आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161
श्लोक 162 से 171 घुड़सवारों का युद्ध
अर्ककीर्ति के घुड़सवार सामने आए, और जयकुमार ने जयतुरंगम घोड़े पर सवार होकर अपनी घुड़सवार सेना को युद्ध की आज्ञा दी। घोड़ों की हिनहिनाहट और तलवारों की चोट से युद्धक्षेत्र भयंकर हो गया। घोड़े और योद्धा परस्पर क्रोधित होकर लड़ते रहे, और तलवारें आकाश में चमकती रहीं। घायल घोड़े अपने स्वामियों को खोजते हुए दौड़ रहे थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
तावद्धेषित निर्घोषैर्भीषयन्तो द्विषो हयाः । बलमाश्वासयन्तः स्वं स्वीचक्रुश्चाक्रिसूनवः ॥१६२॥
इतनेमें ही हिन-हिनाहटके शब्दोंसे शत्रुओंको डराते हुए और अपनी सेनाको धीरज बंधाते हुए चक्रवर्तीके पुत्र-अर्ककीर्तिके घोड़े सामने आये ।।१६२॥
Just then, with resounding neighs that struck terror into the hearts of the enemy and inspired courage within their own ranks, the steeds of Arkkakīrti—the emperor’s son—came forth into view.162
श्लोक ( Shlok ) 163
प्रासान्प्रस्फु रतस्तीक्ष्णानभीक्ष्णं वाहवाहिनः ।आवर्तयन्तः सम्प्रापन् यमस्येवाग्रगा भटाः ॥१६३॥
यमराजके अग्रगामी योद्धाओंके समान, देदीप्य-मान और पैने भालोंको बार बार घुमाते हुए घुड़सवार भी सामने आये ॥ १६३॥
Then appeared the horsemen, radiant as the vanguard of Yama himself, brandishing their gleaming, sharp-tipped spears in swift and ceaseless motion as they surged into the fray.163
श्लोक ( Shlok ) 164
जयोऽपि स्वयमारुह्य जयी जयतुरङ्गमम् । क्रुद्धः प्रासान् समुद्धृत्य योद्धृमश्वीयमादिकान् ।।१६४।।
विजय करनेवाले जयकुमारने भी क्रोधित हो, जयतुरंगम नामके घोड़ेपर सवार होकर अपनी घुड़सवार सेनाको भाला लेकर युद्ध करनेकी आज्ञा दी ॥ १६४॥
Then the victorious Jayakumar, his wrath now kindled, mounted his steed named Jayaturanga and, seizing his spear, commanded his cavalry to charge forth and engage in battle.164
श्लोक ( Shlok ) 165
अभूत् प्रहतगम्भीरभम्भा’ दिध्वनिभीषणः । बलार्णवश्चलत्स्थूलकल्लोल इव वाजिभिः ॥१६५॥
घोड़ोंके द्वारा जिसमें चंचल और बड़ी बड़ी लहरें सी उठ रही हैं ऐसा वह सेनारूपी समुद्र बजते हुए गंभीर नगाड़े आदिके शब्दों से भयंकर हो रहा था ॥ १६५॥
That ocean-like army, its surface stirred into restless, towering waves by the galloping of steeds, grew all the more terrifying with the thunderous roar of war drums and other deep, resounding instruments.165
श्लोक ( Shlok ) 166
असिसंघट्टनिष्ठ्यूतविस्फुलिङ्गो रणेऽनलः । भीषण शरसङ्घाते व्यदीपिष्ट धराचिते ॥१६६॥
उस युद्धमें पृथिवीपर जो भयंकर बाणोंका समूह पड़ा हुआ था उसमें तलवारोंकी परस्परकी चोटसे निकले हुए फुलिंगोंसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी थी ॥१६६।।
In that fierce battle, the earth lay strewn with countless deadly arrows, and from the clash of swords striking one another, sparks flew forth — igniting a blaze that kindled fire amidst the field of war.166
श्लोक ( Shlok ) 167
वाजिनः प्राक्कशाघाताद धावन्ताभिसायकम् । त्रियन्ते न सहन्ते हि परिभूति सतेजसः ॥१६७।।
घोड़े कोड़ोंकी चोटके पहले ही बाणोंके सामने दौड़ रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वी पुरुष मर जाते हैं परन्तु पराभव सहन नहीं करते ॥ १६७॥
It was but fitting that the horses surged forward even before the lash of the whip, racing toward the hail of arrows — for the valiant may embrace death, but they will never endure the shame of defeat.167
श्लोक ( Shlok ) 168
स्थिताः पश्चिमपादाभ्यां बद्धामर्षाः परस्परम् । पति केचिदिवावन्तो ‘युध्यन्ते स्म चिरं हयाः ॥ १६८॥
परस्पर एक दूसरेपर क्रोधित हो पिछले पैरोंसे खड़े हुए कितने ही घोड़े चिरकालतक इस प्रकार युद्ध कर रहे थे मानो अपने स्वामीकी रक्षा ही कर रहे हों ।। १६८।।
Many a steed, enraged and rearing high upon its hind legs, battled fiercely for long hours, as though waging war not for conquest, but for the very protection of its master.168
श्लोक ( Shlok ) 169
समुद्धतास्त्र सम्पृक्तलसल्लोलासिपत्रकैः । नभस्तरुरभाद् भूयस्तदा पल्लवितो यथा ॥१६९।।
उस समय ऊपर उठाई हुई और रुधिरसे रंगी हुई तलवाररूपी चंचल पत्तोंसे आकाशरूपी वृक्ष ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो उसपर फिरसे नवीन पत्ते निकल आये हों ॥ १६९॥
At that moment, the sky appeared as a vast and wondrous tree, adorned with fluttering leaves in the form of upraised swords, stained with blood — as though fresh foliage had once again sprung forth upon its boughs.169
श्लोक ( Shlok ) 170
पतितान्यसिनिर्घातात् सुदूरं स्वाभिनां क्वचित् । शून्यासनाः शिरांस्युच्चैरन्वेष्टुं वा भ्रमन्हयाः ॥१७०॥
कहींपर खाली पीठ लिये हुए घोड़े इस प्रकार दौड़ रह थे मानो तलवारकी चोटसे बहुत दूर पड़े हुए अपने स्वामियोंके शिर ही खोज रहे हों ।॥ १७०।।
Elsewhere, riderless horses raced across the battlefield, as though seeking the severed heads of their fallen masters—flung far by the stroke of the sword—to reunite with them once more.170
श्लोक ( Shlok ) 171
पशून् विशुङ्गान्मत्वाऽश्वान् कृपया कोऽपि नावधीत् । ते ‘स्वदन्तखुरैरेव क्रुद्धाः प्राध्नन् परस्परम् ।।१७१॥
घोड़ोंको बिना सींगके पशु मानकर दयासे कोई नहीं मारता था परन्तु वे क्रोधित होकर दांत और खुरोंसे एक दूसरको मारते थे ॥ १७१॥
Though deemed hornless beasts and often spared out of pity, the horses, in their fury, struck one another with bared teeth and flailing hooves, turning the battlefield into a savage contest of their own.171
श्लोक 172 से 182
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161