याग-मंडल विधान
विधान में नौ वलयों वाला भव्य याग-मंडल सजाया गया था, जिसमें विविध रंगों से निर्मित पवित्र आकृतियाँ, शुभ चिह्न एवं मंडल अलंकरण ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया। पवित्र वेदी पर 245 अर्घ्य धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, फल और जल से भावपूर्वक अर्पित किए गए।
1️⃣ प्रथम वलय – विनायक यंत्र संबंधित 17 अर्घ्य
इस वलय में पंच परमेष्ठी के पाँच अर्घ्य, मंगल के चार, उत्तम के चार तथा शरण के चार अर्घ्य चढ़ाए गए। ये अर्घ्य प्रारंभिक मंगल भावना एवं यंत्र शुद्धि का प्रतीक थे।
- पंच परमेष्ठी के 5 अर्घ्य
- मंगल के 4 अर्घ्य
- उत्तम के 4 अर्घ्य
- शरण के 4 अर्घ्य
2️⃣ द्वितीय वलय – भूतकालीन 24 तीर्थंकर
इस वलय में भूतकालीन चौबीस तीर्थंकरों की आराधना की गई, जिन्होंने अनंत जीवों का कल्याण किया।
3️⃣ तृतीय वलय – वर्तमानकालीन 24 तीर्थंकर
वर्तमान समय के समस्त तीर्थंकरों के प्रति भक्ति व्यक्त करते हुए उनके अर्घ्य अर्पित किए गए।
4️⃣ चतुर्थ वलय – भविष्यत्कालीन 24 तीर्थंकर
भविष्य में धर्म का प्रचार करने वाले चौबीस तीर्थंकरों के प्रति श्रद्धा और कल्याण भावना से अर्घ्य चढ़ाए गए।
5️⃣ पंचम वलय – विदेह क्षेत्र के 20 तीर्थंकर
विदेह क्षेत्र में विराजमान अनंत ज्ञानियों की उपासना करते हुए यह अर्घ्य अर्पण किए गए।
6️⃣ षष्ठ वलय – आचार्य परमेष्ठी के 36 गुण
आचार्य भगवंतों के छत्तीस दिव्य गुणों का स्मरण करते हुए शुद्ध भावना से पूजन किया गया।
7️⃣ सप्तम वलय – उपाध्याय परमेष्ठी के 25 गुण
शास्त्र और आत्मज्ञान के प्रवर्तक उपाध्यायों के 25 गुणों का स्तवन किया गया।
8️⃣ अष्टम वलय – साधु परमेष्ठी के 28 गुण
त्याग, तप, संयम और साधना के प्रतीक साधु परमेष्ठी के अट्ठाईस गुणों के अर्घ्य चढ़ाए गए।
9️⃣ नवम वलय – विधि पूर्णता
अंतिम वलय में समस्त विधान की पूर्णता के लिए समर्पण भावना से अर्घ्य अर्पित किए गए।






