आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 भरत की धार्मिक दिनचर्या
पर्व के दिन उपवास कर भरत जिनमंदिर में सामायिक करते और मुनियों का आचरण धारण करते थे। जिनेंद्रदेव का स्मरण कर उनका चित्त स्थिर हो जाता था, जिससे आभूषण शिथिल पड़ते थे। धर्म की चिंता से अन्य पदार्थों का चिंतन स्वतः हो जाता था। उनकी सभी क्रियाएँ धर्म चिंतन से प्रारंभ होती थीं। प्रभात में दिशाओं की लालिमा को वे जिनेंद्रदेव के चरणों की लालिमा मानते थे। सूर्योदय को केवलज्ञान का प्रतिविम्ब और कमलों की शीतलता को भगवान की दिव्यध्वनि समान समझते थे। धर्मप्रधान जीवन जीते हुए वे प्रातः धर्म चिंतन, पूजा, और प्रजा के सदाचार-असदाचार पर विचार करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
पर्वोपवासमास्थाय जिनागारे समाहितः । कुर्वन् सामयिकं सोऽधान्मुनिवृत्तं च तत्क्षणम् ॥११२॥
वे पर्वके दिन उपवासकी प्रतिज्ञा लेकर चित्तको स्थिर कर सामायिक करते हुए जिनमन्दिरमें ही रहते थे और उस समय ठीक मुनियोंका आचरण धारण करते थे ।।११२।।
On the days of sacred festivals, he would take the vow of fasting, compose his mind in equanimity, and remain within the precincts of the Jina temple, observing sāmāyika (meditative stillness). At such times, he conducted himself in precise accordance with the discipline of monks.112
श्लोक ( Shlok ) 113
जिनानुस्मरणे तस्य समाधानमुपेयुषः ।शैथिल्याद् गात्रबन्धस्य ‘स्रस्तान्याभरणान्यहो ॥११३॥
जिनेन्द्रदेवका स्मरण करने में वे समाधानको प्राप्त हो रहे थे उनका चित्त स्थिर हो रहा था और आश्चर्य है कि शरीरके बन्धन शिथिल होनेसे उनके आभूषण भी निकल पड़े थे ।॥११३॥
While immersed in the remembrance of Lord Jina, he attained perfect composure; his mind grew utterly serene. So wondrous was his state, that as the bonds of the body loosened, even his ornaments slipped away on their own.113
श्लोक ( Shlok ) 114
तथापि बहुचिन्तस्य धर्मचिन्ताऽभवद् दृढा। धर्मे हि चिन्तिते सर्व चिन्त्यं स्यादनुचिन्तितम् ॥११४॥
यद्यपि उन्हें बहुत पदार्थोंकी चिन्ता करनी पड़ती थी तथापि उनके धर्मकी चिन्ता अत्यन्त दृढ थी सो ठीक ही है क्योंकि धर्मकी चिन्ता करनेपर चिन्ता करने योग्य समस्त पदार्थोंका चिन्तवन अपने आप हो जाता है ।। ११४।।
Though he was burdened with the care of many worldly affairs, his concern for righteousness remained unwavering. And rightly so—for when one earnestly contemplates Dharma, all other matters worthy of concern naturally find their place within that contemplation.114
श्लोक ( Shlok ) 115
तस्याखिलाः क्रियारम्भा धर्मचिन्तापुरस्सराः । जाता जातमहोदर्क पुण्यपाकोत्थसम्पदः ॥११५।।
बड़े भारी फल देनेवाले पुण्यकर्म के उदयसे जिन्हें अनेक संपदाएं प्राप्त हुई हैं ऐसे भरतकी समस्त क्रियाओंका प्रारम्भ धर्मके चिन्तवनपूर्वक ही होता था अर्थात् महाराज भरत समस्त कार्योंके प्रारम्भमें धर्मका चिन्तवन करते थे ।।११५।।
Endowed with manifold riches through the rise of immensely meritorious deeds, all the undertakings of King Bharata were ever preceded by deep contemplation on Dharma. Indeed, at the outset of every endeavor, he first turned his mind to righteousness. 115
श्लोक ( Shlok ) 116
प्रातरुन्मीलिताक्षः सन् सन्ध्यारागारुणा दिशः । स मेनेऽर्हत्पदाम्भोजरागेणे वानु रञ्जिताः ॥११६॥
वे प्रातःकाल आंख खोलकर जब समस्त दिशाओंको सबेरेकी लालिमासे लाल लाल देखते थे तब ऐसा मानते थे मानों ये दिशाएं जिनेन्द्रदेव के चरणकमलोंकी लालिमासे ही लाल लाल हो गई हैं ।। ११६।।
At dawn, when he opened his eyes and beheld all directions tinged crimson by the morning’s glow, he perceived them as though suffused with the radiant hue of Lord Jina’s lotus feet.116
श्लोक ( Shlok ) 117
प्रातरुद्यन्तनुद्धूत नैशान्धतमसं रविम् । भगवत्केवलार्कस्य प्रतिबिम्बममंस्त सः ॥११७॥
जिसने रात्रिका गाढ़ अन्धकार नष्ट कर दिया है ऐसे सूर्यको प्रातःकालके समय उदय होता हुआ देखकर वे ऐसा समझकर उठते थे मानो यह भगवान्के केवलज्ञानका प्रतिविम्ब ही हो ॥११७॥
Beholding the sun rise at dawn, dispelling the dense darkness of night, he would rise with the thought that this resplendence was but a reflection of the omniscience of the Blessed Lord.117
श्लोक ( Shlok ) 118
प्रभातमरुतोद्धूतप्रबुद्ध कमलाकरात् । हृदि सोऽधाज्जिनालापकलापानिव शीतलान् ॥११८॥
प्रातःकालकी वायुके चलनेसे खिले हुए कमलोंके समूहको वे अपने हृदयमें जिनेन्द्र भगवान्की दिव्यध्वनिके समूहके समान शीतल समझते थे ।।११८।।
The blooming clusters of lotuses swaying in the morning breeze seemed to him as cool and soothing as the divine echoes of Lord Jina’s sacred sermon, resonating gently within his heart.118
श्लोक ( Shlok ) 119
धार्मिकस्यास्य कामार्य चिन्ताऽभूदानुषङ्गिकी” । तात्पर्य त्वभवद्धर्में कृत्स्नश्रेयोऽनुबन्धिनि ॥११९॥
वे बहुत ही धर्मात्मा थे, उनके काम और अर्थकी चिन्ता गौण रहती थी तथा उनका मुख्य तात्पर्य सब प्रकारका कल्याण करनेवाले धर्म में ही रहता था ।। ११९।।
He was a man of profound righteousness; concerns of desire and wealth held but a secondary place in his heart. His foremost intent ever remained fixed upon Dharma—the wellspring of all auspiciousness and ultimate welfare.119
श्लोक ( Shlok ) 120
प्रातरुत्थाय धर्मस्थैः कृतधर्मानु चिन्तनः । ततोऽर्थकामसम्पत्तिं सहामात्यैर्न्य रूपयत् ॥१२०॥
वे सबेरे उठकर पहले धर्मात्मा पुरुषोंके साथ धर्मका चिन्तवन करते थे और फिर मंत्रियोंके साथ अर्थ तथा कामरूप संपदाओंका विचार करते थे ॥१२०॥
At dawn, he would first engage in the contemplation of Dharma in the company of the virtuous. Thereafter, he would confer with his ministers upon matters of wealth and desire-related pursuits.120
श्लोक ( Shlok ) 121
तल्पादुत्थितमात्रोऽसौ सम्पूज्य गुरुदैवतम् । कृतमङगलनेपथ्यो ‘धर्मासनमधिष्ठितः ।।१२१॥
वे शय्यासे उठते ही देव और गुरुओंकी पूजा करते थे और फिर माङ्गलिक वेष धारणकर धर्मासनपर आरूढ होते थे ।। १२१।।
Rising from his bed, he would first offer worship to the Divine and to the preceptors. Thereafter, adorning himself in auspicious attire, he would ascend the throne of righteousness. 121
श्लोक 122 से 131
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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