आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 गुरुस्थानाभ्युपगम और गणोपग्रहण क्रिया
गुरुस्थानाभ्युपगम क्रिया में साधु, जिसने समस्त विद्याएं सीख ली हैं और अंतःकरण को वश किया है, गुरु की अनुमति से उनका स्थान ग्रहण करता है। वह विनयवान और धर्मात्मा होकर शिष्यों को धर्मोपदेश देता है। गणोपग्रहण क्रिया में आचार्य मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविकाओं का गण बनाकर उनका पोषण करता है। वह शास्त्र अध्ययन की इच्छा वालों को दीक्षा देता है, सदाचारियों को प्रेरित करता है, और दुराचारियों को दूर रखता है। यह क्रिया संघ की रक्षा और धर्म प्रचार पर केंद्रित है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
गणपोषणमित्याविष्कुर्वन्नाचार्यसत्तमः । ततोऽयं स्वगुरुस्थान संक्रान्तो यत्नवान् भवेत् ॥ १७२॥
तदनन्तर इस प्रकार संघका पालन करता हुआ वह उत्तम आचार्य अपने गुरुका स्थान प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न सहित हो ॥१७२।।
Thereafter, while devotedly upholding and nurturing the monastic order, let that noble Ᾱcārya strive with earnest effort to ascend to the revered seat of his own Guru.॥172॥
श्लोक ( Shlok ) 173
अधीतविद्यं तद्विद्यैरादृतं मुनिसत्तमैः। योग्यं शिष्यमथाहूय तस्मै स्वं भारमर्पयेत् ॥ १७३ll
जिसने समस्त विद्याएं पढ़ ली हैं और उन विद्याओंके जानकार उत्तम उत्तम मुनि जिसका आदर करते हैं ऐसे योग्य शिष्यको बुलाकर उसके लिये अपना भार सौंप दे ॥ १७३।।
He who has mastered all the sacred sciences, and whom the most noble and learned monks hold in high esteem—such a worthy disciple should be summoned, and unto him should the Master entrust the sacred burden of his office.॥173॥
श्लोक ( Shlok ) 174
गुरोरनुमतात् सोऽपि गुरुस्थानमधिष्ठितः । गुरुवृत्तौ स्वयं तिष्ठन् वर्तयेदखिलं गणम् ॥१७४॥इति स्वगुरुस्थानावाप्तिः ।
गुरुकी अनुमतिसे वह शिष्य भी गुरुके स्थानपर अधिष्ठित होता हुआ उनके समस्त आचरणोंका स्वयं पालन करे और समस्तसंघको पालन करावे ॥ १७४।। यह उन्तीसवीं स्वगुरु-स्थानावाप्ति क्रिया है।
With the Guru’s consent, that disciple, now established in the Guru’s place, faithfully upholds all the Guru’s conduct and ensures the care and sustenance of the entire Sangha.॥174॥This is the twenty-ninth rite, known as the Swaguru-Sthānāvāpti Kriyā (the Rite of Assuming the Guru’s Position).
श्लोक ( Shlok ) 175
तत्रारोप्य भरं कृत्स्नं काले कस्मिश्चिदव्यथः । कुर्यादेकविहारी स निःसङ्गत्वात्मभावनाम् ॥१७५।।
इस प्रकार सुयोग्य शिष्यपर समस्त भार सौंपकर जो किसी कालमें दुःखी नहीं होता है ऐसा साधु अकेला विहार करता हुआ ‘मेरा आत्मा सब प्रकारके परिग्रहसे रहित है’ इस प्रकारकी भावना करे ।। १७५।।
Thus, having entrusted the entire responsibility to a worthy disciple, the ascetic—who at no time experiences sorrow—wanders alone, holding steadfast to the conviction:“My soul is free from all forms of attachment.”—175.
श्लोक ( Shlok ) 176
निःसङ्गवृत्तिरेकाकी विहरन् स महातपाः । चिकीर्पुरात्मसंस्कारं नान्यं संस्कर्तुमर्हति ॥१७६॥
जिसकी वृत्ति समस्त परिग्रहसे रहित है, जो अकेला ही विहार करता है, महातपस्वी है और जो केवल अपने आत्माका ही संस्कार करना चाहता है उसे किसी अन्य पदार्थका संस्कार नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको छोड़कर किसी अन्य साधु या गृहस्थके सुधारकी चिन्तामें नहीं पड़ना चाहिये ।। १७६ ।।
He whose disposition is entirely free from all attachments, who roams alone as a great ascetic, and who desires solely the refinement of his own soul — such a one should not concern himself with the cultivation of any other matter; that is, he must not engross his mind in the improvement of any other ascetic or householder beyond his own self.—Verse 176
श्लोक ( Shlok ) 177
अपि रागं समुत्सृज्य शिष्यप्रवचनादिपु । निर्ममत्वैकतानः संश्चर्याशुद्धि तदाऽश्रयेत् ॥१७७॥इति निःसङ्गत्वात्मभावना ।
शिष्य पुस्तक आदि सब पदार्थोंमें राग छोड़कर और निर्ममत्वभावनामें एकाग्र बुद्धि लगाकर उस समय उसे चारित्रकी शुद्धि धारण करनी चाहिये ।।१७७।। यह तीसवीं निःसङ्गत्वात्मभावना क्रिया है।
The disciple, renouncing attachment even to scriptures and other possessions, and with a resolute, unwavering mind, must then cultivate purity of character.—Verse 177.This is the Thirtieth practice of the detached and selfless disposition.
श्लोक ( Shlok ) 178
कृत्वेवमात्मसंस्कारं ततः सल्लेखनोद्यतः । कृतात्मशुद्धिरध्यात्मं योगनिर्वाणमाप्नुयात् ॥१७८॥
तदनन्तर इस प्रकार अपने आत्माका संस्कार कर जो सल्लेखना धारण करने के लिये उद्यत हुआ है और जिसने सब प्रकारसे आत्माकी शुद्धि कर ली है ऐसा पुरुष योगनिर्वाण क्रियाको प्राप्त हो ।॥१७८॥
Thereafter, having thus refined his own self, one who is resolved to undertake the solemn vow of Sallekhana—and who has purified the soul in every manner—attains the sacred rite known as Yoga-Nirvāṇa.—Verse 178
श्लोक ( Shlok ) 179
योगो ध्यानं ‘तदर्थो यो यत्नः संवेगपूर्वकः । तमाहुर्योगनिर्वाणसम्प्राप्तं परमं तपः ॥१७९॥
योग नाम ध्यानका है उसके लिये जो संवेग-पूर्वक प्रयत्न किया जाता है उस परम तपको योगनिर्वाण संप्राप्ति कहते हैं ।॥ १७९।।
Yoga denotes meditation, a disciplined effort undertaken with intense fervor; that supreme austerity thus achieved is called the attainment of Yoga-Nirvāṇa.—Verse 179
श्लोक ( Shlok ) 180
कृत्वा परिकरं योग्यं तनुशोधनपूर्वकम् । शरीरं कर्शयेद्दोषैः समं रागादिभिस्तदा ॥१८०॥
प्रथम ही शरीरको शुद्ध कर सल्लेखनाके योग्य आचरण करना चाहिये और फिर रागादि दोषोंके साथ शरीरको कृश करना चाहिये ।। १८० ।।
First and foremost, one should purify the body by observing conduct worthy of Sallekhana,and thereafter, with the afflictions of attachment and the like, gradually weaken the body.—Verse 180
श्लोक ( Shlok ) 181
तदेतद्योगनिर्वाणं संन्यासे पूर्वभावना । जीविताशां मूतीच्छां च हित्वा भव्यात्मलब्धये ॥१८१॥
जीवित रहने आशा और मरनेकी इच्छा छोड़कर ‘यह भव्य है’ इस प्रकारका सुयश प्राप्त करने के लिये संन्यास धारण करनेके पहले भावना की जाती है वह योगनिर्वाण कहलाता है ।। १८१।।
Renouncing all hope of life and desire for death,one cultivates the resolve, “This is the supreme goal,”as a preparatory meditation before embracing renunciation;this is called Yoga-Nirvana.—Verse 181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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