श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 11 : पूर्वभव में राजा महाबल का वैभव और वैराग्य
मंगलावली देश के रत्नसंचय नगर में महाबल नामक प्रतापी और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। उनके शासन में प्रजा पूर्ण स्वतंत्रता और सुख से जीवन व्यतीत करती थी। वे अपार ऐश्वर्य, कीर्ति, विद्या और पराक्रम से विभूषित थे। दीर्घकाल तक सांसारिक सुख भोगने के पश्चात उनमें वैराग्य जाग्रत हुआ। उन्होंने पुत्र धनपाल को राज्य सौंपकर विमलवाहन गुरु से दीक्षा ग्रहण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं का चिंतन किया।
श्लोक 12 से 22 : तीर्थंकर नामकर्म बंध, देवगति और अभिनन्दननाथ का गर्भ-जन्म
सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से महाबल ने तीर्थंकर नामकर्म बाँधा और समाधिमरण के पश्चात विजय अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव बने। आयु पूर्ण होने पर वे भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में राजा स्वयंवर और रानी सिद्धार्था के गर्भ में अवतरित हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनन्दननाथ का जन्म हुआ। इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘अभिनन्दन’ रखा।
श्लोक 23 से 31 : जन्म महोत्सव, दिव्य महिमा और राज्यारोहण
इन्द्र ने अत्यंत हर्षपूर्वक नृत्य और उत्सव मनाकर बालक को पुनः अयोध्या पहुँचाया। भगवान अभिनन्दननाथ संभवनाथ के बाद अवतीर्ण हुए। उनका शरीर अत्यंत ऊँचा, स्वर्णवत् कान्तिमान और पुण्यसमूह का प्रत्यक्ष स्वरूप था। कुमारावस्था पूर्ण होने पर पिता ने उन्हें राज्य देकर वनगमन किया। वे तेज, शांति, वैभव और पुण्य में अद्वितीय सम्राट बने।
श्लोक 32 से 41 : असाधारण गुण, सम्यग्दर्शन और लोककल्याणकारी व्यक्तित्व
राजा अभिनन्दननाथ के चरणों में समस्त राजाओं सहित इन्द्र भी नतमस्तक होते थे। उनमें अविनाशी क्षायिक सम्यग्दर्शन विद्यमान था। वे कुमार अवस्था में धीर-वीर, संयम में शांत और अंतिम अवस्था में उदात्त बने। उनका जीवन धर्म, शक्ति, ज्ञान और लोकहित का अद्भुत समन्वय था। वे जन्मपूर्व से ही श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न थे और मोहादि शत्रुओं के विनाश के लिए तत्पर रहते थे।
श्लोक 42 से 53 : वैराग्य, दीक्षा और मनःपर्ययज्ञान
राज्यकाल के अंत में मेघों में उत्पन्न और नष्ट होते महल को देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने शरीर, आयु और सम्पत्ति की अस्थिरता पर चिंतन कर वैराग्य धारण किया। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने हजार राजाओं सहित माघ शुक्ल द्वादशी को दीक्षा ली। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान की प्राप्ति हुई।
श्लोक 54 से 63 : केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के अगले दिन इन्द्रदत्त राजा ने उन्हें प्रथम आहार अर्पित किया। अठारह वर्ष के तप और मौन साधना के पश्चात पौष शुक्ल चतुर्दशी को असन वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उनके विशाल संघ में गणधर, पूर्वधारी, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविकाओं की विशाल संख्या थी। वे धर्मवृष्टि द्वारा असंख्य जीवों का कल्याण करते रहे।
श्लोक 64 से 70: सम्मेदशिखर पर मोक्ष और अंतिम स्तुति
भगवान अभिनन्दननाथ ने आर्यखण्ड में व्यापक विहार कर धर्म का प्रचार किया और अंततः सम्मेदगिरि पर एक मास के ध्यान के पश्चात वैशाख शुक्ल षष्ठी को पुनर्वसु नक्षत्र में अनेक मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनकी पूजा की। पूर्वभव के महाबल, देवगति के अहमिन्द्र और वर्तमान के तीर्थंकर अभिनन्दननाथ—इन तीनों महान अवस्थाओं से विभूषित प्रभु समस्त भव्य जीवों के भय का नाश कर कल्याण करें।
English translation of Uttar Puran parv 50- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अर्थे सत्ये वचः सत्यं सद्वक्तुर्वक्ति सत्यताम् । यस्यासौ पातु वन्दारूनन्दयन्नभिनन्दनः ॥ १ ॥
पदार्थके सत्य होनेसे जिनके वचनोंकी सत्यता सिद्ध है और ऐसे सत्य वचन ही जिन यथार्थ वक्ताकी सत्यताको प्रकट करते हैं ऐसे अभिनन्दन स्वामी वन्दना करनेवाले लोगोंको आनन्दित करते हुए हम सबकी रक्षा करें ।॥ १ ॥
May Abhinandana Swami—whose words stand vindicated by the very truth of reality, and whose truthful utterances reveal the authenticity of the true knower—bestow delight upon those who bow in reverence, and may He graciously protect us all. ॥ 1 ॥
श्लोक ( Shlok ) 2
जम्बूपलक्षिते द्वीपे विदेहे प्राचि दक्षिणे । सीताया विषयो भागे व्यभासीन्मङ्गलावती ॥ २ ॥
जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तट पर एक मङ्गलावली नामका देश सुशोभित है ॥ २ ॥
In the eastern Videha region of Jambudvipa, upon the southern bank of the Sita River, there flourishes a land renowned as Maṅgalāvalī, resplendent with auspiciousness. ॥ 2 ॥
श्लोक ( Shlok ) 3
राजा महाबलस्तत्र नगरे रणसञ्चये । स्वामिसम्पत्समेतोऽभूच्चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः ॥ ३ ॥
उसके रत्नसंचय नगरमें महाबल नामका राजा था। वह बहुत भारी राजसम्पत्तिसे सहित तथा चारों वर्णों और आश्रमोंका आश्रय था-रक्षा करने-वाला था ।। ३ ।।
In that land, within the city of Ratnasañcaya, there reigned a king named King Mahabala. Endowed with immense royal prosperity, he stood as the protector and sustaining refuge of all the four varṇas and the āśramas. ॥ 3 ॥
श्लोक ( Shlok ) 4
पाति तस्मिन् महीं नासीद् ध्वनिरन्याय इत्ययम् । ‘प्रावर्तना प्रजाः स्वेषु स्वेषु मार्गेष्वनर्गलाः ॥ ४ ॥
उसके पृथिवीकी रक्षा करते समय ‘अन्याय’ यह शब्द ही नहीं सुनाई पड़ता था और समस्त प्रजा किसी प्रतिबन्धके बिना ही अपने-अपने मार्गमें प्रवृत्ति करती थी ॥ ४ ॥
While he governed and safeguarded the earth, the very word “injustice” was unheard of; and all his subjects, free from every restraint, pursued their respective paths in harmony. ॥ 4 ॥
श्लोक ( Shlok ) 5
षाङ्गुण्यं तत्र नैर्गुण्यमगाद्विगतविद्विषि । निर्गुणोऽपि गुणैस्त्यागसत्यादिभिरसौ गुणी ॥ ५ ॥
शत्रुओंको नष्ट करनेवाले उस राजामें सन्धि-विग्रह आदि छह गुणोंका समूह भी निर्गुणताको प्राप्त हो गया था और इस तरह निर्गुण होनेपर भी वह राजा त्याग तथा सत्य आदि गुणोंसे गुणवान् था ।। ५ ।।
In that king, the destroyer of foes, even the six expedients of statecraft—such as alliance and hostility—had lapsed into ineffectiveness, as though rendered devoid of function; yet, though thus “without qualities,” he was in truth richly endowed with virtues such as renunciation and truth. ॥ 5 ॥
श्लोक ( Shlok ) 6 – 7
निःसपनः श्रियः सोऽभूत्पतिस्तस्याः सरस्वती । कीर्तिवीरश्रियोऽभूवन् सपत्न्यः प्रीतचेतसः ॥ ६ ॥अन्यवाकश्रोत्रयोः कीर्तिस्तस्य वाचि सरस्वती । वीरलक्ष्मीरसौ वक्षस्यहमित्यतुषद्मा ॥ ७ ॥
वह राजा लक्ष्मीका एक ही पति था। यद्यपि सरस्वती कीर्ति और वीरलक्ष्मी उसकी सौतें थीं तो भी राजा सब पर प्रसन्नचित्त रहता था। उसकी कीर्ति अन्य मनुष्यों के वचनों तथा कानोंमें रहती है, सरस्वती उसके वचनोंमें रहती है, वीरलक्ष्मी वक्षःस्थल पर रहती है और मैं सर्वाङ्गमें रहती हूं यह विचार कर ही लक्ष्मी अत्यन्त सन्तुष्ट रहती थी ।। ६-७ ।।
That king was the sole consort of Lakṣmī. Though Saraswati, Fame, and Heroic Fortune stood as her co-wives, yet he remained graciously disposed toward all. Reflecting thus—“His renown abides in the words and ears of other men, Sarasvatī dwells in his speech, Vīra-Lakṣmī rests upon his breast, while I pervade his entire being”—Lakṣmī remained supremely content. ॥ 6–7 ॥
श्लोक ( Shlok ) 8
कान्ताकल्पलतारम्यो निजकायामरङ्गमः । फलति स्म सुखं तस्य यद्यप्त्तेनाभिवाब्च्छितम् ॥ ८ ॥
स्त्रीरूपी कल्पलतासे रमणीय उसका शरीररूपी कल्पवृक्ष, वह जिस जिसकी इच्छा करता था वही वही सुख प्रदान करता था ।॥ ८ ॥
His body, like a wish-fulfilling tree rendered delightful by the vine-like grace of women, bestowed whatever pleasures he desired, granting each delight in accordance with his will. ॥ 8 ॥
श्लोक ( Shlok ) 9
रम्यरामामुखाम्भोजसेवालोलाक्षिषट्पदः । सुखेन सोऽनयद्दीर्घ कालं कालकलामिव ॥ ९ ॥
जिसके नेत्ररूपी भ्रमर सुन्दर स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंकी सेवा करनेमें सदा सतृष्ण रहते हैं ऐसे उस राजा महाबलने बहुत लम्बा समय सुखसे कालकी एक कलाके समान व्यतीत कर दिया ॥ ॥ ९ ॥
That king King Mahabala, whose bee-like eyes ever remained thirstily engaged in attending upon the lotus-faces of fair women, passed a vast expanse of time in happiness, as though it were but a single instant of time. ॥ 9 ॥
श्लोक ( Shlok ) 10 – 11
कदाचिज्जातवैराग्यः कामभोगेऽप्यतर्पणात् । सूनवे धनपालाय दत्वा राज्यं महामनाः ॥ १० ॥”आदात् संयममासाद्य गुरुं विमलवाहनम् । एकादशाङ्गधार्येष भावितद्वयष्टकारणः ॥ ११ ॥
किसी समय इच्छानुसार मिलनेवाले भोगोपभोगोंमें अतृप्ति होनेसे उसे वैराग्य उत्पन्न हो गया जिससे उस उदारचेताने धनपाल नामक पुत्रके लिए राज्य कर विमलवाहन गुरुके पास पहुँच संयम धारण कर लिया । वह ग्यारह अङ्ग का पाठी हुआ और सोलह कारण भावनाओंका उसने चिन्तवन किया ।। १०-११ ॥
At length, finding no satiation even in pleasures that arose at his mere desire, a spirit of detachment awakened within him. Thereupon, that noble-minded king King Mahabala entrusted the kingdom to his son Dhanapāla and approached the preceptor Vimalavahana, from whom he accepted the vows of renunciation.
He became well-versed in the eleven Aṅgas and devoted himself to contemplation upon the sixteen sacred causes (kāraṇa-bhāvanās). ॥ 10–11 ॥
श्लोक 12 से 22
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