आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 |
श्लोक 47 से 69 जयकुमार के चरित्र की मांग
राजा श्रेणिक, वृषभदेव के चरित्र से प्रभावित होकर, उनके 84 गणधरों में से 71वें गणधर जयकुमार के चरित्र को सुनने की इच्छा प्रकट करते हैं। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को युद्ध में जीता और उनके प्रताप की प्रशंसा की गई। गणधरों के नामों का उल्लेख करते हुए उनकी महिमा और गुणों का वर्णन किया गया है, जो सर्वज्ञ के अनुरूप थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 47 to 69
श्लोक ( Shlok ) 47
अथातः श्रेणिकः पीत्वा पुरोः सुचरितामृतम् ।आसिस्वादयिषुः शेषं हस्तलग्नमिवोत्सुकः ॥४७॥
अथानन्तर-राजा श्रेणिक भगवान् वृषभदेवके उत्तम चरितरूपी अमृतको पीकर हाथमें लगे हुए की तरह उसके शेष भागको भी आस्वादन करनेकी इच्छा करता हुआ अत्यन्त उत्कंठित हो उठा ।॥४७॥
Thereafter, King Śreṇik, having partaken of the ambrosial essence of the noble deeds of Lord Ṛṣabhadeva, was stirred with profound yearning—like one who, having tasted nectar upon his hand, longs to savor the remainder. ॥47॥
श्लोक ( Shlok ) 48 – 69
समुत्थाय सभामध्ये प्राञ्जलिः प्रणतो मनाक्। पुनर्विज्ञापयामास गौतमं गणनायकम् ॥४८॥ त्वत्प्रसादाच्छ तं सम्यक्पुराणं परम पुरोः । निवृत्तोऽसौ यथास्यान्ते तथाहं चातिनिवृतः ॥४९॥किल तस्मिन् जयो नाम तीर्थेभूत् पार्थिवाग्रणीः । यस्याद्यापि जितार्कस्य प्रतापः प्रथते क्षितौ ॥५०॥यस्य दिग्विजय मेघकुमारविजय स्वयम् । वीरपट्ट समुद्धृत्य बबन्ध भरतेश्वरः ॥५१॥पुरस्तीर्थ कृतां पूर्वश्चक्रिणां भरतेश्वरः । दानतीर्थकृतां श्रेयान् किलासौ च स्वयंवरे ॥५२॥अर्ककीति पुरोः पौत्र” सङ्गरे कृतसङ्गरः। जित्वा निगलयामास” किलैकाकी सहेलया ॥५३॥सेनान्तो वृषभः कुम्भो रथान्तो दृढसंज्ञकः । धनुरन्तः शतो देवशर्मा भावान्तदेवभाक् ॥५४।। नन्दनः सोमदत्ताह्वः सूरदत्तो गुणैर्गुरुः । वायुशर्मा यशोबाहुर्देवाग्निश्चाग्निदेववाक् ॥५५।।अग्निगुप्तोऽथ मित्राग्निर्हलभृत् समहीधरः । महेन्द्रो वसुदेवश्च ततः पश्चाद्वसुन्धरः ॥५६॥अचलो मेरुसंज्ञश्च ततो मेरुधनाह्वयः । मेरुभूतिर्यशोयज्ञप्रान्तसर्वाभिधानकौ ॥५७॥सर्वगुप्तः प्रियप्रान्तसर्वो देवान्तसर्ववाक् । सर्वादिविजयो गुप्तो विजयादिस्ततः परः ॥५८॥विजयमित्रो विजयिलोऽपराजितसंज्ञकः । वसुमित्रः सविश्वादिसेनः सेनान्तसाधुवाक् ॥५९॥देवान्तसत्यः सत्यान्तदेवो गुप्तान्तसत्यवाक् । सत्यमित्रः सतां ज्येष्ठः सम्मितो निर्मलो गुणैः ॥६०॥विनीतः संवरो गुप्तो मुन्यादिर्मुनिदत्तवाक् । मुनियज्ञो मुनिर्देवप्रान्तो यज्ञान्तगुप्तवाक् ॥६१॥मित्रयज्ञः स्वयम्भूश्च देवदत्तान्तगौ भगौ। भगादिफल्गुः फल्ग्वन्तगुप्तो मित्रादिफल्गुकः ॥६२॥प्रजापतिः सर्वसन्धो वरुणो धनपालकः । मघवान् राश्यन्ततेजो महावीरो महारथः ॥६३॥ विशालाक्षो महाबालः शुचिसालस्ततः परः । वज्रश्च वज्रसारश्च चन्द्रचूलसमाह्वयः ॥६४।।जयो महारसः कच्छमहाकच्छावतुच्छकौ । नमिर्विनमिरन्यौ च बलातिबलसंज्ञकौ ॥६५॥बलान्तभद्रो नन्दी च महाभागी परस्ततः । मित्रान्तनन्दी देवान्तकामोऽनुपमलक्षणः ॥६६॥चतुर्भिरधिकाशीतिरिति स्त्रष्टुर्गणाधिपाः । एते सप्तर्द्धिसंयुक्ताः सर्वे वेद्यनुवादिनः ॥६७॥स एवासीद् गृहत्यागादेतेष्वप्युदितोदितः । एकसप्तति संख्यानसम्प्राप्तगणनो गणी ॥६८॥पुराणं तस्य मे ब्रूहि महत्तत्रास्ति कौतुकम् । भव्यचातकवृन्दस्य प्रघणो भगवानिति ॥६९ll
उसने सभाके बीचमें खड़े होकर हाथ जोड़े, कुछ शिर झुकाकर ‘नमस्कार किया और फिर गौतम गणधरसे इस प्रकार प्रार्थना की कि हे भगवन्, मैंने आपके प्रसादसे श्री वृषभदेवका यह उत्कृष्ट पुराण अच्छी तरह श्रवण किया है। जिस प्रकार भगवान् वृषभदेव इस पुराणके अन्तमें निर्वाणको प्राप्त होकर सुखी हुए हैं उसी प्रकार में भी इसे सुनकर अत्यन्त सुखी हुआ हूँ। ऐसा सुना जाता है कि भगवान् वृषभदेवके तीर्थमें सब राजाओंमें श्रेष्ठ जयकुमार नामका वह राजा हुआ था, जिसने अर्ककीतिको भी जीता था और जिसका प्रताप आज भी पृथिवीपर प्रसिद्ध है ।। दिग्विजयके समय मेघकुमारको जीत लेनेपर जिसके लिये स्वयं महाराज भरतने वीरपट्ट निकालकर बाँधा था, जिस प्रकार तीर्थंकरोंमें वृषभदेव, चक्रवतियों में सम्राट् भरत और दान तीर्थकी प्रवृत्ति करनेवालोंमें राजा श्रेयांस सर्वप्रथम हुए हैं उसी प्रकार जो स्वयंवरकी विधि चलानेमें सर्वप्रथम हुआ है, जिसने युद्धमें प्रतिज्ञा कर श्री वृषभदेवके पोते अर्ककीतिको अकेले ही लीलामात्रमें जीतकर बाँध लिया था तथा वृषभसेन १, कुम्भ २, दृढरथ ३, शतधनु ४, देवशर्मा ५, देवभाव ६, नन्दन ७, सोमदत्त ८, गुणोंसे श्रेष्ठ सूरदत्त ९, वायुशर्मा १०, यशोबाहु ११, देवाग्नि १२, अग्निदेव १३, अग्निगुप्त १४, मित्राग्नि १५, हलभृत् १६, प्रसिद्ध महीधर १७, महेन्द्र १८, वसुदेव १९, उसके अनन्तर वसुंधर २०, अचल २१, मेरु २२, तदनन्तर मेरुधन २३, मेरुभूति २४, सर्वयश २५, सर्वयज्ञ २६, सर्वगुप्त २७, सर्वप्रिय २८, सर्वदेव २९, सर्वविजय ३०, विजयगुप्त ३१, फिर विजयमित्र ३२, विजयिल ३३, अपरा-जित ३४, वसुमित्र ३५, प्रसिद्ध विश्वसेन ३६, साधुसेन ३७, सत्यदेव ३८, देवसत्य ३९, सत्य-गुप्त ४०, सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ सत्यमित्र ४१, गुणोंसे युक्त निर्मल ४२, विनीत ४३, संवर ४४, मुनिगुप्त ४५, मुनिदत्त ४६, मुनियज्ञ ४७, मुनिदेव ४८, गुप्तयज्ञ ४९, मित्रयज्ञ ५०, स्वयंभू ५१, भगदेव ५२, भगदत्त ५३, भगफल्गु ५४, गुप्तफल्गु ५५, मित्रफल्गु ५६, प्रजापति ५७, सर्वसंघ ५८, वरुण ५९, धनपालक ६०, मघवान् ६१, तेजोराशि ६२, महावीर ६३, महारथ ६४, विशालाक्ष ६५, महाबाल ६६, शुचिशाल ६७, फिर वज्र ६८, वज्रसार ६९, चन्द्रचूल ७०, जय ७१, महारस ७२, अतिशय श्रेष्ठ कच्छ ७३, महाकच्छ ७४, नमि ७५, विनमि ७६, बल ७७, अतिबल ७८, भद्रबल ७९, नन्दी ८०, फिर महाभागी ८१, नन्दिमित्र ८२, कामदेव ८३ और अनुपम ८४ । इस प्रकार भगवान् वृषभदेवके ये ८४ गणधर थे, ये सभी सातों ऋद्धियोंसे सहित थे और सर्वज्ञ देवके अनुरूप थे। इन चौरासी गणधरोंमें जो घरका त्याग कर अत्यन्त प्रभावशाली, गुणवान् और इकहत्तरवीं संख्याको प्राप्त करनेवाला अर्थात् इकहत्तरवाँ गणधर हुआ था, उन्हीं जयकुमारका पुराण मुझे कहिये क्योंकि उसमें बहुत भारी कौतुक है। आप भव्यजीवरूपी चातक पक्षियोंके समूहके लिये उत्तम मेघके समान हैं ।॥४८-६९।।
Then, standing amidst the royal assembly, King Śreṇik joined his palms reverently, bowed his head slightly in homage, and humbly addressed Gautama Gaṇadhara with these words:
“O Lord! Through your grace I have listened well to this exalted Purāṇa recounting the sublime life of Lord Ṛṣabhadeva. Just as the venerable Ṛṣabha, at the conclusion of this sacred tale, attained liberation and supreme bliss, so too have I found immense joy in hearing it.
It is heard that among the kings in Lord Ṛṣabha’s holy lineage, there arose a sovereign of great renown—King Jayakumāra—foremost among monarchs, who even conquered Arkkītika and whose valor is still famed upon the earth. During his conquests, when he defeated Meghakumāra, the illustrious Emperor Bharata himself honored him with the girdle of victory.
Just as Ṛṣabhadeva was the first among Tīrthaṅkaras, Bharata among Cakravartins, and King Śreyāṁsa the first to offer supreme alms, so too was Jayakumāra the first to establish the rite of svayaṁvara (bridal self-choice). In battle, he made a solemn vow and single-handedly subdued Arkkītika, the grandson of Ṛṣabhadeva, with effortless ease.
Following him were these eminent disciples of Ṛṣabhadeva: Ṛṣabhasena (1), Kumbha (2), Dṛḍharatha (3), Śatadhanu (4), Devaśarman (5), Devabhāva (6), Nandana (7), Somadatta (8), the virtuous Sūradatta (9), Vāyuśarman (10), Yaśobāhu (11), Devāgni (12), Agnideva (13), Agnigupta (14), Mitrāgni (15), Halabhṛt (16), renowned Mahīdhara (17), Mahendra (18), Vasudeva (19), followed by Vasuṁdhara (20), Acala (21), Meru (22), then Merudhanu (23), Merubhūti (24), Sarvayaśas (25), Sarvayajña (26), Sarvagupta (27), Sarvapriya (28), Sarvadeva (29), Sarvavijaya (30), Vijayagupta (31), then Vijayamitra (32), Vijayila (33), Aparājita (34), Vasumitra (35), famed Viśvasena (36), Sādhusena (37), Satyadeva (38), Devasatya (39), Satyagupta (40), Satyamitra, foremost among the virtuous (41), the pure and meritorious Nirmala (42), Vinīta (43), Saṁvara (44), Munigupta (45), Munidatta (46), Muniyajña (47), Munideva (48), Guptayajña (49), Mitrayajña (50), Svayambhū (51), Bhagadeva (52), Bhagadatta (53), Bhagphalgu (54), Guptaphalgu (55), Mitraphalgu (56), Prajāpati (57), Sarvasaṅgha (58), Varuṇa (59), Dhanapālaka (60), Maghavan (61), Tejorāśi (62), Mahāvīra (63), Mahāratha (64), Viśālākṣa (65), Mahābala (66), Śuciśāla (67), then Vajra (68), Vajrasāra (69), Candracūḍa (70), Jaya (71), Mahārasa (72), the exceedingly great Kaccha (73), Mahākaccha (74), Nami (75), Vinami (76), Bala (77), Atibala (78), Bhadrabala (79), Nandī (80), followed by Mahābhāgī (81), Nandimitra (82), Kāmadeva (83), and Anupama (84).
These eighty-four disciples of Lord Ṛṣabha were adorned with the seven kinds of supernatural perfections (ṛddhis) and were in perfect accord with the Omniscient One. Among them, the seventy-first in succession—who renounced his household life, shone with great virtues, and possessed extraordinary power—was none other than the celebrated Jayakumāra.
Revered Lord, I beseech you—relate to me the Purāṇa of that illustrious Jayakumāra, for it abounds in wondrous episodes. You are verily like the noble cloud that quenches the thirst of chātaka birds in the form of worthy souls!”॥48–69॥
श्लोक 70 से 81
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 |
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