आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान
भरत ने प्रातःकालीन क्रियाएँ पूरी कर सभा में राजाओं के साथ वृषभदेव की वंदना के लिए प्रस्थान किया। सेना और मुकुटबद्ध राजाओं के साथ वे समवसरण पहुँचे। दूर से समवसरण भूमि देखकर उन्होंने नमस्त्रीभूत मस्तक पर कमल के समान हाथ जोड़कर नमस्कार किया। बाहरी प्रदक्षिणा देकर, कक्षाओं का उल्लंघन करते हुए, मानस्तंभ, चैत्यवृक्ष, और सिद्धार्थवृक्ष को निहारते हुए वे भीतर प्रवेश किए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
अपि चास्मदुपज्ञं यद् द्विजलोकस्य सर्जनम् । गत्वा तदपि विज्ञाप्यं भगवत्पावसन्निधौ ॥१२॥
इसलिये इस विषय में भगवान्के मुखरूपी मङ्गल दर्पणको देखकर ही मुझे स्वप्नोंके यथार्थ रहस्यका निर्णय करना उचित है और वहीं खोटे स्वप्नोंका शान्तिकर्म करना भी उचित है ॥१२॥
Therefore, it is fitting that I discern the true mystery of these dreams only by gazing into the auspicious mirror that is the visage of the Lord, and therein also perform the rites to pacify the false and troubling visions.12
श्लोक ( Shlok ) 13
द्रष्टव्या गुरवो नित्यं प्रष्टव्याश्च हिताहितम् । महेज्यया च यष्टव्याः शिष्टानामिष्टमीदृशम् ॥१३॥
इसके सिवाय मैंने जो ब्राह्मण लोगोंकी नवीन सृष्टि की है उसे भी भगवान्के चरणोंके समीप जाकर निवेदन करना चाहिये ।।१३।।
Beyond this, I must also humbly present before the Lord’s feet the fresh creation fashioned by the Brahmins.13
श्लोक ( Shlok ) 14
इत्यात्मगतमालोच्य शय्योत्सङ्गात् परार्द्धयतः । प्रातस्तरां समुत्थाय कृतप्राभातिकक्रियः ॥१४।।
फिर अच्छे पुरुषोंका यह कर्तव्य भी है कि वे प्रतिदिन गुरुओंके दर्शन करें, उनसे अपना हित अहित पूछा करें और बड़े वैभवसे उनकी पूजा किया करें ।।१४।।
Moreover, it is the duty of virtuous men to behold their Gurus each day, to inquire of them concerning their welfare and harm, and to worship them with great reverence and grandeur.14
श्लोक ( Shlok ) 15
ततः क्षणमिव स्थित्वा महास्थाने नृपैर्वृतः । वन्दनाभक्तये गन्तुमुद्यतोऽभूद् विशाम्पतिः ॥१५॥
इस प्रकार मनमें विचारकर महाराज भरतने बड़े सबेरे बहुमूल्य शय्यासे उठकर प्रातःकालकी समस्त क्रियाएं कीं और फिर थोड़ी देरतक सभा में बैठकर अनेक राजाओंके साथ भगवान्की वन्दना तथा भक्तिके अर्थ जानेके लिये उद्यम किया ।।१५।।
Thus, having pondered deeply, Maharaja Bharata rose early from his precious bed and performed all the morning rites; thereafter, he sat awhile in council with many kings, striving to comprehend the meanings of devotion and homage to the Lord.15
श्लोक ( Shlok ) 16
वृतः परिमितैरेव मौलिबद्धेरनूत्थितैः । प्रतस्थे वन्दनाहेतोः र्विभूत्या परयान्वितः ॥१६॥
जो साथ ही साथ उठकर खड़े हुए कुछ परिमित मुकुटबद्ध राजाओंसे घिरे हुए हैं और उत्कृष्ट विभूतिसे सहित हैं ऐसे महाराज भरतने वन्दनाके लिये प्रस्थान किया ।।१६।।
Rising promptly, Maharaja Bharata, surrounded by a select assembly of crowned kings adorned with distinguished splendor, proceeded forth to offer his reverent salutations.16
श्लोक ( Shlok ) 17
ततः क्षेपीय एवासौ गत्वा सैन्यैः परिष्कृतः । सम्म्राट् प्रापतमुद्देशं यत्रास्ते स्म जगद्गुरुः ॥१७॥
तदनन्तर सेना सहित सम्राट् भरत शीघ्र ही वहां पहुंच गये जहां जगद्-गुरु भगवान् विराजमान थे ।।१७।।
Thereafter, Emperor Bharata, accompanied by his mighty army, swiftly arrived at the place where the World-Teacher, the Lord, was enthroned.17
श्लोक ( Shlok ) 18
दूरादेव जिनास्थानेभूमि पश्यन्निधीश्वरः । प्रणनाम चलन्मौलिघटिताञ्जलिकुड्मलः ॥१८॥
दूरसे ही भगवान्के समवसरणकी भूमिको देखते हुए निधियोंके स्वामी भरतने नम्त्रीभूत मस्तकपर कमलकी बौंड़ीके समान जोड़े हुए दोनों हाथ रखकर नमस्कार किया ।।१८।।
From afar, beholding the sacred ground of the Lord’s assembly, Bharata—the master of treasures—bowed humbly, placing his joined hands upon his head like a blossoming lotus, and offered his respectful obeisance.18
श्लोक ( Shlok ) 19
स तां प्रदक्षिणीकृत्य बहिर्भागे सदो ऽवनिम् । प्रविवेश विशामीशः क्रान्त्वा कक्षाः पृथग्विधाः ॥१९॥
उन महाराजने पहले उस समवसरण भूमिके बाहरी भागकी प्रदक्षिणा दी और फिर अनेक प्रकारकी कक्षाओंका उल्लंघन कर भीतर प्रवेश किया ।।१९।।
The Maharaja first circumambulated the outer precincts of the sacred assembly ground, then, disregarding the boundaries of various chambers, he entered within.19
श्लोक ( Shlok ) 20
मानस्तम्भमहाचैत्यद्रुमसिद्धार्थपादपान् । प्रेक्षमाणो व्यतीयाय स्तूपांश्चार्चितपूजितान् ॥२०॥
मानस्तम्भ, महाचैत्यवृक्ष, सिद्धार्थवृक्ष और पूजाकी सामग्रीसे पूजित स्तूपोंको देखते हुए उन सबको उल्लंघन करते गये ।।२०।।
Observing the Pillar of Thought, the Great Sacred Tree, the Siddhārtha Tree, and the stupas adorned with ceremonial offerings, he passed by all, respectfully traversing their bounds. 20
श्लोक ( Shlok ) 21
चतुष्टयीं वनश्रेणीं ध्वजान् हर्म्यावलीमपि । तत्र तत्रेक्षमाणोऽसौ तां तां कक्षामलङ्घयत् ॥२१॥
अपने अपने निश्चित स्थानोंपर चारों प्रकारकी वनकी पंक्तियों, ध्वजाओं और हर्म्यावलीको देखते हुए उन्होंने उन कक्षाओंका उल्लंघन किया ॥२१॥
Witnessing, at their appointed stations, the four varieties of groves, the banners, and the sacred enclosures, he traversed beyond the boundaries of those chambers.21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11
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