आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 62 संसारी और मुक्त जीव
संसारी जीव इंद्रियजनित ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख, और सुंदरता को शरीर में अनुभव करता है, परंतु मुक्त जीव अतींद्रिय गुणों से परम सुख का अनुभव करता है। संसारी जीव अल्पज्ञानी होने से शास्त्रज्ञान के लिए अन्य का आश्रय लेता है, सीमित दर्शन और वीर्य के कारण उत्कंठित रहता है, और इंद्रियजनित सुख-सुंदरता के लिए पराधीन है। शरीर की रक्षा में व्याकुल रहता है और तप करने पर भी शरीर को साधन मानकर स्वीकार करता है, पर नष्ट होने पर नया शरीर चाहता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 52 to 62
श्लोक ( Shlok ) 52
ज्ञेयः पुरुषदृष्टान्तो नाम मुक्तेतरात्मनोः । यन्निदर्शनभावेन मुक्त्यमुक्त्योः समर्थनम् ॥५२॥
जिस उदाहरणसे मुक्त और कर्मबन्ध सहित जीवोंके मोक्ष और बन्ध दोनों अवस्थाओंका समर्थन किया जावे उसे पुरुषका दृष्टान्त अथवा उदाहरण जानना चाहिये ।। ५२।।
That illustration which affirms both the states—of liberation and of bondage—pertaining to the soul, whether free or enmeshed in karma, should be understood as the parable of the man.52
श्लोक ( Shlok ) 53
संसारीन्द्रियविज्ञानदृग्वीर्यसुखचारुताः । तन्वावासौ च निर्देष्टुं यतते सुखलिप्सया ॥५३॥
यह संसारी जीव सुख प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंसे उत्त्पन्न हुए ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख और सुन्दरताको शरीररूपी घरमें ही अनुभव करनेका प्रयत्न करता है ।॥५३॥
This worldly soul, desiring to attain pleasure, strives to experience—within the house-like body itself—the knowledge, perception, vitality, delight, and beauty that arise through the senses.53
श्लोक ( Shlok ) 54
मुक्तस्तु न तथा किन्तु गुणैरुक्तैरतीन्द्रियैः। परं सौख्यं स्वसाद्भूतम नुभुङ्क्ते निरन्तरम् ॥५४॥
परन्तु मुक्त जीव ऐसा नहीं करता वह तो ऊपर कहे हुए अतीन्द्रिय गुणोंसे अपने स्वाधीन हुए परम सुखका निरन्तर अनुभवे करता रहता है ।।५४।।
But the liberated soul does not act thus; rather, abiding in supreme freedom, it continually experiences its own boundless bliss through the aforementioned supersensual attributes.54
श्लोक ( Shlok ) 55
“तत्रैन्द्रियकविज्ञानः स्वल्पज्ञानतया स्वयम्। परं शास्त्रोपयोगाय श्रयति ज्ञानवित्तकम् ।।५५।।
इनमेंसे ऐन्द्रियिक ज्ञानवाला संसारी जीव स्वयं अल्प ज्ञानी होनेसे शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ज्ञानका चिन्तवन करनेवाले अन्य पुरुषोंका आश्रय लेता है ।। ५५।।
Of these, the sense-bound worldly soul, being limited in understanding, seeks the shelter of other men who contemplate knowledge, in order to acquire scriptural wisdom.55
श्लोक ( Shlok ) 56
तथैन्द्रियकदृक्रशक्तिः आत्मार्वाग्भागदर्शनः। अर्थानां विप्रकृष्टानां भवेत् संदर्शनोत्सुकः ।।५६।।
इसी प्रकार जिसके इन्द्रियोंसे देखने की शक्ति है ऐसा पुरुष अपने समीपवर्ती कुछ पदार्थोंको ही देख सकता है इसलिये वह दूरवर्ती पदार्थोंको देखनेके लिये सदा उत्कंठित होता रहता है ।॥५६॥
Likewise, a man endowed with the faculty of sight through the senses can perceive only those objects that are near; hence, he ever remains eager to behold things that lie afar.56
श्लोक ( Shlok ) 57
तथेन्द्रियकवीर्यश्च सहायापेक्षयेप्सितस् । कार्य घटयितुं वाञ्छेत् स्वयं तत्साधनाक्षमः ॥५७॥
जिसके इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुआ वीर्य है वह किसी इष्ट कार्यको स्वयं करनेमें असमर्थ होकर उसे दूसरेकी सहायताकी अपेक्षा से करना चाहता है ।।५७।।
He whose vitality arises from the senses finds himself incapable of accomplishing a desired task by his own strength, and therefore seeks to fulfil it with the aid of another.57
श्लोक ( Shlok ) 58
तत्रैन्द्रियसुखी कामभोगरत्यन्तमुन्मनाः । वाञ्छेत् सुखं पराधीनम् इन्द्रियार्थानुतर्षतः ॥५८।।
तथा जिसके इन्द्रियजनित सुख है ऐसा पुरुष काम भोगादिकोंसे उत्कंठित होता हुआ इन्द्रियों के विषयोंकी तृष्णासे पराधीन सुखकी इच्छा करता है ।।५८।।
And he whose pleasure is born of the senses, being ever restless with longing for sensual enjoyments, craves a happiness that is dependent—enslaved by desire for the objects of the senses.58
श्लोक ( Shlok ) 59
तथैन्द्रियकसौन्दर्यः स्नानमाल्यानुलेपनैः । विभूषणैश्च सौन्दर्य संस्कर्तुमभिलष्यति ॥५९॥
इसी प्रकार इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाली सुन्दरतासे युक्त पुरुष स्नान, माला, विलेपन और आभूषण आदिसे अपनी सुन्दरताका संस्कार करना चाहता है। भावार्थ आभूषण आदि धारणकर अपने शरीरकी सुन्दरता बढ़ाना चाहता है ।॥५९॥
In like manner, one adorned with beauty born of the senses seeks to enhance his charm through bathing, garlands, unguents, and ornaments—adorning himself to augment the loveliness of his body.59
श्लोक ( Shlok ) 60
दोषधातुयलस्थानं देहयेन्द्रियकं वहन् । पुमान्विश्वाण भैषज्यतद्रक्षास्वाकुलो भवेत् ॥६०॥
दोष, धातु और मलके स्थान स्वरूप इस इन्द्रियजनित शरीरको धारण करता हुआ पुरुष भोजन और औषधि आदिके द्वारा उसकी रक्षा करनेमें सदा व्याकुल रहता है ॥६०॥
Bearing this sense-born body, which is but a seat of impurities, humours, and filth, man remains ever anxious—striving constantly to preserve it through food, medicine, and the like.60
श्लोक ( Shlok ) 61 – 62
दोषान्पश्यश्च ‘जात्यादीन् देहार्तस्त ज्जिहासया। प्रेक्षाकारी तपः कर्तु “प्रयस्यति यदा कदा ॥६१॥स्वीकुर्वन्निन्द्रियावासं सुखमायुश्च तद्गतम् । आवासान्तरमन्विच्छेत् प्रेक्षमाणः प्रणश्वरम् ॥६२॥
जन्म मरण आदि अनेक दोषोंको देखता हुआ और शरीरसे दुखी हुआ कोई विचारवान् पुरुष जब उसे छोड़नेकी इच्छासे तप करने-का प्रयास करता है तब वह इन्द्रियोंके निवास स्वरूप शरीरको, उससे सम्बन्ध रखनेवाले सुख और आयुको भी स्वीकार करता है और अन्तमें उसे भी नष्ट होता हुआ देखकर दूसरे ऐन्द्रियिक निवासकी इच्छा करता है। भावार्थ तपश्चरण करनेका इच्छुक पुरुष यद्यपि शरीरको हेय समझकर छोड़ना चाहता है परन्तु साधन समझकर उसे स्वीकार करता है और जब तक इष्ट-मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक प्रथम शरीरके जर्जर हो जानेपर द्वितीय शरीरकी इच्छा करता रहता है ।। ६१-६२ ।।
Observing the many afflictions of birth, death, and the like, and tormented by the body, a thoughtful man endeavors to renounce it through the practice of austerity. Yet, desiring liberation, he accepts this very body—as the abode of the senses—along with its pleasures and span of life, regarding it as a means to his end. And when he sees even that perishing, he begins to long for another sense-bound body.
In essence, though the seeker of austerity deems the body fit to be cast off, he accepts it as a necessary instrument; and until the desired liberation is attained, he continues to yearn for yet another body when the former is worn away.61 – 62
श्लोक 63 से 71
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
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आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
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