आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
गुहाश्रमे त एवार्य्यास्तैरेवाहं च बन्धुमान् । निषेद्धारः प्रवृत्तस्य ममाप्यन्यायवर्त्मनि ॥५२॥
गृहस्थाश्रममें तो मेरे वे ही पूज्य हैं, उन्हींसे में भाईबन्धुबाला हूं, औरकी क्या बात ? अन्यायमार्ग में प्रवृत्ति करनेपर वे मुझे भी रोकने वाले हैं ।॥५२॥
“In the realm of household life, he alone is worthy of my reverence; through him have I gained kin and kindred—what more need be said? Should I ever stray from the path of righteousness, he is the one who would restrain even me.” ॥52॥
श्लोक ( Shlok ) 53 – 54
पुरवो मोक्षमार्गस्य गुरवो दानसन्ततेः । श्रेयांश्च चक्रिणां वृत्तेर्यथे हास्म्यहमग्रणीः ॥५३॥तथा स्वयंवरस्येमे नाभूवन् यद्यकम्पनाः । कः प्रवर्तयिताऽन्योऽस्य मार्गस्यैष सनातनः ।।५४।।
इस युगमें मोक्षमार्ग चलाने के लिये जिस प्रकार भगवान् वृषभदेव गुरु हैं, दानकी परम्परा चलानेके लिये राजा श्रेयांस गुरु हैं और चक्रतियोंकी वृत्ति चलानेमें में मुख्य हूं उसी प्रकार स्वयंवरकी विधि चलाने के लिये वे ही गुरु हैं। यदि ये अकंपन महाराज नहीं होते तो इस स्वयंवर मार्गका चलानेवाला दूसरा कौन था ? यह मार्ग अनादि कालका है ॥५३-५४।।
“In this age, just as Lord Ṛṣabhadeva is the Guru for establishing the path of liberation, King Śreyāṁsa the Guru for initiating the tradition of charity, and I myself am foremost in preserving the conduct of the Chakravartins—likewise, he is the true preceptor in upholding the sacred rite of svayaṁvara. For if this King Akampana were not, who else could have carried forward this ancient and eternal tradition?” ॥53–54॥
श्लोक ( Shlok ) 55
मार्गाश्चिरन्तनान् येऽत्र भोगभूमितिरोहितान् । कुर्वन्ति नूतनान् सन्तः सद्भिः पूज्यास्त एव हि ॥५५॥
इस युग में भोगभूमिसे छिपे हुए प्राचीन मार्गोको जो नवीन कर देते हैं वे सत्पुरुष ही सज्जनों द्वारा पूज्य माने जाते हैं ।॥५५॥
“In this age, those noble souls who revive the ancient paths once veiled by the Bhogabhūmi are alone deemed worthy of reverence by the virtuous.” ॥55॥
श्लोक ( Shlok ) 56 -57
न चक्रेण न रत्नैश्च शेषैर्न निधिभिस्तथा । बलेन न षडङ्गेन नापि पुत्रैर्मया च न ॥५६॥तदेतत् सार्वभौमत्वं जयेनैकेन केवलम् । सर्वत्र शौर्यकार्येष तेनैव विजयो मम ॥५७।।
मेरा यह प्रसिद्ध चक्रवर्तीपना न तो चक्ररत्नसे मिला है, न शेष अन्य रत्नोंसे मिला है, न निधियोंसे मिला है, न छह अंगोंवाली सेनासे मिला है, न पुत्रोंसे मिला है और न मुझसे ही मिला है, किन्तु केवल एक जयकुमारसे मिला है क्योंकि शूर वीरताके सभी कार्यों में मेरी जीत उसीसे हुई है ॥५६-५७॥
“This renowned sovereignty of mine as a Chakravartin has not been attained through the Discus-Jewel, nor through the other divine treasures, nor through celestial wealth, nor through a sixfold army, nor through my sons, nor even by my own prowess. It has been won solely through Jayakumāra—for in all deeds of valor and heroism, it is through him alone that I have triumphed.” ॥56–57॥
श्लोक ( Shlok ) 58
म्लेच्छराजान् विनिर्जित्य नाभिशैले यशोमयम् । मन्नाम स्थापितं तेन किमत्रान्येन केनचित् ॥५८॥
म्लेच्छ राजाओंको जीतकर नाभि पर्वतपर मेरा कीर्तिमय नाम उसीने स्थापित किया था, इस विषयमें और किसीने क्या किया है ? ॥५८॥
“It was he who, having vanquished the Mleccha kings, established my glorious name upon Mount Nābhi—what, indeed, has anyone else accomplished in this regard?” ॥58॥
श्लोक ( Shlok ) 59
अर्ककीतिरकीतिं मे कीर्तनीयामकीर्तिषु । आशशांकमिहाकार्षीन्मषीमाषमलीमसाम् ॥५९॥
इस अर्ककीतिने तो अकीतियों में गिनने योग्य तथा स्याही और उड़दके समान काली मेरी अक्रीति जब तक चन्द्रमा है तब तक के लिये संसारभरमें फैला दी ॥५९॥
“As for this Arkakīrti, he has broadcast my ignoble disgrace—dark as ink and black as urad—across the world, to endure for as long as the moon shall shine.” ॥59॥
श्लोक ( Shlok ) 60
अमुना ऽन्यायवत्मैव प्रावर्तीति’ न केवलम् । इह स्वयं च दण्ड्यानां प्रथमः परिकल्पितः ॥६०॥
इसने अन्याय का मार्ग चलाया है केवल इतना ही नहीं है। किन्तु संसारसें दण्ड देने योग्य लोगों में अपने आपको मुख्य बना लिया है ॥६०॥
“It is not merely that he has walked the path of injustice; he has, in truth, made himself the foremost among all in the world who are deserving of punishment.” ॥60॥
श्लोक ( Shlok ) 61
अभूदयशसो रूपं मत्प्रदीपादिवाञ्जनम् । नार्ककीतिरसौ स्पष्टम यशःकीर्तिरेव हि ॥६१॥
जिस प्रकार दीपकसे काजल उत्पन्न होता है उसी प्रकार यह अकीर्तिरूप मुझसे उत्पन्न हुआ है, यह अर्ककीति नहीं है किन्तु साक्षात् अयशस्कोति है ।।६१।।
“Just as soot arises from a lamp, so has this infamy sprung from me—he is no Arkakīrti, but the very embodiment of disgrace itself.” ॥61॥
श्लोक 62 से 72
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51