आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72
श्लोक 73 से 81 सेना का प्रस्थान
अर्ककीर्ति की सेना, जिसमें शक्तिशाली हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक शामिल थे, युद्ध के लिए कूच कर गई। नगाड़ों, घंटियों, और शस्त्रों की ध्वनियों से दिशाएँ गूंज उठीं। सेना का कोलाहल भयावह था, जो युद्ध की भयंकरता को दर्शाता था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 73 to 81
श्लोक ( Shlok ) 73 – 77
अनुभेरीरवं सद्यः प्रत्यावासं” महीभुजाम् । नटद्भटभुजास्फोटचटुलाराव निष्ठुरः ॥७३।।करिकण्ठस्फुटोद्धोषघण्टाटङ्कारभैरवः । जितकण्ठीरवारावहयहेषाविभीषणः ॥७४॥चलद्धरिखुरोद्धट्टकठोरध्वाननिर्भरः । पदातिपद्धति “प्रोद्यद् भूरिभूरवभीवहः ॥७५॥स्पन्दत्स्यन्दनचक्रोत्थपृथुचीत्कारभीकरः । धनुः सज्जीक्रियासक्तगुणास्फालनकर्कशः ॥७६॥प्रतिध्वनितदिग्भित्तिस्सवनिकभयानकः । बलकोलाहलः कालमिवाह्वातुं समुद्यतः ॥७७॥
जो राजाओंके प्रत्येक डेरेमें भेरीके शब्दोंके साथ ही साथ बहुत शीघ्र नाचते हुए योद्धाओंकी भुजाओंकी ताड़नासे उत्पन्न होनेवाले चंचल शब्दोंसे कठोर है, जो हाथियोंके गलोंमें स्पष्ट रूपसे जोर जोरका शब्द करनेवाले घंटाओंकी टंकारसे भयंकर है, जो सिंहोंकी गर्जनाको जीतनेवाले घोड़ोंकी हिनहिनाहटसे भीषण है, जो चलते हुए घोड़ोंके खुरोंके संघटन से उठनेवाले कठोर शब्दोंसे भरा हुआ है, जो पैदल सेनाके पैरोंकी चोटसे उत्पन्न हुए पृथिवीके बहुत भारी शब्दोंसे भयंकर है, जो चलते हुए रथोंके पहियोंसे उत्पन्न होनेवाले बहुत भारी चीत्कार शब्दोंसे भय पैदा करनेवाला है, जो धनुष तैयार करनेके लिये लगाई हुई डोरीके आस्फालन से कठोर है, जिसने दिशारूपी दीवालोंको प्रतिध्वनिसे युक्त कर दिया है और जो सब प्रकारके नगाड़ोंसे भयानक हो रहा है ऐसा बहुत भारी सेनाका कोलाहल उठा सो ऐसा जान पड़ता था मानो कालको बुलानेके लिये ही उठा हो ।। ७३-७७।।
Then rose a tumult from the vast and mighty army—A din so terrible, it seemed as though Time himself had been summoned forth.It rang harsh with the sharp, restless clatter born of the warriors’ arms beating in rhythm to the war-drums echoing from every royal camp.It trembled with the thunder of bells hung about the throats of mighty elephants, whose deep clangor split the air.It resounded with the fierce neighing of horses—cries that triumphed even over lions’ roars—And with the crushing percussion of galloping hooves pounding the earth.The very ground shuddered beneath the marching foot-soldiers,
While great cries burst from the wheels of chariots as they rolled into motion,And bowstrings—drawn taut and snapped in readiness—sang with violent twangs.The tumult reached even the farthest quarters of the heavens,Filling the sky with reverberations,And was made yet more dreadful by the roar of countless drums.Such was the uproar that rose—It seemed not merely the prelude to war,But the heralding of Time’s own descent. 73 – 77
श्लोक ( Shlok ) 78
शिक्षिताः बलिनः शूराः शूरारूढाः सकेतवः । गजाः समन्तात् सन्नाहह्याः प्राक्चेलुरचलोपमाः ॥७८॥
उस समय जो शिक्षित हैं, बलवान् हैं, शूरवीर हैं, जिनपर योद्धा बैठे हुए हैं, पताकाएं फहरा रही हैं, जो सब तरहसे तैयार हैं और पर्वतोंके समान ऊंचे हैं ऐसे हाथी सब ओरसे आगे आगे चल रहे थे ।। ७८॥
At that moment, mighty elephants moved forth from every side—Towering like mountains, fully trained and resolute,Their backs bearing valiant warriors, their forms adorned in strength,Their banners unfurled and fluttering in the wind,Their presence proclaiming readiness in every measure—They advanced at the fore, leading the march to war. 78
श्लोक ( Shlok ) 79
तुरङ्गमास्तरङ्गाभाः सङ्ग्रामाब्धे सवर्मकाः । अनुदन्ति नदन्तो ऽयान् विक्रामन्तः समन्ततः ॥७९।।
जो संग्रामरूपी समुद्रकी लहरोंके समान हैं, कवच पहने हुए हैं, हींस रहे हैं और कूद रहे हैं ऐसे घोड़े उन हाथियों के पीछे पीछे चारों ओर जा रहे थे ॥७९॥
Behind the elephants surged the horses—Clad in armour, neighing fiercely,Leaping and darting in restless power,They moved in all directions,Like the swelling waves of a war-born ocean,Each one a living tempest upon the field.79
श्लोक ( Shlok ) 80
सचक्रं धेहि संयोज्य सधुरं ‘प्राज वाजिनः । इति सम्भ्रमिणोऽपप्तन् रथास्तदनु सध्वजाः ॥८०॥
पहिये जल्दी लगाओ, धुराको ठीककर जल्दी लगाओ, इस प्रकार कुछ जल्दी करनेवाले, तथा जिनमें शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं और ध्वजाएँ फहरा रही हैं ऐसे रथ उन घोड़ोंके पीछे पीछे जा रहे थे ॥८०॥
“Hasten! Fix the wheels! Align the yokes swiftly!”—Thus cried the charioteers, urging speed.And behind the horses rolled the war-chariots—Drawn by steeds of lightning pace,Their banners billowing high in the wind,Driven by warriors eager and resolute,Charging forth with the thunder of urgency.80
श्लोक ( Shlok ) 81
चण्डाः कोदण्डकुन्तासिप्रासचक्रादिभीकराः । यान्ति स्मानुरथं क्रुद्धा रुद्धदिक्काः पदातयः ॥८१॥
उन रथोंके पीछे धनुष, भाला, तलवार, प्रास और चक्र आदि शस्त्रोंसे भयंकर, फैलकर सब दिशाओंको रोकनेवाले, क्रोधी और बलवान् पैदल सेनाके लोग जा रहे थे ।॥८१॥
And behind the chariots came the infantry—Fierce and formidable,Armed with bows, spears, swords, pikes, and discus,Their wrath blazing, their might undeniable.Spreading outward like a living tide,They seemed to halt the very course of the winds,Filling all quarters with their resolute march.81
श्लोक 82 से 92
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61