टैक्स शत्रुओंके समहमें भय उत्पन्न करनेवाला है ऐसे चक्रवर्ती भरतने चक्ररत्नके द्वारा पुण्यसे ही हिमवान् पर्वतसे लेकर पूर्व दिशाके समुद्र तक और दक्षिण समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्र तक समस्त पृथिवी अपने वश की थी। इसलिये बुद्धिमान् लोगोंको जैन मतमें स्थिर रहकर सदा पुण्य उपार्जन करना चाहिये ।।१९९।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें उत्तरार्ध भरतकी विजयका वर्णन करनेवाला बत्तीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 33
हिन्दी-भाषानुवाद
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena