आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 153 to 160
श्लोक ( Shlok ) 153 – 154
उपविन्ध्याद्रि विख्यातो विन्ध्यपुर्यामभूद् विभुः । विन्ध्यकेतुः प्रिया तस्य प्रियङ्गु श्रीस्तयोः सुता ॥१५३॥विन्ध्यश्रीस्तां पिता तस्याः शिक्षितुं सकलान् गुणान् । मया सह मयि स्नेहा महीशस्य’ समर्पयत् ॥१५४।॥
सुलोचना कहने लगी कि विन्ध्याचल पर्वतके समीर विन्ध्यपुरी नामकी नगरी में विन्ध्यकेतु नामका एक प्रसिद्धराजा रहता था। उसकी स्त्रीका नाम प्रियङगुश्री था। उन दोनोंके विन्ध्यश्री नामकी पुत्री थी। उसके पिताने मुझपर प्रेम होनेसे मेरे साथ सब गुण सीखनेके लिये उसे महाराज अकंपनको सौंप दिया ।।१५३-१५४॥
Sulochana began to speak: “In the breezy heights of the Vindhya mountains stood the renowned city of Vindhyapuri, ruled by the illustrious king Vindhyaketu. His queen was named Priyangushri, and to them was born a daughter, Vindhyashri. Out of deep affection for me, her father entrusted her to the care of Maharaja Akampana, so that she might learn every noble virtue and accomplishment by my side.” 153 – 154
श्लोक ( Shlok ) 155 – 160
वसन्ततिलकोद्याने क्रीडन्ती ‘संकदा दिवा । दष्टा तत्र मया दत्तनमस्कारपदान्यलम् ॥१५५।। भावयन्ती मृताऽत्रेयं भूत्वायात् स्नेहिनी मयि । इत्यब्रवीदसौ सोऽपि ज्ञात्वा सन्तुष्टचेतसा ॥१५६॥तत्कालोचितसामोक्त्या गङ्गादेवीं विसर्ज्य ताम् । सबलाक” प्रकुर्वन्तं स्वं चलत्केतुमालया ॥१५७।। स्वावासं सम्प्रविश्योच्चैः सप्रियः सहबन्धुभिः । सस्नेहं राजराजोक्तमुक्त्वा तत्प्रहितं स्वयम् ॥१५८॥पृथक् पृथक् ‘प्रदायातिनुदमासाद्य वल्लभाम् । नीत्वा “तत्रैव तां रात्रि प्रातरुत्थाय भानुवत् ॥१५९॥ विधातुमनु रक्तानां भुक्तिमुद्योतिताखिलः । अनुगङ्गं प्रयान् प्रेम्णा कामिन्याः कुरुवल्लभः ।१६०।
वह विन्ध्यश्री किसी एक दिन उपवनमें क्रीड़ा कर रही थी, वहींपर उसे किसी सांपने काट लिया जिससे मेरे द्वारा दिये हुए पंच नमस्कार मन्त्रका चिन्तवन करती हुई मरकर यह देवी हुई है और मुझपर स्नेह होनेके कारण यहां आई है यह जानकर जयकुमारने संतुष्टचित्त हो शान्तिमय वचन कहकर गंगादेवीको विदा किया । तदनन्तर अपनी प्रिया सुलोचना और इष्ट-बन्धुओंके साथ साथ, फहराती हुई पताकाओंके द्वारा अपने आपको बगुलाओंसे सहित करते हुएके समान जान पड़नेवाले अपने ऊंचे डेरेमें प्रवेश किया । बड़े स्नेहसे महाराज भरतके कहे वचन सबको सुनाये, उनकी दी हुई भेंट सबको अलग अलग दी । सुलोचनाको अत्यन्त प्रसन्न किया, वह रात्रि वहीं बिताई और सबेरा होते ही उठकर अपने में अनुराग रखनेवाले लोगोंके भोजनके लिये सूर्यके समान समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह कुरुवंशियोंका प्यारा जयकुमार सुलोचनाके प्रेमसे गंगा नदीके किनारे किनारे चलने लगा ॥१५५-१६०।।
One day, while Vindhyashree was sporting in a garden, she was bitten by a serpent there; as she passed away, she meditated upon the Fivefold Salutation Mantra that I had bestowed upon her, and thus was reborn as this celestial goddess. Knowing that it was out of her affection for me that she had now appeared here, Jayakumar, his heart appeased, spoke words of peace and bade farewell to Goddess Ganga.
Thereafter, accompanied by his beloved Sulochana and his cherished kinsmen, he entered his lofty pavilion adorned with fluttering pennants, appearing like cranes gathered together. With great affection, he recounted to all the words spoken by Emperor Bharata, and distributed among them the gifts bestowed upon him. He gladdened Sulochana exceedingly, spent that night there itself, and at daybreak, rising early, he—beloved of the Kuru dynasty—radiant like the sun illuminating all quarters, began to walk along the banks of the Ganga, accompanied by those who held him dear, driven by his love for Sulochana.155 – 160
श्लोक 161 से 181
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152