चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
पुत्रपौत्रादिभिः श्रीमान् परीतः कनकप्रभः । स्वराज्यं पालयमेवं सुखेनान्येद्युरुद्धधीः ॥ १४२ ॥
इस प्रकार पुत्र-पौत्रादिसे घिरे हुए श्रीमान् और बुद्धिमान् राजा कनकप्रभ सुखसे अपने राज्यका पालन करते थे ॥ १४२ ॥
In this manner, the illustrious and wise King Kanakaprabha, surrounded by his sons and grandsons, continued to govern his kingdom in peace and prosperity.142
श्लोक ( Shlok ) 143
मनोहरवने धर्म श्रीधराज्जिनपुङ्गत्वात् । श्रुत्वा संयोज्य साम्राज्यं सूनौ संयम्य निर्वृतः ॥ १४३ ॥
किसी दिन उन्होंने मनोहर नामक वनमें पधारे हुए श्रीधर नामक जिन-राजसे धर्मका स्वरूप सुनकर अपना राज्य पुत्रके लिए दे दिया तथा संयम धारण कर क्रम-क्रमसे निर्वाण प्राप्त कर लिया ॥ १४३ ॥
One day, after listening to the nature of Dharma from the King of Jinas, Shridhara, who had arrived in the Manohara forest, King Kanakaprabha abdicated his throne in favor of his son. He then embraced Samyama (self-restraint) and, through gradual stages of spiritual progression, ultimately attained Nirvana.143
श्लोक ( Shlok ) 144
पद्मनाभश्च तत्रैव गृहीतोपासकव्रतः । तन्त्रावापगतव्याप्तिममात्यैः सम्प्रवर्तयन् ॥ १४४ ॥
पद्मनाभने भी उन्हीं जिनराजके समीप श्रावकके व्रत लिये तथा मन्त्रियों के साथ स्वराष्ट्र और पर-राष्ट्रकी नीतिका विचार करता हुआ वह सुखसे रहने लगा ॥ १४४ ॥
Padmanabha also took the vows of a Shravaka (a lay follower) in the presence of the same King of Jinas. Thereafter, deliberating on the policies of his own kingdom and foreign nations alongside his ministers, he lived in happiness.144
श्लोक ( Shlok ) 145 – 146
विश्रम्भहाससंस्पर्शविनोदैरतिपेशलैः । कामिनीनां कलालापैः ‘सविलोलैर्विलोकनैः ॥ १४५ ॥अनङ्गपूर्वरङ्गस्य पुष्पाञ्जलिनिभैः शुभैः । समप्रेमसमुत्पन्नैः प्रसादं प्राप चेतसः ॥ १४६ ॥
परस्परके समान प्रेमसे उत्पन्न हुए और कामदेव के पूर्व रङ्गकी शुभ पुष्पाञ्जलिके समान अत्यन्त कोमल स्त्रियोंकी विनय, हँसी, स्पर्श, विनोद, मनोहर बातचीत और चञ्चल चितवनोंके द्वारा वह चित्तकी परम प्रसन्नताको प्राप्त होता था ॥ १४५-१४६ ॥
Through the mutual affection shared between them, he attained supreme delight of the heart. He found great joy in the humility, laughter, touch, playfulness, charming conversation, and playful glances of his wives—who were exceedingly tender, like the auspicious floral offerings that serve as a prelude to the arrival of Kamadeva (the God of Love).145 – 146
श्लोक ( Shlok ) 147
कामकल्पद्रुमोद्भूतं परिपक्कं फलोत्तमम् । रामाप्रेमोपनीतं साउ सीमाऽऽसीत्तस्य निर्वृतेः ॥ १४७ ॥
कामदेव रूपी कल्प-वृक्षसे उत्पन्न हुए, स्त्रियोंके प्रेमसे प्राप्त हुए और पके हुए भोगोपभोग रूपी उत्तम फल ही राजा पद्मनाभके वैराग्यकी सीमा हुए थे अर्थात् इन्हीं भोगोपभोगोंसे उसे वैराग्य उत्पन्न हो गया था ॥ १४७ ॥
The excellent fruits of worldly pleasures (Bhogopabhoga) produced by the wish-fulfilling tree of Kamadeva and nurtured by the love of his wives, eventually became the very threshold of King Padmanabha’s detachment. That is to say, it was through the ultimate experience of these very pleasures that the seeds of Vairagya (dispassion) were sown within him.147
श्लोक ( Shlok ) 148
प्राक्तनोपात्तपुण्यस्य फलमेतदिति स्फुटम् । प्रबोधयन्नसौ मूढानुद्यद्दीप्तिरभूत्सुखी ॥ १४८ ॥
ये सत्र भोगोपभोग पूर्वभवमें किये हुए पुण्यकर्मके फल हैं इस प्रकार मूर्ख मनुष्योंको स्पष्ट रीतिसे बतलाता हुआ वह तेजस्वी पद्मनाभ सुखी हुआ था ।॥ १४८ ॥
While demonstrating clearly to those of lesser understanding that all these worldly enjoyments were merely the fruits of meritorious deeds (Punya) performed in previous lives, the radiant Padmanabha lived in a state of contentment. 148
श्लोक ( Shlok ) 149
सोऽपि श्रीधरसान्निध्ये बुद्ध्वा धर्म बुधोत्तमः । संसारमोक्षयाथात्म्यमात्मन्येवमचिन्तयत् ॥ १४९ ॥
विद्वानोंमें श्रेष्ठ पद्मनाभ भी, श्रीधर मुनिके समीप धर्मका स्वरूप जानकर अपने हृदयमें संसार और मोक्षका यथार्थ स्वरूप इस प्रकार विचारने लगा ॥ १४९ ॥
श्लोक ( Shlok ) 150
यावदौदयिको भावस्तावत्संसृतिरात्मनः । स च कर्माणि तत्कर्म तावद्यावत्सकारणम् ॥ १५० ॥
उसने विचार किया कि ‘जब तक औदयिक भाव रहता है तब तक आत्माको संसार-भ्रमण करना पड़ता है, औदयिक भाव तब तक रहता है जब तक कि कर्म रहते हैं और कर्म तब तक रहते हैं जब तक कि उनके कारण विद्यमान रहते हैं ।॥ १५० ॥
He reflected: “As long as Audayika-bhava (the state of being influenced by the rise of past karmas) persists, the soul must continue its wanderings through the cycle of transmigration (Samsara). This state remains as long as karmas are present, and karmas persist as long as their underlying causes continue to exist.”150
श्लोक ( Shlok ) 151
कारणान्यपि पञ्चैव मिथ्यात्वादीनि कर्मणः । मिथ्यात्वे सत्यवश्यं स्यारात्र शेषं चतुष्टयम् ॥ १५१ ll
कर्मोंके कारण मिथ्यात्वादिक पाँच हैं। उनमें-से जहाँ मिथ्यात्व रहता है वहाँ बाकीके चार कारण अवश्य रहते हैं ।। १५१ ।।
The causes of karma are fivefold, beginning with Mithyatva (false belief). Among these, wherever Mithyatva exists, the remaining four causes are invariably present. 151
श्लोक 152 से 162
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70
सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 56
चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
Download PDF
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47