आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok )142
ततो धनवती दीक्षां गणिन्याः सन्निधौ ययौ । माता कुबेरसेना च तयोरायिकयोर्द्वयोः ॥१४२॥
तदनन्तर कुबेरमित्रकी स्त्री धनवतीने संघकी स्वामिनी अमितमतिके पास दीक्षा धारण कर ली और उन दोनों आर्यिकाओंकी माता कुबेर-सेनाने भी अपनी पुत्री के समीप दीक्षा धारण की ॥१४२।।
hereafter, Dhanavatī, the wife of Kuberamitra, took initiation into ascetic life under the guidance of the community’s leader, the venerable ascetic Amitamatī. Following her example, Kuberasenā, the mother of the two ascetics, also accepted renunciation, receiving initiation near her own daughters.॥142॥
श्लोक ( Shlok )143 – 144
तावन्येद्युः कपोतौ च ग्रामान्तरमुपाश्रितौ । तण्डुलाद्य पयोगाय समतिप्रचोदितौ ॥१४३॥ “भवदेवचरेणानु बद्धवैरेण पापिना । दृष्टमात्रोत्थकोपेन मारितौ पुरुदंशसा ॥१४४॥
किसी एक दिन यमराजके द्वारा प्रेरित हुए ही क्या मानो वे दोनों कबूतर-कबूतरी चावल चुगने के लिये किसी दूसरे गांव गये। वहां एक बिलाव था जो कि भवदेवका जीव था। उस पापीको पूर्व जन्मसे बंधे हुए वैरके कारण कबूतर-कबूतरीको देखते ही पापकी भावना जागृत हो उठी और उसने उन दोनोंको मार डाला ॥१४३-१४४।।
One day, as if impelled by Yamarāja himself, the pair of dove and dove-hen ventured into another village to peck at grains of rice. There lurked a cat, who was the very same soul that had once been Bhavadeva. The moment that wicked being laid eyes upon the doves, the enmity carried over from his former birth stirred within him, and he was seized by a sinful urge. Without hesitation, he pounced and killed them both.॥143–144॥
श्लोक ( Shlok )145 – 146
तद्राष्ट्रविजयार्द्धस्य दक्षिणश्रेणिमाश्रिते । गान्धारविषयोशीरवत्याख्यनगरेऽधिपः ॥१४५॥आदित्यगप्तिरस्यासीन्महादेवी शशिप्रभा । तयोर्हिरण्यवर्माख्यः सुतो रतिवरोऽभवत् ॥१४६॥
उसी पुष्कलावती देशके विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में एक गांधार नामका देश है और उसमें उशीरवती नामकी एक नगरी है। उसके राजा थे आदित्यगति और उनकी रानीका नाम था शशिप्रभा । रतिवर कबूतर मरकर उन दोनोंके हिरण्यवर्मा नामका पुत्र हुआ ॥१४५-१४६॥
In that very land of Puṣkalāvatī, on the southern slopes of Mount Vijayārddha, lay the country called Gāndhāra, within which stood the city named Uśīravatī. Its king was Ādityagati, and his queen was Shashiprabhā. Upon the death of Rativega, the dove, he was reborn to them as a son named Hiraṇyavarmā.॥145–146॥
श्लोक ( Shlok )147 – 148
तस्मिन्नेवोत्तरश्रेण्यां गौरीविषयविश्रुते । पुरे भोगपुरे वायुरथो विद्याधराधिपः ॥१४७।। तस्य स्वयंप्रभावेव्यां रतिषेणा प्रभावती । बभूव जैनधर्मांशोऽप्यभ्युद्धरति देहिनः ॥१४८।।
उसी विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें एक गौरी नामका देश है उसके भोगपुर नामके प्रसिद्ध नगरमें विद्याधरोंका स्वामी राजा वायुरथ राज्य करता था। उसकी स्वयंप्रभा नामकी रानी थी। रतिषेणा कबूतरी मरकर उन्हीं दोनोंको प्रभावती नामकी पुत्री हुई सो ठीक ही है क्योंकि जैनधर्मका एक अंश भी प्राणियोंका उद्धार कर देता है ॥१४७-१४८।।
On the northern slopes of that same Mount Vijayārddha lay the land called Gaurī. In its renowned city of Bhogapura reigned King Vāyuratha, lord of the Vidyādharas, with his queen named Svayaṁprabhā. Upon the death of Ratiśeṇā, the dove-hen, she was reborn to them as a daughter named Prabhāvatī. And rightly so, for even a mere fraction of the Jain Dharma’s teachings is enough to lead living beings toward liberation.॥147–148॥
श्लोक ( Shlok )149
माता पिताऽपि या यश्च सुकान्तरतिवेगयोः । जन्मन्यस्मिन् किलाभूतां चित्रं तावेव संसृतिः ॥१४९॥
सुकान्त और रति-वेगाके जो पहले माता-पिता थे वे ही इस जन्ममें भी माता-पिता हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि यह संसार बड़ा ही विचित्र है। भावार्थ-सुकान्तके पूर्वभवके माता-पिता अशोक और जिनदत्ता इस भवमें आदित्यगति और शशिप्रभा हुए हैं तथा रतिवेगाके पूर्वभवके माता-पिता विमलश्री और श्रीदत्ता इस भवमें वायुरथ तथा स्वयंप्रभा हुए हैं ॥ १४९।।
he very parents who had been the mother and father of Sukānta and Rativegā in their former lives were once again born as their parents in this birth as well—and rightly so, for the workings of this world are truly wondrous and strange.
In essence: Sukānta’s former-life parents, Ashoka and Jindattā, were reborn as Ādityagati and Shashiprabhā in this life; and Rativegā’s former-life parents, Vimalashrī and Shrīdattā, became Vāyuratha and Svayaṁprabhā in this birth.॥149॥
श्लोक ( Shlok )150
हा मे प्रभावतीत्याह जयश्चते ससुलोचनः । रूपादिवर्णनं तस्याः किं पुनः क्रियते पृथक् ॥१५०॥
जब जयकुमारने सुलोचनाके साथ बैठकर ‘हा मेरी प्रभावती’ ऐसा कहा तब फिर उसके रूप आदिका वर्णन अलगसे क्या किया जाय ? ।॥ १५०॥
When Jayakumāra, seated beside Sulochanā, cried out, “Alas, my Prabhāvatī!”—what need, then, to separately describe the beauty and other qualities of his beloved? For his exclamation alone spoke volumes of his heart’s anguish and her incomparable charms.॥150॥
श्लोक ( Shlok )151
यौवनेन समाक्रान्तां कन्यां दृष्ट्वा प्रभावतीम् । कस्मै देयेयमित्याह खगेशो मन्त्रिणस्तवः (ततः) ॥१५१॥
प्रभावती कन्याको यौवनसे सम्पन्न देखकर विद्याधरोंके अधिपति वायुरथने अपने मंत्रियोंसे कहा कि यह कन्या किसे देनी चाहिये ? ॥१५१॥
Beholding the maiden Prabhāvatī adorned with the fullness of youth, Vāyuratha, lord of the Vidyādharas, turned to his ministers and asked, “To whom should this daughter be given in marriage?”॥151॥
श्लोक 152 से 162
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141