आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81
श्लोक 82 से 92 युद्ध का प्रारंभ और राजनैतिक संकट
अर्ककीर्ति विजयघोष नामक हाथी पर सवार होकर अकम्पन की ओर बढ़ा। अकम्पन ने यह समाचार सुनकर दूत भेजा, जो अर्ककीर्ति को समझाने का प्रयास करता है, परन्तु वह अशांत रहा। दूत के लौटने पर अकम्पन व्याकुल और मूर्छित हो गए। जयकुमार ने अकम्पन को सान्त्वना दी और सुलोचना की रक्षा का वचन देते हुए अर्ककीर्ति को बांधने का संकल्प लिया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82
गजं गजस्तदोद्धव्य वाहो वाहं रथं रथः । पदातयश्च पादान्तं सम्भ्रमान्निर्ययुर्युधे ॥८२॥
उस समय हाथी हाथीको, घोड़ा घोड़ाको, रथ रथको और पैदल पैदलको धक्का देकर युद्धके लिये जल्दी जल्दी जा रहे थे ॥८२॥
In that fervent hour,Elephant jostled elephant,Horse pressed upon horse,Chariot struck chariot,And footman pushed footman aside—Each surging forward with desperate haste,As if the very breath of battle drew them on.82
श्लोक ( Shlok ) 83 – 85
आरूढाने कपाने कभूपालपरिवारितः । भेरीनिष्ठुरनिर्घोषभीषिताशेषदिग्द्विपः ॥८३॥ चक्रध्वजं समुत्थाप्य सम्यगाविष्कृतोन्नतिः । गजं विजयघोषाख्यमा रुह्याद्रिवरोत्तमम् ॥८४॥अर्ककीर्तिर्बहिर्भास्वदस्यु द्यतभटावृतः । ज्योतिः कुलाचलैर्वार्कश्चचालाभ्यचलाधिपम् ॥८५॥
तदनन्तर-हाथियोंपर चढ़े हुए अनेक राजाओंसे घिरा हुआ, नगाड़ोंके कठोर शब्दोंसे समस्त दिग्गजोंको भयभीत करनेवाला, चक्रके चिह्नवाली ध्वजाको ऊंचा उठाकर अपनी ऊंचाईको अच्छी तरह प्रकट करनेवाला और चमकीली तलवार हाथमें लिये हुए योद्धाओंसे आवृत अर्क-कीर्ति, मेरु पर्वतके समान उत्तम विजयघोष नामक हाथीपर सवार हो अचलाधिप (अचला अधिप) अर्थात् पृथ्वीचे अधिपति राजा अकंपनकी ओर इस प्रकार चला मानो ज्योतिर्मण्डल और कुलाचलोंके साथ साथ सूर्य ही अचलाधिप (अचल अधिप) अर्थात् सुमेरुकी ओर चला हो ।।८३-८५।।
Then, surrounded by many kings mounted on elephants,With war-drums thundering—terrifying even the guardians of the quarters—With the emblem of the discus blazing high upon his standard,Proclaiming his majesty for all to behold,And encircled by warriors bearing gleaming swords,Arkakīrti advanced—
Mounted upon the mighty elephant named Vijayaghoṣa, resplendent as Mount Meru itself—Marching forth toward King Akampana, Lord of the Earth.He came on like the radiant sun,Flanked by light and mountain-mass,Surging toward the immovable Lord of Mountains—As though Sūrya himself were advancing upon Sumeru.83 – 85
श्लोक ( Shlok ) 86 – 87
किंवदन्तीं विदित्वैतां भूपो भूत्वा कुलाकुलः । स्वालोचितं” च कर्तव्यं विधिना क्रियतेऽन्यथा ॥८६॥इति स्वसचिवैः सार्धमालोच्य च जयादिभिः । प्रत्यर्ककीर्त्यथा दिक्षद् दूतं सम्प्राप्य सत्वरम् ॥८७॥
महाराज अकंपन यह बात जानकर बहुत ही व्याकुल हुए और सोचने लगे कि अच्छी तरह विचारकर किया हुआ कार्य भी दैवके द्वारा उल्टा कर दिया जाता है । इस प्रकार उन्होंने अपने मंत्री तथा जयकुमार आदिके साथ विचारकर अर्ककीर्तिके प्रति शीघ्र ही एक शीघ्रगामी दूत भेजा ॥८६-८७।।
When the sovereign Akampana came to know of this,he grew deeply perturbed, and reflected thus:“Even deeds wrought with care, reason, and righteous thought may yet be overturned by the inscrutable hand of fate.”Troubled in heart, he then conferred with his ministers and with Jayakumāra—And without delay, he dispatched a swift envoy toward Arkakīrti,bearing a message born of both prudence and urgency. 86 – 87
श्लोक ( Shlok ) 88 – 89
कुमार तव किं युक्तमेवं सीमातिलङ्घनम् । प्रसीद प्रलयो दूरं तन्मा कार्षीर्मृषागमम् ॥ ८८ ॥इति सामादिभिः ‘स्वोक्तैरशान्तमवगम्य तम् । प्रत्येत्य तत्तथा सर्वमाश्ववाजी गमन्नृपम् ॥८९॥
दूतने जाकर कहा कि हे कुमार, क्या तुम्हें इस प्रकार सीमाका उल्लंघन करना उचित है ? प्रलयकाल अभी दूर है इसलिये प्रसन्न हूजिये और आगमको झूठा मत कीजिये । भावार्थ-लड़कर असमयमें ही प्रलय काल न ला दीजिये । दूतने इस प्रकार बहुतसे साम, दान आदिके वचन कहे परन्तु तौ भी उसे अशान्त जानकर वह लौट आया और शीघ्र ही ज्योंके त्यों सब समाचार अकंपनसे कह दिये ॥८८-८९॥
The envoy approached and spoke:“O Prince, is it truly righteous for you to thus transgress the bounds of justice and restraint?The hour of cosmic dissolution is yet far away—Be pleased, therefore, and do not render the sacred scriptures false.”He spoke many such words of conciliation—Of peace, of reason, of generosity and wisdom—But finding Arkakīrti unappeased and unwavering,He swiftly returned and reported all, in faithful detail,
to King Akampana. 88 – 89
श्लोक ( Shlok ) 90
काशिराजस्तदाकर्ण्य विषादचलिताशयः । महामोहाहितो वाऽऽसीद्दुष्कार्ये को न मुह्यति ॥९०॥
उन समाचारोंको सुनकर काशीराज अकंपनका चित्त विषादसे विचलित हो उठा और वे स्वयं महा-मोहसे मूच्छित हो गये सो ठीक ही है क्योंकि बुरे कामोंमें कौन मूच्छित नहीं होता ॥९०॥
Upon hearing the envoy’s report,the heart of Kāśirāja Akampana was shaken with grief,and, overwhelmed by delusion, he fell into a swoon.And rightly so—For when the noblest of intentions turn awry,who, amidst the wreckage of righteousness,does not fall insensible to sorrow?
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
“अत्र चिन्त्यं न वः किञ्चिन्न्यायस्तेनैव लङ्घितः । “तिष्ठतेहैव संरक्ष्य सुनियुक्ताः सुलोचनाम् ॥९१ ll इदानीमेव दुर्वृत्तं शृङ्खलालिङ्गनोत्सुकम् । शाखामृगमिवानेप्ये बध्वा दाराततायिनम् ॥९२॥
जयकुमारने अकंपनको चिन्तित देखकर कहा कि इस विषयमें हम लोगोंको कुछ भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये क्योंकि न्यायका उल्लंघन उसीने किया है, आप सावधान होकर सुलोचना की रक्षा करते हुए यहीं रहिये । दुराचारी, स्त्रियोंपर उपद्रव करनेवाले और इसलिये ही सांकलोंसे आलिंगन करनेकी इच्छा करनेवाले उस अर्ककीति को बंदरके समान बांधकर मैं अभी लाता हूँ ॥९१-९२॥
Seeing King Akampana thus troubled,Jayakumāra spoke with calm resolve:“We have no cause for grief in this—For it is he who has defied the path of justice.You, O King, remain here in vigilance,and guard Sulochanā well.As for that vile Arkakīrti—corrupt of conduct, tormentor of women,whose very lust seeks to bind them in chains—I shall now seize him as one would a frenzied monkey,and bring him here, shackled and disgraced.”91 – 92
श्लोक 93 से 103
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81