आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42
श्लोक 43 से 51 ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्र
इस खंड में ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्रों का प्रारंभ है। ऋषि मंत्रों में ‘विविधर्द्धये नमः’, ‘अङ्गधराय नमः’, और ‘परविभ्यो नमो नमः’ शामिल हैं। सुरेंद्र मंत्रों में ‘दिव्यजाताय स्वाहा’, ‘नेमिनाथाय स्वाहा’, ‘सौधर्माय स्वाहा’, और ‘अहमिन्द्राय स्वाहा’ जैसे मंत्र देवेंद्रों, सौधर्मेंद्र, और उनके अनुचरों को हवि अर्पण के लिए हैं। सम्यग्दृष्टि, कल्पपति, दिव्यमूर्ति, और वज्रनामन् की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 43 to 51
श्लोक ( Shlok ) 43
परमर्षिभ्य इत्यस्मात्परं वाच्यं नमो नमः । ततोऽनुपमजाताय नमो नम इतीरयेत् ॥४३॥
फिर परमर्षिभ्यः शब्दके आगे नमो नमः का उच्चारण करना चाहिये अर्थात् ‘परमर्षिभ्यो नमो नमः’ (परम ऋषियोंको बार बार नमस्कार हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये और इसके बाद ‘अनुपमजाताय नमो नमः’ (उपमारहित जन्मधारण करनेवालेको बार बार नमस्कार हो) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ॥४३।।
Next, one should reverently recite:“Paramarṣibhyo namo namaḥ”— Repeated salutations unto the Supreme Seers (Paramarṣis).Thereafter, the following mantra should be pronounced:“Anupamajātāya namo namaḥ”— Repeated salutations unto Him who has taken birth beyond all comparison.॥43॥
श्लोक ( Shlok ) 44 – 46
सम्यग्दृष्टिपदं चान्ते बोध्यन्तं द्विरुदाहरेत् । ततो भूपतिशब्दश्च नगरोपयदः पतिः ॥४४॥ द्विर्वाच्यौ ताविमौ शब्दौ बोध्यन्तौ मन्त्रवेदिभिः । मन्त्रशेषोऽप्ययं तस्मादनन्तरमुदीर्यताम् ॥४५॥कालश्रमणशब्दं च द्विरुक्त्वाऽऽमन्त्रणे ततः । स्वाहेति पदमुच्चार्य प्राग्वत्काम्यानि चोद्धरेत् ॥४६॥
फिर अन्तमें सम्बोधन विभक्त्यन्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार उच्चारण करना चाहिये और इसी प्रकार मन्त्रोंको जाननेवाले द्विजों को सम्बोधनान्त भूपति और नगरपति शब्दका भी दो दो बार उच्चारण करना चाहिये । तदनन्तर आगे कहा जानेवाला मन्त्रका अवशिष्ट अंश भी बोलना चाहिये । कालश्रमण शब्दको सम्बोधन विभक्तिमें दो बार कहकर उसके आगे स्वाहा शब्दका उच्चारण करना चाहिये और फिर यह सब कह चुकने के बाद पहले के समान काम्यमन्त्र पढ़ना चाहिये ।।४४-४६॥
Then, at the conclusion, the word “Samyagdṛṣṭi”—in the vocative case—should be uttered twice:“Samyagdṛṣṭe, samyagdṛṣṭe”— O Seer of Truth! O Seer of Truth!Likewise, the dvijas (twice-born, or mantra-knowing initiates) should recite—also in vocative form—each of the following words twice:“Bhūpate, bhūpate”— O Lord of the Earth! O Lord of the Earth!“Nagarapate, nagarapate”— O Protector of the City! O Protector of the City!Thereafter, the remaining portion of the forthcoming mantra should also be recited in full.Then, the word “Kālaśramaṇa”, in the vocative form, should be spoken twice, followed by the sacred syllable:“Svāhā”— O Kālaśramaṇa! O Kālaśramaṇa! — Svāhā.(I offer oblation unto Thee.)Having thus completed the recitation of all these, one should once again repeat the kāmya mantra as prescribed earlier.॥44–46॥
श्लोक ( Shlok ) 47
चूर्णिः- सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, निर्ग्रन्थाय नमः, वीतरागाय नमः, महाव्रताय नमः, त्रिगुप्ताय नमः, महायोगाय नमः, विविधयोगाय नमः, विविधद् र्धये नमः, अङ्गधराय नमः, पूर्वधराय नमः, गणधराय नमः, परमर्षिभ्यो नमो नमः, अनुपमजाताय नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे भूपते भूपते नगरपते कालश्रमण कालश्रमण स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशतं भवतु, समाधिमरणं भवतु । मुनिमन्त्रोऽयमाम्नातो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । वक्ष्ये सुरेन्द्रमन्त्रं च यथा ‘स्माहार्षभी श्रुतिः ॥४७॥
इन सब ऋषिमन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-‘सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, निर्ग्रन्थाय नमः, वीतरागाय नमः, महाव्रताय नमः, त्रिगुप्ताय नमः, महायोगाय नमः, विविधयोगाय नमः, विविधर्द्धये नमः’ अङ्गधराय नमः, पूर्वधराय नमः, गणधराय नमः, परमर्षिभ्यो नमो नमः, अनुपमजाताय नमो नमः, सम्य-ग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे भूपते भूपते नगरपते नगरपते कालश्रमण कालश्रमण स्वाहा, सेवाफलं षट्रपरमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।तत्त्वों के जाननेवाले मुनियों के द्वारा ये ऊपर लिखे हुए मन्त्र मुनिमन्त्र अथवा ऋषिमन्त्र माने गये हैं। अब इनके आगे भगवान् ऋषभदेवकी श्रुतिने जिस प्रकार कहा है उसी प्रकार में सुरेन्द्र मन्त्रोंको कहता हूं ॥४७॥
The complete collection of the Ṛṣi Mantras is as follows:“Satyajātāya namaḥ, Arhajjātāya namaḥ, Nirgranthāya namaḥ, Vītarāgāya namaḥ, Mahāvratāya namaḥ, Triguptāya namaḥ, Mahāyogāya namaḥ, Vividha-yogāya namaḥ, Vividhṛddhaye namaḥ, Aṅgadharāya namaḥ, Pūrvadharāya namaḥ, Gaṇadharāya namaḥ, Paramarṣibhyo namo namaḥ, Anupamajātāya namo namaḥ, Samyagdṛṣṭe samyagdṛṣṭe, Bhūpate bhūpate, Nagarapate nagarapate, Kālaśramaṇa kālaśramaṇa — svāhā.
Sevāphalaṁ ṣaṭparamasthānaṁ bhavatu, apamṛtyuvināśanaṁ bhavatu, samādhimaraṇaṁ bhavatu.”These sacred mantras—reverently proclaimed by sages who are the knowers of the ultimate truths (tattvas)—are known as Munimantras or Ṛṣimantras.Now, in accordance with the divine revelation as spoken in the Śruti of Lord Ṛṣabhadeva Himself, I shall proceed to declare the Surendra Mantras (Mantras addressed to the Lord of the celestials).॥47॥
श्लोक ( Shlok ) 48
प्रथमं सत्यजाताय स्वाहेत्येतत्पदं पठेत् । ततः स्यादर्हज्जाताय स्वाहेत्येतत्परं पदम् ॥४८॥
प्रथम ही में ‘सत्यजाताय स्वाहा’ (सत्यजन्म लेनेवालेको हवि समर्पण करता हूं) यह पद पढ़ना चाहिये, फिर ‘अर्हज्जाताय स्वाहा’ (अरहन्तके योग्य जन्म लेनेवालेको हवि समर्पण करता हूँ) यह उत्कृष्ट पद पढ़ना चाहिये ॥४८।।
First of all, one should recite the sacred phrase:“Satyajātāya svāhā”— I offer oblation unto Him who has taken birth in the embodiment of Truth.Then, the exalted mantra should be uttered:“Arhajjātāya svāhā”— Oblation unto Him who has taken a birth worthy of the Arhant, the Enlightened One.॥48॥
श्लोक ( Shlok ) 49
ततश्च दिव्य जाताय स्वाहेत्येवमुदाहरेत् । ततो दिव्यार्च्यजाताय स्वाहेत्येतत्पदं पठेत् ॥४९॥
फिर ‘दिव्यजाताय स्वाहा’ (जिसका जन्म दिव्यरूप है उसे हवि समर्पण करता हूँ) ऐसा उच्चारण करना चाहिये और फिर ‘दिव्या-र्च्यजाताय स्वाहा’ (दिव्य तेजःस्वरूप जन्म धारण करनेवालेके लिये हवि समर्पण करता हूँ) यह पद पढ़ना चाहिये ॥४९॥
Next, one should recite the following mantra:“Divyajātāya svāhā”— I offer oblation unto Him whose birth is of a divine nature.Thereafter, the following sacred phrase is to be pronounced:“Divyārcyajātāya svāhā”— Oblation unto Him who has taken birth radiant with divine effulgence.॥49॥
श्लोक ( Shlok ) 50
ब्रू्याच्च नेमिनाथाय स्वाहेत्येतदनन्तरम् । सौधर्माय पदं चास्मात्स्वाहोक्त्यन्तमनुस्मरेत् ॥५०॥
तदनन्तर ‘नेमिनाथाय स्वाहा’ (धर्मचक्रकी धुरीके स्वामी जिनेन्द्रदेवको समर्पण करता हूँ) यह पद बोलना चाहिये और इसके बाद ‘सौधर्माय स्वाहा’ (सौधर्मेन्द्रके लिये समर्पण करता हूँ) इस मन्त्रका स्मरण करना चाहिये ।। ५० ।।
Thereafter, the following mantra should be recited:“Nemināthāya svāhā”— Oblation unto Lord Neminātha, the divine sovereign of the Dharma-wheel.Next, one should recall and pronounce the sacred phrase:“Saudharmāya svāhā”— Oblation unto Saudharma, the Indra of the celestial realm.॥50॥
श्लोक ( Shlok ) 51
कल्पाधिपतये स्वाहापवं वाच्यमतः परम् । भूयोऽप्यनुचरायादि स्वाहाशब्दमुदीरयेत् ॥५१॥
फिर ‘कल्पाधिपतये स्वाहा (स्वर्गके अधिपतिके लिये समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र कहना चाहिये और उसके बाद ‘अनुचराय स्वाहा’ (इन्द्रके अनुचरोंके लिये समर्पण करता हूँ) यह शब्द बोलना चाहिये ॥५१॥
Then, one should recite the sacred mantra:“Kalpādhipataye svāhā”— Oblation unto the Lord of the celestial realm, the Sovereign of the Heavens.Thereafter, the following phrase is to be pronounced:“Anucarāya svāhā”— Oblation unto the attendants and followers of Indra.॥51॥
श्लोक 52 से 62
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