आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 41 to 51
श्लोक ( Shlok ) 41 – 44
ततः समुद्रदत्ताख्यो धनवत्या सहाभवत् । स्वसा कुबेर भित्रस्य तन्नामैवैतयोः सुता ॥४१॥ प्रियदत्ता ह्वया तस्याश्चेटिका” रतिकारिणी । कन्यकास्तां विधायादि द्वात्रिंशत्सुन्दराकृतीः ॥४२॥ श्रेष्ठी कदाचिदुद्याने यक्षपूजाविधौ सुधीः । सुपरीक्ष्य निमित्तेन प्रियदत्तां गुणान्विताम् ॥४३॥ अवधार्यास्य पुत्रस्य “पञ्चताराबलान्विते । दिने महाविभूत्यैनां कल्याणविधिनाऽग्रहीत् ॥४४॥
तदनन्तर-उसी नगरमें समुद्रदत्त नामका एक सेठ था, जो कि कुबेरमित्रकी स्त्री धनवती का भाई था और उसे कुबेरमित्रकी बहिन कुबेरमित्रा व्याही गई थी। इन दोनोंके प्रियदत्ता नामकी एक पुत्री हुई थी और रतिकारिणी उसकी दासी थी । समुद्रदत्त सेठके प्रियदत्ता आदि बत्तीस कन्याएं थीं। किसी एक दिन उस बुद्धिमान् सेठने एक बागमें यक्षकी पूजा करते समय सुन्दर आकारवाली उन बत्तीसों कन्याओंकी निमित्तवश परीक्षा की और उन सबमें प्रियदत्ताको ही गुणयुक्त समझा। फिर सूर्य, चन्द्र, गुरु, शुक्र और मंगल इन पांचों ताराओंके बलसे सहित किसी शुभ दिनमें बड़े वैभवके साथ कल्याण करनेवाली विधिसे उस प्रियदत्ताको अपने पुत्रके लिये स्वीकार किया ॥४१-४४।॥
“Subsequently, in that very city, there lived a wealthy merchant named Samudra-datta, who was the brother of Dhanavati, Kubera-mitra’s wife, and whose own sister, Kuberamitra, had been wed to Kubera-mitra. To this couple was born a daughter named Priyadatta, and Ratikarini was her maidservant. Samudra-datta had thirty-two daughters, among whom was Priyadatta.
One day, while performing a ritual worship of a yaksha in a garden, that wise merchant decided to test the virtues of his thirty-two beautiful daughters. In this examination, he found Priyadatta alone possessed of true qualities. Thereafter, choosing an auspicious day strengthened by the conjunction of the five favorable planets—Sun, Moon, Jupiter, Venus, and Mars—he arranged, with great splendor and in accordance with the auspicious rites, the marriage of Priyadatta to his son.” ॥41–44॥
श्लोक ( Shlok ) 45 – 46
तन्निमित्तपरीक्षायामवलोकितुमागते । सुते गुणवती राज्ञो” यशस्वत्यभिधा परा ॥४५॥ भाजनं भक्ष्यसम्पूर्णमदत्तवति माकुले (?) ! स्वाभ्यां लज्जाभरानम्रवदने जातनिर्विदे ॥४६॥
राजा प्रजापालकी गुणवती यशस्वती नामकी दो कन्याएं भी वह नैमित्तिक परीक्षा देखनेके लिये आई थीं, जब मामा कुबेरमित्रने भोजनसे भरे हुए पात्र उन्हें नहीं दिये अपने आप ही लज्जाके भारसे उनके मुख नीचे हो गये और उसी समय उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया ।।४५-४६।।
“Two virtuous princesses, the daughters of King Prajapal—named Gunavati and Yashasvati—had also come to witness that ceremonial test. When their maternal uncle, Kubera-mitra, did not offer them the vessels filled with food, their faces fell in shame beneath the weight of modesty, and in that very moment, a spirit of renunciation arose within them.” ॥45–46॥
श्लोक ( Shlok ) 47 – 49
अमितानन्तमत्यार्यिकाभ्याशे संयमं परम् । आददाते स्म यात्येवं काले तस्मिन् महीपतौ ॥४७॥लोकपालाय दत्वाऽऽत्मलक्ष्मीं संयममागते । शीलगुप्तगुरोः पार्श्र्वे शिवङ्करवनान्तरे ॥४८॥देव्यः कनकमालाद्याः परे चोपाययुस्तपः । दुर्गमं च व्रजन्त्यल्पाः प्रभुर्यदि पुरस्सरः ॥४९॥
उन्होंने उसी समय अमितमति और अनन्तमति आर्यिकाके समीप उत्तम संयम धारण कर लिया। इस प्रकार कितना ही समय व्यतीत होनेपर राजा प्रजापालने भी अपनी सब लक्ष्मी लोकपाल नामक पुत्रके लिये देकर शिवंकर नामके वनमें शीलगुप्त नामक मुनिराजके समीप संयम धारण कर लिया । इसी प्रकार कनकमाला आदि रानियोंने भी कठिन तपश्चरण धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि यदि राजा आगे चलता है तो अल्प शक्तिके धारक लोग भी उसी कठिन रास्तेसे चलने लगते हैं ।॥४७-४९॥
श्लोक ( Shlok ) 50
लोकपालोऽपि सम्प्राप्तराज्यश्रीर्विश्रुतोदयः । कुबेरभित्रबुद्ध्यैव धरित्रीं प्रत्यपालयत् ।।५०।।
इधर जिसे राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई है और जिसका वैभव सब जगह प्रसिद्ध हो रहा है ऐसा राजा लोकपाल भी कुबेरमित्रकी सम्मतिके अनुसार ही पृथिवीका पालन करने लगा ॥५०॥
“Meanwhile, King Lokapala—who had attained royal fortune and whose splendor was renowned in all quarters—also began to rule the earth in accordance with the counsel of Kubera-mitra.” ॥50॥
श्लोक ( Shlok ) 51
मन्त्री च फल्गुमत्याख्यो बालोऽसत्यवचः प्रियः । सवयस्को नृपस्याज्ञः प्रकृत्या चपलः खलः ॥५१॥
उस राजाका फल्गुमति नामका एक मंत्री था, जो अज्ञानी था, असत्य बोलनेवाला था, राजाकी समान उमरका था, मूर्ख था और स्वभावसे चंचल तथा दुर्जन था ॥५१॥
“That king had a minister named Phalgumati, who was ignorant and deceitful, of the same age as the king, foolish by nature, fickle in disposition, and thoroughly wicked.” ॥51॥
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40