आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251
श्लोक 252 से 264 नगरी और उत्सव की शोभा
वाराणसी नगरी अचिंत्य वैभव से अलंकृत थी, राजमहल का उत्सव नगर से ही प्रकट था। सचेतन और अचेतन सभी उत्सव मना रहे थे। कोई भोग या भोक्ता अभावग्रस्त न था, कामदेव और लक्ष्मी सदा उपस्थित थे। धर्मात्मा इस पुण्य का माहात्म्य देख आदर करते थे। मुनि इसे धर्म का फल मान प्रसन्न हुए। सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुलोचना को मंगलद्रव्यों से युक्त मंडप में ले गईं, अभिषेक कर चैत्यालय में जिनपूजा कराई, शेषाक्षत दिए, और शुभ लग्न की प्रतीक्षा में ठहरीं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 252 to 264
श्लोक ( Shlok ) 252
जितामरपुरीशोभा सौन्दर्यात् सा पुरी तदा । प्रसाधनमयं कायमधिताचिन्त्य वैभवम् ॥२५२।।
इस प्रकार अपनी सुन्दरतासे स्वर्गपुरीकी शोभाको जीतनेवाली वह नगरी उस समय अचिन्त्य वैभवशाली अलंकारमय शरीरको धारण कर रही थी ॥ २५२॥
Thus, that city—surpassing even the splendor of the celestial realms by the glory of its own beauty—seemed at that time to have assumed a wondrous, resplendent form, adorned with unimagined magnificence. ॥252॥
श्लोक ( Shlok ) 253
उत्सवो राजगेहस्य नगरेणैव वर्णितः । अगाधो यदि पर्यन्तो मध्यमब्धेः किमुच्यते ॥२५३॥
राजमहलका उत्सव तो नगर ही कह रहा था क्योंकि समुद्र के किनारे का भाग ही जब अगाध है तब उसके बीचका क्या पूछना है ? भावार्थ-जब नगरमें ही भारी उत्सव हो रहा था तब राजमहलके उत्सवका क्या पूछना था ? ॥ २५३॥
The grandeur of the royal palace’s celebration needed no telling—for the city itself proclaimed it aloud. Indeed, if the very shore of the ocean is so deep and vast, what need is there to ask of its depths? In like manner, when the city was itself resplendent with festivity, what words could suffice to describe the magnificence within the royal palace? ॥253॥
श्लोक ( Shlok ) 254
न चित्रं तत्र’ मच्चित्ती’ सोत्सवोऽन्तर्बहिश्च तत् । ‘तद्वत्स्वभूषया यस्मात् कुड्याद्यपि विचेतनम् । २५४।।
वहांके सचेतन प्राणी अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग सब जगह उत्सव मना रहे थे इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है क्योंकि वहांकी दीवालें आदि अचेतन पदार्थ भी तो अपने अलंकारों द्वारा सचेतन प्राणियोंके समान ही उत्सव मना रहे थे। भावार्थ-दीवालें आदि अचेतन पदार्थ भी अलंकारोंसे सुशोभित किये गये थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उल्लाससे अलंकार धारण कर स्वयं ही उत्सव मना रहे हों ।॥ २५४।।
The sentient beings of that realm rejoiced in celebration, both inwardly and outwardly—and this was no marvel, for even the insentient—walls and other such forms—seemed to share in the festivity. Adorned with splendid ornaments, even these lifeless elements appeared as though, moved by joy, they had consciously arrayed themselves in finery and joined in the jubilations like living souls. ॥254॥
श्लोक ( Shlok ) 255
भोक्तृशून्यं न भोगाङ्गं न भोक्ता भोगवर्जितः । ‘तत्र सन्निहितोऽनङ्गो लक्ष्मीश्चाविष्कृतोदया ।l २५५ ll
वहांपर भोगोपभोगका कोई भी पदार्थ भोक्तासे रहित नहीं था और न कोई भोक्ता भी भोगोपभोग के पदार्थसे रहित था, वहांपर कामदेव सदा समीप ही रहता था और लक्ष्मी उदयरूप रहती थीं ।॥ २५५।।
There, no object of enjoyment was without an enjoyer, nor was any enjoyer deprived of objects of delight. Desire itself, in the form of Love’s deity, ever dwelt nearby, and Fortune, as auspicious prosperity, was ever on the rise. ॥255॥
श्लोक ( Shlok ) 256
पश्य पुण्यस्य माहात्म्यमिहापीति तदुत्सवम् । विलोक्य कृतधर्माणः पुरस्थान् बहु मेनिरे ॥ २५६॥
इस जन्ममें ही पुण्यका माहात्म्य देखो ऐसा सोचते हुए कितने ही धर्मात्मा लोग वहांका उत्सव देखकर उस नगरके रहनेवाले लोगोंको बड़ी आदरकी दृष्टिसे देख रहे थे ।॥ २५६॥
“Behold the majesty of merit in this very life!”—thus reflecting, many pious souls, beholding the grandeur of the celebration, gazed upon the inhabitants of that city with eyes filled with reverence and esteem. ॥256॥
श्लोक ( Shlok ) 257
उदसुन्वन् फलं मत्वा धर्मस्य मुनयोऽपि तत् । धर्माधर्मफलालोकात् स्वभावः स हि तादृशाम् ॥२५७।।
मुनि लोग भी उसे धर्मका फल मानकर प्रसन्न हुए थे सो ठीक है क्योंकि धर्मका फल देखकर प्रसन्न होना धर्मात्मा लोगोंका स्वभाव है और अधर्मका फलदेखकर प्रसन्न होना अधर्मात्मा लोगोंका स्वभाव है ॥ २५७॥
The sages too rejoiced, deeming it the fruit of righteousness—and rightly so, for to delight in the rewards of virtue is the very nature of the virtuous, just as to rejoice in the fruits of unrighteousness is the nature of the wicked. ॥257॥
श्लोक ( Shlok ) 258 – 264
कन्यागृहात्तदा कन्यामन्यां वा कमलालयाम्” । पुरोभूय” “पुरन्ध्यस्तामीषल्लज्जात्तसाध्वसाम् ll२५८ llविवाहविधिवेदिन्यः कृततत्कालसत्क्रियाम् । समानीय सदैवज्ञा महातूर्यरवान्विताम् ॥ २५९॥सर्वमङ्गलसम्पूर्णे मुक्तालम्बू “षभूषिते । चतुः काञ्चनसुस्तम्भे भूरिरत्नस्फुरत्त्विषि ॥२६०॥प्रमोदात् सुप्रभादेशाद् विवाहोत्सवमण्डपे । कलधौतमये पट्टे निवेश्य प्राङ्मुखीं सुखम् ॥२६१॥कलशैर्मुखविन्यस्त विलसत्पल्लवाधरैः । अभिषिच्य विशुद्धाम्बुपूर्णे स्वर्णमयैः शनैः ॥२६२॥कृतमङ्गलनेपथ्यां नीत्वा नित्यमनोहरम् । पूजयित्वाऽर्हतो भक्त्या सर्वकल्याणकारिणः ॥२६३॥सिद्धशेषां समादाय क्षिप्त्वा शिरसि साशिषम् । स्थिताः प्रतीक्ष्य” सल्लग्नं ‘तत्रावृत्याहितादरम् ॥२६४।॥
उसी समय विवाहकी विधिको जाननेवाली सौभाग्यवती स्त्रियां, जिसने तात्कालिक सत्क्रियाएं की हैं, जो लज्जासे कुछ भयभीत हो रही हैं, जिसके आगे बड़े बड़े नगाड़ोंके शब्द हो रहे हैं ज्योतिष शास्त्रको जाननेवाले अनेक विद्वान् जिसके साथ हैं और जो दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती हैं ऐसी उस कन्याको उसके सामने जाकर उसके घरसे सब प्रकारके मंगल द्रव्योंसे भरे हुए, मोतियोंके आभूषणोंसे सुशो-भित, सुवर्णके बने हुए चार उत्तम खम्भोंसे युक्त और अनेक रत्नोंकी कान्तिसे जगमगाते हुए विवाहोत्सव मण्डपमें बड़े हर्षके साथ महारानी सुप्रभाकी आज्ञासे आईं और पूर्व दिशाकी ओर मुखकर सुखपूर्वक सोनेके पाटपर बिठा दिया। तदनन्तर मुखपर रखे हुए शोभायमान पल्लवों को धारण करनेवाले तथा विशुद्ध जलसे भरे हुए सुवर्णमय शुभ कलशोंसे उसका अभिषेक किया। फिर माङ्गलिक वस्त्राभूषणोंको धारण करनेवाली कन्याको नित्यमनोहर नामक चैत्यालय में ले जाकर वहां उससे सबका कल्याण करनेवाले श्री अर्हन्तदेवकी पूजा कराई । उसके बाद सिद्ध शेषाक्षत लेकर आशीर्वादपूर्वक उसके शिरपर रक्खे और इतना सब कर चुकने के बाद वे स्त्रियां उसका आदर सत्कार करती हुई शुभ लग्नकी प्रतीक्षामें उसे घेरकर वहीं ठहर गई ।।२५८-२६४।।
At that very moment, auspicious and noble women—versed in the rites of marriage, reverent performers of timely sacred observances, gently tremulous with modesty—approached the maiden, who seemed as though another incarnation of the Goddess of Fortune herself. With celestial drums resounding ahead, and accompanied by learned astrologers well-versed in the sacred science of the stars, they came to her home by the command of Queen Suprabhā, and led her joyfully to the splendid wedding pavilion.
That pavilion was adorned with every auspicious substance, bedecked with ornaments of pearls, supported by four excellent pillars of gold, and gleamed with the brilliance of many precious gems. There, they seated the maiden—facing the auspicious east—upon a golden seat, in comfort and delight.
Then, holding radiant leaves over her head and bearing auspicious golden pitchers filled with pure water, they ceremonially bathed her in a sacred ablution. Thereafter, arrayed in auspicious garments and ornaments, the maiden was led to the Nityamanohara Caitya shrine, where she reverently worshipped the venerable Lord Arhant, the source of universal welfare.
Following this, they took consecrated rice and unbroken grains, placed them upon her head with blessings, and, having thus fulfilled every sacred rite, they surrounded the maiden with honor and affection—awaiting the propitious moment of the marriage with joyous anticipation. ॥258–264॥
श्लोक 265 से 275
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251
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