आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के दाँत सुंदर और चमकीले थे, और नाक मुख की सुगंध का स्वाद लेती थी। उसके नेत्र विशाल और कटाक्षपूर्ण थे, जो जयकुमार को जीतते थे। कान जयकुमार के प्रेम संभाषण के पात्र थे। भौंहें कामदेव के धनुष थीं, और ललाट उन्नत था। बाल काले सर्प जैसे थे, और उसका शरीर परमाणुओं से बना था। उसका मुख चंद्रमा से भी श्रेष्ठ था, क्योंकि वह निष्कलंक और पूर्ण था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
‘चिताः सिताः समाः स्निग्धा दन्ताः कान्ताः प्रभान्विताः। अन्तः करोति तद्वक्त्रं तानेव कथमन्यथा ॥१५२।।
अवश्य ही उसके दांत एक दूसरेसे मिले हुए थे-छिद्ररहित थे, सफेद थे, समान थे, चिकने थे, सुन्दर थे, और चमकीले थे, यदि ऐसा न होता तो सुलोचनाका मुख उन्हें भीतर ही क्यों करता ? ॥१५२॥
Surely, her teeth were closely set, without gaps, pure white, even, smooth, lovely, and lustrous—for were they not so, why would Sulocanā’s radiant face keep them so carefully veiled within? Indeed, their concealment was the adornment of their perfection.152
श्लोक ( Shlok ) 153
कुतः कृता समुत्तुङ्गा स्वादमानास्यसौरभम् । मध्येवक्त्रं किमध्यास्ते न सती यदि नासिका’ ।। १५३॥
मुखकी सुगन्धिका स्वाद लेती हुई उसकी नाक यदि इतनी अच्छी नहीं होती तो वह इतनी ऊंची क्यों बनाई जाती ? तथा मुखके बीचमें कैसे ठहर सकती ? ॥१५३॥
Her nose, which seemed to savour the very fragrance of her breath, must indeed have been exquisitely formed—for had it not been so, why would it have been placed so nobly high, or allowed to dwell at the very centre of so radiant a face? Truly, its grace was worthy of such a place of honour. 153
श्लोक ( Shlok ) 154
कर्णान्तगामिनी नेत्रे वृद्धे नरशरोपमे । सोमवंश्यस्य कः क्षेपः पद्मोत्पलजये तयोः ॥१५४॥
अर्जुनके बाणके समान कर्णके (राजा कर्ण अथवा कानके) समीप तक जानेवाले उसके दोनों नेत्र अत्यन्त विशाल थे, उन्होंने लाल कमल और नीलकमल दोनोंको जीत लिया था फिर भला सोमवंश अर्थात् चन्द्रमापर कौनसा आक्षेप बाकी रह गया था अथवा सोमवंश अर्थात् जयकुमारपर कौन सा क्षेप अर्थात् कटाक्ष करना बाकी रह गया था ? ॥ १५४॥
Her eyes, vast and far-reaching like Arjuna’s arrows, extended all the way to her ears in graceful sweep. So radiant were they, they surpassed both the crimson lotus and the blue—leaving no further reproach to cast upon the Moon’s lineage, nor any coy, sidelong glance left to bestow upon Jayakumāra, scion of the Lunar race.154
श्लोक ( Shlok ) 155
तत्कर्णावेव कर्णेषु कृतपुण्यौ प्रियाज्ञया । तत्प्रेमालापगीतानां पात्रं प्रागेव तौ यतः ॥१५५।।
उसके कान ही सब कानोंमें अधिक पुण्यवान् थे क्योंकि वे पहले से ही अपने प्रिय-जयकुमारकी आज्ञासे उनके प्रेमसंभाषण और गीतोंके पात्र हो गये थे ॥ १५५॥
Her ears were, verily, the most blessed among all ears—for even before others, they had been chosen by their beloved Jayakumāra to receive the cherished gift of his tender words and melodious songs. Thus, they were sanctified by love and devotion.155
श्लोक ( Shlok ) 156
तद्भ्रू शरासनः कामस्तत्कटाक्षशरावलिः। स्वरूपेणाजितं मत्वा जयं मन्ये व्यजेष्ट सः ॥१५६॥
मैं तो ऐसा मानता हूँ कि कामदेवने जयकुमारको अपने रूपसे अजेय मानकर सुलोचनाकी भौंहरूपी धनुष और उसीके कटाक्षरूपी बाणोंके समूहसे ही उसे जीता था ।।१५६।।
I am of the firm belief that Kāma, the god of love, having deemed Jayakumāra invincible even to his own beauty, chose instead to conquer him through Sulocanā’s bow-like brows and the swift, piercing arrows of her sidelong glances.156
श्लोक ( Shlok ) 157
तस्या लालाटिको नैकः कामो वीराग्रणीः स्वयम् । जयोऽपि नोन्नतिः कस्माल्ललाटस्य श्रितश्रियः ॥ १५७।।
उस सुलोचनाका सेवक अकेला कामदेव ही नहीं था किन्तु वीरशिरोमणि जयकुमार भी स्वयं उसका सेवक था, फिर भला शोभाको धारण करनेवाले उसके ललाटकी उन्नति-उच्चता अथवा उत्तमता क्यों न होती ? ॥१५७॥
Sulocanā was served not by Kāma alone, but even by the valiant Jayakumāra himself, foremost among heroes. Then why should the eminence of her radiant brow not rise in splendour? Indeed, such beauty was but the natural crown of one so revered by love and might alike.157
श्लोक ( Shlok ) 158
मृदवस्तनवः स्निग्धाः कृष्णास्तस्याः सकुञ्चिताः । कामिनां केवलं कालबालव्यालाः शिरोरुहाः ॥१५८॥
कोमल, बारीक, चिकने, काले और कुछ कुछ टेढ़े उसके शिरके बाल कामी पुरुषोंको केवल काले सांपोंके बच्चोंके समान जान पड़ते थे ।।१५८।।
The soft, fine, smooth, and gently curling tresses upon her head—dark as night—appeared to enamoured hearts like the tender offspring of black serpents, graceful yet fearsome in their bewitching allure.158
श्लोक ( Shlok ) 159
भाति तस्याः पुरोभागो भूषितो नयनादिभिः । सुरूप इव पाश्चात्यो वाभाति स्वयमेव सः ॥१५९॥
उस सुलोचनाका आगेका भाग नेत्र आदिसे विभूषित होकर सुशोभित हो रहा था और पिछला भाग किसी सुन्दर वस्तुके समान अपने आप ही सुशोभित हो रहा था ।।१५९।।
The front of Sulocanā, adorned with eyes and other radiant features, shone with enchanting beauty; while the rear, though free of ornament, gleamed resplendently on its own—like a rare and precious jewel that needs no embellishment to captivate the gaze.159
श्लोक ( Shlok ) 160
ये तस्यास्तनुनिर्माण वेधसा साधनीकृताः। अणवस्तृणवच्छेषास्त एव परमाणवः ॥१६०॥
विधाताने उसका शरीर बनानेमें जिन अणुओंको साधन बनाया था यथार्थमें वे ही अणु परमाणु अर्थात् उत्कृष्ट अणु थे और उनसे वाकी बचे हुए अणु तृणके समान तुच्छ थे ।। १६०।।
The very atoms that the Creator employed in crafting her form were, in truth, the finest of all—veritable paramāṇus, the most exquisite of elements. All others that remained, untouched by that divine purpose, seemed no more than mere straw—insignificant and unworthy by comparison. 160
श्लोक ( Shlok ) 161
अति वृद्धः क्षयासन्नः स्पष्टलक्ष्माहिगोचरः । पूर्णः शेषोऽप्यसम्पूर्णो न तद्वक्त्रोपमो विधुः ॥१६१॥
चन्द्रमा उसके मुखकी उपमाके योग्य नहीं था क्योंकि यदि पूर्ण चन्द्रमाकी उपमा देते हैं तो वह बहुत वृद्ध अर्थात् बड़ा है, उसका क्षय निकट है, कलंक उसका स्पष्ट दिखलाई देता है और राहु उसे दबा देता है। यदि अपूर्ण चन्द्रमाकी उपमा देते हैं तो वह स्वयं अपूर्ण है-अधूरा है। भावार्थ उसका मुख तरुण, अविनश्वर, निष्कलंक और पूर्ण था इसलिये पूर्ण अथवा अपूर्ण कोई भी चन्द्रमा उसके मुखकी उपमाके योग्य नहीं था ॥१६१।।
The moon was unworthy as a simile for her radiant face—for if one likens it to the full moon, it is too aged, nearing its waning, marred by blemishes, and subject to eclipse by Rāhu. And if compared to the crescent, it is by nature incomplete. But her face was ever youthful, eternal, spotless, and whole—thus, neither the full nor the waxing moon could serve as a fitting likeness for its surpassing beauty.161
श्लोक 162 से 171
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
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आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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