श्री बृहत् चारित्रशुद्धि विधान | समुच्चय पूजा | अहिंसा व्रत पूजा
अर्ध्यावली
बादर एकेद्रिय पर्याप्तक
चाल
(तर्ज मेरे बतन के…)
एकेन्द्री है ते बादर, पर्याप्तक का भी आदर। मनकृत हिंसा न करना, जिनवाणी वचन को भरना ॥ पुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं गाथ झुकाउँ गुम्बर ॥१॥
ॐ ह्रीं पर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीवन कृतहिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
बादर पर्याप्त जो जीवा, उनकी रक्षा हो अतीया। न करते और कराते, रक्षा का भाव बनाते ॥ मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥२॥
ॐ ह्रीं पर्याप्तकबारैकेन्द्रिय जीवमनः कारितहिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
अनुमोदन भी न करते, रक्षा कर कर्म को हरते। एकेन्द्री है जो बादर, पर्याप्तक ज्ञान का आदर ॥ मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥३॥
ॐ ह्रीं पर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीवमनसानुमोदित हिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
जीवों की रक्षा प्यारी, वचनों में संयम धारी। वचनों से हिंसा न करतें, वचनों में धर्म है भरते ॥ मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥४॥
ॐ ह्रीं बादरैकेन्द्रियपर्याप्तक जीववचनकृत-हिंसादोषनिवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
वचनों से कहे ना करायें, उससे भी जीव बचायें। कह के हिंसा न कराते, वे धर्म अहिंसा पाते ॥
मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥५॥
ॐ ह्रीं बादरैकेन्द्रियपर्याप्तकजीववचनकारित-हिंसादोषनिवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
करते ना वे अनुमोदन, हिंसा में किया है शोधन। रक्षा का भाव बनाया, शुभ भाव अहिंसा पाया ॥ मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥६॥
हीं बादरैकेन्द्रियपर्याप्तकवचनुमोदित-हिंसादोषनिवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
काया में संयम आया, रक्षा का भाव बनाया। कर धर्म अहिंसा ज्ञानी, पालन करते जिनवाणी ॥ मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥७॥
ॐ ह्रीं बादरैकेन्द्रियपर्याप्तकजीव कायकृत-हिंसादोषनिवारकश्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
काया से ना करवाया, शुभभाव अहिंसा भाया। काया ने धर्म किया है, आतम भी शुद्ध हुआ है। मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥८॥
ॐ ह्रीं पर्याप्तकबादरैकेन्द्रियजीव कायकारित-हिंसादोषनिवारकश्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
काया अनुमोद न करती, जीवों की रक्षा होती। सब प्राणी को सुख देते, शुभ धर्म अहिंसा लेते ॥ मुनि महाव्रती ही पाले, टूटे कर्मों के जाले। है दया के सागर मुनिवर, मैं माथ झुकाऊँ गुरुवर ॥९॥
ॐ ह्रीं पर्याप्तकबादरैकेन्द्रियजीव कायानुमोदित-हिंसादोषनिवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
दोहा
अपर्याप्तक बादर भये, इकेन्द्रीय सुजान। मन से गुरु करुणा करें, धर्म अहिंसा मान ॥१०॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीवमनकृतहिंसादोषनिवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
जीव न छोटा मानते, सभी बराबर जान। मन से करायें हिंसा ना, बारंबार प्रणाम ॥११॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीवमनः कारित हिंसादोषनिवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अध्ये…।
एकेन्द्रिय अपर्याप्त जो, बरसे दया अपार। मन अनुमोदना न करें, दया के हैं भंडार ॥१२॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीवमनोमोदित हिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…।
वचन से हिंसा करने का, देते ना आदेश। एकेन्द्रिय बादर की रक्षा करी विशेष ॥१३॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीववचनकृत हिंसादोष निवारकश्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
हिंसा कार्य कराने का देते ना उपदेश। रक्षा जीवों की करी, धर्म अहिंसा वेश ॥१४॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीववचनकारित हिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
वचनों से संयम रखें, करते ना अनुमोद। वचनों से रक्षा करें, करें आत्म का शोध ॥१५॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीव-वचनानुमोदित हिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
एकेन्द्रिय अपर्याप्त की, रक्षा करती काय। धर्म अहिंसा पालते, शत-शत शीश झुकायें ॥१६॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीव कायकृत हिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
काया से ना करावते, हुआ है रक्षा भाव। वचनों में सिद्धि करी, होते सरल स्वभाव ॥१७॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबादरैकेन्द्रिय जीव कायकारित हिंसादोष निवारक श्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
काया से अनुमोदना, नहीं करें गुरुदेव। धर्म अहिंसा पालकर, करें आत्म की सेव ॥१८॥
ॐ ह्रीं अपर्याप्तकबाददैकेन्द्रिय जीव कायानुमोदित हिंसादोष निवारकश्री जिनाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य…
सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्तक
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