आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 323 से 331 जयकुमार और अर्ककीर्ति का युद्ध
अर्ककीर्ति अपने रथ पर सवार होकर जयकुमार पर आक्रमण करने आया, लेकिन उसकी ध्वजा और शस्त्र जयकुमार के बाणों से नष्ट हो गए। जयकुमार ने अष्टचन्द्र विद्याधरों के बाणों को रोककर हेमांगद और अनंतसेन के साथ युद्ध किया। दोनों पक्षों के राजा परस्पर
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 323 to 331
श्लोक ( Shlok ) 323 – 326
“उपोदयायशस्कीर्तिः अर्ककीर्तिश्च्युतच्छविः। कारागारमिवाध्यास्य स्यन्दनं मन्दवाजिनम् ॥३२३॥अष्टचन्द्रान् सखी कुर्वन् न चन्द्रोपमा युधः । स्वोत्पातकेतु सङ्काशचक्रकेतूपलक्षितः ॥३२४॥प्रत्यायातमहावात विहतस्वजवैः शरैः । विध्यन्म ध्यंन्दिनार्क वा सुमनःक्षतहेतुभिः ॥३२५॥जय शत्रुदुरालोकं ज्वलत्तेजोमयं स्मयात् । कलभो वाऽगमद् वारि प्रेरितः खलकर्मणा ॥३२६॥
जिसकी अपकीर्तिका उदय हो रहा है, कान्ति नष्ट हो गई है, युद्धके नष्ट चन्द्रोंके समान अष्टचन्द्र विद्याधरोंको जिसने अपना मित्र बनाया है जो अपना अनिष्ट सूचित करनेवाले धूमकेतुके समान चक्रके चिह्नवाली ध्वजासे सहित है, और उल्टी चलनेवाली तेज वायुसे जिनका वेग नष्ट हो गया है ऐसे देवताओं का घात करनेवाले बाणोंसे जो दोपहरके सूर्यपर प्रहार करता हुआ सा जान पड़ता है, ऐसा अर्ककीर्ति धीरे चलनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए जेलखानेके समान अपने रथपर बैठकर, शत्रु जिसे देख भी नहीं सकते और जो जलते हुए तेजके समान है ऐसे जयकुमारपर बड़े अभिमानसे इस प्रकार आया जिस प्रकार कि हाथी पकड़नेवालोंके क्रूर व्यापारसे प्रेरित होता हुआ हाथीका बच्चा अपने बंधनेके स्थानपर आता है ।॥ ३२३-३२६॥
He, whose infamy was on the rise, whose radiance had faded, who had taken as allies the Aṣṭacandra Vidyādharas—waning like defeated moons in battle; he, whose banner bore the mark of a discus like a dread comet foretelling doom, and whose force had been spent by the reverse-blowing tempest winds—
Such was Arkakīrti, advancing with haughty pride upon a chariot sluggish as a prison-cart, drawn by slow-moving steeds. With arrows that seemed to assail even the midday sun, arrows fit to fell the very gods, he came to confront Jayakumāra—he whom the enemy could not even behold, so fierce was his blazing splendour.
Arkakīrti’s approach was like that of a young elephant, driven by the cruel schemes of elephant-catchers, walking unwittingly into its own captivity. 323 – 326
श्लोक ( Shlok ) 327 – 328
जयोऽपि शरसन्तानघनी कृत्यघनाघनः । सहार्ककीर्तिमर्केण कुर्वन् विनिहतप्रभम् ॥३२७।। ‘प्रतीयायान्तरे छिन्दन् ‘रिपुप्रहितसायकान् । शराश्चास्य पुरो धावन् ब्रध्नस्येवोदयेंऽशवः ॥३२८॥
बाणों के समूहसे मेघोंको सघन करने वाला जयकुमार भी सूर्यके साथ साथ अर्ककीतिको प्रभारहित करता तथा शत्रुके द्वारा छोड़े हुए बाणोंको छेदन करता हुआ सामने आया और जिस प्रकार उदयकालमें सूर्यकी किरणें उसके सामने जाती हैं उसी प्रकार उसके द्वारा छोड़े हुए बाण ठीक उसके सामने जाने लगे।। ३२७-३२८॥
Jayakumāra, whose volleys of arrows thickened the very skies like gathering clouds, advanced alongside the sun—stripping Arkakīrti of his might and cleaving the shafts loosed by the enemy. And just as the rays of the rising sun stream forth before him, even so did the arrows released by Jayakumāra speed directly ahead of him in perfect alignment.327 – 328
श्लोक ( Shlok ) 329
अच्छेत्सी “च्छत्रमस्त्राणि वैजयन्तीं च दुर्जयः । जयोऽर्ककीर्ते र्रोद्धत्यं विहत्य विनिनीषया ॥३२९ ॥
बड़ी कठिनाईसे जीते जाने योग्य जयकुमारने अर्ककीतिको हटानेकी इच्छासे उसका उद्धतपना नष्ट कर, उसका छत्र शस्त्र तथा ध्वजा सब छेद डाली ॥ ३२९।।
Jayakumāra—one scarcely to be conquered—seeking to drive back Arkakīrti, shattered his arrogance, and with it, pierced his royal parasol, his weapons, and his banner, all in swift succession.329
श्लोक ( Shlok ) 330
अष्टचन्द्रास्तदाभ्येत्य” विद्याबलविजृम्भणात् । न्यषेधयन् जयस्येषूनम्भोदा वा रवेः करान् ॥३३०॥
जिस प्रकार मेघ सूर्यकी किरणोंको रोक लेते हैं उसी प्रकार उस समय अष्टचन्द्रोंने आकर अपनी विद्या और बलके विस्तारसे जयकुमारके बाण रोक लिये थे ॥ ३३०॥
Just as clouds obscure the rays of the sun, even so, at that moment, the Aṣṭacandra warriors arrived and, through the vastness of their might and magical powers, intercepted the arrows of Jayakumāra.330
श्लोक ( Shlok ) 331
भुजबल्यादयोऽभ्येयुर्योद्धुं हेमाङ्गदं क्रुधा । सानुजं सिंहसङ्घातं सिंहसङ्घ इवापरः ॥३३१॥
जिस प्रकार एक सिहोंका समूह दूसरे सिहोंके समूहपर आ पड़ता है उसी प्रकार भुजबली आदि भी बड़े क्रोधसे छोटे भाइयों के साथ खड़े हुए हेमांगदसे लड़नेके लिये उसके सन्मुख आये ॥३३१।।
Just as one band of lions charges upon another, even so did Bhujabalī and the rest, ablaze with wrath, advance with their younger brothers to confront Hemāṅgada in fierce combat.331
श्लोक 332 से 341
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171